07-01-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
जब यह हिन्दुस्तान जन्नत था तब तुम बेइंतहा रोशनी में थे, अभी अन्धियारा है, फिर रोशनी में चलो

सवाल:-
रब अपने बच्चों को कौन सी एक कहानी सुनाने आये हैं?

जवाब:-
रब्बा फ़रमाते मीठे बच्चे - मैं तुम्हें 84 विलादतों की कहानी सुनाता हूँ। तुम जब पहली-पहली विलादत में थे तो एक ही हूरैन मज़हब था फिर तुमने ही दो दौर के बाद बड़े-बड़े मन्दिर बनाये हैं। अकीदत मन्दी शुरू की है। अभी तुम्हारा यह आख़िर के भी आख़िर की विलादत है। तुमने पुकारा दु:ख दूर करने वाले ख़ुशी देने वाले आओ.... अब मैं आया हूँ।

नग़मा:-
आज अन्धेरे में है इन्सान........

आमीन।
तुम बच्चे जानते हो अभी यह इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में दुनिया है, तमाम अन्धियारे में हैं। पहले रोशनी में थे, जबकि हिन्दुस्तान जन्नत था। यही हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन जो अभी अपने को हिन्दू कहलाते हैं यह असल हूर-हूरैन थे। हिन्दुस्तान में जन्नत रिहाईश नशीन थे। जब और कोई मज़हब नहीं था। एक ही दीन था। जन्नत, वैकुंठ, बहिश्त, हेविन - यह तमाम इस हिन्दुस्तान के नाम थे। हिन्दुस्तान पाकीज़ा और कदीम दौलत मन्द था। अभी तो हिन्दुस्तान कंगाल है क्योंकि अभी इख्तिलाफ़ी फ़ितने का दौर है। तुम जानते हो हम अन्धियारे में हैं। जब जन्नत में थे तो रोशनी में थे। जन्नत के मालिक ए आज़म, मल्लिकाए आज़म आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम थे। उसको दारूल मसर्रत कहा जाता है। रब से ही तुमको जन्नत का वर्सा लेना है, जिसको ज़िन्दगी ए निजात कहा जाता है। अभी तो तमाम ज़िन्दगी ए बन्दिश में हैं। ख़ास हिन्दुस्तान और आम दुनिया शैतान की जेल में, ग़म ए गुलशन में हैं। ऐसे नहीं रावण सिर्फ़ लंका में था और राम भारत में था, उसने आकर सीता चुराई। यह तो तमाम हैं रिवायतें। गीता है अहम, सर्व शास्त्रमई शिरोमणी श्रीमत यानि कि अल्ल्लाह् ताला की सुनाई हुई है, हिन्दुस्तान में। इन्सान तो कोई की ख़ैर निजात कर नहीं सकते। सुनहरे दौर में थे आज़ाद ए ज़िन्दगी हूर- हूरैन , जिन्होंने यह वर्सा इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के आखिर में पाया था। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीनियों को यह मालूम नहीं है, न कोई सहीफों में है। सहीफों में है अकीदत मन्दी की राह का इल्म। ख़ैर निजात की राह का इल्म इन्सान में बिल्कुल है नहीं। तमाम अकीदत सिखलाने वाले हैं। कहेंगे सहीफें पढ़ो, सदक़ा-सवाब करो। यह अकीदत द्वापर से चली आती है। आला जन्नत और अदना जन्नत में है इल्म का उजूरा। ऐसे नहीं कि वहाँ भी यह इल्म चलता आता है। यह जो वर्सा हिन्दुस्तान को था वह रब से मिलन के दौर पर ही मिला था जो फिर अभी तुमको मिल रहा है। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन जब जहन्नुम रिहाईश नशीन बेहद दु:खी बन जाते हैं तब पुकारते हैं - ए नापाक से पाक बनाने वाले दु:ख दूर करने वाले ख़ुशी देने वाले। किसका? तमाम का क्योंकि हिन्दुस्तान ख़ास, दुनिया आम तमाम में 5 ख़बासत हैं। रब है नापाक से पाक बनाने वाले। रब फ़रमाते हैं - मैं चक्कर-चक्कर, चक्कर के मिलन पर आता हूँ। तमाम की ख़ैर निजात देने वाला बनता हूँ। मज़लूम,तवाइफ़ और जो हादी लोग हैं उन तमाम का फलाह मुझे ही करना पड़ता है क्योंकि यह तो है ही नापाक दुनिया। पाकीज़ा दुनिया सुनहरे दौर को कहा जाता है। हिन्दुस्तान में इन आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत थी। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन यह नहीं जानते कि यह जन्नत के मालिक थे। नापाक खण्ड माना झूठ खणड, पाकीज़ा खण्ड माना सचखण्ड। हिन्दुस्तान पाकीज़ा खण्ड था, यह हिन्दुस्तान है ला फ़ानी खण्ड, जो कभी फ़ना नहीं होता है। जब इनकी ( आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की) सल्तनत थी तो और कोई खण्ड थे नहीं। वह तमाम बाद में आते हैं। इन्सानों ने तो चक्कर लाखों साल का लिख दिया है। रब फ़रमाते हैं चक्कर की उम्र 5 हज़ार साल है। वह फिर कह देते इन्सान 84 लाख विलादत लेते हैं। इन्सान को कुत्ता, बिल्ली, गधा वगैरह तमाम बना दिया है। मगर कुत्ते बिल्ली की विलादत अलग है, 84 लाख वैराइटी हैं। इन्सानों की तो वैरायटी एक ही है। उनके ही 84 विलादत हैं। रब फ़रमाते हैं हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन अपने मज़हब को ड्रामा प्लैन के मुताबिक भूल गये हैं। इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के अाख़िर में बिल्कुल ही नापाक बन पड़े हैं। फिर रब मिलन पर आकर पाकीज़ा बनाते हैं, इसको कहा जाता है दारूल ग़म फिर हिन्दुस्तान दारूल मसर्रत होगा। रब फ़रमाते हैं - ए बच्चों, तुम हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन, जन्नत रिहाईश नशीन थे फिर तुम 84 विलादतों की सीढ़ी उतरते हो। सतो से रजो-तमो में ज़रूर आना है। तुम हूरैनों जैसा दौलत मन्द एवरहैप्पी, एवरहेल्दी, वेल्दी कोई नहीं होता। हिन्दुस्तान कितना दौलत मन्द था, हीरे-जवाहरात तो पत्थरों मिसल थे। दो दौर बाद अकीदत मन्दी की राह में इतने बड़े-बड़े मन्दिर बनाते हैं। वह भी कितने भारी मन्दिर बनाये। सोमनाथ का मन्दिर बड़े से बड़ा था। सिर्फ़ एक मन्दिर तो नहीं होगा ना। और भी बादशाहों के मन्दिर थे। कितना लूट कर ले गये हैं। रब तुम बच्चों को याददाश्त दिलाते हैं। तुमको कितना दौलत मन्द बनाया था। तुम तमाम फ़ज़ीलतों से लबरेज़, 16 फ़नों से आरास्ता थे। जैसे मलिक ए आज़म-मल्लिकाएं आज़म। उन्हों को भगवान-भगवती भी कह सकते हैं। मगर रब ने समझाया है -अल्लाह ताला एक है, वह बाप है। सिर्फ़ ईश्वर या खुदा कहने से भी याद नहीं आता कि वह तमाम रूहों का बाप है। बाप कहानी बैठ सुनाते हैं। अभी तुम्हारे निहायत विलादत के आख़िर की विलादत है। एक की बात नहीं है, न कोई जंग का मैदान वगैरह है। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन यह भूल गये हैं कि उन्हों की सल्तनत थी। सुनहरे दौर की उम्र लम्बी कर देने से निहियत दूर ले गये हैं। रब आकर समझाते हैं - इन्सान को अल्ल्लाह् ताला नहीं कह सकते। इन्सान किसी की ख़ैर निजात नहीं कर सकते। कहावत है - तमाम का ख़ैर निजात दिलाने वाला, नापाकों को पाकीज़ा बनाने वाला एक है। एक ही सच्चा रब्बा है जो सचखण्ड का क़याम करने वाला है। बुतपरस्ती भी करते हैं मगर अकीदत मन्दी की राह में तुम जिसकी बुतपरस्ती करते आये हो, एक की भी बायोग्राफी को नहीं जानते इसलिए रब समझाते हैं, तुम शिवजयन्ती तो मनाते हो ना। रब है नई दुनिया की तामीर करने वाला, हेविनली गॉड फाॅदर। बेहद ख़ुशी देने वाला। सुनहरे दौर में निहायत ख़ुशी थी। वह कैसे और किसने क़ायम किया? यह रब ही बैठ समझाते हैं। जहन्नुम रिहाईश नशीन को आकर जन्नत रिहाईश नशीन बनाना या बद उनवानों को अफ़जल नशीन हूरैन बनाना, यह तो रब का ही काम है। रब फ़रमाते हैं - मैं तुम बच्चों को पाकीज़ा बनाता हूँ। तुम जन्नत के मालिक बनते हो। तुमको नापाक कौन बनाते हैं? यह शैतान। इन्सान कह देते दु:ख भी अल्ल्लाह् ताला ही देते हैं। रब फ़रमाते हैं - मैं तो तमाम को इतनी ख़ुशी देता हूँ जो फिर आधा चक्कर तुम रब को याद नहीं करेंगे। फिर जब शैतानी सल्तनत होती है तो सबकी बुतपरस्ती करने लग पड़ते हैं। यह है तुम्हारा निहायत विलादतों के आख़िर का विलादत। कहते हैं रब्बा कितने विलादत हमने लिए? रब्बा फ़रमाते हैं - मीठे-मीठे हिन्दुस्तान रिहाईश नशीनियों, ए रूहों, अब तुमको बेहद का वर्सा देता हूँ। बच्चे, तुमने 84 विलादत लिए हैं। अभी तुम 21 विलादत के लिए रब से वर्सा लेने आये हो। तमाम तो इकट्ठे नहीं आयेंगे। तुम ही सुनहरे दौर का खानदान ए आफ़ताबी मर्तबा फिर से लेते हो यानि कि सच्चे हक़ीक़ी रब्बा से सच्ची हज़रात से अफ़ज़ल हज़रात बनने का इल्म सुनते हो। यह है इल्म, वह है अकीदत मन्दी। सहीफें वगैरह तमाम हैं अकीदत मन्दी की राह के लिए। वह इल्म की राह के नहीं हैं। यह है स्प्रीचुअल रूहानी नॉलेज। सुप्रीम रूह बैठ नॉलेज देते हैं। बच्चों को रूहानी हवासी बनना पड़े। अपने को रूह यक़ीन कर दिल से मुझे याद करो। रब समझाते हैं - रूह में ही अच्छी और बुरी आदत होती हैं, जिस के मुताबिक़ ही इन्सान को अच्छी और बुरी विलादत मिलती है। रब बैठ समझाते हैं यह जो पाकीज़ा थे, आखिरी विलादत में नापाक है, तुम्ही थे तुम्हे ही बनना है। मुझ रब को इस पुरानी शैतान की दुनिया, नापाक दुनिया में आना पड़ता है। आना भी उस जिस्म में है जो फिर पहले नम्बर में जाना है। खानदान ए आफ़ताबी ही पूरे 84 विलादत लेते हैं। यह है जिब्राइल अलैहिस्सलाम और जिब्राइल अलैहिस्सलाम की निस्बनामा मोमिन। रब समझाते तो रोज़ हैं। पत्थर अक्ल को पारस अक्ल बनाना मासी का घर नहीं है। ए रूहों, अब रूहानी हवासी बनो। ए रूहों, एक रब को याद करो और बादशाहत को याद करो। जिस्म के रिश्तों को छोड़ो। मरना तो तमाम को है। सबकी बुज़ुर्ग हालत है। एक हक़ीक़ी हादी बिगर तमाम की ख़ैर निजात दिलाने वाला कोई हो नहीं सकता। रब फ़रमाते हैं - ए हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन बच्चों, तुम पहले-पहले मेरे से बिछुड़े हो। गाया जाता है - आत्मायें-परमात्मा अलग रहे बहुकाल..... यानि कि रूह और रब अलग रहे निहायत अरसे पहले-पहले तुम हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन हूर-हूरैन दीन वाले आये हो। और दीन वालों के विलादत थोड़े होते हैं। तमाम चक्कर कैसे फिरता है सो रब बैठ समझाते हैं। जो इख्तियार नहीं करा सकते हैं, उनके लिए भी निहायत आसान है। रूहें इख्तियार करती हैं, नफ़ीस रूह, ख़बीस रूह बनती हैं ना। तुम्हारा यह 84 वां आखिरी विलादत है। तुम तमाम बुज़ुर्ग हालत में हो। बुज़ुर्ग हालत वाले हादी करते हैं, दुआ लेने के लिए। तुमको तो अभी जिस्म नशीन हादी करने की दरकार नहीं है। तुम सबका मैं बाप, उस्ताद, हादी हूँ। मुझे कहते भी हो - ए नापाक से पाक बनाने वाले रहमतुल्आल्मीन। अभी याददाश्त आई है। तमाम रूहों का रब है,रूह हक़ है, ज़िन्दा है क्योंकि हयाती है। तमाम रूहों में पार्ट भरा हुआ है। रब भी हक़ीक़ी ज़िन्दा है। वह इन्सानी खिल्क़त का बीज रूप होने सबब कहते हैं - मैं तमाम दरख्त के आग़ाज़ - दरम्यान - आख़िर को जानता हूँ इसलिए मुझे नॉलेजफुल कहा जाता है। तुमको भी तमाम नॉलेज है। बीज से दरख़्त कैसे निकलता है। दरख़्त बढ़ने में टाइम लगता है ना। रब फ़रमाते हैं मैं बीजरूप हूँ, आखिर में तमाम दरख्त खस्ता हालत को पा लेता है। अभी देखो हूर-हूरैन दीन का फाउण्डेशन है नहीं। आम तौर पर गुम है। जब हूरैन दीन गुम हो जाता है तब रब को आना पड़ता है - एक दीन का क़याम कर बाक़ी सबको खलास करा देते हैं। बाप ए अवाम जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिए रब क़याम करा रहे हैं, अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन की। यह भी तमाम ड्रामा बना हुआ है। इनकी एण्ड होती नहीं। रब आते हैं आखिर में। जबकि खिल्कत के आग़ाज़ - दरम्यान -आख़िर का नॉलेज सुनाना है तो ज़रूर मिलन पर आयेंगे। तुम्हारा एक रब है। रूहें तमाम ब्रदर्स हैं, बुनियादी वतन में रहने वाली। उस एक रब को सब याद करते हैं। दु:ख में याद सब करें.. शैतानी सल्तनत में दु:ख है ना। यहाँ याद करते हैं तो रब सब का ख़ैर निजात दिलाने वाला एक है। उनकी ही अज़मत है। रब नहीं आये तो हिन्दुस्तान को जन्नत कौन बनावे! इस्लामी वगैरह जो भी हैं तमाम इस वक़्त स्याह रास्त हैं। सबको दोबारा विलादत तो ज़रूर लेनी है। अभी दोबारा विलादत मिलती है जहन्नुम में। ऐसे नहीं कि जन्नत में चले जाते हैं। जैसे हिन्दू लोग कहते हैं जन्नत रिहाईश नशीन हुआ तो ज़रूर जहन्नुम में था ना। अभी जन्नत में गया। तुम्हारे मुंह में गुलाब। जन्नत रिहाईश नशीन हुआ फिर जहन्नुम के शैतानी वानगी तुम उनको क्यों खिलाते हो! बंगाल में मछलियां वगैरह भी खिलाते हैं। अरे, उनको इन सब खाने की दरकार ही क्या है! कहते हैं फलाना पार निजात गया, रब फ़रमाते यह तमाम हैं गपोड़े। वापिस कोई भी जा नहीं सकते। जबकि पहले नम्बर वालों को ही 84 विलादत लेने पड़ते हैं।
रब समझाते हैं इसमें कोई तकलीफ़ नहीं है। अकीदत मन्दी में कितनी तकलीफ़ है। राम-राम जपते रोमांच खड़े हो जाते। वह तमाम है अकीदत मन्दी। यह सूरज-चांद भी तुम जानते हो कि रोशनी करने वाले हैं। यह कोई हूरैन थोड़े ही हैं। असल में आफ्ताब ए इल्म,महताब ए इल्म और इल्म के सितारे हैं। उन्हों की अज़मत है। वह फिर कह देते सूर्य देवताए नम:। उनको देवता समझ पानी देते हैं। तो रब समझाते हैं यह सब है अकीदत मन्दी की राह, जो फिर भी होगी। पहले होती है एक की अकीदत मन्दी एक रहमतुल्आल्मीन की, फिर हूरैन की, फिर उतरते-उतरते अभी तो देखो टिवाटे पर (जहाँ तीन रास्ते मिलते हैं) भी मिट्टी का दीवा जगाए, तेल वगैरह डाल उनकी भी बुतपरस्ती करते हैं। अनासरों की भी बुतपरस्ती करते हैं। इन्सानों की भी तस्वीर बनाए बुतपरस्ती करते हैं। अब इनसे दस्तयाबी तो कुछ भी नहीं होती, इन बातों को तुम बच्चे ही समझते हो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. रूह से बुरी आदतों को निकालने के लिए रूहानी हवासी रहने की प्रेक्टिस करनी है। यह आखिरी 84 वीं विलादत है, बुज़ुर्ग हालत है इसलिए नफ़ीस रूह बनने की मेहनत करनी है।

2. जिस्म के तमाम रिश्तों को छोड़ एक रब को और बादशाहत को याद करना है, बीज और दरख्त का इल्म याद कर हमेशा ख़ुशगवार रहना है।

बरक़ात:-
जहान तब्दीली के अफ़जल काम की ज़िम्मेवारी निभाते हुए डबल लाइट रहने वाले बुनियादी नशीन बनो।

जो बुनियादी नशीन होते हैं उनके ऊपर ही तमाम ज़िम्मेवारी रहती है। अभी आप जिस रूप से, जहाँ भी कदम उठायेंगे वैसे कई रूहें आपको फालो करेंगी, यह ज़िम्मेवारी है। मगर यह ज़िम्मेवारी सुरत ए हाल को बनाने में निहायत मदद करती है क्योंकि इससे कई रूहों की बरक़ात मिलती है, जिस सबब ज़िम्मेवारी हल्की हो जाती है, यह ज़िम्मेवारी थकावट मिटाने वाली है।

स्लोगन:-
दिल और दिमाग दोनों का बैलेन्स रख खिदमत करने से कामयाबी मिलती है।

आमीन