06-04-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे - अब वापिस घर जाना है, इसलिए जिस्मानी हवास को भूल अपने को बे जिस्मी रूह समझो, सबसे ममत्व मिटा दो

सवाल:-
मिलन के दौर पर तुम बच्चे रब से कौन सी अक्ल सीखते हो?

जवाब:-
बुरी खस्लतों से आरास्ता से सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ कैसे बनें, अपनी तकदीर आलातरीन कैसे बनायें, यह अक्ल अभी ही तुम सीखते हो। जो जितना राब्ते याफ़्ता और इल्म याफ़्ता बने हैं, उनकी उतनी तरक्की होती रहती है। तरक्की करने वाले बच्चे कभी भी छिप नहीं सकते। रब हर एक बच्चे की एक्ट से समझते हैं कि कौन-सा बच्चा अपनी आला तक़दीर बना रहा है।

नग़मा:-
मरना तेरी गली में

आमीन।
तमाम बच्चों ने यह नग़मा सुना। बच्चे कहने से तमाम सेन्टर्स के बच्चे जान जाते हैं कि रब्बा हम मोमिनों के लिए फ़रमाते हैं कि बच्चे यह नग़मा सुना - जीते जी गले का हार बनने के लिए यानि कि आलम ए अरवाह में जाए रब्बा के घर में रहने के लिए। वह रहमतुल्आल्मीन का घर है ना, जिसमें तमाम सालिग्राम रहते हैं। बच्चे, जवाहिरात ए मोमिन खानदान, दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन जानते हैं कि बरोबर वही रब्बा आये हुए हैं। फ़रमाते हैं - अभी तुमको बे जिस्म बनना है यानि कि जिस्म के हवास को भूलना है। यह पुरानी दुनिया तो मिट जायेगी। इस जिस्म को तो छोड़ना है यानि कि सबको छोड़ना है क्योंकि यह दुनिया ही ख़त्म होनी है। तो अब चलना है वापिस घर। तमाम बच्चों को अब ख़ुशी होती है क्योंकि आधा चक्कर घर जाने के लिए निहायत धक्के खाये हैं। मगर रास्ता मिला नहीं! और ही अकीदत मन्दी की राह का चहचटा (दिखावा) देख इन्सान फँस पड़ते हैं। यह है अकीदत मन्दी की राह की दुबन (दलदल) जिसमें इन्सान गले तक फँस गये हैं। अब बच्चे कहते हैं - रब्बा हम पुरानी दुनिया, पुराने जिस्म को भूलते हैं। अब आपके साथ बे जिस्म बन घर चलेंगे। तमाम की अक्ल में है पाक परवरदिगार आलम ए अरवाह से आये हैं, हमको ले जाने के लिए। सिर्फ़ कहते हैं तुम पाकीज़ा बन हमको याद करो। जीते जी मरना है। तुम जानते हो वहाँ घर में रूहें रहती हैं। सो भी रूह तो नुक्ता है। ग़ैर मुजस्सम दुनिया में तमाम रूहें चली जायेंगी, जितने इन्सान हैं उतनी रूहें वहाँ होंगी। रूहें उस महतत्व की कितनी जगह लेती हैं। जिस्म तो इतना बड़ा है, कितनी स्पेस लेता है? बाक़ी रूह को कितनी जगह चाहिए! हम रूहें कितनी छोटी जगह लेंगी? निहायत थोड़ी। बच्चों को यह तमाम बातें रब के ज़रिए सुनने का क़िस्मत अभी मिलता है। रब ही बतलाते हैं कि तुम नंगे (बिना जिस्म के) आये थे फिर जिस्म इख्तियार कर पार्ट बजाया, अब फिर जीते जी मरना है, सबको भूलना है। रब आकर मरना सिखलाते हैं। फ़रमाते हैं अपने रब को, अपने घर को याद करो। खूब तजवीज़ करो। इबादत में रहने से अज़ाब ख़ाक़ होंगे। फिर रूह बुरी खस्लतों से आरास्ता से सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बन जायेगी इसलिए रब सलाह देते हैं - चक्कर पहले भी कहा था कि जिस्म के तमाम रिश्ते छोड़ दिल से मुझे याद करो। सबका एक रब तो वह है ना। तुम बाप ए अवाम जिब्राइल अलैहिस्सलाम के मुंह निस्बनामा बच्चे हो, जो इल्म पाते रहते हो। रहमतुल्आल्मीन के बच्चे तो हो ही। यह तो सबको यक़ीन है - हम अल्लाह ताला के बच्चे हैं। मगर उनके नाम, रूप, वतन, वक़्त को भूलने के सबब, अल्लाह ताला से किसका भी इतना लव नहीं रहता है। किसको इल्ज़ाम नहीं देते हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है।

रब समझाते हैं कि तुम रूह कितनी छोटी नुक्ता हो, उसमें 84 विलादतों का पार्ट नूँधा हुआ है। कितना वण्डर है। रूह कैसे जिस्म लेकर पार्ट बजाती है। अभी तुमको बेहद के पार्ट का मालूम पड़ा है। यह इल्म और कोई को नहीं है। तुम भी जिस्मानी हवासी थे। अभी कितना पलटा खाया है। वह भी हर एक की तक़दीर पर है। चक्कर पहले वाली तक़दीर का अब दीदार ए जलवा हो रहा है। दुनिया में कितने बेहिसाब इन्सान हैं, हर एक की अपनी तक़दीर है। जैसा-जैसा जिसने आमाल किया है उस के मुताबिक ग़मग़ीन, ख़ुशहाल, दौलत मन्द, ग़रीब बनते हैं। बनती रूह है। रूह कैसे ख़ुशी में आती है, फिर ग़म में आती है, यह रब बैठ समझाते हैं। स्याह रास्त से ख़ैर रास्त बनने का अक्ल रब ही सिखाते हैं चक्कर पहले मुआफिक़। जितना जिसने अक्ल पाया है उतना ही अब पा रहे हैं। पिछाड़ी तक दरेक की तक़दीर को समझ जायेंगे। फिर कहेंगे चक्कर चक्कर ऐसे ही हर एक की तक़दीर रहेगी। जो अच्छा इबादत याफ़्ता, इल्म याफ़्ता होगा - वह ख़िदमत भी करता रहेगा। तमाम में हमेशा तरक्की होती रहती है। कोई बच्चे जल्दी तरक्की को पा लेते हैं, कोई निहायत माथा खपाते हैं। यहाँ भी ऐसे हैं। चक्कर पहले मुआफिक़ जो-जो तरक्की करते हैं, वह छिपे नहीं रह सकते। रब तो जानते हैं ना - सबका कनेक्शन रहमतुल्आल्मीन से है। यह भी बच्चों की एक्ट देखते समझ जाते हैं, तो वह भी देखते हैं। इनसे भल कोई छिपाये मगर रहमतुल्आल्मीन से तो छिपा नहीं सकेंगे। अकीदत मन्दी की राह में ही पाक परवरदिगार से नहीं छिपा सकते तो इल्म की राह में कैसे छिपा सकते। रब समझाते रहते हैं, तालीम तो निहायत आसान है। आमाल भी करना है। रहना भी दोस्त रिश्तेदारों के पास पुरानी दुनिया में है। वहाँ रहकर मेहनत करनी है। यहाँ रहकर तजवीज़ करने वालों से वहाँ घर में रह तजवीज़ करने वाले तीखे हो सकते हैं। अगर ऐसी लगन है तो। सहीफों में अर्जुन और भील का मिसाल है ना। भल भील बाहर का रहने वाला था मगर प्रेक्टिस से वह अर्जुन से भी तीर चलाने में होशियार हो गया। तो घरेलू राब्ते में रह कमल फूल जैसे रहना है। यह भी तुम मिसाल देखेंगे। घरेलू राब्ते में रह निहायत अच्छी खिदमत कर सकते हैं। वह जास्ती इज़ाफें को पाते रहेंगे। यहाँ रहने वालों को भी इबलीस छोड़ता नहीं है। ऐसे नहीं कि रब्बा के पास आने से छूट जाते हैं। नहीं, दरेक का अपना-अपना तजवीज़ है। घरेलू राब्ते में रहने वाले यहाँ रहने वालों से अच्छी तजवीज़ कर सकते हैं। निहायत अच्छी बहादुरी दिखा सकते हैं, उनको ही अज़ीम बहादुर कहा जाता है, जो घरेलू राब्ते में रहकर कमल फूल जैसा बनकर दिखाये। कहेंगे कि रब्बा आपने तो छोड़ा है। रब्बा फ़रमाते - हमने कहाँ छोड़ा है, मुझे ही छोड़कर गये हैं। रब्बा तो किसको भी छोड़ नहीं आये। घर में और ही बच्चे आ गये। बाक़ी कन्याओं के लिए तो रब्बा फ़रमाते हैं कि तुम यह इलाही ख़िदमत करो। यह भी बाबा है, वह भी बाबा है। कुमार भी निहायत आये मगर चल न सके। कन्यायें फिर भी अच्छी हैं। कन्या 100 मोमिनों से आला गिनी जाती है। तो कन्या वह जो 21 खानदान का फ़लाह करे, इल्म के तीर मारे। बाक़ी जो घरेलू राब्ते में रहते वह भी बी. के. ठहरे। आगे चल उन्हों की भी बंदिश खलास हो जायेगी। खिदमत तो करनी है ना। कई खिदमत करने वाले बच्चे रब उल हक़ के दिल पर चढ़े हुए हैं, जो हज़ारों का फ़लाह कर रहे हैं। तो ऐसे सर्विसएबुल बच्चों पर बरक़ात भी आती रहेगी। वे दिल पर चढ़े रहेंगे। जो दिल पर हैं वही तख्त पर बैठेंगे। रब्बा फ़रमाते आपस में मिलकर तरीक़ा बनाते रहो, सबको राह दिखाने की। तस्वीर भी बनते रहते हैं। यह तमाम प्रैक्टिकल बातें हैं।

अभी तुम समझाते हो कि पाक परवरदिगार ग़ैर मुजस्सम है, वह भी नुक्ता है। मगर वह नॉलेजफुल, नापाक से पाक बनाने वाला है। रूह भी नुक्ता है। बच्चा फिर भी छोटा होता है। बाप और बच्चे में फ़र्क तो होता है ना। आजकल तो 15-16 साल वाले भी बाप बन जाते हैं। तो भी बच्चा उनसे छोटा ही ठहरा ना। यहाँ वन्डर देखो - बाप भी रूह, बच्चा भी रूह। वह है सुप्रीम रूह, नॉलेजफुल। बाक़ी तमाम अपनी तालीम के मुताबिक नीच और ऊंच मर्तबा पाते हैं। तमाम मदार है तालीम पर। अच्छा आमाल करने से आला मर्तबा पा लेते हैं। अभी तुम बच्चों को ख़िल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का इल्म है। जन्नत में सिर्फ़ हिन्दुस्तान ही थी और कोई खण्ड नहीं था। तो छोटी न्यु इन्डिया में अपना फ़िरदौस दिखायें। जैसे द्वारिका नाम नहीं, लक्ष्मी-नारायण की डिनायस्टी की सल्तनत लिखना चाहिए। अक्ल भी कहती है सुनहरे दौर में पहले डीटी डिनायस्टी की सल्तनत होगी। उनके गाँव होंगे, छोटे-छोटे इलाके होंगे। यह भी इरादा ए ग़ौरतलब करना है। साथ-साथ रहमतुल्आल्मीन से अक्ल का राब्ता भी लगाना है। हम याद से ही बादशाही लेते हैं। याद से ही कट उतरनी है, इसमें ही तमाम मेहनत है। कइयों की अक्ल बाहर में धक्का खाती रहती है, यहाँ बैठे भी तमाम वक़्त याद में नहीं रह सकते हैं, अक्ल और तरफ़ चली जायेगी। अकीदत मन्दी की राह में भी ऐसे होता है। श्रीकृष्ण की अकीदत मन्दी करते-करते अक्ल और तरफ चली जाती है। नौधा अकीदत मन्दी वाले दीदार के लिए निहायत मेहनत करते हैं। कितने घण्टे बैठ जाते हैं कि कृष्ण के सिवाए और कोई याद न आये, निहायत मेहनत है। इसमें 8 की और फिर 16108 की माला होती है। वह तो लाखों की माला भी दिखाते हैं। मगर इल्म की राह की माला निहायत कीमती है। अकीदत मन्दी की राह की सस्ती है क्योंकि इसमें रूहानी मेहनत है। कृष्ण को देख खुश हो डांस करते हैं। अकीदत मन्दी की राह और इल्म में रात दिन का फ़र्क है, तुम्हें यह नहीं समझाया जाता है कि कृष्ण को याद करने से कट निकलेगी। यहाँ तो समझाया जाता है कि जितना रब को याद करेंगे उतना गुनाह ख़ाक होंगे।

तुम बच्चे अभी कुव्वत ए इबादत से दुनिया के मालिक बनते हो। यह किसको सपने में भी ख्याल नहीं होगा। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम ने कोई जंग वगैरह नहीं की है। दुनिया के मालिक फिर कैसे बने? यह तो तुम बच्चे ही जानते हो। रब फ़रमाते हैं कुव्वत ए इबादत से तुमको बादशाहत मिलेगी। मगर तक़दीर में नहीं है तो तदबीर ही नहीं करते। खिदमतगार बनते नहीं हैं। रब्बा तो डायरेक्शन देते रहते हैं कि ऐसे-ऐसे नुमाइश करो। कम से कम 150-200 नुमाइशे एक दिन में हो जायें। गाँव-गाँव में चक्कर लगाओ। जितने सेन्टर्स, उतनी नुमाइशें। एक-एक सेन्टर पर नुमाइश होने से समझाने में आसान हो जायेगा। सेन्टर्स भी रोज़ ब रोज़ बड़े होते जायेंगे जो तस्वीर वगैरह भी रख सकें। तस्वीरों की भी इन्वेन्शन निकलती रहती है। फ़िरदौस की तस्वीर खूबसूरत महल वगैरह के हिन्दुस्तान की बनाना चाहिए। आगे चल समझाने के लिए अच्छी-अच्छी तस्वीर निकलते जायेंगे। बुज़ुर्ग हालत वाले घूमते फिरते भी खिदमत करते रहें, जिनकी क़िस्मत आग़ाज़ होगा वह निकलेंगे। कई बच्चे बुरे आमाल कर अपनी आबरू गँवाते हैं, तो यज्ञ की आबरू (इज़्ज़त) गँवाते हैं। जैसा अख्लाक़ वैसा मर्तबा। जो निहायतों को ख़ुशी देते हैं, उनका तो नाम गाया जाता है ना। अभी तमाम फ़ज़ीलतों में लबरेज़ तो नहीं बने हो ना। कोई-कोई बड़ी अच्छी ख़िदमत कर रहे हैं। ऐसे-ऐसे के नाम सुन रब्बा ख़ुश होते हैं। ख़िदमतगार बच्चों को देख रब्बा ख़ुश होगा ना। अच्छी ख़िदमत में मेहनत करते रहते हैं। सेन्टर्स भी खोलते रहते हैं, जिससे हज़ारों का फ़लाह होना है। उनके ज़रिए फिर निहायत निकलते जायेंगे। मुकम्मल तो कोई नहीं बना है। भूलें भी कुछ न कुछ हो जाती है। इबलीस छोड़ती नहीं है। जितनी खिदमत कर अपनी तरक्की करेंगे उतना ही दिल पर चढ़ेंगे। उतना ही आला मर्तबा पायेंगे। फिर चक्कर चक्कर ऐसा ही मर्तबा होगा। रहमतुल्आल्मीन से तो कोई छिपा नहीं सकता। आख़िर में हर एक को अपने आमालों का दीदार ए जलवा तो होता है। फिर क्या कर सकेंगे! ज़ार-ज़ार रोना पड़ेगा इसलिए रब्बा समझाते रहते हैं कि ऐसा कोई भी आमाल नहीं करो जो आख़िर में सज़ा के भागी बनो, पछतावा करना पड़े। मगर कितना भी समझाओ तक़दीर में नहीं है तो तदबीर करते ही नहीं। आजकल के इन्सान तो रब को जानते नहीं। अल्लाह ताला को याद करते हैं मगर जानते नहीं। उनका कहना नहीं मानते। अभी उस बेहद के रब से तुम्हें सुनहरे दौर सल्तनत ए नफ़्स का वर्सा मिलता है सेकण्ड में। रहमतुल्आल्मीन का नाम तो तमाम पसन्द करते हैं ना। बच्चे जानते हैं कि उस बेहद के रब से जन्नत का वर्सा मिल रहा है। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. अपनी चलन से रब का और यज्ञ का नाम बाला करना है, ऐसा कोई आमाल न हो जो रब की इज़्ज़त जाये। ख़िदमात से अपना क़िस्मत आपे ही बनाना है।

2. रब जैसा फ़लाह नशीन बन तमाम की बरक़ात ले आगे नम्बर लेना है। घरेलू राब्ते में रह कमल फूल जैसा रहने की अच्छी बहादुरी दिखानी है।

बरक़ात:-
इमदाद के ज़रिए ख़ुद को आसान इबादत नशीन बनाने वाले मुसलसल नमाज़ी बनो।

मिलन के दौर पर रब के मददगार बन जाना - यही इबादत नशीन बनने का तरीक़ा है। जिनका दरेक इरादा, बोल और आमाल रब की और अपनी सल्तनत के क़याम के फराइज़ में मददगार रहने की है, उसको इल्मी, आबिद तू रूह मुसलसल सच्चा ख़िदमतगार कहा जाता है। ज़हन से नहीं तो जिस्म से, जिस्म से नहीं तो दौलत से, दौलत से भी नहीं तो जिसमें मददगार बन सकते हो उसमें मददगार बनो तो यह भी इबादत है। जब हो ही रब के, तो रब और आप - तीसरा कोई न हो - इससे मुसलसल इबादत नशीन बन जायेंगे।

स्लोगन:-
मिलन पर बर्दाश्त करना यानि कि मरना ही जन्नत की सल्तनत लेनी है।

आमीन