05-09-2021 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 15-03-88


नई दुनिया की तस्वीर की बुनियाद मौजूदा अफ़ज़ल मोमिन ज़िन्दगी


आज दुनिया के खालिक, दुनिया की अफ़ज़ल तक़दीर बनाने वाले बाप-दादा अपनी अफ़ज़ल तक़दीर की तस्वीर - याफ़्ता बच्चों को देख रहे हैं। आप तमाम मोमिन रूहें दुनिया की अफ़ज़ल तक़दीर की तस्वीर हो। मोमिन ज़िन्दगी की तस्वीर से मुस्तकबिल की अफ़ज़ल तक़दीर साफ़ दिखाई देती है। मोमिन ज़िन्दगी की दरेक अफ़ज़ल आमाल मुस्तकबिल अफ़ज़ल सिले का एहसास कराती है। मोमिन ज़िन्दगी का अफ़ज़ल इरादा मुस्तकबिल की अफ़ज़ल आदत ज़ाहिर करता है। तो मोमिन ज़िन्दगी तस्वीर है - मुस्तकबिल तक़दीर वान जहान की। बाप-दादा ऐसे मुस्तकबिल की तस्वीर बच्चों को देख खुशगवार होते हैं। तस्वीर भी आप हो, मुस्तकबिल की तक़दीर की सुरत ए बुनियाद भी आप हो। आप अफ़ज़ल बनते, तब ही दुनिया भी अफ़ज़ल बनती है। आपकी उड़ते फ़न की सूरत ए हाल तो दुनिया का भी उड़ती फ़न है। आप मोमिन रूहें वक़्त दर वक़्त जैसी स्टेज से पास करती तो दुनिया की स्टेजेस भी तब्दील होती रहती हैं। आपकी सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ सूरत ए हाल है तो दुनिया भी सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ है, गोल्डन एजड है। आप बदलते तो दुनिया भी बदल जाती है। इतने सूरत ए बुनियाद हो!

मौजूदा वक़्त रब के साथ कितना अफ़ज़ल पार्ट बजा रहे हो! तमाम चक्कर के अन्दर सबसे बड़े ते बड़ा ख़ास पार्ट इस वक़्त बजा रहे हो! रब के साथ-साथ मददगार बन दुनिया की दरेक रूह की विलादतों की उम्मीदें पूरी कर रहे हो। रब के ज़रिए दरेक रूह को निजात और ज़िन्दगी ए निजात का हक़ दस्तयाब कराने के ज़रिया बने हुए हो। तमाम की खुवाहिशात को पूरा करने वाले रब जैसा कामधेनु' हो, खुवाहिशात पूरी करने वाले हो। ऐसे दरेक रूह को इच्छा मात्रम् अविधा यानि कि खुवाहिशात की बे इल्मी की सूरत ए हाल का एहसास कराते हो जो आधा चक्कर कई विलादत, न अकीदत मन्दी वाली रूहों को, न ज़िन्दगी ए निजात हालत वाली रूहों को कोई भी खुवाहिश रहती है। एक विलादत की खुवाहिशात पूरी कराने वाले नहीं मगर कई विलादतों के लिए खुवाहिशात की बे इल्मी का एहसास कराने वाले हो। जैसे रब के तमाम भण्डारे, तमाम ख़ज़ाने हमेशा लबरेज़ हैं, ग़ैर दस्तयाबी का नाम निशान नहीं है; ऐसे रब जैसे हमेशा और तमाम खज़ानों से लबरेज़ हो।

मोमिन रूह यानि कि दस्तयाबी याफ़्ता रूह, लबरेज़ रूह। जैसे रब हमेशा लाइट-हाउस, माइट हाउस हैं, ऐसे मोमिन रूहें भी रब जैसी हो, लाइट-हाउस हो इसलिए दरेक रूह को अपनी मंजिल पर पहुँचाने के ज़रिया हो। जैसे रब दरेक इरादे, दरेक बोल, दरेक आमाल से दरेक वक़्त सादिक़ है, बरक़ात देने वाले है, ऐसे आप मोमिन रूहें भी सादिक़ हो, मास्टर बरक़ात देने वाले हो। ऐसे मोमिन ज़िन्दगी की तस्वीर हो? कोई भी तस्वीर बनाते हो तो उसमें तमाम खासियतें दिखाते हो ना। ऐसे मौजूदा वक़्त की मोमिन ज़िन्दगी की तस्वीर की खासियतें अपने में भर ली हैं? बड़े ते बड़े पेन्टर आप हो जो अपनी तस्वीर भी बना रहे हो। आपकी तस्वीर बनते ही दुनिया की तस्वीर बनती जा रही है। ऐसे एहसास करते हो ना।

कई पूछते हैं ना कि नई दुनिया में क्या होगा? तो नई दुनिया की तस्वीर ही आप हो। आपकी ज़िन्दगी से मुस्तकबिल साफ़ ज़ाहिर होता है। इस वक़्त भी अपनी तस्वीर में देखो कि हमेशा ऐसी तस्वीर बनी है जो कोई भी देखे तो हमेशा के लिए खुशगवार हो जाए। कोई भी ज़रा भी बेसुकूनियत की लहर वाला हो तो आपकी तस्वीर देख बेसुकूनियत को ही भूल जाए, सुकून की लहरों में लहराने लगे। ग़ैर दस्तयाबी याफ़्ता, दस्तयाबी का एहसास अपने आप ही एहसास करे। भिखारी बनकर आये, भरपूर बनकर जाये। आपकी मुस्कराती हुई सूरत देख ज़हन का और आंखों का रोना भूल जाएं, मुस्कराना सीख जाएं। आप लोग भी रब को कहते हो ना कि मुस्कराना सिखा दिया.. तो आपका काम ही है रोना छुड़ाना और मुस्कराना सिखाना। तो ऐसी तस्वीर मोमिन ज़िन्दगी है। हमेशा यह याददाश्त में रखो कि हम ऐसी सूरत ए बुनियाद हैं, फाउण्डेशन हैं। दरख़्त की तस्वीर में देखा - मोमिन कहाँ बैठे हैं? फाउन्डेशन में बैठे हो ना। मोमिन फाउन्डेशन मज़बूत है, तब आधा चक्कर अचल-अडोल रहते हो। सादी रूहें नहीं हो, बुनियादी याफ़्ता हो, फाउन्डेशन हो।

इस वक़्त की आपकी मुकम्मल सूरत ए हाल सुनहरे दौर की 16 फ़नों से आरास्ता सूरत ए हाल की बुनियाद है। अब की एक राय वहाँ की एक सल्तनत की सूरत ए बुनियाद है। यहाँ के तमाम खज़ानों की लबरेज़ नशीनी - इल्म, फ़ज़ीलत, कुव्वतें, तमाम ख़ज़ाने वहाँ की लबरेज़ नशीनी की बुनियाद हैं। यहाँ की जिस्म की कशिश से न्यारापन, वहाँ की जिस्म की तन्दरूस्ती की दस्तयाबी की बुनियाद है। बे जिस्मी-पन की सूरत ए हाल सेहतयाब-पन और लम्बी उम्र के बुनियाद याफ़्ता है। यहाँ की बेफिकर, बादशाहपन की ज़िन्दगी वहाँ के दरेक घड़ी के ज़हन की मौज की ज़िन्दगी इसी सूरत ए हाल की दस्तयाबी की बुनियाद बनती है। एक रब दूसरा न कोई - यहाँ की यह अखण्ड-अटल इबादत वहाँ अखण्ड, अटल, अखुट, बे मुश्किल अस्बाबों की दस्तयाबी की बुनियाद बनती है। यहाँ का छोटा-सा जहान बापदादा और मां-बाप और बहन-भाई, वहाँ के छोटे जहान की बुनियाद बनता है। यहाँ एक मां-बाप के रिश्ते की आदत वहाँ भी एक ही दुनिया के मालिक ए आज़म और मल्लिका ए आज़म को मां-बाप के रूप में एहसास करते हैं। यहाँ की प्यार-भरी फैमिली के रिश्ते, वहाँ भी चाहे बादशाह और अवाम बनते मगर अवाम भी अपने को फैमिली समझती है, प्यार की नज़दीकियां फैमिली की रहती है। चाहे मर्तबे रहते हैं मगर प्यार के मर्तबे हैं, हिचक और डर के नहीं। तो मुस्तकबिल की तस्वीर आप हो ना। यह तमाम बातें अपनी तस्वीर में चेक करो - कहाँ तक अफ़ज़ल तस्वीर बन करके तैयार हुई है कि अभी तक लक़ीरे खींच रहे हो? होशियार आर्टिस्ट हो ना।

बापदादा यही देखते रहते हैं कि दरेक ने कहाँ तक तस्वीर तैयार की है? दूसरे को उल्हना तो दे नहीं सकते कि इसने यह दुरूस्त नहीं किया, इसलिए ऐसे हुआ। अपनी तस्वीर आपे ही बनानी है। और चीज़ें तो तमाम बापदादा से मिल रही हैं, उसमें तो कमी नहीं है ना। यहाँ भी खेल सिखाते हो ना जिसमें चीज़ें खरीदकर फिर बनाते हो। बनाने वाले के ऊपर होता है, जितना चाहे उतना लो। लेने वाले सिर्फ़ ले सकें। बाक़ी खुला बाज़ार है, बापदादा यह हिसाब नहीं रखता कि दो लेना है या चार लेना है। सबसे बढ़िया तस्वीर बनाई है ना। हमेशा अपने को ऐसे समझो कि हम ही मुस्तकबिल की तक़दीर की तस्वीर हैं। ऐसे समझकर दरेक कदम उठाओ। प्यारे होने के सबब मददगार भी हो और मददगार होने के सबब रब की इमदाद दरेक रूह को है। ऐसे नहीं कि कुछ रूहों को ज़्यादा इमदाद है और किन्हों को कम है, नहीं। रब की इमदाद दरेक रूह के वास्ते एक के रिटर्न में पदमगुणा है ही। जो भी मददगार रूहें हो, उन सबको रब की इमदाद हमेशा ही दस्तयाब है और जब तक है, तब तक है ही है। जब रब की इमदाद है तो दरेक काम हुआ ही पड़ा है। ऐसे एहसास करते भी हो और करते चलो। कोई मुश्किल नहीं क्योंकि तक़दीर बनाने वाले के ज़रिए तक़दीर की दस्तयाबी की बुनियाद है। जहाँ तक़दीर होती, बरक़ात होती वहाँ मुश्किल होती ही नहीं।

जिसकी निहायत अच्छी तस्वीर होती है, तो ज़रूर फर्स्ट नम्बर आयेगा। तो तमाम फर्स्ट डिवीज़न में तो आने वाले हो ना। नम्बर फर्स्ट एक आयेगा मगर फर्स्ट डिवीज़न तो है ना। तो किसमें आना है? फर्स्ट डिवीज़न सबके लिए है। कुछ कर लेना अच्छा है। बापदादा तो सबको चांस दे रहे हैं - चाहे हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन हों या डबल विलायती हों क्योंकि अभी रिज़ल्ट आउट तो हुई नहीं है। कभी अच्छे-अच्छे रिज़ल्ट आउट के पहले ही आउट हो जाते हैं, तो यह जगह मिल जायेगी ना इसलिए जो भी लेने चाहो, अभी चांस है। फिर बोर्ड लगा देते हैं ना कि अभी जगह नहीं है। यह सीट फुल हो जायेंगी, इसलिए खूब उड़ो। दौड़ो नहीं मगर उड़ो। दौड़ने वाले तो नीचे रह जायेंगे, उड़ने वाले उड़ जायेंगे, उड़ते चलो और उड़ाते चलो। अच्छा!

चारों ओर के तमाम अफ़ज़ल तक़दीर की अफ़ज़ल तस्वीर याफ़्ता अज़ीम रूहों को, हमेशा खुद को दुनिया की सूरत ए बुनियाद एहसास करने वाली रूहों को, हमेशा अपने को दस्तयाबी याफ़्ता एहसासों के ज़रिए औरों को भी दस्तयाबी याफ़्ता एहसास कराने वाली अफ़ज़ल रूहों को, हमेशा रब के प्यार और इमदाद का पद्मगुणा हक़ दस्तयाब करने वाली काबिल ए एहतराम मोमिन सो हूरैन रूहों को बापदादा का यादप्यार और सलाम।

पर्सनल मुलाकात

रब का हाथ हमेशा पेशानी पर है ही - ऐसा एहसास करते हो? अफ़ज़ल राय ही अफ़ज़ल हाथ है। तो जहाँ दरेक कदम में रब का हाथ यानि कि अफ़ज़ल राय है, वहाँ अफ़ज़ल राय से अफ़ज़ल काम अपने आप ही होता है। हमेशा हाथ की याददाश्त से काबिल बन आगे बढ़ाते चलो। रब का हाथ हमेशा ही आगे बढ़ाने का एहसास आसान कराता है इसलिए इस अफ़ज़ल तक़दीर को दरेक काम में याददाश्त में रख आगे बढ़ते रहो। हमेशा हाथ है, हमेशा जीत है।

सवाल:- आसान आबिद हमेशा रहें, उसकी आसान तरीक़त कौन सी है?

जवाब:- रब ही जहान है - इस याददाश्त में रहो तो आसान आबिद बन जायेंगे क्योंकि तमाम दिन दुनिया में ही अक्ल जाती है। जब रब ही जहान है तो अक्ल कहाँ जायेगी? जहान में ही जाएगी ना, जंगल में तो नहीं जाएगी। तो जब रब ही जहान हो गया तो आसान आबिद बन जायेंगे। नहीं तो मेहनत करनी पड़ेगी - यहाँ से अक्ल हटाओ, वहाँ से जुड़ाओ। हमेशा रब के प्यार में समाए रहो तो वह भूल नहीं सकता। अच्छा!

ग़ैबी बापदादा से डबल विलायती भाई बहिनों की मुलाकात

डबल विलायती में खिदमत का जोश अच्छा है, इसलिए इज़ाफ़ा भी अच्छा कर रहे हो। विलायत- खिदमत में 14 साल में इज़ाफ़ा अच्छा किया है। जिस्मानी और रूहानी - डबल काम करते आगे बढ़ रहे हैं। डबल काम में वक़्त भी लगाते हो और अक्ल की, जिस्म की कुव्वत भी लगाते हो। यह भी अक्ल की कमाल है। जिस्मानी काम करते खिदमत में आगे बढ़ना - यह भी हिम्मत का काम है। ऐसे हिम्मत वाले बच्चों का बापदादा हमेशा दरेक काम में मददगार है। जितनी हिम्मत उतनी पदमगुणा रब मददगार है ही। मगर दोनों पार्ट बजाते तरक्की को दस्तयाब कर रहे हो - यह देख बापदादा हमेशा बच्चों पर खुशगवार होते हैं। इबलीस से तो आज़ाद हो ना? जब राब्ते याफ़्ता हैं तो अपने आप ही इबलीस से आज़ाद हैं। राब्ते याफ़्ता नहीं तो इबलीस से आज़ाद भी नहीं। इबलीस को भी मोमिन रूहें प्यारी लगती हैं। जो पहलवान होता है, उनको पहलवान से ही मज़ा आता है। इबलीस भी कुव्वत नशीन है। आप भी तमाम कुव्वत नशीन हो, तो इबलीस को तमाम कुव्वत नशीन के साथ खेल करना अच्छा लगता है। अब तो जान गये हो ना इबलीस को अच्छी तरह से कि कभी-कभी नये रूप से आ जाता है। नॉलेजफुल का मतलब ही है रब को भी जानना, मख़लूक़ को भी जानना और इबलीस को भी जानना। अगर खालिक और मख़लूक़ को जान लिया और इबलीस को नहीं जाना तो नॉलेजफुल नहीं ठहरे।

कभी भी किसी भी बात में चाहे जिस्म कमज़ोर भी हो या काम का ज़्यादा बोझ भी हो मगर ज़हन से कभी भी थकना नहीं। जिस्म की थकावट ज़हन के ख़ुशी से ख़त्म हो जाती है। मगर ज़हन की थकावट जिस्म की थकावट को भी बढ़ा देती है।ज़हन कभी थकना नहीं चाहिए। जब थक जाओ तो सेकण्ड में रब के वतन में आ जाओ। अगर ज़हन को थकाने के आदी होंगे तो मोमिन ज़िन्दगी के जोश हुल्लास का जो एहसास होना चाहिए, वह नहीं होगा। चल तो रहे हैं मगर चलाने वाला चला रहा है - ऐसे एहसास नहीं होगा। मेहनत से चल रहे हैं तो जब मेहनत एहसास होगी तो थकावट भी होगी। इसलिए हमेशा समझो - करावनहार करा रहा है, चलाने वाला चला रहा है।

वक़्त, कुव्वत - दोनों के मुताबिक खिदमत करते चलो। खिदमत कभी रह नहीं सकती, आज नहीं तो कल होनी ही है। अगर सच्चे दिल से, दिल के प्यार से जितनी खिदमत कर सकते हो उतनी करते हो तो बापदादा कभी उल्हना नहीं देंगे कि इतना काम किया, इतना नहीं किया। शाबासी मिलेगी। वक़्त मुताबिक, कुव्वत मुताबिक सच्ची दिल से खिदमत करते हो तो सच्चे दिल पर साहेब राज़ी हैं। जो आपका काम रह भी जायेगा तो रब कहाँ न कहाँ से पूरा करायेगा। जो खिदमत जिस वक़्त में होनी है वह होकर ही रहेगी, रह नहीं सकती। किसी न किसी रूह को टच कर बापदादा अपने बच्चों के मददगार बनायेंगे। आबिद बच्चों को तमाम तरह की इमदाद वक़्त पर मिलती ही है। मगर किसको मिलेगी? सच्चे दिल वाले सच्चे खिदमतगार को। तो तमाम सच्चे खिदमतगार बच्चे हो? साहेब राज़ी है हमारे ऊपर - ऐसा एहसास करते हो ना। अच्छा!

बरक़ात:-
एक रब के लव में लवलीन रह हमेशा चढ़ते फ़न का एहसास करने वाले कामयाबी याफ़्ता बनो।

खिदमत में और खुद के चढ़ते फ़न में कामयाबी की अहम बुनियाद है - एक रब से बेशुमार प्यार। रब के सिवाए और कुछ दिखाई न दे। इरादे में भी रब्बा, बोल में भी रब्बा, आमाल में भी रब का साथ। ऐसी लवलीन रूह एक अल्फ़ाज़ भी बोलती है तो उसके प्यार के बोल दूसरी रूह को भी प्यार में बांध देते हैं। ऐसी लवलीन रूह का एक रब्बा अल्फ़ाज़ ही जादू का काम करता है। वह रूहानी जादूगर बन जाती है।

स्लोगन:-
आबिद तू रूह वह है जो सूरत ए अन्दरूनी बन लाइट माइट रूप में वाक़ेअ रहता है।

आमीन