06-09-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे - नापाक से पाक बनाने वाले रब की सिरात ए मुस्तकीम पर तुम पाकीज़ा बनते हो इसलिए तुम्हें पाकीज़ा दुनिया की बादशाहत मिलती, अपनी राय पर पाकीज़ा बनने वालों को कोई दस्तयाबी नहीं

सवाल:-
बच्चों को खिदमत पर ख़ास किस बात का तवज्जों रखना चाहिए?

जवाब:-
जब खिदमत में जाते हो तो कभी छोटी मोटी बात में एक दूसरे से रूठो मत यानि कि नाराज़ न हो। अगर आपस में लूनपानी होते, बात नहीं करते तो डिससर्विस का ज़रिया बन जाते। कई बच्चे तो रब से भी रूठ जाते हैं। उल्टे आमाल करने लग पड़ते हैं। फिर ऐसे बच्चों की एडाप्शन ही रद्द हो जाती है।

आमीन।
नापाक से पाक बनाने वाले रब, जो बच्चे पाकीज़ा बनते हैं उन्हों को बैठ समझाते हैं। नापाक बच्चे ही पाकीज़ा बनाने वाले रब को पुकारते हैं। ड्रामा के प्लैन भी कहते हैं, शैतानी सल्तनत होने के सबब तमाम इन्सान नापाक हैं। नापाक उसे कहा जाता है जो ख़बासत में जाते हैं। ऐसे निहायत हैं जो ख़बासत में नहीं जाते हैं। ब्रह्मचारी रहते हैं। समझते हैं हम ग़ैर ख़बासती हैं, जैसे पादरी लोग हैं, मुल्लेकाज़ी हैं, बौद्धी भी होते हैं जो पाकीज़ा रहते हैं। उनको पाकीज़ा किसने बनाया? वह खुद बने हैं। दुनिया में निहायत ऐसे मज़हबों में हैं जो ख़बासत में नहीं जाते हैं। मगर उनको नापाक से पाक बनाने वाले रब तो पाकीज़ा नहीं बनाते हैं ना इसलिए वह पाकीज़ा दुनिया का मालिक नहीं बन सकते। पाकीज़ा दुनिया में जा नहीं सकते। राहिब भी 5 ख़बासतों को छोड़ देते हैं। मगर उनको बेनियाज़ी करायी किसने? नापाक से पाक बनाने वाले पाक परवरदिगार ने तो बेनियाज़ नहीं कराया ना। नापाक से पाक बनाने वाला रब के सिवाए कामयाब हो नहीं सकता। पाकीज़ा दुनिया दारूल सुकून में जा नहीं सकते। यहाँ तो रब आकर तुमको पाकीज़ा बनने की सिरात ए मुस्तकीम देते हैं। सुनहरे दौर को कहा जाता है वाइसलेस दुनिया। इससे साबित है, सुनहरे दौर में आने वाले पाकीज़ा ज़रूर होंगे। सुनहरे दौर में भी पाक़ीज़ा थे, दारूल सुकून में भी रूहें पाकीज़ा हैं। इस शैतानी सल्तनत में हैं ही तमाम नापाक। दोबारा विलादत तो लेनी ही है। सुनहरे दौर में भी दोबारा विलादत लेते हैं, मगर ख़बासत से नहीं। वह है ही मुकम्मल ग़ैर ख़बासती दुनिया। भल अदना जन्नत में 2 फ़न कम होती हैं मगर ख़बासती नहीं कहेंगे। भगवान श्री राम, भगवती श्री सीता कहते हैं ना। 16 फ़न फिर 14 फ़न कहा जाता है। चान्द का भी ऐसे होता है ना। तो इससे साबित होता है जब तक नापाक से पाक बनाने वाला रब आकर पाकीज़ा न बनाये तब तक निजात-ज़िन्दगी ए निजात में कोई जा नहीं सकते। रब ही गाइड है। इस दुनिया में पाकीज़ा तो निहायत हैं। राहिबों की भी पाकीज़गी के सबब मान्यता है।मगर रब के ज़रिए पाकीज़ा नहीं बनते हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो हमको पाकीज़ा बनाने वाला ग़ैर मुजस्सम पाक परवरदिगार है। वह तो आपे ही अपनी सलाह पर पाकीज़ा बनते हैं। तुम रब के ज़रिए पाकीज़ा बनते हो। नापाक से पाक बनाने वाले रब के ज़रिए ही पाकीज़ा दुनिया का वर्सा मिलता है। रब फ़रमाते हैं -ए बच्चों ज़िनाखोरी तुम्हारी अज़ीम-दुश्मन है, इन पर फ़तह पहनो, गिरते भी इसमें हैं। ऐसे कभी नहीं लिखेंगे कि हमने गुस्सा किया, तो काला मुँह कर दिया। ज़िना के लिए ही लिखते हैं हमने काला मुँह किया। गिर गया। इन बातों को तुम बच्चे ही जानते हो, दुनिया नहीं जानती। ड्रामा के मुताबिक जिनको आकर मोमिन बनना है, वह आते जायेंगे। और इज्तेमाअ में तो कोई एम आब्जेक्ट ही नहीं है। शिवानंद वगैरह के फालोअर्स तो निहायत हैं मगर उनमें भी कोई-कोई बेनियाज़ी लेते होंगे। घरेलू राब्ता तो लेते ही नहीं। बाक़ी घरबार छोड़ने वाले निहायत थोड़े निकल पड़ते हैं। बेनियाज़ बनते हैं फिर भी दोबारा विलादत लेनी पड़ती है। शिवानंद के लिए थोड़े ही कहेंगे कि ज्योति ज्योत में समाया। तुम समझते हो तो तमाम की ख़ैर निजात दिलाने वाला रब ही है, वही गाइड है। गाइड बिगर कोई जा नहीं सकता। तुम बच्चे जानते हो हमारा बाप, बाप भी है, नॉलेजफुल भी है। इन्सानी खिल्क़त का बीजरूप है। तमाम इन्सानी खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर की नॉलेज तो बीज को ही होगी ना। फादर तो तमाम कहते हैं ना। बच्चे तो जानते हैं हमारा गॉड फादर एक ही है तो तरस भी उस फादर को ही सब पर पड़ेगा ना। कितने बेइंतहा इन्सान हैं, कितने चरिन्दे परिन्दे हैं। वहाँ इन्सान थोड़े होते हैं तो चरिन्दे परिन्दे भी थोड़े होते हैं। सुनहरे दौर में ऐसी किचड़पट्टी होती नहीं। यहाँ तो कई तरह की बीमारियां वगैरह कितनी निकलती रहती हैं, जिसके लिए फिर नई दवाइयां निकलती रहती हैं। ड्रामा प्लैन के मुताबिक कई तरह के हुनर निकालते रहते हैं। वह तमाम है इन्सान के हुनर। रूहानी रब का हुनर क्या है? रब के लिए कहते हैं ए नापाक से पाक बनाने वाले आकर हमारी रूह को पाकीज़ा बनाओ, जिस्म भी पाक़ीज़ा, कहते हैं नापाक से पाक बनाने वाले, दु:ख दूर करने वाले, ख़ुशी देने वाले, एक को ही बुलाते हैं ना। अपनी-अपनी ज़ुबां में याद ज़रूर करते हैं। इन्सान मरने पर होते हैं तो भी अल्लाह ताला को याद करते हैं, समझते हैं दूसरा कोई सहारा नहीं देगा, इसलिए कहते हैं - गॉड फादर को याद करो। क्रिश्चियन भी कहेंगे गॉड फादर को याद करो। ऐसे नहीं कहेंगे - क्राइस्ट को याद करो। जानते हैं क्राइस्ट के ऊपर गॉड है। गॉड तो सबका एक होगा ना। अब तुम बच्चे जानते हो आलम ए मौत क्या है, आलम ए हयात क्या है! दुनिया में कोई नहीं जानते। वह तो कहते जन्नत जहन्नुम तमाम यहाँ ही है। कोई-कोई समझते हैं सुनहरे दौर था, हूरैनों की सल्तनत थी। अभी तक भी कितने नये-नये मन्दिर बनते रहते हैं। तुम बच्चे जानते हो सिवाए एक रब के और कोई भी हमको पाकीज़ा बनाए वापिस अपने घर ले नहीं जा सकते। तुम्हारी अक्ल में है कि हम अपने स्वीटहोम में जा रहे हैं। रब हमको वापिस ले जाने के लिए लायक़ बना रहे हैं। यह याददाश्त में रहना चाहिए।

रब समझाते हैं बच्चे तुमने इतने-इतने विलादत लिए हैं। अभी हम आकर यज़ीद से मोमिन बने हैं। फिर मोमिन से हूरैन बनना है, जन्नत में जाना है। अभी है मिलन। तफ्सीलरूप में मोमिनों की चोटी मशहूर है। हिन्दुओं के लिए भी चोटी निशानी है। इन्सान तो इन्सान ही हैं। खालसे, मुसलमान वगैरह ऐसे बन जाते हैं जो तुमको मालूम भी न पड़े कौन हैं? बाक़ी चीनी हैं, अफ्रीकन हैं, उनका मालूम पड़ जाता है। उन्हों की शक्ल ही अलग है। क्रिश्चियन का हिन्दुस्तान से कनेक्शन है तो यह सीखे हैं। कितनी वैरायटी है मज़हबों की। उनकी रसम-रिवाज़ पहरवाइस तमाम अलग है। अभी तुम बच्चों को इल्म मिला है, हम सुनहरे दौर का क़याम कर रहे हैं। वहाँ और कोई मज़हब नहीं था। अभी तो तमाम वैरायटी मज़हब वाले हाज़िर हैं। अब आखिर में और क्या मज़हब क़ायम करेंगे। हाँ, नई रूहें पाकीज़ा होती हैं इसलिए जो नई रूह आती है तो कुछ न कुछ उस रूह की अज़मत होती रहेगी। अक्ल कहती है जो पिछाड़ी में आयेंगे उनको पहले ज़रूर ख़ुशी मिलेगी। अज़मत होगी फिर ग़म भी होगा। है ही एक विलादत जैसे तुम दारूल मसर्रत में निहायत रहते हो। वह फिर दारूल सुकून में निहायत रहते हैं। आखिर तक इज़ाफ़ा बहुत होता है। दरख़्त बड़ा है ना। इस वक़्त इन्सानों की कितना इज़ाफ़ा होता रहता है इसलिए इनको बन्द करने के तरीके निकालते रहते हैं। मगर इससे कुछ हो नहीं सकता। तुम जानते हो ड्रामा प्लैन के मुताबिक इज़ाफ़ा होना है ज़रूर। नये पत्ते आते जायेंगे फिर टालियां वगैरह निकलती रहेंगी। कितनी वैरायटी है। अब बच्चे जानते हैं हम और कोई कनेक्शन में नहीं हैं। रब ही हमको पाकीज़ा बनाते हैं और खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर की ख़बर सुनाते हैं। तुम भी उनको ही बुलाते हो ए नापाक से पाक आकर हमको पाकीज़ा बनाओ तो ज़रूर नापाक दुनिया तबाही को पायेगी। यह भी हिसाब है। सुनहरे दौर में थोड़े इन्सान रहते हैं। इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में कितने बेइंतहा इन्सान हैं, तुम बच्चों को समझानी भी देनी है। रब हमको पढ़ाते हैं इस पुरानी दुनिया की अब तबाही होती है। क़याम रब ही करेंगे। अल्लाह ताला फ़रमाते हैं मैं क़याम कराता हूँ। तबाही तो ड्रामा के मुताबिक होती है। हिन्दुस्तान में ही तस्वीर भी हैं। जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिए मोमिन, जिब्राइल अलैहिस्सलाम मुंह निस्बनामा देखो कितने हैं। वह हैं कोख निस्बनामा ब्राह्मण। वह तो रब को जानते ही नहीं। तुमको अब हौंसला आया है। तुम जानते हो अब इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर की तबाही हो सुनहरा दौर आना है। यह है ही राजस्व अश्वमेध अविनाशी रूद्र ज्ञान यज्ञ। इसमें कुर्बानी पड़नी है - पुरानी दुनिया की। दूसरी तो कोई कुर्बानी है नहीं। रब फ़रमाते हैं - मैंने तमाम खिल्क़त पर यह राजस्व अश्वमेध यज्ञ रचा है। तमाम सरज़मी पर तामीर हुआ है। यज्ञ कुण्ड होते हैं ना। इसमें तमाम दुनिया ख़ाक हो जायेगी। यज्ञ कुण्ड बनाते हैं। यह तमाम खिल्क़त यज्ञ कुण्ड बनी हुई है। इस यज्ञ कुण्ड में क्या होगा? सब इसमें खलास हो जायेंगे। यह कुण्ड पाकीज़ा नया हो जायेगा, इसमें फिर हूरैन आयेंगे। समुन्दर चारों ओर है ही, तमाम दुनिया नई हो जायेगी। उथल-पाथल तो निहायत होगी। ऐसी कोई जगह नहीं है जो किसकी न हो। तमाम कहते हैं यह मेरी है। अब मेरी-मेरी कहने वाले इन्सान तमाम ख़त्म हो जायेंगे। बाक़ी मैं जिनको पाकीज़ा बनाता हूँ, वह थोड़े ही तमाम दुनिया में रहेंगे। पहले-पहले अल्लाह अव्वल हूर-हूरैन दीन होगा। जमुना नदी के कण्ठे पर उन्हों की सल्तनत होगी। यह तमाम बातें तुम्हारी अक्ल में बैठनी चाहिए, ख़ुशी रहनी चाहिए। इन्सान एक दूसरे को कहानी बैठ सुनाते रहते हैं ना। यह भी हक़ीक़ी अफ़ज़ल हज़रात की रिवायत है, ये है बेहद की। तुम्हारी अक्ल में ही यह बातें हैं। उनमें भी जो अच्छे-अच्छे खिदमतगार हैं, उन्हों की अक्ल में इख्तियारात होती है, झोली भरेगी, सदक़ा देते रहेंगे इसलिए कहते हैं धन दिये धन ना खुटे। समझते हैं सदक़ा देने से बरक़त बढ़ेगी। तुम्हारी तो है ला फ़ानी दौलत। अभी दौलत दिये दौलत ना खुटे, जितना सदक़ा देंगे उतनी ही ख़ुशी होगी। सुनते वक्त कोई-कोई का कांध जैसे झूलता रहेगा। कोई तो तवाई मुआफ़िक बैठे रहते हैं। रब इतनी अच्छी-अच्छी प्वाइंट्स सुनाते हैं। तो सुनते वक्त आटोमेटिक कांध हिलेगा। यहाँ बच्चे आते ही हैं सम्मुख बाप से रिफ्रेश होने। बाप कैसे बैठ युक्ति से प्वाइंट सुनाते हैं। तुम जानते हो हिन्दुस्तान में हूर-हूरैनों की सल्तनत थी। हिन्दुस्तान को जन्नत कहा जाता है। अभी तो जहन्नुम है। जहन्नुम बदलकर जन्नत होगा बाक़ी इतने सबकी तबाही हो जायेगी। तुम्हारे लिए तो जन्नत जैसे कल की बात है। कल सल्तनत करते थे, दूसरा कोई ऐसे कह न सके। कहते भी हैं क्राइस्ट के इतने साल पहले पैराडाइज़ था, तब कोई दूसरा मज़हब नहीं था। तांबे के दौर से तमाम मज़हब आते हैं। बड़ी आसान बात है। मगर इन्सानों की अक्ल इस तरफ़ है नहीं जो समझ सकें। बुलाते भी हैं नापाक से पाक बनाने वाले आओ तो आकर ज़रूर नापाक से पाक बनायेंगे ना! यहाँ तो कोई पाकीज़ा हो न सके। सुनहरे दौर को वाइसलेस वर्ल्ड कहा जाता है। अभी तो है विशश वर्ल्ड। अहम बात है पाकीज़गी की। इसके लिए तुमको कितनी मेहनत करनी पड़ती है। तुम जानते हो आज दिन तक जो भी पास्ट हुआ वह ड्रामा के मुताबिक ही कहेंगे। इसमें हम किसको बुरा भला नहीं कह सकते। जो कुछ होता है, ड्रामा में नूँध है। रब आगे के लिए समझाते हैं कि खिदमत में ऐसे-ऐसे आमाल नहीं करो। नहीं तो डिससर्विस हो जाती है। रब ही तो बतायेंगे ना। तुम आपस में लूनपानी हो गये हो। समझते हैं हम लूनपानी हैं, एक दूसरे से मिलते बात नहीं करते फिर किसको कुछ कहो तो एकदम बिगड़ जाते हैं। रहमतुल्आल्मीन को भूल जाते हैं इसलिए समझाया जाता है कि हमेशा रहमतुल्आल्मीन को याद करो। रब एहतियात देते हैं बच्चों को। ऐसे-ऐसे काम करने से बुरी हालत हो जाती है। मगर तक़दीर में नहीं है तो समझते ही नहीं। रहमतुल्आल्मीन जिनसे वर्सा मिलता है, उनसे भी रूठ पड़ते हैं। मोमिना से भी रूठते हैं, इनसे भी रूठते हैं। फिर कभी क्लास में नहीं आते हैं। रहमतुल्आल्मीन से तो कभी नहीं रूठना चाहिए ना। उनकी नूरानी कलेमात तो पढ़नी है। याद भी उनको करना है। रब्बा फ़रमाते हैं ना - बच्चे अपने को रूह समझ मुझे याद करो तो ख़ैर निजात होगी। जिस्मानी हवास में आने से जिस्म नशीनियों से रूठ पड़ते हैं। वर्सा तो दादे से मिलेगा। बाप का बनें तब दादे का वर्सा मिले। बाप को ही फारकती दे दी तो वर्सा कैसे मिलेगा। मोमिन खानदान से निकल यज़ीद खानदान में चले गये तो वर्सा ख़त्म। एडाप्शन रद्द हो गया। फिर भी समझते नहीं हैं। इबलीस ऐसा है जो एकदम तवाई बना देती है। रब को तो कितना प्यार से याद करना चाहिए मगर याद करते ही नहीं। रहमतुल्आल्मीन का बच्चा हूँ, जो हमको दुनिया का मालिक बनाते हैं। ज़रूर हिन्दुस्तान में ही विलादत लेते हैं। शब ए बारात मनाते हैं ना। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होगी तो पहले-पहले रहमतुल्आल्मीन ही आकर जन्नत बनायेंगे। तुम जानते हो कि हमको जन्नत की बादशाही मिल रही है। रब ही आकर जन्नत रिहाईश नशीन बनाते हैं। नई दुनिया के लिए सल्तनत ए इबादत सिखलाते हैं। तुम जाकर नई दुनिया में सल्तनत चलाते हो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) अक्ल रूपी झोली में ला फ़ानी जवाहिरात ए इल्म लबरेज़ कर फिर सदक़ा करना है। सदक़ा करने से ही ख़ुशी रहेगी। दौलत ए इल्म बढ़ती जायेगी।

2) कभी भी आपस में बिगड़कर लूनपानी नहीं होना है। निहायत प्यार से रब को याद करना है और नूरानी कलेमात सुननी है। तवाई नहीं बनना है।

बरक़ात:-
हमेशा सवाब का खाता जमा करने और कराने वाले मास्टर उस्ताद बनो।

हम मास्टर उस्ताद हैं, मास्टर कहने से रब अपने आप याद आता है। बनाने वाले की याद आने से खुद ज़रिया हूँ - यह अपने आप याददाश्त में आ जाता है। और ख़ास याददाश्त रहे कि हम सवाबी रूह हैं, सवाब का खाता जमा करना और कराना - यही ख़ास खिदमत है।सवाबी रूह कभी अज़ाब का एक परसेन्ट इरादा भी नहीं कर सकती। मास्टर उस्ताद माना हमेशा सवाब का खाता जमा करने और कराने वाले, रब जैसे।

स्लोगन:-
तनज़ीम की अहमियत को जानने वाले तनज़ीम में ही खुद की सेफ्टी का एहसास करते हैं।

आमीन