07-04-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे - बाप दूरदेश से आये हैं तुम बच्चों के लिए नयी सल्तनत क़ायम करने, तुम अभी जन्नत के लायक़ बन रहे हो

सवाल:-
जिन बच्चों का रहमतुल्आल्मीन में बेइंतहा यक़ीन है उनकी निशानी क्या होगी?

जवाब:-
वह आंख बन्द करके रब्बा की सिरात ए मुस्तकीम पर चलते रहेंगे, जो फ़रमान मिले। कभी ख्याल भी नहीं आयेगा कि इसमें कुछ नुकसान न हो जाए क्योंकि ऐसे यक़ीनी दानिश मन्द बच्चों का रेसपान्सिबुल रब है। उन्हें यक़ीन की कुव्वत मिल जाती है। हालत अडोल और अचल हो जाती है।

नग़मा:-
तुम्हीं हो माता, तुम्हीं पिता हो..

आमीन।
यह अज़मत किसकी सुनी? जिसको सिवाए तुम बच्चों के दुनिया में और कोई जानते नहीं हैं। यह है आला ते आला रब की अज़मत। बाक़ी जिसकी भी अज़मत करते हैं वह फालतू हो जाती है। आला ते आला एक ही रब है। मगर रब की पहचान कौन देवे। खुद आकर रूह की और अपनी पहचान देते हैं। कोई भी इन्सान को रूह की भी पहचान है नहीं। भल कहते हैं अज़ीम रूह, जिस्मानी रूह। जिस्म जब छूट जाता है तो कहते - रूह निकल जाती है। जिस्म मुर्दा हो जाता है। रूह ला फ़ानी है। वह कभी ख़त्म नहीं होती। रूह जो स्टार मिसल है, वह बेइंतहा महीन है। इन आंखों से देखने में नहीं आती है। फ़राइज़ तमाम रूह करती है। मगर घड़ी-घड़ी जिस्मानी हवास में आ जाते हैं तो कहते हैं मैं फलाना हूँ, मैं यह करता हूँ। असल में करती तमाम रूह है। जिस्म तो आरगन्स हैं। यह राहिब वगैरह भी जानते हैं कि रूह निहायत महीन है, जो पेशानी के दरम्यान में रहती है। मगर उनको यह इल्म नहीं है कि रूह में यह पार्ट बजाने के आदत हैं। कोई कहते - रूह में आदत होती नहीं, रूह निर्लेप है। कोई कहते - आदतों के मुताबिक विलादत मिलती है। इख्तिलाफ़ निहायत है। यह भी किसको मालूम नहीं कि कौन सी रूहें 84 विलादत लेती हैं। तुम जानते हो कि खानदान ए आफ़ताबी को ही 84 का चक्कर लगाना पड़ता है। रूह ही 84 का चक्कर लगाए नापाक बनती है। उनको अब पाकीज़ा कौन बनाये? नापाक से पाक बनाने वाला आला ते आला एक ही रब है, उनकी अज़मत सबसे आला है। 84 विलादत तमाम तो नहीं लेते। पीछे आने वाले तो 84 विलादत ले न सकें। तमाम इकट्ठे तो नहीं आते हैं। जो पहले-पहले सुनहरे दौर में आयेंगे, खानदान ए आफ़ताबी मलिक ए आज़म और अवाम, उन्हों के 84 विलादत होते हैं। पीछे तो इन्सानों का निहायत इज़ाफ़ा होता है ना। फिर कोई के 83 कोई के 80 विलादत होते हैं। वहाँ जन्नत में तो पूरी 150 साल उम्र होती है। कोई जल्दी मर न सके। यह बातें रब ही बैठ समझाते हैं। अब कोई पाक परवरदिगार को नहीं जानते हैं। रब फ़रमाते हैं कि जैसे तुम्हारी रूह है, वैसे मेरी भी रूह है। तुम सिर्फ़ विलादत मौत में आते हो, मैं नहीं आता हूँ। मुझे बुलाते भी तब हैं जब नापाक बनते हैं। जब निहायत दु:खी हो जाते हैं तब बुलाते हैं। इस वक़्त तुम बच्चों को रहमतुल्आल्मीन तालीम दे रहे हैं।

कोई पूछते कि यह कैसे मानें कि पाक परवरदिगार आते हैं! तो उन्हों को समझाना है कि तमाम पुकारते हैं - ए पाक परवरदिगार आओ। अब वह है ग़ैर मुजस्सम। उनको अपना जिस्म नहीं है, आना भी है नापाक दुनिया में। पाकीज़ा दुनिया में तो नहीं आयेंगे। ऐसे समझाना चाहिए। यह भी समझाना है कि पाक परवरदिगार इतनी छोटी है जैसे रूह छोटी है, मगर वह है इन्सानी खिल्क़त का बीजरूप, नॉलेजफुल। रब फ़रमाते हैं कि तुम मुझे पाक परवरदिगार कहते हो। पुकारते हो तो ज़रूर आयेंगे ना। गायन भी है कि दूरदेश का रहने वाला आया देश पराये। अभी रब के ज़रिए मालूम पड़ा है कि अभी हम पराये वतन यानि कि शैतान के वतन में हैं।आला जन्नत-अदना जन्नत में हम इलाही वतन यानि कि अपने वतन में थे फिर जहन्नुम से लेकर हम पराये वतन, परायी सल्तनत में आ जाते हैं। उल्टी राह में आ जाते हैं। फिर अकीदत मन्दी शुरू हो जाती है। पहले-पहले रहमतुल्आल्मीन की अकीदत मन्दी करने लग जाते हैं, वे लोग शिव का इतना बड़ा लिंग बनाते हैं, मगर इतना बड़ा तो वह है नहीं। अभी तुमने समझा है कि रूह और पाक परवरदिगार में क्या फ़र्क है। वह नॉलेजफुल हमेशा पाकीज़ा, दरिया ए मसर्रत, दरिया ए निशात है। यह सुप्रीम रूह की अज़मत है ना। अब बुलाते हैं कि ए‌ नापाक से पाक बनाने वाले आओ। वह है पाक परवरदिगार जो चक्कर चक्कर आते हैं। दूरदेश के रहने वाले मुसाफिर को बुलाते हैं, उनकी अज़मत गाते हैं। ब्रह्मा, सरस्वती को तो बुलाते नहीं हैं। पुकारते हैं ग़ैर मुजस्सम पाक परवरदिगार को। रूह बुलाती है कि दूरदेश के रहने वाले अब आओ देश पराये क्योंकि तमाम नापाक बन चुके हैं। मैं भी आऊंगा तब, जब शैतानी सल्तनत ख़त्म होनी होगी। मैं आता भी हूँ - मिलन का दौर। यह किसको भी मालूम नहीं है। कहते भी हैं कि वह पाक परवरदिगार, नुक्ता है। आजकल फिर कहते हैं रूह सो रब, रब सो रूह। रूह सो रब हो न सके। रूह रब दोनों अलग-अलग हैं। रूप दोनों का एक जैसा है। मगर रूह नापाक बनती है, 84 विलादतों का पार्ट बजाना पड़ता है। पाक परवरदिगार विलादत मौत से बालातर है। अगर रूह सो रब कहते तो क्या सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ पाक परवरदिगार, स्याह रास्त में आते हैं। नहीं, यह तो हो न सके। रब फ़रमाते हैं कि मैं आता हूँ, तमाम रूहों की खिदमत करने। मेरी विलादत भी नहीं कहा जाता। मैं आता ही हूँ जहन्नुम रिहाईश नशीनियों को जन्नत रिहाईश नशीन बनाने। पराये वतन में आये हैं, अपनी जन्नत क़ायम करने। रब ही आकर हमको जन्नत का लायक़ बनाते हैं। यह भी समझाया है कि और रूहों का पार्ट अपना-अपना है। पाक परवरदिगार विलादत मौत से बालातर है। आते भी ज़रूर हैं तब तो शब ए बारात मनाते हैं। मगर वह कब आये, यह कोई नहीं जानते। ऐसे ही शब ए बारात मनाते आये हैं। ज़रूर मिलन पर आये होंगे, जन्नत क़ायम करने। नापाक को पाक बनाने ज़रूर मिलन पर आयेंगे ना। पाकीज़ा खिल्क़त है जन्नत। कहते हैं नापाक से पाक बनाने वाले आओ। फिर ज़रूर नापाक दुनिया के तबाही का वक़्त होगी, तब ही पाक दुनिया क़ायम करेंगे। दौर-दौर तो नहीं आते। रब फ़रमाते हैं - मुझे मिलन पर ही आकर नापाक दुनिया को पाक बनाना है। यह पराया वतन है, शैतान का वतन। मगर यह कोई इन्सान थोड़े ही जानते कि शैतान की सल्तनत चल रही है। कब से यह शैतानी सल्तनत शुरू हुई, कुछ भी मालूम नहीं। पहली-पहली अहम बात रूह और रब का राज़ समझाना है, फिर समझाना है कि वह चक्कर के मिलन के दौर पर आते हैं पाक़ीज़ा बनाने। यह काम उनका ही है, न कि श्रीकृष्ण का। श्रीकृष्ण तो खुद ही 84 विलादत ले नीचे उतरते हैं। खानदान ए आफ़ताबी तमाम नीचे उतरते हैं। दरख़्त आधा ताज़ा, आधा पुराना थोड़े ही होगा। जड़जड़ीभूत हालत सबकी होती है। चक्कर की उम्र का भी इन्सानों को मालूम नहीं है। सहीफों में लम्बी चौड़ी उम्र दे दी है। यह रब ही बैठ समझाते हैं। इसमें और सवाल उठ न सके। खालिक बाप सच ही बोलते हैं। हम इतने बी. के. हैं, तमाम मानते हैं। तो ज़रूर है तब तो मानते हैं। आगे चल जब यक़ीन होगा तो समझ में भी आ जायेगा। पहले-पहले इन्सानों को यह समझाना है कि पाक परवरदिगार ग़ैर मुजस्सम दूरदेश से आये हैं। मगर किस जिस्म में आये? मल्क़ूतवतन में आकर क्या करेंगे? ज़रूर यहाँ आना पड़े। बाप ए अवाम जिब्राइल अलैहिस्सलाम भी यहाँ चाहिए। जिब्राइल अलैहिस्सलाम कौन है, यह भी रब बैठ समझाते हैं। जिसमें दाख़िली किया है वह अपने विलादतों को नहीं जानते थे तो बच्चे भी नहीं जानते थे। बच्चे भी तब बनते जब मैं एडॉप्ट करता हूँ। मैं इन (जिस्मानी) के साथ बच्चों को समझाता हूँ कि क्या तुम अपने विलादतों को भूल गये हो। अभी खिल्क़त का चक्कर पूरा होता है फिर रिपीट होगा। मैं आया हूँ पाकीज़ा बनाने के लिए, सल्तनत ए इबादत सिखाने। पाकीज़ा बनने का और कोई रास्ता नहीं है। अगर यह राज़ इन्सान जानते तो गंगा वगैरह पर स्नान करने, मेले वगैरह पर जाते नहीं। इन पानी की नदियों में तो हमेशा स्नान करते रहते हैं। जहन्नुम से लेकर करते आये हैं। समझते हैं कि गंगा में डुबकी मारने से अज़ाब ख़ाक़ होंगे। मगर कोई के भी अज़ाब ख़ाक नहीं होते हैं। पहले-पहले तो रूह और रब का ही राज़ बताओ। रूहें ही पाक परवरदिगार बाप को पुकारती हैं, वह ग़ैर मुजस्सम है, रूह भी ग़ैर मुजस्सम है। इन आरगन्स के ज़रिए रूह पुकारती है। अकीदत मन्दी के बाद अल्लाह ताला को आना है, यह भी ड्रामा में पार्ट है।

रब फ़रमाते हैं - मुझे नई दुनिया क़ायम करने आना पड़ता है। सहीफों में भी है कि अल्लाह ताला को इरादा उठा तो ज़रूर ड्रामा प्लैन मुताबिक इरादा उठा होगा। आगे इन बातों को थोड़े ही समझते थे। रोज़ ब रोज़ समझते जाते हैं। रब फ़रमाते हैं - मैं तुमको नई-नई गहरी से गहरी बातें सुनाता हूँ। सुनते-सुनते समझते जाते हैं। आगे ऐसे नहीं कहते थे कि रहमतुल्आल्मीन तालीम देते हैं। अब तो अच्छी तरह समझ गये हैं, और भी समझने का निहायत पड़ा है। रोज़ समझाते रहते हैं कि कैसे किसको समझाना चाहिए। पहले यह यक़ीन करें कि बेहद का रब समझाते हैं तो वह ज़रूर सच बतायेंगे। इसमें मूँझने की भी बात नहीं। बच्चे कोई पक्के हैं, कोई कच्चे हैं। कच्चा है तो कोई को समझा नहीं सकते हैं। यह तो स्कूल में भी नम्बरवार होते हैं। बहुतों को यह शक पड़ता है कि हम कैसे समझें कि पाक परवरदिगार आकर तालीम देते हैं क्योंकि उन्हों की अक्ल में है श्रीकृष्ण ने इल्म सुनाया। अब नापाक दुनिया में तो कृष्ण आ नहीं सकता। यह उनको साबित करो कि पाक परवरदिगार को ही आना पड़ता है, नापाक दुनिया और नापाक जिस्म में। रब यह भी समझते हैं कि हर एक की अपनी-अपनी अक्ल है। कोई तो झट समझ जाते हैं। जितना हो सके समझाना है। मोमिन तमाम एक जैसे नहीं होते हैं। मगर जिस्मानी हवास बच्चों में निहायत है। यह रब्बा भी जानते हैं कि नम्बरवार हैं। डायरेक्शन पर बच्चों को चलना पड़े। बड़ा बाबा जो कहे, वह मानना चाहिए। रहबरों वगैरह की तो मानते आये हो। अब रब जो जन्नत में ले जाने वाला है, उनकी बात तो आंख बंद कर माननी चाहिए। मगर ऐसे यक़ीनी दानिश मन्द हैं नहीं। भल उसमें नुकसान हो या फ़ायदा हो, मान लेना चाहिए। भल समझो नुकसान भी हो जाए। फिर भी रब्बा फ़रमाते हैं ना - हमेशा ऐसे समझो कि रहमतुल्आल्मीन ही फ़रमाते हैं, जिब्राइल अलैहिस्सलाम के लिए मत समझो। रेसपान्सिबुल रहमतुल्आल्मीन होगा। उनका यह गाड़ी है, वह दुरुस्त कर देंगे। कहेंगे कि मैं बैठा हूँ। हमेशा समझो कि रहमतुल्आल्मीन ही फ़रमाते हैं, यह कुछ नहीं जानते। ऐसे ही समझो। एक तरफ़ तो यक़ीन रखना चाहिए, रहमतुल्आल्मीन फ़रमाते मेरा मानते रहो तो तुम्हारा फ़लाह होता रहेगा। यह जिब्राइल अलैहिस्सलाम भी अगर कुछ कहते हैं, तो उनका भी रेसपान्सिबुल मैं हूँ। तुम बच्चे फिकर नहीं करो। रहमतुल्आल्मीन को याद करने से हालत और ही पक्की हो जायेगी। यक़ीन में गुनाह भी ख़ाक होंगे, कुव्वत भी मिलेगी। जितना बाबा को याद करेंगे उतनी कुव्वत जास्ती मिलेगी। जो सिरात ए मुस्तकीम पर चल खिदमत करते हैं वही आला मर्तबा पायेंगे। बहुतों में जिस्मानी हवास निहायत रहता है। रब्बा देखो तमाम बच्चों से कैसे प्यार से चलता है। सबसे बात करते रहते हैं। बच्चों से पूछते हैं कि दुरूस्त बैठे हो! कोई तकलीफ़ तो नहीं है! लव होता है बच्चों के लिए। बेहद के रब को बच्चों के लिए बहुत-बहुत लव है। जो जितनी सिरात ए मुस्तकीम पर खिदमत करते हैं उस मुताबिक़ लव रहता है। खिदमत में ही फ़ायदा है। खिदमत में हडिड्याँ देनी हैं। कोई भी काम करते रहेंगे तो वह फिर दिल पर भी रहते हैं कि यह बच्चा फर्स्टक्लास है। मगर चलते-चलते किसी पर ग्रहचारी भी बैठती है। इबलीस का सामना होता है ना। ग्रहचारी के सबब फिर इल्म उठा नहीं सकते। कई तो फिर आमाल ए ख़िदमत अथक होकर करते हैं।

तुम्हारा काम है सबको दारूल मसर्रत का मालिक बनाना। किसको दु:ख नहीं देना। इल्म नहीं है तो फिर निहायत ग़म देते हैं। फिर कितना भी समझाओ तो समझते नहीं। पहले-पहले समझानी देनी है रूह और रब की। कैसे रूह में 84 विलादतों का पार्ट भरा हुआ है, जो ला फ़ानी पार्ट है। कभी बदलने का नहीं है, ड्रामा में नूँधा हुआ है। यह यक़ीन वाला कभी हिलेगा नहीं।निहायत हिल जाते हैं। पिछाड़ी में जब भंभोर को आग लगेगी तब अचल बन जायेंगे। अभी तो बहुत तरीक़े से समझाना है। अच्छे-अच्छे बच्चे तो खिदमत पर रहते हैं। दिल पर चढ़े रहते हैं। निहायत तीखे जाते रहते हैं। निहायत मेहनत करते हैं। उनको खिदमत का निहायत शौक रहता है। जिनमें जो फ़ज़ीलत हैं वह रब्बा बयान करते हैं। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. खिदमत में हड्डियाँ देनी हैं, किसी भी बात में शक नहीं उठाना है। सबको खिदमत से ख़ुशी देनी है, दु:ख नहीं।

2. यक़ीन की कुव्वत से अपनी हालत को अडोल बनाना है। जो सिरात ए मुस्तकीम मिलती है, उसमें फ़लाह समाया हुआ है, क्योंकि रेसपान्सिबुल रब है इसलिए फिकर नहीं करना है।

बरक़ात:-
आसान इबादत को नेचर और नैचुरल बनाने वाले हर सबजेक्ट में परफेक्ट बनो।

जैसे बाप के बच्चे हो - इसमें कोई परसेन्टेज़ नहीं है, ऐसे मुसलसल आसान इबादत नशीन और आबिद बनने की स्टेज में अब परसेन्टेज ख़त्म होनी चाहिए। नैचुरल और नेचर हो जानी चाहिए। जैसे कोई की ख़ास नेचर होती है, उस नेचर के बस न चाहते भी चलते रहते हैं। ऐसे यह भी नेचर बन जाए। क्या करूं, कैसे राब्ता लगाऊं - यह बातें ख़त्म हो जाएं तो हर सबजेक्ट में परफेक्ट बन जायेंगे। परफेक्ट यानि कि इफेक्ट और डिफेक्ट से बालातर।

स्लोगन:-
बर्दाश्त करना है तो ख़ुशी से करो, मजबूरी से नहीं।

आमीन