06-02-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
तुम महावीर हो, तुम्हें इबलीस के तूफानों से डरना नहीं है, एक रब के सिवाए और कोई की भी परवाह न कर पाकीज़ा ज़रूर बनना है"

सवाल:-
बच्चों में कौन सी हिम्मत बनी रहे तो निहायत आला मर्तबा पा सकते हैं?

जवाब:-
सिरात ए मुस्तकीम पर चलकर पाकीज़ा बनने की। भल कितने भी हंगामें हो, सितम बर्दाश्त करने पड़े मगर रब ने जो पाकीज़ा बनने की अफ़ज़ल सिरात दी है उस पर मुसलसल चलते रहें तो निहायत आला मर्तबा पा सकते हैं। किसी भी बात में डरना नहीं है, कुछ भी होता है - नथिंग न्यु।

नग़मा:-
भोलेनाथ से निराला........

आमीन।
यह है अकीदत मन्दी वालों का नग़मा। राह ए इल्म में नग़में वगैरह की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि गाया हुआ है रब से हमें बेहद का वर्सा मिलना है। जो अकीदत मन्दी की रसम-रिवाज़ है, वह इसमें नहीं आ सकती। बच्चे कविता वगैरह बनाते हैं वो औरों को सुनाने के लिए। उसका भी मतलब जब तक तुम न समझाओ तब तक कोई समझ न सके। अब तुम बच्चों को रब मिला है तो ख़ुशी का पारा चढ़ना चाहिए। रब ने 84 विलादतों के चक्कर का नॉलेज भी सुनाया है। ख़ुशी होनी चाहिए - हम अभी दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन बने हैं। रब से जन्नत का वर्सा ले रहे हैं। यक़ीनी दानिश मन्द ही फ़तहयाब। जिसको यक़ीन होता है वह सुनहरे दौर में तो जायेंगे ही। तो बच्चों को हमेशा ख़ुशी रहनी चाहिए - फालो फादर। बच्चे जानते हैं ग़ैर मुजस्सम रहमतुल्आल्मीन ने जब से इसमें दाखिल किया है तो बड़े हंगामें हुए। पाकीज़गी पर बड़े झगड़े चले। बच्चे बड़े होते, कहेंगे जल्दी शादी करो, शादी बिगर काम कैसे चलेगा। भल इन्सान नग़में गाते हैं मगर उससे समझते कुछ नहीं। सबसे जास्ती बाबा को प्रेक्टिस थी। एक दिन भी गीता पढ़ना मिस नहीं करते थे। जब मालूम पड़ा गीता का भगवान शिव है, नशा चढ़ गया हम तो दुनिया के मालिक बनते हैं। यह तो रहमतुल्आल्मीन फ़रमाते है फिर पाकीज़गी का भी बड़ा हंगामा हुआ। इसमें बहादुरी चाहिए ना। तुम हो ही अज़ीम बहादुर- अज़ीम बहादुरनियां। सिवाए एक के और कोई की परवाह नहीं। मर्द है रचता, रचता खुद पाकीज़ा बनता है तो रचना को भी पाकीज़ा बनाता है। बस इस बात पर ही बहुतों का झगड़ा चला। बड़े-बड़े घरों से निकल आये। कोई की परवाह नहीं की। जिनकी तक़दीर में नहीं है तो समझें भी कैसे। पाकीज़ा रहना है तो रहो, नहीं तो जाकर अपना बन्दोबस्त करो। इतनी हिम्मत चाहिए ना। बाबा के सामने कितने हंगामे हुए। बाबा को कभी रंज हुआ देखा? अमेरिका तक अखबारों में निकल गया। नथिंगन्यु। यह तो चक्कर पहले मुआफिक़ होता है, इसमें डरने की क्या बात है। हमको तो अपने रब से वर्सा लेना है। अपनी मख़लूक़ को बचाना है। रब जानते हैं सारी क्रियेशन इस वक़्त नापाक है। मुझे ही सबको पाकीज़ा बनाना है। रब को ही सब कहते हैं ए नापाक से पाक बनाने वाले, लिबरेटर आओ, तो उनको ही तरस पड़ता है। रहमदिल है ना। तो रब समझाते हैं - बच्चे, कोई भी बात में डरो मत। डरने से इतना आला मर्तबा पा नहीं सकेंगे। माताओं पर ही ज़ुल्म होते हैं। यह भी निशानी है - द्रोपदी को नंगन करते थे। रब 21 विलादतों के लिए नंगन होने से बचाते हैं। दुनिया इन बातों को नहीं जानती। नापाक बुरी खस्लतों से आरास्ता पुरानी खिल्क़त भी बननी ही है। हर चीज़ नई से फिर पुरानी ज़रूर होनी है। पुराने घर को छोड़ना ही पड़ता है। नई दुनिया गोल्डन एज, पुरानी दुनिया आइरन एज...... हमेशा तो रह न सके। तुम बच्चे जानते हो - यह खिल्क़त का चक्कर है। हूर-हूरैन की सल्तनत का फिर से क़याम हो रहा है। रब भी फ़रमाते हैं फिर से तुमको गीता इल्म सुनाता हूँ। यहाँ शैतानी सल्तनत में दु:ख है। इलाही सल्तनत किसको कहा जाता है, यह भी कोई समझते नहीं। रब फ़रमाते हैं मैं जन्नत यानि कि इलाही सल्तनत का क़याम करने आया हूँ। तुम बच्चों ने कई बार सल्तनत लिया और फिर गँवाया है। यह तमाम की अक्ल में है। 21 विलादत सुनहरे दौर में हम रहते हैं, उसको कहा जाता है 21 पीढ़ी यानि कि जब बुज़ुर्ग हालत होती है तब जिस्म छोड़ते हैं। बे वक़्त मौत कभी होती नहीं। अब तुम जैसे तीनों ज़माने के जानने वाले बन गये हो। तुम जानते हो - रहमतुल्आल्मीन कौन है? शिव के मन्दिर भी बेइंतहा बनाये हैं। मूर्ति तो घर में भी रख सकते हो ना। मगर अकीदत मन्दी की भी ड्रामा में नूँध है। अक्ल से काम लिया जाए। कृष्ण की या शिव की मूर्ति घर में भी रख सकते हैं। चीज़ तो एक ही है। फिर इतना दूर-दूर क्यों जाते हैं? क्या उनके पास जाने से कृष्णपुरी का वर्सा मिलेगा। अभी तुम जानते हो विलादत दर विलादत हम अकीदत मन्दी करते आये हैं। शैतानी सल्तनत का भी भभका देखो कितना है। यह है पिछाड़ी का भभका। इलाही सल्तनत तो सुनहरे दौर में थी। वहाँ यह एरोप्लेन वगैरह तमाम थे फिर यह तमाम गुम हो गये। फिर इस वक़्त यह सब निकले हैं। अभी यह तमाम सीख रहे हैं, जो सीखने वाले हैं वह आदत ले जायेंगे। वहाँ आकर फिर एरोप्लेन बनायेंगे। यह मुस्तकबिल में तुमको ख़ुशी देने वाली चीज़ें हैं। यह साइंस फिर तुमको काम आयेगी। अभी यह साइंस दु:ख के लिए है फिर वहाँ ख़ुशी के लिए होगी। अभी क़याम हो रहा है। रब नई दुनिया के लिए दारूल हुकूमत क़ायम करते हैं तो तुम बच्चों को अज़ीम बहादुर बनना है। दुनिया में यह थोड़े ही कोई जानते कि अल्लाह ताला आया हुआ है।

रब फ़रमाते हैं घरेलू राब्ते में रहते कमल फूल जैसे पाकीज़ा रहो, इसमें डरने की बात नहीं। करके गाली देंगे। गाली तो इनको भी निहायत मिली है। आदम अलैहिस्सलाम ने गाली खाई - ऐसा दिखाते हैं। अब आदय अलैहिस्सलाम तो गाली खा न सके। गाली तो इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में खाते हैं। तुम्हारा रूप जो अभी है फिर चक्कर के बाद इस वक़्त होगा। दरम्यान में कभी हो न सके। विलादत बाई विलादत फीचर्स बदलते जाते हैं, यह ड्रामा बना हुआ है। 84 विलादतों में जो फीचर्स वाले विलादत लिए हैं वही लेंगे। अब तुम जानते हो यही फीचर्स बदल दूसरे विलादत में यह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम के फीचर्स हो जायेंगे। तुम्हारी अक्ल का अब ताला खुला हुआ है। यह है नई बात। बाबा भी नया, बातें भी नई। यह बातें किसकी समझ में जल्दी नहीं आती। जब तक़दीर में हो तब कुछ समझें। बाक़ी अज़ीम बहादुर उनको कहा जाता है जो कितने भी तूफान आयें, हिले नहीं। अब वह हालत हो न सके। होनी है ज़रूर। अज़ीम बहादुर कोई तूफान से डरेंगे नहीं। वह हालत पिछाड़ी में होनी है इसलिए गाया हुआ है हवास ए बालातर ख़ुशी गोप-गोपियों से पूछो। रब आये हैं तुम बच्चों को जन्नत के लायक़ बनाने। चक्कर पहले मिसल जहन्नुम की तबाही तो होनी ही है। सुनहरे दौर में तो एक ही दीन होगा। चाहते भी हैं वननेस, एक मज़हब होना चाहिए। यह भी किसको मालूम नहीं है कि इलाही सल्तनत, शैतानी सल्तनत अलग-अलग है। अब रब में पूरा यक़ीन है तो सिरात ए मुस्तकीम पर चलना पड़े। हर एक की नब्ज़ देखी जाती है। उस मुताबिक फिर राय भी दी जाती है। रब्बा ने भी बच्चे को कहा - अगर शादी करनी हो तो जाकर करो। निहायत दोस्त रिश्तेदार वगैरह बैठे हैं, उनको शादी करा देंगे। फिर कोई न कोई निकल पड़ा। तो हर एक की नब्ज़ देखी जाती है। पूछते हैं रब्बा यह हालत है, हम पाकीज़ा रहना चाहते हैं, हमारे रिश्तेदार हमको घर से निकालते हैं, अब क्या करना है? अरे यह भी पूछते हो, पाकीज़ा रहना है, अगर नहीं रह सकते हो तो जाकर शादी करो। अच्छा समझो किसकी सगाई हुई है, राजी करना है, हर्जा नहीं। हथियाला जब बांधते हैं तो उस वक़्त कहते हैं यह खाविन्द तुम्हारा गुरु है। अच्छा तुम उनसे लिखवा लो। तुम मानती हो मैं तुम्हारा गुरू ईश्वर हूँ, लिखो। अच्छा अब मैं हुक्म देता हूँ पाकीज़ा रहना है। हिम्मत चाहिए ना। मंजिल निहायत भारी है। दस्तयाबी निहायत ज़बर्दस्त है। ज़िना की आग तब लगती है जब दस्तयाबी का मालूम नहीं है। रब फ़रमाते हैं इतनी बड़ी दस्तयाबी होती है तो अगर एक विलादत पाकीज़ा रहे तो क्या बड़ी बात है। हम तुम्हारे पति ईश्वर हैं। हमारी इजाज़त पर पाकीज़ा रहना पड़ेगा। रब्बा तरीक़त बता देते हैं। हिन्दुस्तान में यह क़ायदा है - औरत को कहते हैं तुम्हारा पति ईश्वर है। उनकी इजाज़त में रहना है। खाविन्द का पांव दबाना है क्योंकि समझते हैं ना, लक्ष्मी ने भी नारायण के पांव दबाये थे। यह आदत कहाँ से निकली? अकीदत मन्दी की तस्वीरों से। सुनहरे दौर में तो ऐसी बात होती नहीं। नारायण कभी कोई थकता है क्या जो लक्ष्मी पांव दबायेगी। थकावट की बात हो न सके। यह तो दु:ख की बात हो जाती है। वहाँ दु:ख-दर्द कहाँ से आया। तब बाबा ने फोटो से लक्ष्मी की तस्वीर ही उड़ा दिया। नशा तो चढ़ता है ना। छोटेपन से ही बेनियाज़ी रहता था इसलिए अकीदत मन्दी निहायत करते थे। तो रब्बा तरीक़त निहायत बताते हैं। तुम जानते हो हम एक रब के बच्चे हैं तो आपस में भाई-बहन हो गये। डाडे से वर्सा लेते हैं। रब को बुलाते ही हैं नापाक दुनिया में। ए नापाक से पाक बनाने वाले तमाम सीताओं के राम। रब को कहा जाता है ट्रूथ, सचखण्ड क़ायम करने वाला। वही सारी खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का हक़ीक़ी इल्म तुमको देते हैं। तुम्हारी रूह अभी दरिया ए इल्म बन रही है।
मीठे बच्चों को हिम्मत रखनी चाहिए, हमको रब्बा की सिरात ए मुस्तकीम पर चलना है। बेहद का रब बेहद के मख़लूक़ को जन्नत का मालिक बनाते हैं। तो तजवीज़ कर पूरा वर्सा लेना है। वारी जाना है। तुम उनको अपना वारिस बनायेंगे तो वो तुमको 21 विलादतों के लिए वर्सा देंगे। रब बच्चे के ऊपर वारी जाते हैं। बच्चे कहते हैं रब्बा यह जिस्म-ज़हन-दौलत तमाम आपका है। आप बाप भी हो तो बच्चा भी हो। गाते भी हैं त्वमेव माताश्च पिता त्वमेव........ एक की अज़मत कितनी बड़ी है। उनको कहा ही जाता है तमाम का दु:ख दूर करने वाला, ख़ुशी देने वाला। सुनहरे दौर में 5 अनासर भी ख़ुशी देने वाले होते हैं। इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में 5 अनासर भी स्याह रास्त होने के सबब दु:ख देते हैं। वहाँ तो है ही ख़ुशी। यह ड्रामा बना हुआ है। तुम जानते हो यह वही 5 हज़ार साल पहले वाली जंग है। अभी जन्नत का क़याम हो रहा है। तो बच्चों को हमेशा ख़ुशी में रहना चाहिए। अल्लाह ताला ने तुमको एडाप्ट किया है फिर तुम बच्चों को रब सिंगारते भी हैं, पढ़ाते भी हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. हमेशा रब जैसा बनने की हिम्मत रखनी है। रब पर पूरा कुर्बानी जाना है।

2. किसी भी बात में डरना नहीं है। पाकीज़ा ज़रूर बनना है।

बरक़ात:-
हमेशा रहम और फ़लाह की नज़र से दुनिया की खिदमत करने वाले दुनिया तब्दीली नशीन बनो।

तब्दीली नशीन और दुनिया खिदमतगार रूहों की अहम निशानी है-अपने रहम और फ़लाह की नज़र के ज़रिए दुनिया को लबरेज़ और ख़ुशहाल बनाना। जो ग़ैर दस्तयाब चीज़ है, इलाही ख़ुशी, सुकून और इल्म की दौलत से, तमाम कुव्वतों से तमाम रूहों को भिखारी से हक़दार बनाना। ऐसे ख़िदमतगार अपना हर सेकण्ड, अल्फ़ाज़ और आमाल, रिश्ते, राब्ते ख़िदमात में ही लगाते हैं। उनके देखने, चलने, खाने सबमें खिदमत समाई हुई रहती है।

स्लोगन:-
मान, शान की कुर्बानी कर अपने वक़्त को बेहद खिदमत में कामयाब करना ही रहमत नशीन बनना है।


मम्मा के बेशकीमती अज़ीम कलेमात
खैरात से अख़लाक़ अपने आप साबित होता है
अल्लाह ताला फरमाते है कि तुम मेरे ज़रिए दूसरों के फ़लाह को जानने से मेरे आला मर्तबे को दस्तयाब करेंगे यानि कि दूसरों के फ़लाह को जानने से अख्लाक साबित हो जाता है। देखो, हूरैन के आगे कुदरत तो कदमों की गुलाम होकर रहती है, यह पाँच अनासर ख़ुशी याफ़्ता बन ज़हनी खुवाहिशात के मुताबिक खिदमत करते हैं। इस वक़्त देखो ज़हनी खुवाहिशात के मुताबिक ख़ुशी न मिलने के सबब इन्सान को दु:ख, बे सुकूनियत हासिल होती रहती है। सुनहरे दौर में तो यह कुदरत बा अदब रहती है। देखो, हूरैन के जड़ तस्वीरों पर भी इतने हीरे-जवाहरात लगाते हैं, तो जब ज़िन्दा में ज़ाहिर होंगे तो उस वक़्त कितने शान ओ शौकत होंगी? इस वक़्त इन्सान भूख मरते हैं और जड़ तस्वीरों पर करोड़ों रूपये खर्च कर रहे हैं। तो यह क्या फर्क है! ज़रूर उन्होंने ऐसे अफ़ज़ल आमाल किये हैं तभी तो उन्हों के यादगार बने हुए हैं। उनका पूजन भी कितना होता है। वह ग़ैर ख़बासती रवादारी में रहते भी कमल फूल जैसी हालत में थे, मगर अब वो ग़ैर ख़बासती रवादारी के बदले ख़बासती रवादारी में चले गये हैं, जिस सबब तमाम दूसरे के फ़लाह को भूल अख़लाक की तरफ़ लग गये हैं, इसलिए रिज़ल्ट उल्टी जा रही है। अब अपने को खुद पाक परवरदिगार आए ख़बासती रवादारी से निकाल ग़ैर ख़बासती रवादारी सिखाते हैं, जिससे अपनी ज़िंदगी हमेशा के अवक़ात के लिये ख़ुशहाल बनती है इसलिए पहले चाहिए दूसरों के फ़लाह बाद में अख़लाक। दूसरों के फ़लाह में रहने से अख़लाक़ ऑटोमेटिकली साबित हो जाता है। आमीन।

आमीन