06-09-2020 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 16-03-86


रुहानी ड्रिल

रब उल हक़ तमाम बच्चों की स्वीट साइलेन्स की सूरत ए हाल को देख रहे हैं। एक सेकेण्ड में साइलेन्स की सूरत ए हाल में वाकेअ हो जाना यह प्रैक्टिस कहाँ तक की है? इस सूरत ए हाल में जब चाहें तब हो सकते हैं और वक़्त लगता है? क्योंकि अबदी रूप स्वीट साइलेन्स है। क़दीम रूप आवाज़ में आने का है। मगर अबदी ला फ़ानी आदत साइलेन्स है। तो अपने अबदी आदत, क़दीम रूप को,अबदी रवैये को जानते हुए जब चाहो तब उस रूप में वाक़ेअ हो सकते हो? 84 विलादत आवाज़ में आने के हैं इसलिए हमेशा प्रेक्टिस आवाज़ में आने की है। मगर अबदी रूप और फिर इस वक़्त चक्कर पूरा होने के सबब वापिस साइलेन्स होम में जाना है। अब घर जाने का वक़्त नज़दीक है। अब आग़ाज़ दरम्यान आख़िर तीनों ही वक़्त का पार्ट ख़त्म कर अपने अबदी रूप, अबदी सूरत ए हाल में वाकेअ होने का वक्त है इसलिए इस वक़्त यही प्रेक्टिस ज़्यादा ज़रूरी है। अपने आपको चेक करो कि आज़ा फ़तहयाब बने हैं? आवाज़ में नहीं आने चाहें तो यह मुंह का आवाज़ अपनी तरफ़ खींचता तो नहीं है। इसी को ही रूहानी ड्रिल कहा जाता है।

जैसे मौजूदा वक़्त के मुताबिक़ जिस्म के लिए तमाम बीमारियों का इलाज एक्सरसाइज सिखाते हैं, तो इस वक़्त रूह को कुव्वत नशीन बनाने के लिए यह रूहानी एक्सरसाइज की प्रेक्टिस चाहिए। चारों ओर कैसा भी माहौल हो, हलचल हो मगर आवाज़ में रहते आवाज़ से बालातर सूरत ए हाल की प्रेक्टिस अभी निहायत अरसे का चाहिए। सुकून के माहौल में सुकून की सूरत ए हाल बनाना यह कोई बड़ी बात नहीं है। बे सुकूनियत के दरम्यान आप सुकून परस्त रूह की यही प्रेक्टिस चाहिए। ऐसी प्रेक्टिस जानते हो? चाहे अपनी कमज़ोरियों की हलचल हो, आदतों के फ़ालतू इरादों की हलचल हो। ऐसी हलचल के वक़्त खुद को अचल बना सकते हो या टाइम लग जाता है? क्योंकि टाइम लगना यह कभी भी धोखा दे सकता है। आख़िर के वक़्त में ज़्यादा वक़्त नहीं मिलना है। फाइनल रिज़ल्ट का पेपर कुछ सेकण्ड और मिनटों का ही होना है। मगर चारों ओर की हलचल के माहौल में अचल रहने पर ही नम्बर मिलना है। अगर निहायत अरसे हलचल की सूरत ए हाल से अचल बनने में वक़्त लगने की प्रेक्टिस होगी तो खात्में के वक़्त क्या रिज़ल्ट होगी? इसलिए यह रूहानी एक्सरसाइज की प्रेक्टिस करो। ज़हन को जहाँ और जितना वक़्त वाक़ेअ करने चाहें उतना वक़्त वहाँ वाक़ेअ कर सको। फाइनल पेपर है निहायत ही आसान। और पहले से ही बता देते हैं कि यह पेपर आना है। मगर नम्बर बहुत थोड़े अरसे में मिलना है। स्टेज भी पाॅवरफुल हो।

जिस्म, जिस्म के राब्ते, जिस्म की आदत, इन्सान या शान ओ शौकत, वायब्रेशन, माहौल तमाम होते हुए भी कशिश न करे। इसी को ही कहते हैं खात्मा ए लगाव क़ाबिल रूप। तो ऐसी प्रैक्टिस है? लोग चिल्लाते रहें और आप अचल रहो। कुदरत भी, इबलीस भी तमाम लास्ट दाँव लगाने वास्ते अपने तरफ़ कितना भी खींचे लेकिन आप न्यारे और रब के प्यारे बनने की सूरत ए हाल में लवलीन रहो, इसको कहा जाता देखते हुए न देखो, सुनते हुए न सुनो... ऐसी प्रेक्टिस हो। इसी को ही स्वीट साइलेन्स रूप की सूरत ए हाल कहा जाता है। फिर भी रब उल हक़ वक़्त दे रहे है। अगर कोई भी कमी है तो अब भी भर सकते हो क्योंकि निहायत अरसे का हिसाब सुनाया। तो अभी थोड़ा चांस है, इसलिए इस प्रैक्टिस की तरफ़ फुल अटेन्शन रखो। पास विद आनर बनना या पास होना यह बुनियाद इसी प्रेक्टिस पर है। ऐसी प्रेक्टिस है? वक़्त की घण्टी बजे तो तैयार होंगे या अभी सोचते हो तैयार होना है? इसी प्रेक्टिस के सबब आठ जवाहिरात की माला ख़ास छोटी बनी है। निहायत थोड़े टाइम की है। जैसे आप लोग कहते हो ना सेकण्ड में निजात वा ज़िन्दगी ए निजात का वर्सा लेना तमाम का हक़ है। तो खात्मे के वक़्त भी नम्बर मिलना थोड़े वक़्त की बात है। मगर ज़रा भी हलचल न हो। बस नुक्ता कहा और नुक्ते में टिक जायें। नुक्ता हिले नहीं। ऐसे नहीं कि उस वक़्त प्रेक्टिस करना शुरू करो - मैं रूह हूँ...मैं रूह हूँ.. यह नहीं चलेगा क्योंकि सुनाया वार भी चारों ओर का होगा। लास्ट ट्रायल तमाम करेंगे। कुदरत में भी जितनी कुव्वत होगी, इबलीस में भी जितनी कुव्वत होगी, ट्रायल करेगी। उनकी भी लास्ट ट्रायल और आपकी लास्ट मुकम्मल, बन्दिश ए आमाल से आज़ाद सूरत ए हाल होगी। दोनों तरफ़ की निहायत पाॅवरफुल सीन होगी। वह भी फुलफोर्स, यह भी फुल-फोर्स। मगर सेकण्ड की फ़तह, फ़तह के नगाड़े बजायेगी। समझा लास्ट पेपर क्या है। तमाम नेक इरादा तो यही रखते भी हैं और रखना भी है कि नम्बरवन आना ही है। तो जब चारों ओर की बातों में विन होंगे तभी वन आयेंगे। अगर एक बात में ज़रा भी फ़ालतू इरादा, फ़ालतू वक़्त लग गया तो नम्बर पीछे हो जायेगा इसलिए सब चेक करो। चारों ही तरफ़ चेक करो। डबल विदेशी सब में तेज़ जाने चाहते हैं ना इसलिए तेज़ तजवीज़ और फुल अटेन्शन इस प्रेक्टिस में अभी से देते रहो। समझा! क्वेश्चन को भी जानते हो और टाइम को भी जानते हो। फिर तो सब पास होने चाहिए। अगर पहले से क्वेश्चन का मालूम होता है तो तैयारी कर लेते हैं। फिर पास हो जाते हैं। आप सभी तो पास होने वाले हो ना! अच्छा।

यह सीजन रब उल हक़ ने हरेक से मिलने का खुला भण्डारा खोला है। आगे क्या होना है, वह फिर बतायेंगे। अभी खुले भण्डार से जो भी लेने आये हैं वह तो ले ही लेंगे। ड्रामा का सीन हमेशा बदलता ही है लेकिन इस सीज़न में चाहे हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन को, चाहे डबल विदेशियों को तमाम को खास बरक़ात तो मिली ही है। रब उल हक़ ने जो वायदा किया है वह तो निभायेंगे। इस सीज़न का फल खाओ। फल है मिलन, बरक़ात। तमाम सीज़न का फल खाने आये हो ना। रब उल हक़ को भी बच्चों को देख ख़ुशी होती है। फिर भी जिस्मानी ख़िल्क़त में तो सब देखना होता है। अभी तो मौज मना लो। फिर सीज़न की लास्ट में सुनायेंगे।

खिदमत के मुकाम भले अलग-अलग हैं मगर ख़िदमत का मकसद तो एक ही है। जोश-हुल्लास एक ही है इसलिए रब उल हक़ तमाम मुकामों को खास अहमियत देते हैं। ऐसे नहीं एक मुकाम अहमियत वाला है, दूसरा कम है। नहीं। जिस भी सरज़मी पर बच्चे पहुँचे हैं उससे कोई न कोई ख़ास रिज़ल्ट ज़रूर निकलनी है। फिर चाहे कोई की जल्दी दिखाई देती, कोई की वक़्त पर दिखाई देगी। मगर खासियत सब तरफ़ की है। कितने अच्छे-अच्छे जवाहिरात निकले हैं। ऐसे नहीं समझना कि हम तो सादा हैं। तमाम ख़ास हो। अगर कोई ख़ास न होता तो रब के पास नहीं पहुँचता। ख़ासियत है लेकिन कोई खासियत को खिदमत में लगाते हैं कोई खिदमत में लगाने के लिए अभी तैयार हो रहे हैं, बाक़ी हैं सब खास रूहें। तमाम अज़ीम हस्ती, अज़ीम बहादुर हो। एक-एक की अज़मत शुरू करें तो लम्बी-चौड़ी माला बन जायेगी। कुव्वतैन को देखो तो हर एक कुव्वत अज़ीम रूह, जहान फ़लाह नशीन रूह दिखाई देगी। ऐसे हो ना या सिर्फ़ अपने-अपने मुकाम के फ़लाह नशीन हो? अच्छा।

06-09-20 ग़ैबी नूरानी कलेमात' रिवाइज 19-03-86 मधुबन

वक़्त ए शफ़ा - अफ़ज़ल दस्तयाबियों का वक़्त

आज रूहानी बागवान अपने रूहानी रोज़ फ्लावर्स का बग़ीचा देख रहे हैं। ऐसा रूहानी गुलाब का बग़ीचा अब इस मिलन के दौर पर ही रब उल हक़ के ज़रिए ही बनता है। रब उल हक़ हर एक रूहानी गुलाब के फूल की रूहानियत की खुशबू और रूहानियत के खिले हुए फूलों की रौनक देख रहे हैं। खुशबूदार तमाम हैं लेकिन किसकी खुशबू हमेशा अवक़ात रहने वाली है और किसकी खुशबू थोड़े वक़्त के लिए रहती है। कोई गुलाब हमेशा खिला हुआ है और कोई कब खिला हुआ कब थोड़ा-सा धूप और मौसम के हिसाब से मुरझा भी जाते हैं। मगर हैं फिर भी रूहानी बागवान के बगीचे के रूहानी गुलाब। कोई-कोई रूहानी गुलाब में इल्म की खुशबू ख़ास है। कोई में याद की खुशबू ख़ास है। तो कोई में अमल की खुशबू, कोई में खिदमत की खुशबू ख़ास है। कोई-कोई ऐसे भी हैं जो तमाम खुशबू से सराबोर हैं। तो बगीचे में सबसे पहले नज़र किसके ऊपर जायेगी? जिसकी दूर से ही खुशबू कशिश करेगी। उस तरफ़ ही सबकी नज़र पहले जाती है। तो रूहानी बागवान हमेशा तमाम रूहानी गुलाब के फूलों को देखते हैं। मगर नम्बरवार। प्यार भी तमाम से है क्योंकि हर एक गुलाब फूल के अन्दर बागवान के वास्ते बेइंतहा प्यार है। मालिक से फ़ूलों का प्यार है। और मालिक का फूलों से प्यार है। फिर भी शोकेस में हमेशा रखने वाले रूहानी गुलाब वही होते जो हमेशा तमाम खुशबू से सराबोर हैं और हमेशा खिले हुए हैं। मुरझायें हुए कभी नहीं। रोज़ वक़्त ए शफ़ा रब उल हक़ प्यार और कुव्वत की ख़ास परवरिश से तमाम रूहानी गुलाब के फूलों से मिलन मनाते हैं।

वक़्त ए शफ़ा ख़ास इलाही परवरिश का वक़्त है।वक़्त ए शफ़ा ख़ास इलाही मिलन का वक़्त है। रूहानी रूह-रूहान करने का वक़्त है। वक़्त ए शफ़ा भोले भण्डारी के बरक़ातों के ख़ज़ाने से आसान बरक़ात हासिल होने का वक्त है। जो गायन है ज़हनी खुवाहिशात का सिला हासिल करना, यह इस वक़्त वक़्त ए शफ़ा के वक़्त का गायन है। बिना मेहनत के खुले ख़ज़ाने दस्तयाब करने का वक़्त है। ऐसे सुहावने वक़्त को एहसास से जानते हो ना। एहसास साती ही जानें इस अफ़ज़ल ख़ुशी को, अफ़ज़ल दस्तयाबियों को। तो रब उल हक़ तमाम रूहानी गुलाब को देख-देख ख़ुशग्वार महसूस कर रहे हैं। रब उल हक़ भी कहते हैं वाह मेरे रूहानी गुलाब। आप वाह-वाह के नग़में गाते तो रब उल हक़ भी यही नग़में गाते। समझा!

नूरानी कलेमात तो निहायत सुनी हैं। सुन-सुनकर लबरेज़ बन गये हो। अभी अज़ीम सदक़ा नशीन बन बांटने के प्लैन बना रहे हो। यह जोश निहायत अच्छा है। आज यू.के. यानि कि ओ.के. रहने वालों का टर्न है। डबल ग़ैर मुल्क वाले का एक अल्फ़ाज़ सुन करके रब उल हक़ हमेशा मुस्कराते रहते हैं। कौन-सा? थैंक यू। थैंक यू करते हुए भी रब को भी याद करते रहते हैं क्योंकि सबसे पहले शुक्रिया दिल से रब का ही मानते हैं। तो जब किसी को भी थैंक यू करते तो पहले रब याद आयेगा ना! मोमिन ज़िन्दगी में पहला शुक्रिया अपने आप ही रब के वास्ते निकलता है। उठते-बैठते कई बार थैंक यू कहते हो। यह भी एक तरीक़ा है रब को याद करने का। यू.के.वाले तमाम अलग-अलग हद की कुव्वत वालों को मिलाने के ज़रिया बने हुए हो ना। कई तरह के नॉलेज की कुव्वतें हैं। अलग-अलग ताक़त वाले, अलग-अलग फ़िरक़े वाले, अलग-अलग दीन वाले, ज़ुबां वाले तमाम को मिलाकर एक ही मोमिन फ़िरके में लाना, मोमिन दीन में, मोमिन ज़ुबां में आना। मोमिनों की ज़ुबां भी अपनी है। जो नये समझ भी नहीं सकते कि यह क्या बोलते हैं। तो मोमिनों की ज़ुबां, मोमिनों की डिक्शनरी ही अपनी है। तो यू.के. वाले तमाम को एक बनाने में बिज़ी रहते हो ना। तादाद भी अच्छी है और प्यार भी अच्छा है हर एक मुकाम की अपनी-अपनी खासियत तो है ही है लेकिन आज यू.के.का सुना रहे हैं। यज्ञ मोहब्बत नशीन, यज्ञ मददगार यह खासियत अच्छी दिखाई देती है। हर कदम पर पहले यज्ञ यानि कि मधुबन का हिस्सा निकालने में अच्छे नम्बर में जा रहे हैं। डायरेक्ट मधुबन की याद एक स्पेशल लिफ्ट बन जाती है। दरेक काम में, हर कदम में मधुबन यानि कि रब की याद है या रब की तालीम है या रब का तबर्रुक है या रब से मिलन है। मधुबन अपने आप ही रब की याद दिलाने वाला है। कहाँ भी रहते मधुबन की याद आना यानि कि ख़ास प्यार, लिफ्ट बन जाता है। चढ़ने की मेहनत से छूट जाते। सेकण्ड में स्विच ऑन किया और पहुँचे।

रब उल हक़ को और कोई हीरे मोती तो चाहिए नहीं। रब को प्यार की छोटी चीज़ ही हीरे जवाहरात हैं इसलिए सुदामा के कच्चे चावल गाये हुए हैं। इसका जज़्बा मतलब यही है कि प्यार की छोटी-सी सुई में भी मधुबन याद आता है। तो वह भी निहायत बड़ा बेशकीमती जवाहिरात है क्योंकि प्यार का दाम है। वैल्यु प्यार की है। चीज़ की नहीं। अगर कोई वैसे ही भल कितना भी दे देवे लेकिन प्यार नहीं तो उसका जमा नहीं होता और प्यार से थोड़ा भी जमा करे तो उनका पदम जमा हो जाता है। तो रब को प्यार पसन्द है। तो यू.के. वालों की ख़ासियत यज्ञ के प्यारे, यज्ञ मददगार शुरू से रहे हैं। यही आसन इबादत भी है। आसान इबादत है। मदद का इरादा आने से भी याद तो रब की रहेगी ना। तो मददगार, आसान इबादत नशीन अपने आप ही बन जाते हैं। राब्ता रब से होता, मधुबन यानि कि रब उल हक़ से। तो मददगार बनने वाले भी आसान इबादत की सबजेक्ट में अच्छे नम्बर ले लेते हैं। दिल की इमदाद रब को प्यारी है, इसलिए यहाँ यादगार भी दिलवाला मन्दिर बनाया है। तो दिलवाला रब को दिल का प्यार, दिल की इमदाद ही प्यारी है। छोटी दिल वाले छोटा सौदा कर ख़ुश हो जाते और बड़ी दिल वाले बेहद का सौदा करते हैं। फाउन्डेशन बड़ी दिल है तो तफ्सील भी बड़ी हो रही है। जैसे कई जगह पर दरख्त देखे होंगे तो दरख्त की शाखायें भी तना बन जाती हैं। तो यू.के.के फाउन्डेशन से तना निकला, शाखायें निकलीं। अब वह शाखायें भी तना बन गई। उस तना से भी शाखायें निकल रही हैं। जैसे आस्ट्रेलिया निकला, अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका निकले। सब तना बन गये। और हर एक तना की शाखायें भी अच्छी तरह से इज़ाफें को पा रही हैं क्योंकि फाउन्डेशन प्यार और मदद के पानी से मज़बूत है, इसलिए तफ्सील भी अच्छा है और सिला भी अच्छा हैं। अच्छा -

बरक़ात:-
जिस्मानी हवास को कुर्बान कर ग़ैर गुस्सैल बनने वाले हलीम नशीन बनो।

जो बच्चे जिस्मानी हवास की कुर्बानी करते हैं उन्हें कभी भी गुस्सा नहीं आ सकता क्योंकि गुस्सा आने के दो सबब होते हैं। एक - जब कोई झूठी बात कहता है और दूसरा जब कोई तौहीन करता है। यही दो बातें गुस्से को पैदा करती हैं। ऐसे हालात में हलीम नशीन की बरक़ात के ज़रिए दुश्मन पर भी रहम करो, गाली देने वाले को गले लगाओ, ग़ीबत करने वाले को सच्चा दोस्त मानो - तब कहेंगे कमाल। जब ऐसी तब्दीली दिखाओ तब दुनिया के आगे मशहूर होंगे

स्लोगन:-
मौज का एहसास करने के लिए इबलीस की गुलामी को छोड़ आज़ाद बनो।

आमीन