05-09-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
इस बेहद के ड्रामा में तुम रूहों को अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है, अभी तुम्हें यह जिस्म रूपी कपड़े उतार घर जाना है, फिर नयी सल्तनत में आना है''

सवाल:-
रब कोई भी काम इल्हाम से नहीं करते, उनका नुज़ूल होता है, यह किस बात से साबित होता है?

जवाब:-
रब को कहते ही हैं करनकरावनहार। इल्हाम का तो मतलब है इरादा। इल्हाम से कोई नई दुनिया का क़याम नहीं होता है। रब बच्चों से क़याम कराते हैं, आज़ाओं बिगर तो कुछ भी करा नहीं सकते इसलिए उन्हें जिस्म का बैस लेना होता है।

आमीन।
रूहानी बच्चे रूहानी रब के सामने बैठे हैं। गोया रूहें अपने रब के सामने बैठी हैं। रूह ज़रूर जिस्म के साथ ही बैठेगी। रब भी जब जिस्म लेते हैं तब ही सामने होते हैं इसको ही कहा जाता है रूह-रब अलग रहे तवील अरसे..... तुम बच्चे समझते हो आला ते आला रब को ही अल्ल्लाह ताला, खुदा ताला, पाक परवरदिगार अलग नाम दिये हैं, पाक परवरदिगार कभी जिस्मानी बाप को नहीं कहा जाता है। सिर्फ़ पाक परवरदिगार लिखा तो भी हर्जा नहीं है। सुप्रीम बाप यानि कि वह तमाम का बाप है एक। बच्चे जानते हैं हम सुप्रीम बाप के साथ बैठे हैं। सुप्रीम बाप पाक परवरदिगार और हम रूहें दारूल सुकून की रहने वाली हैं। यहाँ पार्ट बजाने आते हैं, सुनहरे दौर से लेकर इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के आखिर तक पार्ट बजाया है, यह हो गए नए मख़लूक़। खालिक़ रब ने समझाया है कि तुम बच्चों ने ऐसे पार्ट बजाया है। आगे यह नहीं जानते थे कि हमने 84 विलादतों का चक्कर लगाया है। अभी तुम बच्चों से ही रब बात करते हैं, जिन्होंने 84 का चक्कर लगाया है। तमाम तो 84 विलादत नहीं ले सकते हैं। यह समझाना है कि 84 का चक्कर कैसे फिरता है। बाक़ी लाखों साल की तो बात ही नहीं। बच्चे जानते हैं कि हम हर 5 हज़ार साल बाद पार्ट बजाने आते हैं। हम पार्टनशीन हैं। आला ते आला अल्ल्लाह् ताला का भी अजब पार्ट है। जिब्राइल अलैहिस्सलाम और मीकाईल अलैहिस्सलाम का अजब पार्ट नहीं कहेंगे। दोनों ही 84 का चक्कर लगाते हैं। बाक़ी इस्राफील अलैहिस्सलाम का पार्ट इस दुनिया में तो है नहीं। तीन शक्ल में दिखाते हैं - क़याम, तबाही, परवरिश। तस्वीरों पर समझाना होता है। तस्वीर जो दिखाते हो उस पर समझाना है। मिलन के दौर पर पुरानी दुनिया की तबाही तो होना ही है। प्रेरक अल्फ़ाज़ भी रांग है। जैसे कोई कहते हैं आज हमको बाहर जाने की प्रेरणा नहीं है, प्रेरणा यानी इरादा। प्रेरणा का कोई और मतलब नहीं है। पाक परवरदिगार कोई प्रेरणा से काम नहीं करता। न प्रेरणा से इल्म मिल सकता है। रब आते हैं इन आज़ाओं के ज़रिए पार्ट बजाने। करनकरावनहार है ना। करायेंगे बच्चों से। जिस्म बिगर तो कर न सकें। इन बातों को कोई भी जानते नहीं। न अल्ल्लाह् ताला बाप को ही जानते हैं। ऋषि-मुनि यानि कि राहिब-वली कहते थे हम अल्ल्लाह् ताला को नहीं जानते। न रूह को, न रब बाप को, कोई में इल्म नहीं है। रब है अहम क्रियेटर, डायरेक्टर, डायरेक्शन भी देते हैं। सिरात ए मुस्तकीम देते हैं। इन्सानों की अक्ल में तो सब तरफ़ मौजूद का इल्म है। तुम समझते हो रब्बा हमारा बाबा है, वो लोग सब तरफ़ मौजूद कह देते हैं तो बाप समझ ही नहीं सकते। तुम समझते हो यह बेहद के बाप की फैमिली है। सब तरफ़ मौजूद कहने से फैमिली की ख़ुशबू नहीं आती। उनको कहा जाता है ग़ैर मुजस्सम पाक परवरदिगार। ग़ैर मुजस्सम रूहों का रब्बा। जिस्म है तब रूह बोलती है कि बाबा। बिगर जिस्म तो रूह बोल न सके। अकीदत मन्दी की राह में बुलाते आये हैं। समझते हैं वह रब्बा दु:ख दूर करने वाला खुशियां देने वाला है। ख़ुशी मिलती है दारूल मसर्रत में। सुकून मिलता है दारूल सुकून में। यहाँ है ही दु:ख। यह इल्म तुमको मिलता है मिलन पर। पुराने और नये के बीच। रब आते ही तब हैं जब नई दुनिया का क़याम और पुरानी दुनिया का तबाही होना है। पहले हमेशा कहना चाहिए नई दुनिया का क़याम। पहले पुरानी दुनिया की तबाही कहना रांग हो जाता है। अभी तुमको बेहद के ड्रामा की नॉलेज मिलती है। जैसे उस ड्रामा में एक्टर्स आते हैं तो घर से सादे कपड़े पहनकर आते फिर ड्रामा में आकर कपड़े बदलते हैं। फिर ड्रामा पूरा हुआ तो वह कपड़े उतार कर घर जाते हैं। यहाँ तुम रूहों को घर से बे जिस्म आना होता है। यहाँ आकर यह जिस्म रूपी कपड़े पहनते हो। हर एक को अपना- अपना पार्ट मिला हुआ है। यह है बेहद का ड्रामा। अभी यह बेहद की सारी दुनिया पुरानी है फिर होगी नई दुनिया। वह निहायत छोटी है, एक दीन है। तुम बच्चों को इस पुरानी दुनिया से निकल फिर हद की दुनिया में, नई दुनिया में आना है क्योंकि वहाँ है एक दीन। कई दीन, बेहिसाब इन्सान होने से बेहद हो जाती। वहाँ तो है एक दीन, थोड़े इन्सान। एक दीन के क़याम के लिए आना पड़ता है। तुम बच्चे इस बेहद के ड्रामा के राज़ को समझते हो कि यह चक्कर कैसे फिरता है। इस वक़्त जो कुछ प्रैक्टिकल में होता है उसका ही फिर अकीदत मन्दी की राह में त्यौहार मनाते हैं। नम्बरवार कौन-कौन से त्यौहार हैं, यह भी तुम बच्चे जानते हो। आला ते आला अल्ल्लाह् ताला पाक परवरदिगार की जयन्ती कहेंगे। वह जब आये तब फिर और त्योहार बनें। पाक परवरदिगार पहले-पहले आकर गीता सुनाते हैं यानि कि आग़ाज़ - दरम्यान -आख़िर का इल्म सुनाते हैं। इबादत भी सिखाते हैं। साथ-साथ तुमको तालीम भी देते हैं। तो पहले-पहले रब आया शिवजयन्ती हुई फिर कहेंगे गीता जयन्ती। रूहों को इल्म सुनाते हैं तो गीता जयन्ती हो गई। तुम बच्चे इरादा कर त्योहारों को नम्बरवार लिखो। इन बातों को समझेंगे भी अपने दीन के। हर एक को अपना दीन प्यारा लगता है। दूसरे दीन वालों की बात ही नहीं। भल किसको दूसरा दीन प्यारा हो भी मगर उसमें आ न सकें। जन्नत में और दीन वाले थोड़े ही आ सकते हैं। दरख़्त में बिल्कुल साफ़ है। जो जो दीन जिस वक़्त आते हैं फिर उस वक़्त आयेंगे। पहले बाप आते हैं, वही आकर हक़ीक़ी इबादत सिखलाते हैं तो कहेंगे शिवजयन्ती सो फिर गीता जयन्ती फिर नारायण जयन्ती। वह तो हो जाता सुनहरा दौर। वो भी लिखना पड़े नम्बरवार। यह इल्म की बातें हैं। शिव जयन्ती कब हुई वह भी मालूम नहीं है, इल्म सुनाया, जिसको गीता कहा जाता है फिर तबाही भी होती है। जगत अम्बा वगैरह की जयन्ती का कोई हॉली डे नहीं है। इन्सान किसी की भी तिथि -तारीख वगैरह को बिल्कुल नहीं जानते हैं। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम, नूह अलैहिस्सलाम और आबर अलैहिस्सलाम की सल्तनत को ही नहीं जानते। 2500 साल में जो आये हैं, उनको जानते हैं मगर उनसे पहले जो अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन के थे, उनको कितना वक्त हुआ, कुछ नहीं जानते। 5 हज़ार साल से बड़ा कल्प तो हो न सके। आधा तरफ़ तो बेहिसाब तादाद आ गई, बाक़ी आधा में इनकी सल्तनत। फिर जास्ती सालों का कल्प हो कैसे सकता। 84 लाख विलादत भी नहीं हो सकते। वो लोग समझते हैं इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर की उम्र लाखों साल है। इन्सानों को अंधियारे में डाल दिया है। कहाँ सारा ड्रामा 5 हज़ार साल का, कहाँ सिर्फ़ इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के लिए कहते कि अभी 40 हज़ार साल बचे हैं। जब लड़ाई लगती है तो समझते हैं अल्ल्लाह् ताला को आना चाहिए मगर अल्ल्लाह् ताला को तो आना चाहिए मिलन पर। जंग ए क़यामत तो लगती ही है मिलन पर। रब फ़रमाते हैं मैं भी कल्प-कल्प मिलन के दौर पर आता हूँ। रब आयेंगे नई दुनिया का क़याम पुरानी दुनिया की तबाही कराने। नई दुनिया का क़याम होगा तो पुरानी दुनिया की तबाही ज़रूर होगी, इसके लिए यह जंग है। इसमें इस्राफील अलैहिस्सलाम के प्रेरणा वगैरह की तो कोई बात नहीं। अन्डरस्टुड पुरानी दुनिया ख़लास हो जायेगी। मकान वगैरह तो अर्थक्वेक में तमाम खलास हो जायेंगे क्योंकि नई दुनिया चाहिए। नई दुनिया थी ज़रूर। देहली परिस्तान थी, जमुना का कण्ठा था। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत थी। तस्वीर भी हैं। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम को जन्नत का ही कहेंगे। तुम बच्चों ने मोजिज़ा भी किया है कि कैसे खुद अपना खाविन्द मुन्तखिब करते है। यह सब प्वाइंट्स रब्बा रिवाइज़ कराते हैं। अच्छा प्वाइंट्स याद नहीं पड़ती हैं तो रब्बा को याद करो।बाप भूल जाता है तो टीचर को याद करो। टीचर जो सिखलाते हैं वह भी ज़रूर याद आयेगा ना। टीचर भी याद रहेगा, नॉलेज भी याद रहेगी। मकसद भी अक्ल में है। याद रखना ही पड़े क्योंकि तुम्हारी स्टूडेन्ट लाइफ़ है ना। यह भी जानते हो जो हमको तालीम देते हैं वह हमारा बाप भी है, जिस्मानी बाप कोई गुम नहीं हो जाता है। जिस्मानी, रुहानी और फिर यह है आफ़ाक़ी। इनको कोई याद नहीं करते। जिस्मानी बाप से तो वर्सा मिलता है। आख़िर तक याद रहती है। जिस्म छोड़ा फिर दूसरा बाप मिलता है। विलादत बाई विलादत जिस्मानी बाप मिलते हैं। रूहानी बाप को भी दु:ख और सुख में याद करते हैं। बच्चा मिला तो कहेंगे अल्ल्लाह् ताला ने बच्चा दिया। बाक़ी बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम को क्यों याद करेंगे, इनसे कुछ मिलता थोड़े ही है। इनको आफ़ाक़ी कहा जाता है।
तुम जानते हो हम आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए पाक परवरदिगार से वर्सा ले रहे हैं। जैसे हम पढ़ते हैं, यह जिस्म भी ज़रिया बना हुआ है। निहायत विलादतों के आख़िर में इनका जिस्म ही गाड़ी बना है।गाड़ी का नाम तो रखना पड़ता है ना। यह है बेहद की बेनियाज़ी। गाड़ी क़ायम ही रहती है, बाक़ी का ठिकाना नहीं है। चलते-चलते फिर भागन्ती हो जाते। यह जिस्म तो मुकरर है ड्रामा के मुताबिक़, इनको कहा जाता है क़िस्मत नशीन जिस्म। तुम सबको क़िस्मत नशीन जिस्म नहीं कहेंगे। क़िस्मत नशीन जिस्म एक माना जाता है, जिसमें रब आकर इल्म देते हैं। क़याम का काम कराते हैं। तुम क़िस्मत नशीन जिस्म नहीं ठहरे। तुम्हारी रूह इस गाड़ी में बैठ पढ़ती है। रूह पाक बन जाती इसलिए कुर्बान नशीनी इस जिस्म की है जो इसमें बैठ तालीम देते हैं। यह आख़िरी विलादत निहायत वैल्युबल है फिर जिस्म बदल हम हूरैन बन जायेंगे। इस पुराने जिस्म के ज़रिए ही तुम तालीम पाते हो। पाक परवरदिगार के बनते हो। तुम जानते हो हमारी पहली ज़िन्दगी वर्थ नाट ए पेनी थी। अब पाउण्ड बन रही है। जितना तालीम हासिल करेंगे उतना आला मर्तबा पायेंगे। रब ने समझाया है याद का सफ़र है अहम। इनको ही हिन्दुस्तान का क़दीम हक़ीक़ी इबादत कहते हैं जिससे तुम नापाक से पाक बनते हो, जन्नत रिहाईश नशीन तो तमाम बनते हैं फिर है तालीम पर मदार। तुम बेहद के स्कूल में बैठे हो। तुम ही फिर हूरैन बनेंगे। तुम समझ सकते हो आला मर्तबा कौन पा सकते हैं। उनकी क्वालिफिकेशन क्या होनी चाहिए। पहले हमारे में भी क्वालिफिकेशन नहीं थी। शैतानी सलाह पर थे। अब इलाही सिरात मिलती है। शैतानी सलाह से हम उतरते फ़न में जाते हैं। इलाही सिरात से चढ़ते फ़न में जाते हैं। इलाही सिरात देने वाला एक है, शैतानी सलाह देने वाले अनेक हैं। माँ-बाप, भाई-बहन, उस्ताद- हादी कितनों की सलाह मिलती है। अभी तुमको एक की सिरात मिलती है जो 21 विलादत काम आती है। तो ऐसी सिरात ए मुस्तकीम पर चलना चाहिए ना। जितना चलेंगे उतना अफ़ज़ल मर्तबा पायेंगे। कम चलेंगे तो कम मर्तबा। सिरात ए मुस्तकीम है ही की। आला ते आला अल्ल्लाह् ताला ही है, जिसने आदम अलैहिस्सलाम को आला ते आला बनाया फिर नीच ते नीच शैतान ने बनाया। रब हसीन बनाते फिर शैतान स्याह बनाते। रब वर्सा देते हैं। वह तो है ही वाइसलेस। हूरैन की अज़मत गाते हैं तमाम फ़ज़ीलतों से लबरेज़...... राहिबों को मुकम्मल ग़ैर ख़बासती नहीं कहेंगे। सुनहरे दौर में रूह और जिस्म दोनों पाकीज़ा होते हैं। हूरैन को तमाम जानते हैं, वो मुकम्मल ग़ैर ख़बासती होने के सबब मुकम्मल जहान के मालिक बनते हैं। अभी नहीं हैं, फिर तुम बनते हो। रब भी मिलन के दौर पर ही आते हैं। आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए मोमिन। आदम अलैहिस्सलाम के बच्चे तो तुम सब ठहरे। वह है ग्रेट ग्रेट ग्रैन्ड फादर। बोलो, बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम का नाम नहीं सुना है? सुप्रीम बाप पाक परवरदिगार आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए ही ख़िल्क़त तामीर करेंगे ना। मोमिन खानदान है। आदम अलैहिस्सलाम मुंह निस्बनामा भाई-बहिन हो गये। यहाँ राजा-रानी की बात नहीं। यह मोमिन खानदान तो मिलन के थोड़े वक़्त चलता है। बादशाहत न पाण्डवों की है, न कौरवों की यानि कि न पनजतन सल्लल्लाहो वसल्लम की है न यज़ीद की अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-

1) 21 विलादत अफ़ज़ल विलादत का हक़दार बनने के लिए सब शैतानी सलाहों को छोड़ एक इलाही सिरात पर चलना है। मुकम्मल वाइसलेस बनना है।

2) इस पुराने जिस्म में बैठ रब की तालीमों को इख्तियार कर हूरैन बनना है। यह है निहायत वैल्युबल ज़िन्दगी, इसमें वर्थ पाउण्ड बनना है।

बरक़ात:-
तमाम रिश्तों की इमदाद के ज़रिए मुसलसल इबादत नशीन, आसान इबादत नशीन बनो।

हर वक्त रब के अलग-अलग रिश्तों की इमदाद लेना यानि कि एहसास करना ही आसान इबादत है। रब कैसे भी वक़्त पर रिश्ता निभाने के लिए बंधे हुए हैं। तमाम कल्प में अभी ही तमाम एहसासों की खान हासिल होती है इसलिए हमेशा तमाम रिश्तों की इमदाद लो और मुसलसल इबादत नशीन, आसान इबादत नशीन बनो क्योंकि जो तमाम रिश्तों का एहसास और दस्तयाबी में मग्न रहता है वह पुरानी दुनिया के माहौल से आसान ही बेनियाज़ हो जाता है।

स्लोगन:-
तमाम कुव्वतों से लबरेज़ रहना यही मोमिन रूप की ख़ासियत है।

आमीन