08-09-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे - अपने से बड़ों का रिगॉर्ड रखना यह भी हूरैन फ़ज़ीलत है, जो होशियार अच्छा समझाने वाले हैं, उनको फॉलो करना है

सवाल:-
सुनहरे दौर में कोई भी अकीदत मन्दी की रसम-रिवाज़ नहीं होती है - क्यों?

जवाब:-
क्योंकि दरिया ए इल्म रब इल्म देकर ख़ैर निजात में भेज देते हैं। अकीदत मन्दी का सिला मिल जाता है। इल्म मिलने से अकीदत मन्दी का जैसे डायओर्स हो जाता। जब है ही इल्म के उजूरे का वक़्त तो अकीदत मन्दी, नमाज़ सदक़ा सवाब करने की ज़रूरत ही क्या! वहाँ यह कोई भी रसम हो नहीं सकती।

आमीन।
नापाक से पाक बनाने वाले रहमतुल्आल्मीन अल्लाह ताला फ़रमाते हैं। अब रब बैठ बच्चों को इल्म सुनाते हैं। बच्चों को समझाया गया है जब मैं यहाँ आता हूँ तो नापाको को पाकीज़ा बनाने के लिए इल्म सुनाता हूँ और कोई यह इल्म सिखला न सके। वह भी अकीदत मन्दी ही सिखलाते हैं। इल्म सिर्फ़ तुम बच्चे ही सीखते हो जो तुम अपने को जिब्राइल ज़ादा ज़ादियां समझते हो। देलवाड़ा मन्दिर तुम्हारे सामने खड़ा है। वहाँ भी राजयोग की तपस्या में बैठे हैं। जगत अम्बा भी है, प्रजापिता भी है। कुमारी कन्या, अधर कुमारी भी है। रब सल्तनत ए इबादत सिखला रहे हैं। ऊपर में बादशाहत की तस्वीर भी खड़ी हैं। रब कोई अकीदत मन्दी नहीं सिखलाते हैं। अकीदत मन्दी ही उनकी करते हैं जो सिखलाकर गये हैं। मगर उनको मालूम नहीं है कि कौन सल्तनत ए इबादत सिखलाए बादशाहत कायम करके गये हैं। तुम बच्चे अभी जानते हो अकीदत मन्दी अलग चीज़ है, इल्म अलग चीज़ है। इल्म सुनाने वाला है ही एक और कोई सुना न सके। दरिया ए इल्म एक ही है। वही आकर इल्म से नापाको को पाक बनाते हैं। और जो भी इज्तेमाअ हैं उनमें कोई भी इल्म नहीं सिखला सकते। भल अपने को श्री श्री 108 जगतगुरू, भगवान भी कहते हैं मगर ऐसे कोई नहीं कहते कि मैं सबका पाक परवरदिगार दरिया ए इल्म हूँ, उनको कोई पाक परवरदिगार तो कहते ही नहीं। यह तो जानते ही हैं कि पाक परवरदिगार नापाक से पाक बनाने वाला है। यह प्वाइंट्स अक्ल में अच्छी तरह रखनी है। इन्सान कहते हैं यह जिब्राइल ज़ादियां तो अकीदत मन्दी को डायओर्स देती हैं। मगर जब इल्म मिलता है तो अकीदत मन्दी को डायओर्स देना ही है। ऐसे नहीं जब अकीदत मन्दी में जाते हैं तो उस वक़्त यह मालूम पड़ता है कि हम इल्म को डायओर्स देते हैं। नहीं, वह तो आटोमेटिकली शैतानी सल्तनत में आ जाते हैं। अभी तुमको समझ मिली है कि रब्बा हमको सल्तनत ए इबादत सिखला रहे हैं। सल्तनत ए इबादत का इल्म है, इनको अकीदत मन्दी नहीं कहेंगे। अल्लाह ताला दरिया ए इल्म है, वह कभी अकीदत मन्दी नहीं सिखलायेंगे। अकीदत मन्दी का सिला है ही इल्म। इल्म से होती है ख़ैर निजात। इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के आखिर में तमाम दु:खी हैं इसलिए इस पुरानी दुनिया को दारूल ग़म कहा जाता है। इन बातों को अभी तुम समझते हो। रब आया हुआ है अकीदत मन्दी का सिला यानि कि ख़ैर निजात देने। सल्तनत ए इबादत सिखला रहे हैं। यह है पुरानी दुनिया, जिसकी तबाही होनी है। हमको बादशाहत चाहिए नई दुनिया में। यह सल्तनत ए इबादत का इल्म है। इल्म सिखलाने वाला एक ही पाक परवरदिगार रहमतुल्आल्मीन है। उनको ही दरिया ए इल्म कहा जाता है, आदम अलैहिस्सलाम को नहीं। आदम अलैहिस्सलाम की अज़मत ही अलग है। ज़रूर आगे विलादत में ऐसा फ़र्ज़ किया है जो प्रिन्स बना है।

अभी तुम जानते हो हम सल्तनत ए इबादत का इल्म ले नई दुनिया में जन्नत का प्रिन्स-प्रिन्सेज बनेंगे। जन्नत को ख़ैर हालत, जहन्नुम को बुरी हालत कहा जाता है। हम अपने लिए सल्तनत क़ायम कर रहे हैं। बाक़ी जो यह इल्म नहीं लेंगे, पाकीज़ा नहीं बनेंगे तो दारूल हुकूमत में आ नहीं सकेंगे क्योंकि सुनहरे दौर में निहायत थोड़े होगे। इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के आखिर में जो इतने बेहिसाब इन्सान हैं, वह ज़रूर दारूल निजात में होंगे। गुम नहीं हो जाते हैं, तमाम घर चले जाते हैं। अभी तो बच्चों को घर याद रहता है कि अब 84 विलादतों का चक्कर पूरा होता है। ड्रामा पूरा होता है। बेहिसाब बार चक्कर लगाया है। यह तुम मोमिन बच्चे ही जानते हो। मोमिन तो बनते जाते हैं। 16108 की माला है। सुनहरे दौर में तो निहायत नहीं होंगे। सुनहरे दौर का मॉडल रूप भी दिखलाते हैं ना। बड़ी चीज़ का मॉडल छोटा होता है। जैसे सोने की द्वारिका दिखलाते हैं। कहा जाता है - द्वारिका में कृष्ण की सल्तनत थी। अब द्वारिका में कहेंगे या देहली में कहेंगे? जमुना का कण्ठा तो यहाँ देहली में है। वहाँ तो समन्दर है। यह तो बच्चे समझते हैं जमुना का कण्ठा था कैपीटल। द्वारिका कैपीटल नहीं है। देहली मशहूर है। जमुना नदी भी चाहिए। जमुना की अज़मत है। परिस्तान देहली को ही कहा जाता है। बड़ी गद्दी देहली ही होगी। अभी तो बच्चे समझते हैं अकीदत मन्दी की राह खलास हो इल्म की राह होती है। यह हूरैन दारूल हुकूमत क़ायम हो रही है। रब फ़रमाते हैं - आगे चल तुमको तमाम मालूम पड़ जायेगा। कौन-कौन कितना पास होते हैं। स्कूल में भी मालूम पड़ता है, फलाने-फलाने इतने नम्बर से पास हुए हैं। अभी दूसरे क्लास में जाते हैं। पिछाड़ी के वक़्त जास्ती मालूम पड़ेगा। कौन-कौन पास होते हैं जो फिर ट्रांसफर होंगे। क्लास तो बड़ा है ना। बेहद का क्लास है। सेन्टर्स रोज़ ब रोज़ बढ़ते जायेंगे। कोई आकर 7 रोज़ का कोर्स अच्छी तरह लेंगे। एक-दो रोज़ का कोर्स भी कम नहीं है। देखते हैं इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर की तबाही सामने खड़ी है, अब सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनना है। रब ने कहा है अक्ल का राब्ता मेरे से लगाओ तो सातो फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बन जायेंगे। पाकीज़ा दुनिया में आयेंगे, पार्ट तो ज़रूर बजाना ही है। जैसे ड्रामा में चक्कर पहले पार्ट बज चुका है। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन ही सल्तनत करते थे फिर इज़ाफ़े को पाया है। दरख़्त इज़ाफ़े को पाता जाता है। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन हूर-हूरैन दीन वाले हैं। मगर पाकीज़ा न होने के सबब उन पाकीज़ा हूरैनो की बुत परस्ती करते हैं। जैसे क्रिश्चियन लोग क्राइस्ट को पूजते हैं। अल्लाह अव्वल हूर-हूरैन दीन है - सुनहरे दौर में। सुनहरे दौर का क़याम करने वाला है रब। बरोबर सुनहरे दौर में इन हूरैनों की सल्तनत थी। तो ज़रूर एक विलादत पहले इन्होंने तजवीज़ की होगी। ज़रूर वह मिलन ही होगा। जबकि पुरानी दुनिया बदल नई दुनिया होती है। इख्तिलाफ़ी फ़ितने का दौर बदल सुनहरा दौर आना है तो इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में नापाक होंगे। रब्बा ने समझाया है यह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की तस्वीर बनाते हो या लिटरेचर छपाते हो तो उसमें लिख देना चाहिए कि इन्होंने इस आसान सल्तनत ए इबादत के इल्म से आगे विलादत में यह तजवीज़ की है। सिर्फ़ बादशाह बैग़म तो नहीं होंगे। अवाम भी तो बनती है ना। बे इल्मी में तो कुछ भी इल्म नहीं जानते सिर्फ़ बुत परस्ती करते रहते हैं। अभी तुम समझते हो वे लोग बुत परस्ती करते हैं तो सिर्फ लक्ष्मी-नारायण को ही देखते रहते। इल्म कुछ भी नहीं। लोग समझते हैं अकीदत मन्दी बिगर अल्लाह ताला ही नहीं मिलेगा। तुम किसको कहते हो अल्लाह ताला आया हुआ है तो तुम पर हँसते हैं। अल्लाह ताला तो आयेगा इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के आखिर में, अभी कहाँ से आया! इख्तिलाफ़ी फ़ितने का दौर के आखिर में भी क्यों कहते हैं, यह भी समझते नहीं। वह तो कृष्ण को ले गये हैं द्वापर में। इन्सानों को जो आता है सो बोल देते हैं, बिगर समझ के इसलिए रब फ़रमाते हैं तुम बिल्कुल ही बेसमझ बन गये हो। रब को सब तरफ़ मौजूद कह देते हैं। अकीदत मन्दी बाहर से तो निहायत खूबसूरत दिखाई पड़ती है। अकीदत मन्दी की चमक कितनी है! तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है। और कहाँ भी इज्तेमाअ वगैरह में जायेंगे तो आवाज़ ज़रूर होगा। नग़में गायेंगे। यहाँ तो रब्बा रिकार्ड भी नहीं पसन्द करते। आगे चल शायद यह भी बन्द हो जाएं।

रब फ़रमाते हैं - इन नग़मों वगैरह का तमाम खुलासा तुमको समझाता हूँ। तुम मतलब जानते हो। यह तालीम है। बच्चे जानते हैं हम सल्तनत ए इबादत सीख रहे हैं। अगर कम पढ़ेंगे तो अवाम में चले जायेंगे इसलिए जो निहायत होशियार हैं उनको फॉलो करना चाहिए क्योंकि उनका तालीम में अटेन्शन जास्ती है तो उससे फायदा होगा। जो अच्छा समझाने वाले हैं उनसे सीखना चाहिए। जो अच्छा समझाते हैं उनको सेन्टर्स पर याद करते हैं ना। जिब्राइल ज़ादी तो बैठी है फिर कहते हैं फलानी आये। समझते हैं यह बड़ी होशियार है। ऐसे हैं तो उसकी फिर इज़्ज़त भी करनी पड़े। बड़े का फिर रिगॉर्ड भी ऐसा रखना होता है। यह इल्म में हमारे से तीखे हैं, ज़रूर इनको आला मर्तबा मिलेगा, इसमें तकब्बुर नहीं आना चाहिए। बड़े की बड़ी इज़्ज़त होती हैं। प्रेज़ीडेंट की ज़रूर जास्ती इज़्ज़त होगी। हर एक की नम्बरवार इज़्ज़त होती है। एक-दो का रिगॉर्ड तो रखेंगे ना। बैरिस्टर में भी नम्बरवार होते हैं। बड़े केस में बड़ा होशियार वकील लेते हैं। कोई-कोई तो लाख रूपये का भी केस उठाते हैं। नम्बरवार ज़रूर होते हैं। हमसे होशियार हैं तो रिगॉर्ड रखना चाहिए। सेन्टर सम्भालना है। तमाम काम भी करना है। रब्बा को तमाम दिन ख्यालात रहते हैं ना। नुमाइश कैसे बनाई जाये, पूरा अटेन्शन देना है। हम स्याह रास्त से ख़ैर रास्त कैसे बनें। रब आये ही हैं सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनाने। नापाक से पाक बनाने वाला रब ही है। यहाँ फिर कहते नापाक से पाक बनाने वाली गंगा, उसमें विलादत दर विलादत स्नान करते आये हैं। पाकीज़ा तो कोई भी नहीं बना है। यह तमाम है अकीदत मन्दी। जबकि कहते हैं ए नापाक से पाक बनाने वाले आओ। वह आयेगा तो ज़रूर मिलन पर, और एक ही बार आते हैं। हर एक की अपनी-अपनी रसम-रिवाज़ है। जैसे नेपाल में अष्टमी पर बलि चढ़ाते हैं। छोटे बच्चे को हाथ में बन्दूक दे चलवाते हैं। वह भी बलि चढ़ायेंगे। बड़ा होगा तो एक धक से बछड़े को काट देगा। कोई ने कम धक लगाया, एक धक से न मरे तो वह बलि नहीं हुई, वह देवी पर नहीं चढ़ायेंगे। यह तमाम है अकीदत मन्दी की राह। हर एक की अपनी-अपनी कल्पना है। कल्पना पर फॉलोअर्स बन जाते हैं। यहाँ फिर यह नई बातें हैं। इनको तो बच्चे ही जान सकें। एक ही रब बैठ खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का इल्म सुनाते हैं। तुमको ख़ुशी रहती है हम दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन हैं, और कोई समझ न सकें। तुमको मजलिस में हम कहेंगे - सर्वोत्तम ब्राह्मण कुल भूषण, स्वदर्शन चक्रधारी यानि कि जवाहिरात ए इल्म दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन मोमिन तो इसका मतलब तुम समझेंगे। नया कोई होगा तो मूँझ जायेगा कि यह क्या कहा? स्वदर्शन चक्र धारी तो विष्णु है। यह नई बात है ना इसलिए तुम्हारे लिए कहते हैं बाहर मैदान में आओ तो मालूम पड़े।

तुम्हारी है इल्मी राह । तुम 5 ख़बासतो पर जीत पाते हो। इन शैतानों (5ख़बासतो) से तुम्हारी लड़ाई है। फिर तुम हूरैन बनते हो और कोई जंग की बात नहीं होती। जहाँ शैतान हैं वहाँ हूरैन होते नहीं। तुम हो मोमिन, हूरैन बनने वाले। जो तजवीज़ कर रहे हो। इलाही इल्म यज्ञ में मोमिन ज़रूर चाहिए। सिवाए मोमिनों के यज्ञ होता नहीं। रूद्र है शिव, फिर कृष्ण का नाम कहाँ से आया। तुम दुनिया से बिल्कुल ही न्यारे हो। और तुम हो कितने थोड़े। चिड़ियाओं ने समन्दर को हप किया। सहीफों में रिवायतें कितनी हैं। रब फ़रमाते हैं - अब वह तमाम भूल दिल से मुझे याद करो। रूह ही रब को याद करती है। रब तो एक है ना। हे पाक परवरदिगार और अल्लाह ताला फ़रमाते हैं तो उस वक़्त लिंग भी याद नहीं आता है। सिर्फ़ अल्लाह ताला और खुदा ताला कह देते हैं।रूह को रब से आधा चक्कर की खुशी मिली हुई है, तो फिर अकीदत मन्दी में याद करती है। अभी तुमको नॉलेज मिली है - रूह क्या है, पाक परवरदिगार क्या है। हम तमाम रूहें आलम ए अरवाह में रहने वाली हैं, वहाँ से नम्बरवार पार्ट बजाने आती हैं। पहले आते हैं हूर हूरैन। कहते हैं क्राइस्ट के पहले हूर-हूरैन दीन था। 5 हज़ार साल की बात है। वो लोग कह देते 50 हज़ार साल की यह पुरानी चीज़ है। मगर 50 हज़ार साल की पुरानी चीज़ कोई हो नहीं सकती। ड्रामा है ही 5 हज़ार साल का। अहम हैं ही यह। इन मज़हब वालों के ही मकान वगैरह होंगे। पहले-पहले तो रजोगुणी अक्ल थे। अभी तो और ही स्याह रास्त अक्ल वाले हैं। नुमाइश में कितना समझाते हैं। किसकी समझ में थोड़े ही आता है। मोमिनों की ही सैपलिंग लगनी है। तो बच्चों को समझाया गया है -इल्म अलग चीज़ है, अकीदत मन्दी अलग चीज़ है। इल्म से ख़ैर निजात होती है इसलिए कहते भी हैं हे नापाक से पाक बनाने वाले आओ, दु:ख से लिबरेट करो। फिर गाइड बन साथ ले जायेंगे। रब आकर रूहों को ले जाते हैं। जिस्म तो तमाम ख़त्म हो जायेंगे। तबाही होगी ना। सहीफों में एक ही क़यामत की लड़ाई गाई हुई है। कहते भी हैं यह वही क़यामत की लड़ाई है। वह तो लगनी ही है। सबको रब का तारूफ़ देते रहो। बुरी खस्लतों से आरास्ता से सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनने का तरीक़ा तो एक ही है। रब फ़रमाते हैं - दिल से मुझे याद करो तो गुनाह ख़ाक हो जायेंगे और रूह मेरे साथ चली जायेगी। सबको पैगाम देते रहो तो निहायत का फ़लाह होगा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) जो तालीम में होशियार हैं, अच्छा समझाते हैं - उनकी सोहबत करना है, उन्हें रिगॉर्ड देना है। कभी भी तकब्बुर में नहीं आना है।

2) इल्म की नई-नई बातों को अच्छी तरह समझना वा समझाना है। इसी ख़ुशी में रहना है कि हम हैं दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन।

बरक़ात:-
एक रब की याद में हमेशा मगन रह एकरस हालत बनाने वाले डिटैच हो कर देखने वाले बनो।

अभी ऐसे पेपर आने हैं जो इरादे, सपने में भी नहीं होंगे। मगर आपकी प्रैक्टिस ऐसी होनी चाहिए जैसे हद का ड्रामा डिटैच होकर देखा जाता है फिर चाहे दर्दनाक हो या हंसी का हो, फ़र्क नहीं होता। ऐसे चाहे कोई का लिज़्ज़त बख्श पार्ट हो, चाहे प्यारी रूह का गम्भीर पार्ट हो.....हर पार्ट डिटैच होकर देखो, एकरस हालत हो। मगर ऐसी हालत तब रहेगी जब हमेशा एक रब की याद में मगन होंगे।

स्लोगन:-
मज़बूत यक़ीन से अपनी किस्मत को तयशुदा कर दो तो हमेशा बे फ़िक्र रहेंगे।

आमीन