07-02-2021 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 29-10-87


जिस्म, ज़हन, दौलत और रिश्ते की कुव्वत


आज तमाम कुव्वत नशीन रब अपने कुव्वत नशीन बच्चों को देख रहे हैं। हर एक मोमिन रूह कूव्वत नशीन बनी है मगर नम्बरवार है। तमाम कुव्वतें रब का वर्सा और बरकाती की बरक़ात हैं। रब और बरक़ात - इन डबल रिश्ते से हरेक बच्चे को यह अफ़ज़ल दस्तयाबी विलादत से ही होती है। विलादत से ही रब तमाम कुव्वतों का यानि कि पैदाइशी हक़ का हक़दार बना देता है, साथ-साथ बरक़ाती के नाते से विलादत होते ही मास्टर तमाम कुव्वत नशीन बनाए तमाम कुव्वत नशीन बनो' की बरक़ात दे देते हैं। तमाम बच्चों को एक ज़रिए एक जैसा ही डबल हक़ मिलता है मगर इख्तियार करने की कुव्वत नम्बरवार बना देती है। रब तमाम को हमेशा और तमाम कुव्वत नशीन बनाते हैं मगर बच्चे यथा-कुव्वत बन जाते हैं। वैसे जिस्मानी ज़िन्दगी में और रूहानी ज़िन्दगी में कामयाबी की बुनियाद कुव्वतैन ही हैं। जितनी कुव्वतें, उतनी कामयाबी।अहय कुव्वतें हैं - जिस्म की, ज़हन की, दौलत की और रिश्ते की। चारों ही ज़रूरी हैं। अगर चार में से एक भी कुव्वत कम है तो ज़िन्दगी में हमेशा फुल कामयाबी नहीं होती। रूहानी ज़िन्दगी में भी चारों ही कुव्वतें ज़रूरी है।

इस रूहानी ज़िन्दगी में रूह और कुदरत दोनों की तन्दरूस्ती ज़रूरी है। जब रूह सेहतमंद है तो जिस्म का हिसाब-किताब और जिस्म की बीमारी सूली से कांटा बनने के सबब, खुद की सूरत ए हाल के सबब सेहतयाब एहसास करता है। उनके मुंह पर, चेहरे पर बीमारी के तक़लीफ के निशान नहीं रहते। मुंह पर कभी बीमारी का ज़िक्र नही होता, तकलीफ़ ए आमाल के बयान के बदले इबादत ए आमाल की सूरत ए हाल का बयान करते हैं क्योंकि बीमारी का ज़िक्र भी बीमारी के इज़ाफ़ा करने का सबब बन जाता है। वह कभी भी बीमारी की तकलीफ़ का एहसास नहीं करेगा, न दूसरे को तकलीफ़ सुनाकर दर्द की लहर फैलायेगा। और ही तब्दीली की कुव्वत से तकलीफ़ को मुत्मइन नशीनी में तब्दील कर मुत्मइन रह औरों में भी मुत्मइन नशीनी की लहर फैलायेगा यानि कि मास्टर तमाम कुव्वत नशीन बन कुव्वतों की बरक़ात में से वक़्त मुताबिक बर्दाश्त की कुव्वत, समाने की कुव्वत इस्तेमाल करेगा और वक़्त पर कुव्वतों की बरक़ात और वर्सा काम में लाना - यही उसके लिए बरक़ात यानि कि दुआ दवाई का काम कर देती है क्योंकि तमाम कुव्वत नशीन रब के ज़रिए जो तमाम कुव्वतें दस्तयाब हैं वह जैसी हालत, जैसा वक़्त और जिस तरीक़े से आप काम में लगाने चाहो, वैसे ही रूप से यह कुव्वतें आपकी मददगार बन सकती हैं। इन कुव्वतों को और अल्लाह ताला की बरक़ात को जिस रूप में चाहे वह रूप इख्तियार कर सकती है। अभी-अभी शीतलता के रूप में, अभी-अभी जलाने के रूप में। पानी की शीतलता का भी एहसास करा सकते तो आग के जलाने का भी एहसास करा सकते; दवाई का भी काम कर सकता और कुव्वत नशीन बनाने का माजून का भी काम कर सकता। सिर्फ़ वक़्त पर काम में लगाने की अथॉरिटी बनो। यह तमाम कुव्वतें आप मास्टर तमाम कुव्वत नशीन की ख़िदमतगार हैं। जब जिसको आर्डर करो, वह हाज़िर हज़ूर' कह मददगार बनेगी मगर खिदमत लेने वाले भी इतने चतुर-सुजान चाहिए। तो जिस्म की कुव्वत रूहानी कुव्वत की बुनियाद पर हमेशा एहसास कर सकते हो यानि कि हमेशा सेहतमंद रहने का एहसास कर सकते हो।

यह रूहानी मोमिन ज़िन्दगी है ही हमेशा सेहतमंद ज़िन्दगी। बरक़ाती से हमेशा सेहतमन्द बनो' की बरक़ात मिली हुई है। रब उल हक़ देखते हैं कि दस्तयाब हुए बरक़ातों को कई बच्चे वक़्त पर काम में लगाकर फायदा नहीं ले सकते हैं वा यह कहें कि कुव्वतों यानि कि खिदमतगार से अपनी बेहद नशीनी और बेहद अक्ल के ज़रिए खिदमत नहीं ले पाते हैं। मास्टर तमाम कुव्वत नशीन' - यह सूरत ए हाल कोई कम नहीं है! यह अफ़ज़ल सूरत ए हाल भी है, साथ-साथ डायरेक्ट पाक परवरदिगार के ज़रिए सुप्रीम टाइटल' भी है। टाइटल का नशा कितना रखते हैं! टाइटल कितने काम कामयाब कर देता है! तो यह इलाही-टाइटल है, इसमें कितनी ख़ुशी और कुव्वतें भरी हुई है! अगर इसी एक टाइटल की सूरत ए हाल रूपी सीट पर सेट रहो तो यह तमाम कुव्वतें खिदमत के लिए हमेशा हाज़िर एहसास होंगी, आपके आर्डर की इन्तजार में होगी। तो बरक़ात को और वर्से को काम में लगाओ। अगर मास्टर तमाम कुव्वत नशीन के इज़्ज़त ए आप में वाक़ेअ नहीं होते तो कुव्वतों को आर्डर में चलाने के बजाए बार-बार रब को अर्जी डालते रहते कि यह कुव्वत दे दो, यह हमारा काम करा दो, यह हो जाए, ऐसा हो जाए। तो अर्जी डालने वाले कभी भी हमेशा राज़ी नहीं रह सकते हैं। एक बात पूरी होगी, दूसरी शुरू हो जायेगी। इसलिए मालिक बन, राब्ते याफ़्ता बन तरीक़त मुताबिक खिदमत खिदमतगार से लो तो हमेशा सेहतमंद का अपने आप ही एहसास करेंगे। इसको कहते हैं जिस्म की कुव्वत की दस्तयाबी ।

ऐसे ही ज़हन की कुव्वत यानि कि अफ़ज़ल इरादे की कुव्वत। मास्टर तमाम कुव्वत नशीन के दरेक इरादे में इतनी कुव्वत है जो जिस वक़्त जो चाहे वह कर सकता है और करा भी सकता है क्योंकि उनके इरादे हमेशा अफ़ज़ल, अफ़ज़ल और फ़लाह नशीन होंगे। तो जहाँ अफ़ज़ल फ़लाह का इरादा है, वह पूरा ज़रूर होता है और मास्टर तमाम कुव्वत नशीन होने के सबब ज़हन कभी मालिक को धोखा नहीं दे सकता है, दु:ख नहीं एहसास करा सकता है। ज़हन तवज्जों नशीन यानि कि एक ठिकाने पर वाक़ेअ रहता है, भटकता नहीं है। जहाँ चाहो, जब चाहो ज़हन को वहाँ वाक़ेअ कर सकते हो। कभी ज़हन उदास नहीं हो सकता है, क्योंकि वह खिदमतगार गुलाम बन जाता है। यह है ज़हन की कुव्वत जो रूहानी ज़िन्दगी में वर्से और बरक़ात में दस्तयाब है।

इसी तरह तीसरी है दौलत की कुव्वत यानि कि दौलत ए इल्म की कुव्वत। दौलत ए इल्म मैकरू दौलत की दस्तयाब अपने आप ही कराता है। जहाँ इल्म की दौलत है, वहाँ कुदरत अपने आप ही गुलाम बन जाती है। यह मैकरू दौलत कुदरत के अस्बाब के लिए है। इल्म की दौलत से कुदरत के तमाम अस्बाब अपने आप दस्तयाब होती हैं इसलिए इल्म की दौलत तमाम दौलत का राजा है। जहाँ राजा है, वहाँ तमाम चीज़े अपने आप ही दस्तयाब होती हैं, मेहनत नहीं करनी पड़ती। अगर कोई भी जिस्मानी चीज़ें दस्तयाब करने में मेहनत करनी पड़ती है तो इसका सबब इल्म के दौलत की कमी है। असल में, इल्म की दौलत पद्मापद्मपति बनाने वाला है। दूसरों के फ़लाह के अखलाक़ को अपने आप ही पूरा करता है। तो इलाही-दौलत वाले दूसरे के फ़लाह नशीन बन जाते हैं। इरादा करने की भी ज़रूरत नहीं, अपने आप ही तमाम ज़रूरतें पूरी होती रहती। दौलत की इतनी कुव्वत है जो कई विलादत यह इल्म की दौलत राजाओं का भी राजा बना देती है। तो दौलत की भी कुव्वत आसानी से दस्तयाब हो जाती है।

इसी प्रकार - रिश्तों की कुव्वत। रिश्ते की कुव्वत की दस्तयाबी की नेक खुवाहिशात इसलिए होती है क्योंकि रिश्ते में प्यार और इमदाद की दस्तयाबी होती है। इस रूहानी ज़िन्दगी में रिश्ते की कुव्वत डबल रूप में दस्तयाब होती है। जानते हो, डबल रिश्ते की कुव्वत कैसे दस्तयाब होती है? एक - रब के ज़रिए तमाम रिश्ता, दूसरा - हूरैन फैमिली के ज़रिए रिश्ता। तो डबल रिश्ता हो गया ना - रब से भी और आपस में भी। तो रिश्ते के ज़रिए तमाम बे गर्ज प्यार, ला फ़ानी प्यार और ला फ़ानी मदद हमेशा ही दस्तयाब होता रहता है। तो रिश्ते की भी कुव्वत है ना। वैसे भी बाप, बच्चे को क्यों चाहता है यानि कि बच्चा, रब को क्यों चाहता है? इमदाद के लिए, वक़्त पर मदद मिले। तो इस रूहानी ज़िन्दगी में चारों कुव्वतों की दस्तयाबी बरक़ात रूप में, वर्से के रूप में है। जहाँ चारों तरह की कुव्वतें दस्तयाब हैं, उसकी हर वक़्त की सूरत ए हाल कैसी होगी? हमेशा मास्टर तमाम कुव्वत नशीन। इसी सूरत ए हाल की सीट पर हमेशा वाक़ेअ हो? इसी को ही दूसरे अल्फ़ाज़ों में खुद के राजे और सल्तनत ए नफ़्स इबादत नशीन कहा जाता है। बादशाहों के भण्डार हमेशा लबरेज़ रहते हैं। तो सल्तनत ए नफ़्स इबादत नशीन यानि कि हमेशा कुव्वतों के भण्डार लबरेज़ रहते, समझा? इसको कहा जाता है अफ़ज़ल मोमिन रूहानी ज़िन्दगी। हमेशा मालिक बन तमाम कुव्वतों को काम में लगाओ। जितनी कुव्वत के बजाए हमेशा कुव्वत नशीन बनो। अर्जी करने वाले नहीं, हमेशा राज़ी रहने वाले बनो। अच्छा।

मधुबन आने का चांस तो तमाम को मिल रहा है ना। इस दस्तयाब हुए क़िस्मत को हमेशा साथ रखो। खालिक ए क़िस्मत को साथ रखना यानि कि क़िस्मत को साथ रखना है। तीन ज़ोन के आये हैं। अलग-अलग मुकाम की 3 नदियां आकर इकट्ठी हुई - इसको त्रिवेणी का मिलन कहते हैं। रब उल हक़ तो बरक़ाती बन तमाम को बरक़ात देते हैं। बरक़ात को काम में लगाना, वह हर एक के ऊपर है। अच्छा।
चारों ओर के तमाम वर्से और बरक़ातों के हक़दार अफ़ज़ल रूहों को, तमाम मास्टर तमाम कुव्वत नशीन अफ़ज़ल रूहों को, हमेशा मुत्मइन नशीनी की लहर फैलाने वाले मुत्मइन रूहों को, हमेशा दूसरों का फ़लाह के ज़रिए अख्लाक़ में सिद्धी दस्तयाब करने वाली अज़ीम रूहों को रब उल हक़ का प्यार और कुव्वत लबरेज़ यादप्यार और सलाम।

तमाम की इमदाद से खुशहाल जहान'' प्रोग्राम के बारे में - ग़ैबी रब उल हक़ की प्रेरणा
यह सब्जेक्ट ऐसी है जो खुद तमाम मदद देने की आॅफर करेंगे। मदद से फिर रिश्ते में भी आयेंगे इसलिए आपे ही आॅफर होगी। सिर्फ़ नेक जज़्बात, नेक खुवाहिशात लबरेज़ खिदमत में खिदमतगार आगे बढ़ें। नेक जज़्बात का सिला दस्तयाब नहीं हो - यह हो ही नहीं सकता। खिदमतगार के नेक जज़्बात, नेक खुवाहिशात की सरज़मी आसानी से सिला देने के ज़रिया बनेगी। सिला तैयार है, सिर्फ़ सरज़मी तैयार होने की थोड़ी-सी देरी है। सिला तो फटाफट निकलेंगे मगर उसके लिए क़ाबिल सरज़मी चाहिए। अभी वह सरज़मी तैयार हो रही है।

वैसे खिदमत तो तमाम की करनी ज़रूरी है मगर फिर भी जो ख़ास सल्तनत हैं, उनमें से नज़दीक नहीं आये हैं। चाहे सल्तनत हुकूमत वालों की खिदमत हुई है या मज़हब हुकूमत वालों की हुई है, मगर मददगार बनकर के सामने आयें, वक़्त पर मददगार बनें - उसकी ज़रूरत है। उसके लिए तो कुव्वत नशीन तीर लगाना पड़ेगा। देखा जाता है कि कुव्वत नशीन तीर वही होता है जिसमें तमाम रूहों की मदद का जज़्बा हो, ख़ुशी का जज़्बा हो, ख़ैर जज़्बा हो। इससे हर काम आसान क़ामयाब होता है। अभी जो खिदमत करते हो वह अलग-अलग करते हो। मगर जैसे पहले ज़माने में कोई काम करने के लिए जाते थे तो तमाम फैमिली की बरक़ात लेकर के जाते थे। वह बरक़ात ही आसान बना देती है। तो मौजूदा खिदमत में यह एडीशन (इज़ाफ़ा) चाहिए। तो कोई भी काम शुरू करने के पहले तमाम नेक जज़्बात, नेक खुवाहिशात लो, तमाम के इत्मीनान की ताक़त भरो, तब तमाम कुव्वत नशीनी का सिला निकलेगा। अभी इतनी मेहनत करने की ज़रूरत नहीं है। तमाम खोखले हुए पड़े हैं। मेहनत करने की ज़रूरत नहीं। फूंक दो और उड़कर यहाँ आ जायें - ऐसे खोखले हैं। और आजकल तो तमाम समझ रहे हैं कि और कोई पाॅवर चाहिए जो कन्ट्रोल कर सके - चाहे सल्तनत को, चाहे मज़हब को। अन्दर से तलाश रहे हैं। सिर्फ़ मोमिन रूहों की खिदमत की तरीक़े में फर्क चाहिए, वही मंत्र बन जायेगा। अभी तो मंत्र चलाओ और सिद्धि हो। 50 साल मेहनत की। यह तमाम भी होना ही था, एहसास साती बन गये। अभी हर काम में यही मकसद रखो कि तमाम के इमदाद से कामयाबी' - मोमिनों के लिए यह टॉपिक है। बाक़ी दुनिया वालों के लिए टॉपिक है - तमाम की इमदाद से खुशहाल जहान'।

अच्छा। अब तो आप सबके सिद्धि का ज़ाहिर रूप दिखाई देगा। कोई बिगड़ा हुआ काम भी आपकी नज़र से, आपके इमदाद से आसान हल होगा जिसके सबब अकीदत मन्दी में धन्य-धन्य करके पुकारोंगे। यह सब सिद्धियां भी आपके सामने ज़ाहिर रूप में आयेंगी। कोई सिद्धि के तरीक़े से आप लोग नहीं कहेंगे कि हाँ यह हो जायेगा, मगर आपका डायरेक्शन अपने आप सिद्धि दस्तयाब कराता रहेगा। तब तो अवाम जल्दी-जल्दी बनेगी, सब तरफ़ से निकल कर आपकी तरफ़ आयेंगे। यह सिद्धि का पार्ट अभी चलेगा। मगर पहले इतने कुव्वत नशीन बनो जो सिद्धि को क़बूल न करो, तब यह ज़ूहूर होगा। नहीं तो, सिद्धि देने वाले ही सिद्धि में फंस जायें तो फिर क्या करेंगे? तो यह तमाम बातें यहाँ से ही शुरु होनी हैं। रब का जो गायन है कि वह सर्जन भी है, इंजीनियर भी है, वकील भी है, जज भी है, इसका प्रैक्टिकल तमाम एहसास करेंगे, तब सब तरफ़ से अक्ल हटकर एक तरफ़ जायेगी। अभी तो आपके पीछे भीड़ लगने वाली है। रब उल हक़ तो यह सीन देखते हैं और कभी-कभी अब के सीन देखते हैं - निहायत फ़र्क लगता है। आप हो कौन, वह रब जानता है! बहुत-बहुत वण्डरफुल पार्ट होने हैं, जो ख्याल-ख्वाब में भी नहीं है। सिर्फ थोड़ा रुका हुआ है बस। जैसे पर्दा कभी-कभी थोड़ा अटक जाता है ना। झण्डा भी लहराते हो तो कभी अटक जाता है। ऐसे अभी थोड़ा-थोड़ा अटक रहा है। आप जो हैं, जैसे हो - निहायत अज़ीम हो। जब आपकी खासियत ज़ाहिर होगी तब तो पसंदीदा हूरैन बनेंगे। आख़िर तो अकीदत माला भी ज़ाहिर होगी ना, मगर पहले ठाकुर सजकर तैयार हों तब तो भक्त आयें ना। अच्छा।

बरक़ात:-
खुद के आराम की भी कुर्बानी कर खिदमत करने वाले हमेशा मुत्मइन, हमेशा खुशहाल बनो।

खिदमतगार खुद के रात-दिन के आराम को भी छोड़ कर खिदमत में ही आराम महसूस करते हैं, उनके राब्ते में रहने वाले और रिश्ते में आने वाले नज़दीकी का ऐसे एहसास करते हैं जैसे शीतलता और कुव्वत, सुकून के झरने के नीचे बैठे हैं। अफ़ज़ल अख्लाक नशीन खिदमतगार कामधेनु बन तवील अरसे के लिए तमाम की खुवाहिशात पूरी कर देते हैं। ऐसे ख़िदमतगार को हमेशा ख़ुशहाल और हमेशा मुत्मइन रहने की बरक़ात अपने आप दस्तयाब हो जाती है।

स्लोगन:-
इल्म याफ़्ता बनना है तो हर वक़्त स्टडी पर अटेन्शन रखो, रब और तालीम से बराबर प्यार हो।

आमीन