05-11-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
रब आये हैं तुम बच्चों को सुकून और ख़ुशी का वर्सा देने, तुम्हारा अपना दीन ही सुकून है, इसलिए तुम सुकून के लिए भटकते नहीं हो।

सवाल:-
अभी तुम बच्चे 21 विलादतों के लिए बेशुमार खज़ानों में वज़न करने वाले बनते हो - क्यों?

जवाब:-
क्योंकि रब जब नई खिल्क़त तामीर करते हैं, तब तुम बच्चे उनके मददगार बनते हो। अपना सब कुछ उनके काम में निसार करते हो इसलिए रब उसके रिटर्न में 21 विलादतों के लिए तुम्हें बेशुमार खज़ानों में ऐसा वज़न करते हैं जो कभी दौलत भी नहीं ख़त्म होती, दु:ख भी नहीं आता, बे वक़्त मौत भी नहीं होती।

नग़मा:-
मुझको सहारा देने वाले........

आमीन।
मीठे-मीठे रूहानी बच्चों को ओम् का मतलब तो सुनाया है। कोई-कोई सिर्फ ओम् कहते हैं, मगर कहना चाहिए ओम् शान्ति। सिर्फ़ ओम् का मतलब निकलता है ओम् भगवान। ओम् शान्ति का मतलब है मैं रूह सुकून परस्त हूँ। हम रूह हैं, यह हमारा जिस्म है। पहले है रूह, पीछे है जिस्म। रूह सुकून परस्त है, उनकी रिहाईश का मकाम है दारूल सुकून। बाक़ी कोई जंगल में जाने से सच्चा सुकून नहीं मिलता है। सच्चा सुकून मिलना ही तब है जब घर जाते हैं। दूसरा सुकून चाहते हैं जहाँ बे सुकूनियत है। यह बेसुकूनियत का दारूल ग़म तबाह हो जायेगा फिर सुकून हो जायेगा। तुम बच्चों को सुकून का वर्सा मिल जायेगा। वहाँ न घर में, न बाहर दारूल हुकूमत में बेसुकूनियत होती। उसको कहा जाता है सुकून की सल्तनत, यहाँ है बेसुकूनियत की सल्तनत क्योंकि शैतानी सल्तनत है। वह है अल्ल्लाह् ताला का क़ायम की हुई सल्तनत। फिर द्वापुर के बाद शैतानी सल्तनत होती है, शैतानों को कभी सुकून होता नहीं। घर में, दुकान में जहाँ तहाँ बेसुकूनियत ही बेसुकूनियत होगी। 5 ख़बासत रूपी शैतान बेसुकूनियत फैलाते हैं। शैतान क्या चीज़ है, यह कोई भी दानिश्मन्द वली वगैरह नहीं जानते। समझते नहीं हैं हम साल-साल शैतान को क्यों मारते हैं। आला जन्नत-अदना जन्नत में यह शैतान होता ही नहीं। वह है ही इलाही सल्तनत। इलाही रब्बा हूरैन सल्तनत को क़ायम करते हैं तुम्हारे ज़रिए। अकेले तो नहीं करते हैं। तुम मीठे-मीठे बच्चे अल्ल्लाह् के मददगार हो। आगे थे शैतान के मददगार। अब अल्ल्लाह् आकर तमाम की ख़ैर निजात कर रहे हैं। पाकीज़गी, ख़ुशी, सुकून को क़ायम करते हैं। तुम बच्चों को इल्म की अब तीसरी आंख मिली है। सुनहरे दौर में दु:ख की बात नहीं। कोई गाली वगैरह नहीं देते, गंद नहीं खाते। यहाँ तो देखो गंद कितना खाते हैं। दिखाते हैं कृष्ण को गऊयें बहुत प्यारी लगती थी। ऐसे नहीं कि कृष्ण कोई ग्वाला था, गऊ की पालना करते थे। नहीं, वहाँ की गऊ और यहाँ की गऊ में बहुत-बहुत फ़र्क है। वहाँ की गायें ख़ैर रास्त निहायत खूबसूरत होती हैं। जैसे खुबसूरत हूरैन, वैसे गायें। देखने से ही दिल ख़ुश हो जाए। वह है ही जन्नत। यह है जहन्नुम। तमाम जन्नत को याद करते हैं। जन्नत और जहन्नुम में रात-दिन का फ़र्क है। रात होती है अन्धियारी, दिन में है सोझरा। आदम अलैहिस्सलाम का दिन गोया खानदान ए आदम अलैहिस्सलाम का भी दिन हो जाता। पहले तुम भी घोर अन्धियारी रात में थे। इस वक़्त अकीदत मन्दी का कितना ज़ोर है, अज़ीम रूहों वगैरह को सोने में वज़न करते रहते क्योंकि सहीफों के निहायत आलिम हैं। उन्हों का असर इतना क्यों है? यह भी रब्बा ने समझाया है। दरख़्त में नये-नये पत्ते निकलते हैं तो सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ हैं। ऊपर से नई सोल आयेगी तो ज़रूर उनका असर होगा ना कलील अरसे के लिए। सोने और हीरों में वज़न करते हैं, मगर यह तो तमाम खलास हो जाने हैं। इन्सानों के पास कितने लाखों के मकान हैं। समझते हैं हम तो निहायत दौलत मन्द हैं। तुम बच्चे जानते हो यह दौलत मन्दी बाक़ी थोड़े अरसे के लिए है। यह तमाम मिट्टी में मिल जायेंगी। किनकी दबी रही धूल में........ रब जन्नत का क़याम करते हैं, उसमें जो लगाते हैं उन्हों को 21 विलादतों के लिए हीरों-जवाहरों के महल मिलेंगे। यहाँ तो एक विलादत के लिए मिलता है। वहाँ तुम्हारा 21 विलादत चलेगी। इन आंखों से जो कुछ देखते हो जिस्म के साथ तमाम ख़ाक हो जाना है। तुम बच्चों को इलाही नज़र के ज़रिए ही दीदार ए जलवा भी होता है। तबाही होगी फिर इन अफ़ज़ल ख्वातीन अफ़ज़ल हज़रात की सल्तनत होगी। तुम जानते हो हम अपनी सल्तनत-क़िस्मत फिर से क़ायम कर रहे हैं। 21 पीढ़ी सल्तनत किया फिर शैतान की सल्तनत चली। अब फिर रब आया है। अकीदत मन्दी की राह में तमाम रब को ही याद करते हैं। गायन भी है दु:ख में याद तमाम करें........। रब खुशी का वर्सा देते हैं, फिर याद करने की दरकार नहीं रहती। तुम मात-पिता........ अब यह तो माँ-बाप होंगे अपने बच्चों के। यह है रूहानी मां-बाप की बात। अभी तुम यह अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़ज़ल हज़रात बनने के लिए पढ़ते हो। स्कूल में बच्चे अच्छा पास होते हैं तो फिर उस्ताद को इनाम देते हैं। अब तुम उनको क्या इनाम देंगे! तुम तो उनको अपना बच्चा बना लेते हो, जादूगरी से। दिखलाते हैं - आदम अलैहिस्सलाम के मुंह में माँ ने देखा माखन का गोला। अब आदम अलैहिस्सलाम ने तो विलादत लिया सुनहरे दौर में। वह तो माखन वगैरह नहीं खायेंगे। वह तो है दुनिया का मालिक। तो यह किस वक्त की बात है? यह है अभी मिलन की बात। तुम जानते हो हम यह जिस्म छोड़ बच्चा जाए बनेंगे। दुनिया का मालिक बनेंगे। दोनों क्रिश्चियन आपस में लड़ते हैं और माखन मिलता है तुम बच्चों को। बादशाहत मिलती है ना। जैसे वो लोग हिन्दुस्तान को लड़ाकर मक्खन खुद खा गये। क्रिश्चियन की दारूल हुकूमत पौन हिस्से में थी। पीछे आहिस्ते-आहिस्ते छूटती गई है। तमाम दुनिया पर सिवाए तुम्हारे कोई सल्तनत कर न सके। तुम अभी इलाही औलाद बने हो। अभी तुम कायनात के मालिक और दुनिया के मालिक बनते हो। दुनिया में कायनात नहीं आया। मलक़ूतवतन में भी बादशाहत नहीं है। आला जन्नत-अदना जन्नत...... यह चक्कर यहाँ मैकरू वतन में होता है। ट्रांस में रूह कहाँ जाती नहीं। रूह निकल जाए तो जिस्म ख़त्म हो जाए। यह तमाम हैं दीदार ए जलवा, रिद्धि-सिद्धि के ज़रिए ऐसे भी दीदार ए जलवा होते हैं, जो यहाँ बैठे विलायत की पार्लियामेन्ट वगैरह देख सकते हैं। रब्बा के हाथ में फिर है इलाही नज़र की चाबी। तुम यहाँ बैठे लण्डन देख सकते हो। औज़ार वगैरह कुछ नहीं जो खरीद करना पड़े। ड्रामा के मुताबिक उस वक़्त पर वह दीदार ए जलवा होता है, जो ड्रामा में पहले से ही नूँध है। जैसे दिखाते हैं अल्ल्लाह् ताला ने आदम अलैहिस्सलाम को दीदार ए जलवा कराया। ड्रामा के मुताबिक़ उनको दीदार ए जलवा होना था। यह भी नूँध है। कोई की बड़ाई नहीं है। यह तमाम ड्रामा के मुताबिक होता है। आदम अलैहिस्सलाम दुनिया का प्रिन्स बनता है, गोया मक्खन मिलता है। यह भी कोई जानते नहीं कि दुनिया किसको, कायनात किसको कहा जाता है। कायनात में तुम रूहें रिहाईश करती हो। मलक़ूतवतन में आना-जाना दीदार ए जलवा वगैरह इस वक्त होता है फिर 5 हज़ार साल मलक़ूतवतन का नाम नहीं होता। कहा जाता है आदम अलैहिस्सलाम हूरैन को सलाम फिर कहते हैं रहमतुल्आल्मीन पाक परवरदिगार को सलाम तो सबसे आलातरीन हो गया ना। उनको कहा जाता है अल्ल्लाह् ताला। वह हूरैन हैं इन्सान, मगर हूरैन फ़ज़ीलत वाले हैं। बाक़ी 4-8 बाज़ू वाले इन्सान होते नहीं। वहाँ भी 2 बाज़ू वाले ही इन्सान होते हैं, मगर मुकम्मल खालिस, नापाकी की बात नहीं। बे वक़्त मौत कभी होता नहीं। तो तुम बच्चों को निहायत ख़ुशी रहनी चाहिए। हम रूह इस जिस्म के ज़रिए रब्बा को तो देखें। देखने में तो जिस्म आता है, पाक परवरदिगार यानि कि रूह को तो देख नहीं सकते। रूह और रब को जानना होता है। देखने लिए फिर इलाही नज़र मिलती है। और तमाम चीज़ें इलाही नज़र से बड़ी देखने में आयेगी। दारूल हुकूमत बड़ी देखने में आयेगी। रूह तो है ही नुक्ता। नुक्ते को देखने से तुम कुछ भी नहीं समझेंगे।रूह तो निहायत महीन है। निहायत डॉक्टर्स वगैरह ने कोशिश की है रूह को पकड़ने की, मगर किसको मालूम नहीं पड़ता। वो लोग तो सोने-हीरों में वज़न करते हैं। तुम विलादत दर विलादत पद्मपति बनते हो। तुम्हारा बाहर का शो ज़रा भी नहीं। सादा तरीक़त इस गाड़ी में बैठ पढ़ाते हैं। उनका नाम है क़िस्मत नशीन गाड़ी। यह है नापाक पुरानी गाड़ी, जिसमें रब आकर आला ते आला खिदमत करते हैं। रब फ़रमाते हैं मुझे तो अपना जिस्म है नहीं। मैं जो इल्म का समन्दर, मोहब्बत का समन्दर.... हूँ, तो तुमको वर्सा कैसे दूँ! ऊपर से तो नहीं दूँगा। क्या इल्हाम से पढ़ाऊंगा? ज़रूर आना पड़ेगा ना। अकीदत मन्दी की राह में मेरी इबादत करते हैं, सबको प्यारा लगता हूँ। गांधी, नेहरू की तस्वीर प्यारी लगती है, उनके जिस्म को याद करते हैं। रूह जो ला फ़ानी है उसने तो जाकर दूसरी विलादत लिया। बाक़ी फ़ानी तस्वीर को याद करते हैं। वह भूत पूजा हुई ना। मकबरा बनाकर उन पर फूल वगैरह बैठ चढ़ाते हैं। यह है यादगार। रहमतुल्आल्मीन के कितने मन्दिर हैं, सबसे बड़ा यादगार रहमतुल्आल्मीन का है ना। सोमनाथ मन्दिर का गायन है। मुहम्मद गजनवी ने आकर लूटा था। तुम्हारे पास इतनी दौलत रहती थी। रब्बा तुम बच्चों को जवाहिरातों में वज़न करते हैं। खुद को वज़न नहीं कराता हूँ। मैं इतना दौलत मन्द बनता नहीं हूँ, तुमको बनाता हूँ। उनको तो आज वज़न किया, कल मर जायेंगे। दौलत कोई काम नहीं आयेगी। तुमको तो रब बे शुमार ख़ज़ाने में ऐसा वज़न करते हैं जो 21 विलादत साथ रहेगा। अगर सिरात ए मुस्तकीम पर चलेंगे तो वहाँ दु:ख का नाम नहीं, कभी बे वक़्त मौत नहीं होती। मौत से डरेंगे नहीं। यहाँ कितना डरते हैं, रोते हैं। वहाँ कितनी ख़ुशी होती है - जाकर प्रिंस बनेंगे। जादूगर, सौदागर, रत्नागर, यह रहमतुल्आल्मीन पाक परवरदिगार को कहा जाता है। तुमको भी दीदार ए जलवा कराते हैं। ऐसे प्रिन्स बनेंगे। आजकल रब्बा ने दीदार ए जलवा का पार्ट बन्द कर दिया है। नुकसान हो जाता है। अभी रब इल्म से तुम्हारी ख़ैर निजात करते हैं। तुम पहले जायेंगे दारूल मसर्रत। अभी तो है दारूल ग़म। तुम जानते हो रूह ही इल्म इख्तियार करती है, इसलिए रब फ़रमाते हैं अपने को रूह समझो। रूह में ही अच्छी और बुरी आदत होती हैं। जिस्म में हों तो जिस्म के साथ आदतें ख़ाक हो जाएं। तुम कहते हो पाक परवरदिगार, हम रूहें पढ़ती हैं इस जिस्म के ज़रिए। नई बात है ना। हम रूहों को रहमतुल्आल्मीन पढ़ाते हैं। यह तो पक्का-पक्का याद करो। हम तमाम रूहों का वह रब भी है, उस्ताद भी है। रब खुद फ़रमाते हैं मुझे अपना जिस्म नहीं है। मैं भी हूँ रूह, मगर मुझे सुप्रीम रूह कहा जाता है।रूह ही तमाम कुछ करती है। बाक़ी जिस्म के नाम बदलते हैं। रूह तो रूह ही है। मैं सुप्रीम रूह तुम्हारे मुआफिक़ दोबारा विलादत नहीं लेती हूँ। मेरा ड्रामा में पार्ट ही ऐसा है, जो मैं इनमें दाखिल कर तुमको सुना रहा हूँ इसलिए इनको क़िस्मत नशीन गाड़ी कहा जाता है। इनको पुरानी जुत्ती भी कहते हैं। रहमतुल्आल्मीन ने भी पुराना लांग बूट पहना है। रब फ़रमाते हैं मैंने इसमें निहायत विलादतों के आख़िर में दाखिल किया है। पहले-पहले यह बनते हैं तत् त्वम। रब्बा फ़रमाते हैं तुम तो जवान हो। मेरे से जास्ती पढ़कर आला मर्तबा पाना चाहिए,मगर मेरे साथ रब्बा है तो मुझे घड़ी-घड़ी उनकी याद आती है। रब्बा मेरे साथ सोता भी है, मगर रब्बा मुझे भाकी नहीं पहन सकते। तुमको भाकी पहनते हैं। तुम क़िस्मत नशीन हो ना। रहमतुल्आल्मीन ने जो जिस्म लोन लिया है तुम उनको भाकी पहन सकते हो। मैं कैसे पहनूँ! मुझे तो यह भी नसीब नहीं है इसलिए तुम लक्की सितारे गाये हुए हो। बच्चे हमेशा लक्की होते हैं। बाप पैसे बच्चों को दे देते हैं, तो तुम लक्की सितारे ठहरे ना। रहमतुल्आल्मीन भी फ़रमाते हैं तुम मेरे से लक्की हो, तुमको पढ़ाकर दुनिया का मालिक बनाता हूँ, मैं थोड़े ही बनता हूँ। तुम कायनात के भी मालिक बनते हो। बाक़ी मेरे पास जास्ती इलाही नज़र की चाबी है। मैं दरिया ए इल्म हूँ। तुमको भी मास्टर दरिया ए इल्म बनाती हूँ। तुम इस सारे चक्कर को जान चक्कर नशीन मलिक ए आज़म-मल्लिकाए आज़म बनते हो। मैं थोड़े ही बनता हूँ। बुज़ुर्ग होते हैं तो फिर बच्चों को विल कर खुद दारूल बुज़ुर्ग में चले जाते हैं। आगे ऐसा होता था। आजकल तो बच्चों में लगाव जाकर पड़ता है। रूहानी रब फ़रमाते हैं मैं इनमें दाखिल कर तुम बच्चों को कांटों से फूल दुनिया का मालिक बनाए, आधा-चक्कर के लिए हमेशा खुशहाल बनाए मैं आवाज़ से बालातर में बैठ जाता हूँ। यह तमाम बातें सहीफों में थोड़े ही हैं। राहिब, उदासी सहीफों की बातें सुनाते हैं। रब तो दरिया ए इल्म है। खुद फ़रमाते हैं यह वेद-सहीफें वगैरह तमाम अकीदत मन्दी की चीज़े हैं। दरिया ए इल्म तो मैं ही हूँ। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) इन आंखों से जिस्म के साथ जो दिखाई देता है, यह तमाम ख़ाक हो जाना है इसलिए अपना सब कुछ कामयाब करना है।

2) रब से पूरा वर्सा लेने के लिए तालीम पढ़नी है। हमेशा अपने लक को याददाश्त में रख क़ायनात और जहान का मालिक बनना है।

बरक़ात:-
इबलीस के रॉयल रूप के बन्दिशों से आज़ाद, जहान फ़तहयाब, जहान फ़तहयाब बनो।

मेरा तजवीज़, मेरी इन्वेन्शन, मेरी खिदमत, मेरी टचिंग, मेरी फ़ज़ीलत अच्छी हैं, मेरी फैसला करने की कुव्वत निहायत अच्छी है, यह मेरा पन ही रॉयल इबलीस का रूप है। इबलीस ऐसा जादू मंत्र कर देती है जो तेरे को भी मेरा बना देती है इसलिए अब ऐसे कई बन्दिशों से आज़ाद बन एक रब के रिश्ते में आ जाओ तो इबलीस फ़तहयाब बन जायेंगे। इबलीस फ़तहयाब ही कुदरत फ़तहयाब, दुनिया फ़तहयाब और जहान फ़तहयाब बनते हैं। वही एक सेकण्ड के बेजिस्म बनो के डायरेक्शन को आसानी से और अपने आप काम में लगा सकते हैं।

स्लोगन:-
जहान फ़लाह नशीन वही है जो किसी के निगेटिव को पॉजिटिव में बदल दे।

आमीन