04-10-2020 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 29-03-86


डबल विदेशी बच्चों से रब उल हक़ की रूह-रिहान

आज रब उल हक़ चारों ओर के डबल विदेशी बच्चों को वतन में इमर्ज कर तमाम बच्चों की खासियतों को देख रहे थे क्योंकि तमाम बच्चे ख़ास रूहें हैं तब ही रब के बने हैं यानि कि अफ़ज़ल क़िस्मत नशीन बने हैं। ख़ास तमाम हैं फिर भी नम्बरवार तो कहेंगे। तो आज रब उल हक़ डबल विदेशी बच्चों को ख़ास रूप से देख रहे थे। थोड़े वक़्त में चारों ओर के अलग-अलग रीति-रसम और एतमाद होते हुए भी एक एतमाद के एक सलाह वाले बन गये हैं। रब उल हक़ खास दो खासियत मैजारिटी में देख रहे हैं। एक तो प्यार के रिश्ते में निहायत जल्दी बंध गये हैं। प्यार के रिश्ते में, इलाही फैमिली का बनने में, रब का बनने में अच्छी इमदाद दिया है। तो एक प्यार में आने की खासियत, दूसरा प्यार के सबब तब्दीली-कुव्वत आसानी से प्रैक्टिकल में लाया। खुद को तब्दीली और साथ-साथ हमजिन्स के तब्दीली में अच्छी लगन से आगे बढ़ रहे हैं। तो प्यार की कुव्वत और तब्दील करने की कुव्वत इन दोनों खासियतों को हिम्मत से इख्तियार कर अच्छा ही सबूत दिखा रहे हैं।
आज वतन में रब उल हक़ आपस में बच्चों की खासियत पर रूह-रिहान कर रहे थे। अभी इस साल के रूहानी का जिस्मानी में मिलने की सीजन कहो या मिलन मेला कहो ख़त्म हो रहा है, तो रब उल हक़ तमाम की रिज़ल्ट को देख रहे थे। वैसे तो रूहानी रूप से रूहानी सूरत ए हाल से हमेशा का मिलन है ही और हमेशा रहेगा। मगर जिस्मानी रूप के ज़रिए मिलन का वक्त तय करना पड़ता है और इसमें वक़्त की हद रखनी पड़ती है। रूहानी रूप के मिलन में वक़्त की हद नहीं है, जो जितना चाहे मिलन मना सकते हैं। रूहानी कुव्वत का एहसास कर खुद को खिदमत को स
हमेशा आगे बढ़ा सकते हैं। फिर भी तयशुदा वक़्त के मुताबिक़ इस साल की यह सीजन ख़त्म हो रही है। मगर ख़त्म नहीं है मुकम्मल बन रहे हैं। मिलना यानि कि बराबर बनना। बराबर बने ना। तो खात्मा नहीं है, भले सीज़न का वक्त तो ख़त्म हो रहा है मगर ख़ुद बराबर और लबरेज़ बन गये इसलिए रब उल हक़ चारों ओर के डबल विदेशी बच्चों को वतन में देख खुशगवार हो रहे थे क्योंकि जिस्मानी में तो कोई आ सकता, कोई नहीं भी आ सकता, इसलिए अपनी तस्वीर या ख़त भेज देते हैं।मगर रूहानी रूप में रब उल हक़ चारों ओर की सोहबत "न को आसानी से इमर्ज कर सकता है। अगर यहाँ तमाम को बुलावें फिर भी रहने वगैरह का तमाम अस्बाब चाहिए। रूहानी वतन में तो इन मैकरू अस्बाबों की कोई ज़रूरत नहीं। वहाँ तो सिर्फ़ डबल विदेशी क्या मगर तमाम हिन्दुस्तान के बच्चे भी इकट्ठे करो तो ऐसे लगेगा जैसे बेहद का रूहानी वतन है। वहाँ भले कितने भी लाख हों फिर भी ऐसे ही लगेगा जैसे छोटी सी तनज़ीम दिखाई दे रही है। तो आज वतन में सिर्फ़ डबल विदेशियों को इमर्ज किया था।
रब उल हक़ देख रहे थे कि अलग रसम-रिवाज़ होते हुए भी मज़बूत इरादे से तरक्की अच्छी की है। मैजारिटी जोश-हुल्लास में चल रहे हैं। कोई-कोई खेल दिखाने वाले होते ही हैं मगर रिज़ल्ट में यह फर्क देखा कि अगले साल तक कनफ्यूज ज़्यादा होते थे। मगर इस साल की रिज़ल्ट में कई बच्चे पहले से मज़बूत देखे। कोई-कोई रब उल हक़ को खेल दिखाने वाले बच्चे भी देखे। कन्फ्यूज होने का भी खेल करते हैं ना। उस वक़्त का वीडियो निकाल बैठ देखो तो आपको बिल्कुल ड्रामा लगेगा। मगर पहले से फ़र्क है। अभी एहसास साती बने हुए गम्भीर भी बन रहे हैं। तो यह रिज़ल्ट देखी कि तालीम से प्यार और याद में रहने का हुल्लास अलग रीति-रसम एतमाद को आसानी से बदल देता है। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीनियों को तब्दील होने में आसानी है। हूरैनों को जानते हैं, सहीफों के मिक्स नॉलेज को जानते हैं तो एत्मादें हिन्दुस्तान रिहाईश नशीनियों के लिए इतनी नयी नहीं है। फिर भी टोटल चारों ओर के बच्चों में ऐसे यक़ीनी दानिश मन्द, अटल, अचल रूहें देखीं। ऐसे यक़ीनी दानिश मन्द औरों को भी यक़ीनी दानिश मन्द बनाने में एक्जाम्पुल बनी हुई हैं। फैमिली में रहते भी पाॅवरफुल इरादे से नज़र, कैफियत तब्दील कर लेते। वह भी ख़ास जवाहिरात देखे। कई ऐसे भी बच्चे हैं जो जितना ही अपनी रीति मुताबिक क़लील अरसे के अस्बाबों में, क़लील अरसे की खुशियों में मस्त थे, ऐसे भी रात-दिन की तब्दीली में अच्छे तेज़ तजवीज़ नशीन की लाइन में चल रहे हैं। चाहे ज़्यादा अन्दाज न भी हो मगर फिर भी अच्छे हैं। जैसे रब उल हक़ झाटकू का मिसाल देते हैं। ऐसे ज़हनी तौर से कुर्बानी का इरादा करने के बाद फिर ऑख भी न डूबे ऐसे भी हैं। आज टोटल रिज़ल्ट देख रहे थे। कुव्वत नशीन रूहों को देख रब उल हक़ मुस्कराते हुए रूह-रिहान कर रहे थे कि आदम अलैहिस्सलाम के मख़लूक़ दो तरह की गाई हुई है। एक आदम अलैहिस्सलाम के मुंह से मोमिन निकले। और दूसरी मख़लूक़-आदम अलैहिस्सलाम ने इरादे से खिल्क़त तामीर की। तो आदम बाप ने कितने वक़्त से अफ़ज़ल कुव्वत नशीन इरादा किया! हैं तो बाप-दादा दोनों ही फिर भी मख़लूक़ के लिए पाक परवरदिगार का मख़लूक़ नहीं कहेंगे। खानदान ए अल्ल्लाह् ताला कहेंगे। अल्ल्लाह् ज़ादा-अल्लाह ज़ादी नहीं कहेंगे। आदम ज़ादा -ज़ादियां कहेंगे। तो आदम अलैहिस्सलाम ने खास अफ़ज़ल इरादें से बुलावा किया यानि कि मख़लूक़ तामीर किया। तो यह आदय अलैहिस्सलाम के कुव्वत नशीन इरादे से, बुलावे से जिस्मानी रूप में पहुँच गये हैं।
इरादे के मख़लूक़ भी कम नहीं है। जैसे इरादा कुव्वत नशीन है तो दूर से अलग पर्दों के अन्दर से बच्चों को अपनी फैमिली में लाना था, अफ़ज़ल कुव्वत नशीन इरादे ने कशिश कर नज़दीक लाया, इसलिए यह कुव्वत नशीन इरादे की मख़लूक़ भी कुव्वत नशीन है। कईयों का एहसास भी है - जैसे अक्ल को ख़ास कोई कशिश कर नज़दीक ला रहा है। आदम अलैहिस्सलाम के कुव्वत नशीन इरादे के सबब आदम अलैहिस्सलाम की तस्वीर को देखते ही ज़िन्दा नशीनी का एहसास होता है। ज़िन्दा राब्ते के एहसास से आगे बढ़ रहे हैं। तो रब उल हक़ मख़लूक़ को देख ख़ुशग्वार हो रहे हैं। अभी आगे और भी कुव्वत नशीन मख़लूक़ का ज़ाहिर सबूत देते रहेंगे। डबल विदेशियों की खिदमत के वक्त के हिसाब से अब बचपन का वक़्त खत्म हुआ। अभी एहसास साती बन औरों को भी अचल अडोल बनाने का, एहसास कराने का वक़्त है। अभी खेल करने का वक़्त खत्म हुआ। अब हमेशा क़ाबिल बन कमज़ोर रूहों को क़ाबिल बनाते चलो। आप लोगों में कमज़ोरी की आदत होंगी तो दूसरों को भी कमज़ोर बनायेंगे। वक़्त कम है और मख़लूक़ ज़्यादा-से-ज़्यादा आने वाली है। इतनी तादाद में ही ख़ुश नहीं हो जाना कि निहायत हो गये। अभी तो तादाद बढ़नी ही है। मगर जैसे आपने इतना वक़्त परवरिश ली और जिस तरीक़े से आप लोगों ने परवरिश ली, अब वह तब्दील होता जायेगा।
जैसे 50 सालों की परवरिश वाले गोल्डन जुबली वालों में और सिल्वर जुबली वालों में फ़र्क रहा है ना। ऐसे पीछे आने वालों में फ़र्क होता जायेगा। तो थोड़े वक़्त में उन्हें कुव्वत नशीन बनाना है। खुद उन्हों की अफ़ज़ल जज़्बात तो होगी ही। मगर आप तमाम को भी ऐसे थोड़े वक़्त में आगे बढ़ने वाले बच्चों को अपने रिश्ते और राब्ते की इमदाद देनी ही है, जिससे उन्हों को आसानी से आगे बढ़ने का जोश और हिम्मत हो। अभी यह खिदमत निहायत होनी है। सिर्फ़ अपने लिए कुव्वतें जमा करने का वक़्त नहीं है। मगर अपने साथ औरों के वास्ते भी कुव्वतें इतनी जमा करनी हैं जो औरों को भी इमदाद दे सको। सिर्फ़ इमदाद लेने वाले नहीं मगर देने वाले बनना है। जिन्हों को दो साल भी हो गया है उन्हों के लिए दो साल भी कम नहीं हैं। थोड़े टाइम में तमाम एहसास करना है। जैसे दरख्त में दिखाते हो ना, लास्ट आने वाली रूह भी 4 स्टेजेस से पास ज़रूर होती हैं। फिर चाहे 10-12 विलादत भी हों या कितने भी हों। तो पीछे आने वालों को भी थोड़े वक़्त में तमाम कुव्वतों का एहसास करना ही है। स्टूडेन्ट लाइफ़ का भी और साथ-साथ खिदमत नशीनी का भी एहसास करना है। खिदमत नशीन को सिर्फ़ कोर्स कराना या तक़रीर करना नहीं है। खिदमत नशीन यानि कि हमेशा जोश और हुल्लास की मदद देना।कुव्वत नशीन बनाने का मदद देना। थोड़े वक़्त में तमाम सबजेक्ट्स पास करनी हैं। इतना तेज़ रफ़्तार से करेंगे तब तो पहुँचेंगे ना, इसलिए एक दो का मददगार बनना है। एक दो के राब्ते नशीन नहीं बनना। एक दो से राब्ता लगाना नहीं शुरू करना। मददगार रूह हमेशा इमदाद से रब के नज़दीक और बराबर बना देती है। आप बराबर नहीं मगर रब बराबर बनाना है। जो भी अपने में कमज़ोरी हो उनको यहाँ ही छोड़ जाना। विदेश में नहीं ले जाना। कुव्वत नशीन रूह बन कुव्वत नशीन बनाना है। यही खास मज़बूत इरादा हमेशा याददाश्त में हो। अच्छा!
चारों ओर के तमाम बच्चों को खास प्यार से लबरेज़ यादप्यार दे रहे हैं। हमेशा प्यारे, हमेशा मददगार और कुव्वत नशीन ऐसी अफ़ज़ल रूहों को रब उल हक़ का याद प्यार और सलाम।
तमाम को यह ख़ुशी है ना कि वैराइटी होते हुए भी एक के बन गये। अभी अलग-अलग सलाह नहीं है। एक ही इलाही सलाह पर चलने वाली अफ़ज़ल रूहें हैं। मोमिनों की ज़ुबां भी एक ही है। एक रब के हैं और रब की नॉलेज औरों को भी दे तमाम को एक रब का बनाना है। कितनी बड़ी अज़ीम फैमिली है। जहाँ जाओ, जिस भी देश मे जाओ तो यह नशा है कि हमारा अपना घर है। खिदमत का मुकाम यानि कि अपना घर। ऐसा कोई भी नहीं होगा जिसके इतने घर हों। अगर आप लोगों से कोई पूछे - आपके मिलने वाले कहाँ-कहाँ रहते हैं? तो कहेंगे तमाम वर्ल्ड में हैं। जहाँ जाओ अपनी ही फैमिली है। कितने बेहद के हक़दार हो गये। खिदमत नशीन हो गये। खिदमत नशीन बनना यानि कि हक़दार बनना। यह बेहद की रूहानी ख़ुशी है। अभी हर एक मुकाम अपनी कुव्वत नशीन सूरत ए हाल से तफ़्सील को दस्तयाब हो रहे है। पहले थोड़ी मेहनत लगती है। फिर थोड़े एक्जाम्पुल बन जाते तो उन्हों को देख दूसरे आसानी से आगे बढ़ते रहते।
रब उल हक़ तमाम बच्चों को यही अफ़ज़ल इरादा बार-बार याददाश्त में दिलाते हैं कि हमेशा खुद भी याद और खिदमत के जोश- हुल्लास में रहो, खुशी-खुशी से आगे तेज़ रफ़्तार से बढ़ते चलो और दूसरों को भी ऐसे ही जोश हुल्लास से बढ़ाते चलो, और चारों ओर के जो जिस्मानी तौर से नहीं पहुंचे हैं उन्हों के भी तस्वीर और ख़त तमाम पहुंचे हैं। सबके रेसपान्ड में रब उल हक़ तमाम को पद्मापदम गुणा दिल से याद-प्यार भी दे रहे हैं। जितना अभी जोश हुल्लास, ख़ुशी है उससे और पद्मगुणा बढ़ाओ। कोई-कोई ने अपनी कमज़ोरियों का ख़बर भी लिखी है, उन्हों के लिए रब उल हक़ फ़रमाते, लिखा यानि कि रब को दिया। दी हुई चीज़ फिर अपने पास नहीं रह सकती। कमज़ोरी दे दी फिर उसको इरादे में भी नहीं लाना। तीसरी बात कभी भी किसी भी खुद की आदत और तनज़ीम की आदतों और माहौल की हलचल से दिलशिकस्त नहीं होना। हमेशा रब को कम्बाइन्ड रूप में एहसास कर दिल-शिकस्त से कुव्वत नशीन बन आगे उड़ते रहो। हिसाब-किताब चुक्तू हुआ यानि कि बोझ उतरा। खुशी-खुशी से पिछले बोझ को ख़ाक़ करते जाओ। रब उल हक़ हमेशा बच्चों के मददगार हैं। ज़्यादा सोचो भी नहीं। फ़ालतू सोच भी कमज़ोर कर देती है। जिसके फ़ालतू इरादे ज़्यादा चलते हैं तो दो चार बार नूरानी कलेमात पढ़ो। गौरतलब करो, पढ़ते जाओ। कोई न कोई प्वाइंट अक्ल में बैठ जायेगी। खालिस इरादों की कुव्वत जमा करते जाओ तो फ़ालतू ख़त्म हो जायेगा। समझा।

रब उल हक़ के ख़ास इरशादात
चारों ओर चाहे देश, चाहे विदेश में कई ऐसे छोटे-छोटे मुकाम हैं। इस वक़्त के मुताबिक सादा हैं मगर मालामाल बच्चे हैं। तो ऐसे भी कई हैं जो ज़रिया बने बच्चों को अपनी तरफ़ चक्कर लगाने की उम्मीद निहायत वक़्त से देख रहे हैं। मगर उम्मीद पूरी नहीं हो रही है। वह भी रब उल हक़ उम्मीद पूरी कर रहे हैं। ख़ास अज़ीम हस्ती बच्चों को प्लैन बनाकर चारों ओर जिन्हों की उम्मीद के दीए बने हुए रखे हैं, वह जगाने जाना है। उम्मीद के दीए जगाने के लिए रब उल हक़ ख़ास वक़्त दे रहे हैं। तमाम मिलकर भिन्न-भिन्न एरिया बांट, गांव के बच्चे, जिन्हों के पास समय के कारण नहीं जा सके हैं उन्हों की आश पूरी करनी है। मुख्य स्थानों पर तो मुख्य प्रोग्राम्स के कारण जाते ही हैं लेकिन जो छोटे-छोटे स्थान हैं, उन्हों के यथाशक्ति प्रोग्राम ही बड़े प्रोग्राम हैं। उन्हों की भावना ही सबसे बड़ा फंक्शन है। बापदादा के पास ऐसे कई बच्चों की बहुत समय की अर्जियां फाइल में पड़ी हुई हैं। यह फाइल भी बापदादा पूरा करना चाहते हैं। महारथी बच्चों को चक्रवर्ती बनने का विशेष चांस दे रहे हैं। फिर ऐसे नहीं कहना - सब जगह दादी जावे। नहीं, अगर एक ही दादी सब तरफ जावे फिर तो 5 वर्ष लग जाएं। और फिर 5 वर्ष बापदादा न आवे यह मंजूर है? बापदादा की सीजन यहाँ हो और दादी चक्र पर जाये, यह भी अच्छा नहीं लगेगा इसलिए महारथियों का प्रोग्राम बनाना। जहाँ कोई नहीं गया है वहाँ जाने का बनाना और विशेष इस वर्ष जहाँ भी जावे तो एक दिन बाहर की सेवा, एक दिन ब्राह्मणों की तपस्या का प्रोग्राम - यह दोनों प्रोग्राम जरूर हों। सिर्फ फंक्शन में जाए भाग-दौड़ कर नहीं आना है। जितना हो सके ऐसा प्रोग्राम बनाओ जिसमें ब्राह्मणों की विशेष रिफ्रेशमेन्ट हो। और साथ-साथ ऐसा प्रोग्राम हो जिससे वीआईपीज का भी सम्पर्क हो जाए लेकिन शार्ट प्रोग्राम हो। पहले से ही ऐसा प्रोग्राम बनावें जिसमें ब्राह्मणों को भी विशेष उमंग-उत्साह की शक्ति मिले। निर्विघ्न बनने का हिम्मत उल्लास भरे। तो चारों ओर का चक्र का प्रोग्राम बनाने के लिए भी विशेष समय दे रहे हैं क्योंकि समय प्रमाण सरकमस्टांस भी बदल रहे हैं और बदलते रहेंगे इसलिए फाइल को खत्म करना है। अच्छा।

बरक़ात:-
रूहानियत की श्रेष्ठ स्थिति द्वारा वातावरण को रूहानी बनाने वाले सहज पुरूषार्थी भव

रूहानियत की स्थिति द्वारा अपने सेवाकेन्द्र का ऐसा रूहानी वातावरण बनाओ जिससे स्वयं की और आने वाली आत्माओं की सहज उन्नति हो सके क्योंकि जो भी बाहर के वातावरण से थके हुए आते हैं उन्हें एकस्ट्रा सहयोग की आवश्यकता होती है इसलिए उन्हें रूहानी वायुमण्डल का सहयोग दो। सहज पुरूषार्थी बनो और बनाओ। हर एक आने वाली आत्मा अनुभव करे कि यह स्थान सहज ही उन्नति प्राप्त करने का है।

स्लोगन:-
वरदानी बन शुभ भावना और शुभ कामना का वरदान देते रहो।

आमीन