05-10-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
ख़ामोशी में बैठ अब ऐसी प्रेक्टिस करो जो एहसास हो मैं जिस्म से अलग रूह हूँ, इसको ही जीते जी मरना कहा जाता है

सवाल:-
ख़ामोशी का मतलब क्या है? ख़ामोशी में बैठ तुमको कौन-सा एहसास करना है?

जवाब:-
ख़ामोशी का मतलब है एक की याद में इस जिस्म का आख़िर हो यानि कि ख़ामोशी में बैठ ऐसा एहसास करो कि मैं रूह इस जिस्म (चमड़ी) को छोड़ रब के पास जाती हूँ। कोई भी याद न रहे। बैठे-बैठे बे जिस्म हो जाओ। जैसे कि हम इस जिस्म से मर गये। बस हम रूह हैं, पाक परवरदिगार के बच्चे हैं, इस प्रैक्टिस से जिस्मानी हवास टूटता जायेगा।

आमीन।
बच्चों को रब पहले-पहले समझाते हैं कि मीठे-मीठे बच्चों जब यहाँ बैठते हो, तो अपने को रूह समझ रब को याद करते रहो और कोई तरफ़ अक्ल नहीं जानी चाहिए। यह तुम बच्चे जानते हो हम रूह हैं। पार्ट हम रूह बजाती हैं इस जिस्म के ज़रिए। रूह ला फ़ानी, जिस्म फ़ानी है। तो तुम बच्चों को रूहानी हवासी बन रब की याद में रहना है। हम रूह हैं चाहें तो इन आरगन्स से काम लेवें या न लेवें। अपने को जिस्म से अलग समझना चाहिए। रब फ़रमाते हैं अपने को रूह समझो। जिस्म को भूलते जाओ। हम रूह इन्डिपिन्डेंट हैं। हमको सिवाए एक रब के और कोई को याद नहीं करना है। जीते जी मौत की हालत में रहना है। हम रूह का राब्ता रहना है अब रब के साथ। बाक़ी तो दुनिया से, घर से मर गये। कहते हैं ना आप मुये मर गई दुनिया। अब जीते जी तुमको मरना है। हम रूह पाक परवरदिगार के बच्चे हैं। जिस्म का हवास उड़ाते रहना चाहिए। रब फ़रमाते हैं अपने को रूह समझो और मुझे याद करो। जिस्म का हवास छोड़ो। यह पुराना जिस्म है ना। पुरानी चीज़ को छोड़ा जाता है ना। अपने को बे जिस्म समझो। अभी तुमको रब को याद करते-करते रब के पास जाना है। ऐसे करते-करते फिर तुमको आदत पड़ जायेगी। अभी तो तुमको घर जाना है फिर इस पुरानी दुनिया को याद क्यों करें। ख़ामोशी में बैठ ऐसे अपने साथ मेहनत करनी है। अकीदत मन्दी में भी कोठरी में अन्दर बैठ तस्बीह फेरते हैं, इबादत करते हैं। तुम भी खामोशी में बैठ यह कोशिश करो तो आदत पड़ जायेगी। तुमको मुंह से तो कुछ बोलना नहीं है। इसमें है अक्ल की बात। पाक परवरदिगार तो है सिखलाने वाला। उनको तो तजवीज़ नहीं करनी है। यह बाबा तजवीज़ करते हैं, वह फिर तुम बच्चों को भी समझाते हैं। जितना हो सके ऐसे बैठकर ख्याल करो। अभी हमको जाना है अपने घर। इस जिस्म को तो यहाँ छोड़ना है। रब को याद करने से ही गुनाहों का ख़ात्मा होंगा और उम्र भी बढ़ेगी। अन्दर यह ग़ौरतलब चलना चाहिए। बाहर में कुछ बोलना नहीं है। अकीदत मन्दी की राह में भी ब्रह्म तत्व को या कोई पाक परवरदिगार को भी याद करते हैं। मगर वह याद कोई हक़ीक़ी नहीं है। रब का तारूफ़ ही नहीं तो याद कैसे करें। तुमको अब रब का तारूफ़ मिला है। सवेरे-सवेरे उठकर ख़ामोशी में ऐसे अपने साथ बातें करते रहो। इरादा ए ग़ौरतलब करो, रब को याद करो। रब्बा हम अभी आया कि आया आपकी सच्ची गोद में। वह है रूहानी गोद। तो ऐसे-ऐसे अपने साथ बातें करनी चाहिए। रब्बा आया हुआ है। रब्बा कल्प-कल्प आकर हमको हक़ीक़ी इबादत सिखलाते हैं। रब फ़रमाते हैं - मुझे याद करो और चक्कर को याद करो। दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन बनना है। रब में ही तमाम इल्म है ना चक्कर का। वह फिर तुमको देते हैं। तुमको तीनों ज़माने को जानने वाले बना रहे हैं। तीनों ज़माने यानि कि आग़ाज़ - दरम्यान - आख़िर को तुम जानते हो। रब भी है सुप्रीम रूह। उनको जिस्म तो है नहीं। अभी इस जिस्म में बैठ तुमको समझाते हैं। यह वन्डरफुल बात है। क़िस्मत नशीन गाड़ी पर तख्त नशीन होंगे तो ज़रूर दूसरी रूह है। निहायत विलादतों की आख़िर की विलादत इनकी है। नम्बरवन पाकीज़ा वही फिर नम्बरवन नापाक बनते हैं। वह अपने को अल्ल्लाह् ताला, मीकाईल अलैहिस्सलाम वगैरह तो कहते नहीं। यहाँ एक भी रूह पाकीज़ा है नहीं, तमाम नापाक ही हैं। तो रब्बा बच्चों को समझाते हैं, ऐसे-ऐसे इरादा ए ग़ौरतलब करो तो इससे तुमको ख़ुशी भी रहेगी, इसमें खामोशी भी ज़रूर चाहिए। एक की याद में जिस्म का खात्मा होता है, उनको कहा जाता है एकान्त। यह चमड़ी छूट जायेगी। राहिब भी ब्रह्म की याद में और अनासर की याद में रहते हैं, उस याद में रहते-रहते जिस्म का हवास छूट जाता है। बस हमको ब्रह्म में लीन होना है। ऐसे बैठ जाते हैं। तपस्या में बैठे-बैठे जिस्म छोड़ देते हैं। अकीदत मन्दी में तो इन्सान निहायत धक्के खाते हैं, इसमें धक्के खाने की बात नहीं। याद में ही रहना है। पिछाड़ी में कोई याद न रहे। घरेलू राब्तें में तो रहना ही है। बाक़ी टाइम निकालना है। स्टूडेण्ट को तालीम का शौक होता है ना। यह तालीम है, अपने को रूह न समझने से बाप-उस्ताद-हादी सबको भूल जाते हैं। ख़ामोशी में बैठ ऐसे-ऐसे इरादा करो। घरेलू घर में तो वायब्रेशन दुरूस्त नहीं रहता है। अगर अलग इन्तज़ाम है तो एक कोठरी में खामोशी में बैठ जाओ। माताओं को तो दिन में भी टाइम मिलता है। बच्चे वगैरह स्कूल में चले जाते हैं। जितना टाइम मिले यही कोशिश करते रहो। तुमको तो एक घर है, रब को तो कितनी ढेर के ढेर दुकान हैं, और ही इज़ाफ़ा होती जायेगी। इन्सानों को तो कारोबार वगैरह की फ़िक्र होती है तो नींद भी फिट जाती है। यह व्यापार भी है ना। कितना बड़ा शर्राफ है। कितना बड़ा मट्टा-सट्टा करते हैं। पुराने जिस्म वगैरह लेकर नया देते हैं, सबको रास्ता बताते हैं। यह भी धन्धा उनको करना है। यह व्यापार तो निहायत बड़ा है। व्यापारी को व्यापार का ही ख्याल रहता है। बाबा ऐसे-ऐसे प्रैक्टिस करते हैं फिर बतलाते हैं - ऐसे-ऐसे करो। जितना तुम रब की याद में रहेंगे तो अपने आप ही नींद फिट जायेगी। कमाई में रूह को निहायत मज़ा आयेगा। कमाई के लिए इन्सान रात में भी जागते हैं। सीज़न में तमाम रात भी दुकान खुला रहता है। तुम्हारी कमाई रात को और अलस्सुबह को निहायत अच्छी होगी। दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन बनेंगे, तीनों ज़माने को जानने वाले बनेंगे। 21 विलादत के लिए दौलत इकट्ठा करते हैं। इन्सान दौलत मन्द बनने के लिए तजवीज़ करते हैं। तुम भी रब को याद करेंगे तो गुनाहों का ख़ात्मा होंगा, कुव्वत मिलेगी। याद के सफ़र पर नहीं रहेंगे तो निहायत घाटा पड़ जायेगा क्योंकि सिर पर गुनाहों का बोझा निहायत है। अब जमा करना है, एक को याद करना है और तीनों ज़माने को जानने वाला बनना है। यह ला फ़ानी दौलत आधाकल्प के लिए इकट्ठा करनी है। यह तो निहायत वैल्युबुल है। इरादा ए ग़ौरतलब कर जवाहिरात निकालने हैं। रब्बा जैसे खुद करते हैं, बच्चों को भी तरीक़त बतलाते हैं। कहते हैं रब्बा इबलीस के तूफ़ान निहायत आते हैं।
रब्बा फ़रमाते हैं जितना हो सके अपनी कमाई करनी है, यही काम आनी है। खामोशी में बैठ रब को याद करना है। फुर्सत है तो खिदमत भी मन्दिरों वगैरह में निहायत कर सकते हो। बैज ज़रूर लगा रहे। तमाम समझ जायेंगे यह रूहानी मिलेट्री है। तुम लिखते भी हो - हम जन्नत को क़ायम कर रहे हैं। अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन था, अब नहीं है जो फिर क़ायम करते हैं। यह अफ़ज़ल ख्वातीन अफ़ज़ल हज़रात एम-ऑब्जेक्ट है ना। कोई वक़्त यह ट्रांसलाइट की तस्वीर बैटरी के साथ उठाकर चक्कर देंगे और सबको कहेंगे, यह सल्तनत हम क़ायम कर रहे हैं। यह तस्वीर सबसे फर्स्ट क्लास है। यह तस्वीर निहायत नामीग्रामी हो जायेगी। अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़ज़ल हज़रात सिर्फ़ एक तो नहीं थे, उन्हों की दारूल हुकूमत थी ना। यह दीदार ए नफ़्स क़ायम कर रहे हैं। अब रब फ़रमाते हैं दिल से मुझे याद करो। रब को याद करो तो गुनाहों का ख़ात्मा होंगा। कहते हैं हम गीता का सप्ताह मनायेंगे। यह सब प्लैन कल्प पहले मुआफिक़ बन रहे हैं। चक्कर लगाने में यह तस्वीर लेनी पड़े। इनको देखकर सब ख़ुश होंगे। तुम कहेंगे रब को और वर्से को याद करो, दिल से मुझे याद करो। यह गीता के अल्फ़ाज़ हैं ना। पाक परवरदिगार रब्बा है, वह फ़रमाते हैं मुझे याद करो तो गुनाहों का ख़ात्मा हों। 84 के चक्कर को याद करो तो यह बन जायेंगे। लिटरेचर भी तुम सौगात देते रहो। पाक परवरदिगार का भण्डारा तो हमेशा भरपूर है। आगे चलकर निहायत खिदमत होगी। एम ऑब्जेक्ट कितनी क्लीयर है। एक सल्तनत, एक दीन था, निहायत दौलत मन्द थे। इन्सान चाहते हैं एक सल्तनत, एक दीन हो। इन्सान जो चाहते हैं सो अब आसार दिखाई पड़ते हैं फिर समझेंगे यह तो दुरुस्त कहते हैं। 100 पर्सेंट पाकीज़गी, ख़ुशी, सुकून की सल्तनत फिर से क़ायम कर रहे हैं फिर तुमको ख़ुशी भी रहेगी। याद में रहने से ही तीर लगेगा। सुकून में रह थोड़े अल्फ़ाज़ ही बोलना हैं। जास्ती आवाज़ नहीं। गीत, कविताएं वगैरह कुछ भी रब्बा पसन्द नहीं करते। बाहर वाले इंसानों से रीस नहीं करनी है। तुम्हारी बात ही और है। अपने को रूह समझ रब को याद करना है, बस। स्लोगन भी अच्छे हों जो इन्सान पढ़कर जागें। बच्चे इज़ाफ़े को पाते रहते हैं। खज़ाना तो भरपूर रहता है। बच्चों का दिया हुआ फिर बच्चों के काम में ही आता है। रब तो पैसे नहीं ले आते हैं। तुम्हारी चीज़ें तुम्हारे काम में आती हैं। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन जानते हैं हम निहायत सुधार कर रहे हैं। 5 साल के अन्दर इतना अनाज होगा जो अनाज की कभी तकलीफ़ नहीं होगी। और तुम जानते हो - ऐसी हालत होगी जो अन्न खाने के लिए नहीं मिलेगा। ऐसे नहीं अनाज कोई सस्ता होगा।
तुम बच्चे जानते हो हम 21 विलादत के लिए अपनी सल्तनत - क़िस्मत पा रहे हैं। यह थोड़ी बहुत तकलीफ़ तो बर्दाश्त करनी ही है। कहा जाता है ख़ुशी जैसी खुराक़ नहीं। हवास ए आज़ा से बालातर ख़ुशी गोप-गोपियों का गाई हुई है। बेहिसाब बच्चे हो जायेंगे। जो भी सैपलिंग वाले होंगे वह आते जायेंगे। दरख़्त यहाँ ही बढ़ना है ना। क़याम हो रहा है। और मज़हबों में ऐसा नहीं होता है। वह तो ऊपर से आते हैं। यह तो जैसे कि दरख्त क़ायम हुआ ही पड़ा है, इसमें फिर नम्बरवार आते जायेंगे, इज़ाफ़े को पाते जायेंगे। तकलीफ़ कुछ नहीं। उन्हों को तो ऊपर से आकर पार्ट बजाना ही है, इसमें अज़मत की क्या बात है। पैगम्बर के पिछाड़ी आते रहते हैं। वह तालीम क्या देंगे खैर निजात की? कुछ भी नहीं। यहाँ तो रब मुस्तकबिल हूर-हूरैन दीन को क़ायम कर रहे हैं। मिलन के दौर पर नया सैपलिंग लगाते हैं ना। पहले पौधों को गमले में लगाकर फिर नीचे लगा देते हैं। इज़ाफ़ा होता जाता है। तुम भी अब पौधा लगा रहे हो फिर सुनहरे दौर में इज़ाफें को पाए सल्तनत-क़िस्मत पायेंगे। तुम नई दुनिया को क़ायम कर रहे हो। इन्सान समझते हैं - अजुन इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में निहायत साल पड़े हैं क्योंकि सहीफों में लाखों साल लिख दिये हैं। समझते हैं इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में अभी 40 हज़ार साल पड़े हैं। फिर रब आकर नई दुनिया बनायेंगे। कई समझते हैं यह वही क़यामत जंग है। गीता का भगवान भी ज़रूर होगा। तुम बतलाते हो कृष्ण तो था नहीं। रब ने समझाया है - कृष्ण तो 84 विलादत लेते हैं। एक फीचर्स न मिले दूसरे से। तो यहाँ फिर कृष्ण कैसे आयेंगे। कोई भी इन बातों पर ख्याल नहीं करते हैं। तुम समझते हो कृष्ण जन्नत का प्रिन्स वह फिर द्वापर में कहाँ से आयेगा। इस आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की तस्वीर को देखने से ही समझ में आ जाता है - पाक परवरदिगार यह वर्सा दे रहे हैं। सुनहरे दौर को क़ायम करने वाला रब ही है। यह गोला, दरख्त वगैरह की तस्वीर कम थोड़े ही हैं। एक दिन तुम्हारे पास यह तमाम तस्वीर ट्रांसलाइट के बन जायेंगे। फिर तमाम कहेंगे हमको ऐसी तस्वीर ही चाहिए। इन तस्वीरों से फिर विहंग मार्ग की खिदमत हो जायेगी। तुम्हारे पास बच्चे इतने आयेंगे जो फुर्सत नहीं रहेगी। बेहिसाब आयेंगे। निहायत ख़ुशी होगी। रोज़ ब रोज़ तुम्हारा फोर्स बढ़ता जायेगा। ड्रामा के मुताबिक जो फूल बनने वाले होंगे उनको टच होगा। तुम बच्चों को ऐसे नहीं कहना पड़ेगा कि रब्बा इनकी अक्ल को टच करो। टच कोई रब्बा थोड़े ही करते हैं। वक़्त पर आपे ही टच होगा। रब तो रास्ता बतायेंगे ना। निहायत बच्चियां लिखती हैं - हमारे खाविन्द की अक्ल को टच करो। ऐसे सबकी अक्ल को टच करेंगे फिर तो तमाम जन्नत में इकट्ठे हो जायें। तालीम की ही मेहनत है। तुम खुदाई खिदमतगार हो ना। सच्ची-सच्ची बात रब्बा पहले से ही बता देते हैं - क्या-क्या करना है। ऐसी तस्वीर ले जानी पड़ेंगी। सीढ़ी का भी ले जाना पड़े। ड्रामा के मुताबिक क़याम तो होनी ही है। रब्बा खिदमत के लिए जो डायरेक्शन देते हैं, उस पर तवज्जों देना है। रब्बा फ़रमाते हैं बैजेस किस्म-किस्म के लाखों बनाओ। ट्रेन की टिकेट लेकर 100 माइल तक खिदमत करके आओ। एक डिब्बे से दूसरे में, फिर तीसरे में, निहायत आसान है। बच्चों को खिदमत का शौक रहना चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. इरादा ए ग़ौरतलब कर अच्छे-अच्छे जवाहिरात निकालने हैं, कमाई जमा करनी है। सच्चा-सच्चा खुदाई खिदमतगार बन खिदमत करनी है।

2. तालीम का निहायत शौक रखना है। जब भी वक़्त मिले खामोशी में चले जाना है। ऐसी प्रेक्टिस हो जो जीते जी इस जिस्म से मरे हुए हैं, इस स्टेज का एहसास होता रहे। जिस्म का हवास भी भूल जाए।

बरक़ात:-
इख्तिलाफ़ को मिटाकर इत्तिहाद लाने वाले सच्चे खिदमतगार बनो।

मोमिन फैमिली की खासियत है कई होते भी एक। आपके इत्तिहाद के ज़रिए ही तमाम दुनिया में एक दीन, एक सल्तनत का क़याम होता है इसलिए ख़ास अटेन्शन देकर इख्तिलाफ़ को मिटाओ और इत्तिहाद को लाओ तब कहेंगे सच्चे खिदमतगार। खिदमतगार खुद के वास्ते नहीं मगर खिदमत के वास्ते होते हैं। खुद का सब कुछ खिदमत के वास्ते तसलीम करते हैं, जैसे आदम अलैहिस्सलाम बाप ने खिदमत में हड्डियां भी निसार की ऐसे आपकी हर आज़ा के ज़रिए खिदमत होती रहे।

स्लोगन:-
इलाही प्यार में खो जाओ तो दु:खों की दुनिया भूल जायेगी।

आमीन