04-09-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
जब तुम फूल बनेंगे, तब यह हिन्दुस्तान काँटों के जंगल से मुकम्मल फूलों का बगीचा बनेगा, रब्बा आया है तुम्हें फूल बनाने"

सवाल:-
मन्दिर लायक़ बनने के लिए किन बातों पर ख़ास तवज्जो देना है?

जवाब:-
मन्दिर लायक़ बनना है तो चलन पर ख़ास तवज्जों दो - चलन निहायत मीठी और रॉयल होनी चाहिए। इतना मीठापन हो जो दूसरों को उसकी महसूसता आये। अनेकों को रब का तारूफ दो। अपना फ़लाह करने के लिए अच्छी तरह तजवीज़ कर ख़िदमत पर लगे रहो।

नग़मा:-
बदल जाए दुनिया न बदलेंगे हम........

आमीन।
रूहानी बच्चे जानते हैं कि रब आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए समझा रहे हैं। आदम अलैहिस्सलाम के जिस्म के ज़रिए ही समझाते रहते हैं। हम यह अहद करते हैं कि सिरात ए मुस्तकीम पर हम इस हिन्दुस्तान की सरज़मी को नापाक से पाकीज़ा बनायेंगे। हिन्दुस्तान ख़ास और दुनिया आम, सबको हम नापाक से पाक बनने का रास्ता बताते हैं। इतने ख्यालात दरेक को अपनी अक्ल में रखना है। रब फ़रमाते हैं ड्रामा के मुताबिक़ जब तुम फूल बन जायेंगे और जब वक़्त आ जायेगा तो मुकम्मल बगीचा बन जायेगा। बागवान भी ग़ैर मुजस्सम को कहा जाता है, माली भी ग़ैर मुजस्सम को कहा जाता है, जिस्मानी को नहीं। माली भी रूह है, न कि जिस्म। बागवान भी रूह है। रब समझायेंगे तो ज़रूर जिस्म के ज़रिए ना। जिस्म के साथ ही उनको माली बागवान कहा जाता है, जो इस दुनिया को फूलों का बगीचा बनाते हैं। बगीचा था जहाँ यह हूरैन रहते थे। वहाँ कोई दुःख नहीं था। यहाँ इस कांटों के जंगल में तो दुःख है, शैतान की सल्तनत है, कांटों का जंगल है। फट से कोई फूल नहीं बनते। हूरैन के आगे जाकर गाते भी हैं कि हम विलादत दर विलादत के गुनाहगार हैं, अजामिल हैं। ऐसी दुआ करते हैं, अब आकर हमको नफ़ीस रूह बनाओ। समझते हैं अभी हम ख़बीस रूह हैं। कोई वक़्त नफ़ीस रूह थे। अभी इस दुनिया में नफ़ीस रूहों की सिर्फ़ तस्वीर हैं। दारूल हुकूमत के हेड्स की तस्वीर हैं और उन्हों को ऐसा बनाने वाला ग़ैर मुजस्सम पाक परवरदिगार है। उनकी तस्वीर है, बस। और कोई तस्वीर हैं नहीं। इसमें भी पाक परवरदिगार का तो बड़ा लिंग बना देते हैं। कहते भी हैं कि रूह स्टार मिसल है, तो ज़रूर रब भी ऐसा होगा ना। मगर उनकी पूरी पहचान नहीं है। इन आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की दुनिया में सल्तनत थी। इनके वास्ते कहाँ भी कोई जुर्म की बात नहीं लिखते। बाक़ी कृष्ण को कब द्वापर में, कब कहाँ ले जाते। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम के लिए सब कहेंगे जन्नत के मालिक थे। यह है तुम्हारी एम आब्जेक्ट। राधे-कृष्ण कौन हैं इन्सान बिचारे एकदम मुझे हुए हैं, कुछ नहीं समझते। जो रब के ज़रिए समझते हैं, वह समझाने लायक़ भी बनते हैं। नहीं तो लायक़ बन नहीं सकते। हूरैन फ़ज़ीलत इख्तियार कर नहीं सकते। भल कितना भी समझाओ। मगर ड्रामा के मुताबिक़ ऐसा होना ही है। तुम अभी खुद समझते हो हम सब बच्चे रब की सिरात ए मुस्तकीम पर हिन्दुस्तान की रूहानी खिदमत करते हैं अपने ही जिस्म-ज़हन-दौलत से। नुमाइश और म्युज़ियम वगैरह में पूछते हैं तुम हिन्दुस्तान की क्या खिदमत करते हो? तुम जानते हो हम हिन्दुस्तान की निहायत अच्छी खिदमत करते हैं, जंगल से बगीचा बना रहे हैं। जन्नत है गार्डन। यह है काँटों का जंगल। एक-दो को दु:ख देते रहते हैं। यह तुम अच्छी तरह समझा सकते हो। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की तस्वीर भी निहायत अच्छी बनानी चाहिए। मन्दिरों में निहायत खूबसूरत तस्वीर बनाते हैं। कहाँ हसीन, कहाँ स्याह तस्वीर बनाते, उनका क्या राज़ है, यह भी समझते नहीं। तुम बच्चों को अभी यह तमाम इल्म है। रब फ़रमाते हैं मैं आकर सबको मन्दिर लायक़ बनाता हूँ, मगर सब मन्दिर लायक़ नहीं बनते हैं। अवाम को तो मन्दिर लायक़ नहीं कहेंगे ना। अवाम उन्हों की होगी जो तजवीज़ कर निहायत खिदमत करते हैं। तुम बच्चों को रूहानी सोशल खिदमत भी करनी है, इस खिदमत में अपनी ज़िन्दगी कामयाब करनी है। चलन भी निहायत मीठी खुबसूरत होनी चाहिए, जो औरों को भी मीठे-पन से समझा सकें। खुद ही कांटा होगा तो किसको फूल कैसे बनायेंगे, उनका तीर पूरा लगेगा नहीं। रब को याद नहीं करते होंगे तो तीर कैसे लगेगा। अपने फ़लाह के वास्ते अच्छी तरह तजवीज़ कर खिदमत में लगे रहो। रब भी खिदमत पर है ना। तुम बच्चे भी दिन-रात खिदमत पर रहो। दूसरी बात, समझाते हैं शिवजयन्ती पर निहायत बच्चे तारें भेज देते हैं, उनमें भी ऐसी लिखत लिखनी चाहिए जो वह तारें किसको भी दिखायें तो समझ जाएं। आगे के लिए क्या करना है, उसकी तजवीज़ की जाती है। सेमीनार भी इसलिए करते हैं कि क्या-क्या खिदमत करें जो निहायतों को रब का तारूफ मिले। तारें ढेर रखी हैं, इनसे निहायत काम ले सकते हो। एड्रेस डालते हैं पाक परवरदिगार केयर ऑफ आदम अलैहिस्सलाम। बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम भी है, वह रूहानी बाप, वह जिस्मानी। उनसे जिस्मानी मख़लूक़ तामीर किये जाते है। रब है इन्सानी ख़िल्क़त का खालिक। कैसे मख़लूक़ तामीर करते हैं, यह दुनिया भर में कोई नहीं जानते। रब आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए अब नए मख़लूक़ तामीर कर रहे हैं। मोमिन हैं चोटी। पहले-पहले मोमिन ज़रूर चाहिए। तफ्सील रूप की है यह चोटी। मोमिन, हूरैन, जंग जू, कारोबारी, यज़ीद। पहले यज़ीद तो नहीं हो सकते। रब आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए मोमिन तामीर करते हैं। यज़ीद कैसे और किस के ज़रिए बनाएंगे? तुम बच्चे जानते हो कैसे नए मख़लूक़ बनते हैं, यह एडाप्शन है रब की। कल्प-कल्प रब आकर यज़ीद से मोमिन बनाते हैं फिर मोमिन से हूरैन बनाते हैं। मोमिनों की खिदमत निहायत आलातरीन है। वह ब्राह्मण लोग खुद ही पाकीज़ा नहीं हैं तो दूसरे को पाकीज़ा कैसे बनायेंगे। कोई भी ब्राह्मण संन्यासी को कभी राखी नहीं बांधेगे। वह कहेंगे हम तो हैं ही पाकीज़ा । तुम अपना मुंह देखो। तुम बच्चे भी कोई से राखी नहीं बंधवा सकते। दुनिया में तो तमाम एक-दो को बांधते हैं। बहन-भाई को बांधती है, यह रिवाज़ अभी निकला है। अभी तुम यज़ीद से मोमिन बनने के लिए तजवीज़ करते हो। समझाना पड़ता है। मेल-फीमेल दोनों पाकीज़गी का अहद करते हैं, दोनों बता सकते हैं कि हम कैसे रब की सिरात ए मुस्तकीम से पाकीज़ा रहते हैं। आख़िर तक इस हवस ख़बासत पर फ़तह रहे तो पाकीज़ा जहान का मालिक बनेंगे। पाकीज़ा दुनिया जन्नत को कहा जाता है, सो अब क़ायम हो रही है। तुम सब पाकीज़ा हो। ख़बासत में गिरने वाले को राखी बांध सकते हो। अहद कर और फिर नापाक बने तो कहेंगे तुम राखी बंधवाने आये थे फिर क्या हुआ? कहेंगे इबलीस से हार खा ली, यह है जंग का मैदान । ख़बासत बड़ा दुश्मन है। इन पर फ़तह पाने से ही जहान फ़तहयाब यानि कि राजा-रानी बनना है, अवाम को जहान फ़तहयाब नहीं कहेंगे। मेहनत तो राजा-रानी करते हैं ना। कहते भी हैं हम तो आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम बनेंगे। वह फिर नूह अलैहिस्सलाम और आबर अलैहिस्सलाम भी बनेंगे। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम के बाद उनके तख्त पर जीत, उनके बच्चे की होती है। वह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम फिर दूसरी विलादत में नीचे चले जायेंगे। अलग नाम-रूप से बच्चे को गद्दी मिलती है तो आला नम्बर गिना जायेगा। दोबारा विलादत तो लेते हैं ना। बच्चा तख्त पर बैठेगा तो वह सेकण्ड ग्रेड हो जायेगा। ऊपर वाला नीचे, नीचे वाला ऊपर आ जायेगा। तो अब बच्चों को ऐसा आला बनना है तो खिदमत में लग जाना चाहिए। पाकीज़ा होना भी निहायत ज़रूरी है। रब फ़रमाते हैं मैं पाकीज़ा दुनिया बनाता हूँ। अच्छा तजवीज़ थोड़े करते हैं, पाकीज़ा तो सारी दुनिया बन जाती है। तुम्हारे लिए जन्नत का क़याम करते हैं। यह ड्रामा के मुताबिक़ होना ही है, यह खेल बना हुआ है। तुम पाकीज़ा बन जाते हो फिर तबाही शुरू हो जाती है। जन्नत का क़याम हो जाता है। ड्रामा को तो तुम समझ सकते हो। सुनहरे दौर में थी हूरैनों की सल्तनत। अभी नहीं है फिर होनी है। तुम हो रूहानी मिलेट्री। तुम 5 ख़बासत पर फ़तह पाने से जहान फ़तहयाब बनने वाले हो।विलादत दर विलादत के गुनाह कटने लिए रब्बा तरीक़े बताते हैं। रब एक ही बार आकर तरीक़ा बताते हैं। जब तक दारूल हुकूमत क़ायम न हो जाए तब तक तबाही नहीं होगी। तुम निहायत बातिन वारियर्स हो। सुनहरा दौर होना ही है इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के बाद। फिर सुनहरे दौर में कभी लड़ाई होती नहीं। तुम बच्चे जानते हो तमाम रूहें जो भी पार्ट बजाती हैं, वह सब बंधा हुआ है। जैसे कठपुतलियाँ होती हैं ना, ऐसे नाचती रहती हैं। यह भी ड्रामा है, दरेक का इस ड्रामा में पार्ट है। पार्ट बजाते-बजाते तुम स्याह रास्त बने हो। फिर अब ऊपर जाते हो, ख़ैर रास्त बनते हो। नॉलेज तो सेकण्ड की है। सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनते हैं फिर गिरते-गिरते स्याह रास्त बनते हैं। फिर रब ऊपर ले जाते हैं। असल में वह मछलियाँ तार में लटकती हैं, इस तार में इन्सानों को डालना चाहिए। ऐसे उतरता फ़न फिर चढ़ता फ़न होता है। तुम भी ऐसे चढ़ते हो फिर उतरते-उतरते नीचे आ जाते हो। 5 हज़ार साल लगते हैं ऊपर जाकर फिर उतरने में। यह 84 का चक्कर तुम्हारे अक्ल में है। उतरते फ़न और चढ़ते फ़न का राज़ रब ने ही समझाया है। तुम्हारे में भी नम्बरवार जानते हैं और फिर तजवीज़ करते हैं, जो रब को याद करते हैं वह जल्दी ऊपर जाते हैं। यह कुनबाई राह है। जैसे जोड़ी को दौड़ाते हैं तो जोड़ी का एक-एक पैर बांधते हैं फिर दौड़ते हैं। यह भी तुम्हारी दौड़ी है ना। कोई की प्रैक्टिस नहीं होती है तो गिर पड़ते हैं, इसमें भी ऐसे होता है। एक आगे बढ़ता है, तो दूसरा रोक लेता है, कहाँ दोनों गिर पड़ते हैं। रब्बा वन्डर खाते हैं - बुज़ुर्गों को भी हवस की आग लगती है तो वह भी गिर पड़ते हैं। ऐसे थोड़े ही उसने गिराया। गिरना, न गिरना अपने हाथ में है। कोई धक्का थोड़े ही देते हैं, हम गिरें क्यों? कुछ भी हो जाए हम गिरेंगे नहीं। गिरे तो खाना ख़राब, ज़ोर से चमाट लगती है। फिर पछताते भी हैं, हड्डी-हड्डी टूट जाती है। निहायत चोट लगती है।रब्बा अलग-अलग तरह से समझाते रहते हैं। यह भी समझाया शिव जयन्ती पर तारें ऐसी आनी चाहिए जो इन्सान पढ़ने से समझ जाएं। इरादा ए ग़ौरतलब करने के लिए रब्बा टाइम देते हैं। कोई देखें तो वन्डर खाये। कितनी चिट्ठियां आती हैं, सब लिखते हैं बाप दादा। तुम समझा भी सकते हो पाक परवरदिगार को बाप, आदम अलैहिस्सलाम को दादा कहते हैं। एक को कभी कोई बापदादा कहते हैं क्या? यह तो वन्डरफूल बात है, इसमें सच्चा-सच्चा इल्म है। मगर याद में रहें तब किसको तीर भी लगे। घड़ी-घड़ी जिस्मानी हवास में आ जाते हैं। रब फ़रमाते हैं रूहानी हवासी बनो। रूह ही जिस्म इख्तियार कर पार्ट बजाती है। कोई मरता है तो भी कोई ख्याल नहीं। रूह में जो पार्ट की नूंध है उसको हम साक्षी हो देखते हैं। उनको एक जिस्म छोड़ दूसरा ले पार्ट बजाना है। इसमें हम कर ही क्या सकते हैं? यह इल्म भी तुम्हारी अक्ल में है। वह भी नम्बरवार। कईयों की अक्ल में तो ठहरता ही नहीं इसलिए किसको समझा नहीं सकते। रूह बिल्कुल ही गर्म तवा, स्याह रास्त नापाक है। उन पर इल्म का आब ए हयात डाला जाता है तो ठहरता नहीं। जिसने निहायत अकीदत मन्दी की है, उनको ही तीर लगेगा, झट इख्तियार होगा। हिसाब ही वन्डरफुल है - पहले नम्बर में पाकीज़ा, वही फिर नापाक बनते हैं। यह भी कितनी समझने की बातें होती हैं। कोई की तक़दीर में नहीं है तो तालीम को छोड़ देते हैं। अगर छोटेपन से ही नॉलेज में लग जाएं तो अमल होता जायेगा। समझेंगे इसने निहायत अकीदत मन्दी की हुई है, निहायत होशियार हो जाए, क्योंकि आरगन्स बड़े होने से फिर समझ भी जास्ती आती है। जिस्मानी, रूहानी दोनों तरफ़ अटेन्शन देने से फिर वह असर निकल जाता है। यह है इलाही तालीम। फ़र्क है ना। मगर जब वह लगन भी लगे ना। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-

1) रूहानी मिलेट्री बन 5 ख़बासतों पर फ़तह पानी है, पाकीज़ा ज़रूर बनना है। सिरात ए मुस्तकीम पर हिन्दुस्तान को पाकीज़ा बनाने की खिदमत करनी है।

2) इस बेहद ड्रामा में हर पार्ट रूहानी हवासी होकर बजाना है, कभी भी जिस्मानी हवास में नहीं आना है। साक्षी होकर हर एक एक्टर का पार्ट देखना है।

बरक़ात:-
इज़्ज़त ए आप के ज़रिए तकब्बुर को खत्म करने वाले हमेशा हलीम बनों

जो बच्चे इज़्ज़त ए आप में रहते हैं उन्हें कभी भी तकब्बुर नहीं आ सकता, वे हमेशा हलीम होते हैं। जितना बड़ा इज़्ज़त ए आप उतना ही हाँ जी में हलीम । छोटे बड़े, इल्मी-बेइल्मी, इबलीस फ़तहयाब या इबलीस के बस, फ़ज़ीलत नशीन हो या कोई एक दो ख़सलत नशीन भी हो यानि कि फ़ज़ीलत नशीन बनने की तजवीज़ हो मगर इज़्ज़त ए आप वाले तमाम को इज़्ज़त देने वाले खैराती होते हैं यानि कि खुद लबरेज़ होने के सबब हमेशा रहमदिल होते हैं।

स्लोगन:-
प्यार ही आसान याद का अस्बाब है इसलिए हमेशा प्यारे रहना और प्यारे बनाना।

आमीन