08-10-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
रब्बा आये हैं तुम्हें बहुत दिलचिस्पी से तालीम देने, तुम भी दिलचस्पी से तालीम हासिल करों - नशा रहे हमको पढ़ाने वाला खुद अल्ल्लाह् ताला है

सवाल:-
तुम आदम ज़ादा-आदम ज़ादियाॅ का मकसद और खालिस जज़्बात कौनसा है?

जवाब:-
तुम्हारा मकसद है - कल्प 5 हज़ार साल पहले की तरह फिर से सिरात ए मुस्तकीम पर दुनिया में ख़ुशी और सुकून की सल्तनत क़ायम करना। तुम्हारे ख़ालिस जज़्बात है कि सिरात ए मुस्तकीम पर हम तमाम दुनिया की ख़ैर निजात करेंगे। तुम नशे से कहते हो हम सबको ख़ैर निजात देने वाले हैं। तुम्हें रब से पीस प्राइज़ मिलती है। जहन्नुम रिहाईश नशीन से जन्नत रिहाईश नशीन बनना ही प्राइज़ लेना है।

आमीन।
स्टूडेण्ड जब पढ़ते हैं तो ख़ुशी से पढ़ते हैं। टीचर भी बहुत खुशी से, दिलचस्पी से पढ़ाते हैं। रूहानी बच्चे यह जानते हैं कि बेहद का रब जो टीचर भी है, हमको बहुत दिलचिस्पी से पढ़ाते हैं। उस पढ़ाई में तो बाप अलग होता है, टीचर अलग होता है, जो पढ़ाते हैं। कोई-कोई का बाप ही टीचर होता है जो पढ़ाते हैं तो बहुत दिलचिस्पी से पढ़ाते हैं क्योंकि फिर भी ब्लड कनेक्शन होता है ना। अपना समझकर बहुत दिलचिस्पी से पढ़ाते हैं। यह बाप तुम्हें कितना दिलचस्पी से पढ़ाते होंगे तो बच्चों को भी कितना दिलचस्पी से पढ़ना चाहिए।। डायरेक्ट रब पढ़ाते हैं और यह एक ही बार आकर पढ़ाते हैं। बच्चों को दिलचस्पी बहुत चाहिए। रब्बा
अल्ल्लाह् ताला हमको पढ़ाते हैं और हर बात अच्छी तरह समझाते रहते हैं। कोई-कोई बच्चों को पढ़ते-पढ़ते ख्याल आते हैं यह क्या है, ड्रामा में यह आने जाने का चक्कर है। मगर यह ड्रामा बनाया ही क्यों? इससे क्या फ़ायदा? बस सिर्फ़ ऐसे चक्कर ही लगाते रहेंगे, इससे तो छूट जाएं तो अच्छा है। जब देखते हैं यह तो 84 का चक्कर लगाते ही रहना है तो ऐसे-ऐसे ख्यालात आते हैं। अल्ल्लाह् ताला ने ऐसा खेल क्यों तामीर किया है, जो आने जाने के चक्कर से छूट ही नहीं सकते, इससे तो निजात मिल जाए। ऐसे-ऐसे ख्यालात कई बच्चों को आते हैं। इस आने जाने से, दु:ख सुख से छूट जायें। रब फ़रमाते हैं यह कभी हो नहीं सकता। मोक्ष पाने के लिए कोशिश करना ही वेस्ट हो जाता है। रब ने समझाया है एक भी रूह पार्ट से छूट नहीं सकती। रूह में ला फ़ानी पार्ट भरा है। वह है ही अबदी ला फ़ानी, बिल्कुल एक्यूरेट एक्टर्स हैं। एक भी कम जास्ती नहीं हो सकते। तुम बच्चों को तमाम नॉलेज है। इस ड्रामा के पार्ट से कोई छूट नहीं सकता। न कोई मोक्ष पा सकता है। तमाम मज़हब वालों को नम्बरवार आना ही है। रब समझाते हैं यह बना बनाया ला फ़ानी ड्रामा है। तुम भी कहते हो रब्बा अब जान गये, कैसे हम 84 का चक्कर लगाते हैं। यह भी समझते हो पहले-पहले जो आते होंगे, वह 84 विलादत लेते होंगे। पीछे आने वाले के ज़रूर कम विलादत होंगे। यहाँ तो तजवीज़ करने की है। पुरानी दुनिया से नई दुनिया ज़रूर बननी है। रब्बा हर एक बात बार-बार समझाते रहते हैं क्योंकि नये-नये बच्चे आते रहते हैं। उनको आगे की पढ़ाई कौन पढ़ाये। तो रब नये-नये को देख फिर पुरानी प्वाइंट्स ही रिपीट करते हैं।
तुम्हारी अक्ल में तमाम नॉलेज है। जानते हो शुरू से लेकर कैसे हम पार्ट बजाते आये हैं। तुम हक़ीक़ी तौर पर जानते हो, कैसे नम्बरवार आते हैं, कितनी विलादत लेते हैं। इस वक़्त ही रब आकर इल्म की बातें सुनाते हैं। सुनहरे दौर में तो है ही क़िस्मत। यह इस वक़्त तुमको ही समझाया जाता है। गीता में भी शुरू में फिर पिछाड़ी में यह बात आती है - दिल से मुझे याद करो। पढ़ाया जाता है स्टेट्स पाने के लिए। तुम बादशाह बनने के लिए अब तजवीज़ करते हो। और मज़हब वालों का तो समझाया है - कि वह नम्बरवार आते हैं, पैगम्बर के पिछाड़ी सबको आना पड़ता है। बादशाहत की बात नहीं। एक ही गीता सहीफ़ा है जिसकी निहायत अज़मत है। हिन्दुस्तान में ही रब आकर सुनाते हैं और सबकी ख़ैर निजात करते हैं। वह मज़हब के पैगम्बर जो आते हैं, वो जब मरते हैं तो बड़े-बड़े मुकद्दस ज़ियारत बना देते हैं। असल में सबका मुकद्दस मुकाम यह हिन्दुस्तान ही है जहाँ बेहद के रब आते हैं। रब ने हिन्दुस्तान में ही आकर तमाम की ख़ैर निजात की है। रब फ़रमाते हैं मुझे लिबरेटर, गाइड कहते हो ना। हम तुमको इस पुरानी दुनिया, दु:ख की दुनिया से लिबरेट कर दारूल सुकून, दारूल मसर्रत में ले जाते हैं। बच्चे जानते हैं रब्बा हमें दारूल सुकून, दारूल मसर्रत में ले जायेंगे। बाक़ी सब दारूल सुकून में जायेंगे। दु:ख से रब आकर लिबरेट करते हैं। उनकी विलादत-मौत तो है नहीं। रब आया फिर चला जायेगा। उनके लिए ऐसे थोड़े ही कहेंगे कि मर गया। जैसे शिवानंद के लिए कहेंगे जिस्म छोड़ दिया फिर जनाज़े की सेरमनी करते हैं। यह रब चला जायेगा तो इनके जनाज़े की सेरीमनी वगैरह कुछ भी नहीं करना होता। उनके तो आने का भी नहीं मालूम पड़ता। जनाज़े की सेरीमनी वगैरह की तो बात ही नहीं है। और तमाम इन्सानों के जनाज़े को दफनाया करते हैं। रब के जनाज़े की सेरीमनी होती नहीं, उनको जिस्म ही नहीं। सुनहरे दौर में यह इल्म अकीदत की बातें होती नहीं। यह अभी ही चलती हैं और सब अकीदत मन्दी ही सिखलाते हैं। आधाकल्प है अकीदत मन्दी फिर आधाकल्प के बाद रब आकर इल्म का वर्सा देते हैं। इल्म कोई वहाँ साथ नहीं चलता। वहाँ रब को याद करने की दरकार ही नहीं रहती। निजात में हैं। वहाँ याद करना होता है क्या? दु:ख की फरियाद वहाँ होती ही नहीं। अकीदत मन्दी भी पहले ग़ैर हरामकारी फिर हराम कारी। इस वक़्त तो बेइंतहा हरामकारी अक़ीदत मन्दी है, इसको ख़ौफनाक जहन्नुम कहा जाता है। एकदम तीखे में तीखा जहन्नुम है फिर रब आकर तीखी जन्नत बनाते हैं। इस वक़्त है 100 पर्सेंट दु:ख, फिर 100 पर्सेंट ख़ुशी-सुकून होगी। रूह जाकर अपने घर आराम पायेगी। समझाने में बड़ा आसान है। रब फ़रमाते हैं मैं आता ही तब हूँ जब नई दुनिया को क़ायम कर पुरानी की तबाही करनी होती है। इतना काम सिर्फ़ एक तो नहीं करेंगे। खिदमतग़ार निहायत चाहिए। इस वक़्त तुम रब के खिदमतग़ार बच्चे बने हो। हिन्दुस्तान की ख़ास सच्ची खिदमत करते हो। सच्चा रब सच्ची खिदमत सिखलाते हैं। अपनी भी, हिन्दुस्तान का भी और जहान का भी फ़लाह करते हो। तो कितना दिलचस्पी से करना चाहिए। रब्बा कितनी दिलचस्पी से तमाम की ख़ैर निजात करते हैं। अभी भी तमाम की ख़ैर निजात होनी है ज़रूर। यह है खालिस तकब्बुर, खालिस जज़्बात।
तुम सच्ची-सच्ची खिदमत करते हो - मगर बातिन। रूह करती है जिस्म ज़रिए। तुम से निहायत पूछते हैं - बी.के. का मकसद क्या है? बोलो बी.के. का मकसद है दुनिया में सुनहरे दौर ख़ुशी-सुकून का दीदार ए नफ़्स क़ायम करना। हम हर 5 हज़ार साल बाद सिरात ए मुस्तकीम पर दुनिया में सुकून क़ायम कर दुनियावी सुकून की प्राइज़ लेते हैं। जैसा राजा-रानी और अवाम प्राइज़ लेते हैं। जहन्नुम रिहाईश नशीन से जन्नत रिहाईश नशीन बनना कम प्राइज़ है क्या! वह पीस प्राइज़ लेकर ख़ुश होते रहते हैं, मिलता कुछ भी नहीं। सच्ची-सच्ची प्राइज़ तो अभी हम रब से ले रहे हैं, दुनिया की बादशाही की। कहते हैं ना हिन्दुस्तान हमारा आलातरीन वतन है। कितनी अज़मत करते हैं। तमाम समझते हैं हम हिन्दुस्तान के मालिक हैं, मगर मालिक हैं कहाँ। अभी तुम बच्चे रब्बा की सिरात ए मुस्तकीम से सल्तनत क़ायम करते हो। हथियार पंवार तो कुछ नहीं हैं। हूरैन फ़ज़ीलत इख्तियार करते हैं इसलिए तुम्हारा ही गायन पूजन है। अम्बा की देखो कितनी पूजा होती है। मगर अम्बा कौन है, मोमिन है या हूरैन.... यह भी मालूम नहीं। अम्बा, काली, दुर्गा, सरस्वती वगैरह...... ऐसे निहायत नाम हैं। यहाँ भी नीचे अम्बा का छोटा-सा मन्दिर है। अम्बा को बहुत बाजुएं दे देते हैं। ऐसे तो है नहीं। इसको कहा जाता है ब्लाइन्ड फेथ। क्राइस्ट बुद्ध वगैरह आये, उन्होंने अपना-अपना मज़हब क़ायम किया, तिथि-तारीख सब बताते हैं। वहाँ ब्लाइन्डफेथ की तो बात ही नहीं। यहाँ हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन को कुछ मालूम नहीं है - हमारा मज़हब कब और किसने क़ायम किया? इसलिये कहा जाता है ब्लाइन्डफेथ। अभी तुम क़ाबिल ए एहतराम हो फिर नाकाबिल बनते हो। तुम्हारी रूह भी काबिल ए एहतराम तो जिस्म भी काबिल बनता है। तुम्हारी रूह की भी इबादत होती है फिर हूरैन बनते हो तो भी इबादत होती है। रब तो है ही ग़ैर मुजस्सम। वह हमेशा काबिल ए एहतराम है। वह कभी नाकाबिल नहीं बनते हैं। तुम बच्चों के लिए कहा जाता है आपे ही काबिल ए एहतराम आपे ही नाकाबिल। रब तो एवर काबिल ए एहतराम है, यहाँ आकर रब सच्ची खिदमत करते हैं। सबको ख़ैर निजात देते हैं। रब फ़रमाते हैं - अब दिल से मुझे याद करो। दूसरे कोई जिस्म नशीनी को याद नहीं करना है। यहाँ तो बड़े-बड़े लखपति, करोड़पति जाकर अल्लाह-अल्लाह कहते हैं। कितनी अन्धी अकीदत मन्दी है। रब ने तुमको हम सो का मतलब भी समझाया है। वह तो कह देते शिवोहम्, रूह सो रब। अब रब ने करेक्ट कर बताया है। अब जज करो, अकीदत मन्दी की राह में राइट सुना है या हम राइट बताते हैं? हम सो का मतलब निहायत लम्बा-चौड़ा है। हम सो मोमिन, हूरैन, जंग जू। अब हम सो का मतलब कौनसा राइट है? हम रूह चक्कर में ऐसे आती हैं। तफ्सील रूप की तस्वीर भी है, इसमें चोटी मोमिन और रब को दिखाया नहीं है। हूरैन कहाँ से आये? पैदा कहाँ से हुए?इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में तो है यज़ीदी फ़िरक़ा सुनहरे दौर में फट से हूरैन फिरक़ा कैसे हुआ? कुछ भी समझते नहीं। अकीदत मन्दी की राह में इन्सान कितना फंसे रहते हैं। कोई ने क़िताब पढ़ लिया, ख्याल आया, मन्दिर बना लिया बस क़िताब बैठ सुनायेंगे। निहायत इन्सान आ जाते, निहायत फालोअर्स बन जाते हैं। फ़ायदा तो कुछ भी नहीं होता। निहायत दुकान निकल गये हैं। अब यह सब दुकान ख़त्म हो जायेंगे। यह दुकानदारी तमाम अकीदत मन्दी में है, इनसे निहायत दौलत कमाते हैं। राहिब कहते हैं हम ब्रह्म योगी, तत्व योगी हैं। जैसे हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन असल में हैं अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन के मगर हिन्दू मज़हब कह देते हैं। वैसे ब्रह्म तो अनासर है, जहाँ रूहें रहती हैं। उन्होंने फिर ब्रह्म ज्ञानी तत्व ज्ञानी नाम रख दिया है। नहीं तो ब्रह्म अनासर है रहने का मुकाम। तो रब समझाते हैं कितनी भारी भूल कर दी है। यह सब है उलझन। मैं आकर तमाम उलझन दूर कर देता हूँ। अकीदत मन्दी की राह में कहते भी हैं हे प्रभू तेरी गति मत न्यारी है। निजात तो कोई कर न सके।राय तो कई तरह की मिलती हैं। यहाँ की राय कितनी कमाल कर देती है। तमाम दुनिया को चेंज कर देती है।

अभी तुम बच्चों की अक्ल में है, इतने तमाम मज़हब कैसे आते हैं! फिर रूहें कैसे अपने-अपने सेक्शन में जाकर रहती हैं। यह सब ड्रामा मे नूँध है। यह भी बच्चे जानते हैं - इलाही नज़र देने वाला एक रब ही है। रब्बा को कहा - यह इलाही नज़र की चाबी हमको दे दो तो हम कोई को मोजिज़ा करा दें। बोला - नहीं, यह चाबी किसको मिल नहीं सकती। उनके एवज में तुमको फिर दुनिया की बादशाही देता हूँ। मैं नहीं लेता हूँ। मेरा ही पार्ट है मोजिज़ा कराने का। मोजिज़ा होने से कितना ख़ुश हो जाते हैं। मिलता कुछ भी नहीं। ऐसे नहीं कि मोजिज़े से कोई सेहतमंद बन जाते हैं या दौलत मिल जाती है। नहीं, मीरा को मोजिज़ा हुआ मगर निजात को थोड़े ही पाया। इन्सान समझते हैं वह रहती ही फिरदौस में थी। मगर फ़िरदौस जन्नत है कहाँ। यह सब है मोजिज़ा। रब बैठ सब बातें समझाते हैं। इनको भी पहले-पहले मीकाईल अलैहिस्सलाम के मोजिज़े हुआ तो निहायत ख़ुश हो गया। वह भी जब देखा कि मैं मलिक ए आज़म बनता हूँ। तबाही भी देखी फिर बादशाहत का भी देखा तब यक़ीन बैठा ओहो! मैं तो दुनिया का मालिक बनता हूँ।रब्बा की दाखिली हो गई। रब्बा यह सब आप ले लो, हमको तो दुनिया की बादशाही चाहिए। तुम भी यह सौदा करने आये हो ना। जो इल्म उठाते हैं उनकी फिर अकीदत मन्दी छूट जाती है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. हूरैन फ़ज़ीलत इख्तियार कर सिरात ए मुस्तकीम पर हिन्दुस्तान की सच्ची खिदमत करनी है। अपना, हिन्दुस्तान का और तमाम जहान का फ़लाह बहुत-बहुत दिलचस्पी से करना है।

2. ड्रामा की अबदी ला फ़ानी नूँध को हक़ीक़ी तौर पर समझ कोई भी टाइम वेस्ट करने वाली तजवीज़ नहीं करनी है। फ़ालतू ख्यालात भी नहीं चलाने हैं।

बरक़ात:-
इरतिकाद के कोशिश के ज़रिये एकरस सूरत ए हाल बनाने वाले तमाम कमाल रूप बनो

जहाँ इरतिक़ाद है वहाँ अपने आप एकरस सूरत ए हाल है। इरतिक़ाद से इरादा, बोल और आमाल का फ़िज़ूल पन खत्म हो जाता है और लायक़ पन आ जाता है। इरतिक़ाद यानि कि एक ही अफ़ज़ल इरादें में वाक़ेअ में रहना। जिस एक बीज रूपी इरादे में तमाम दरख्त रूपी तफ्सील समायी हुई है। इरतिक़ाद को बढ़ाओ तो तमाम तरह की हलचल ख़त्म हो जायेगी। तमाम इरादे, बोल और आमाल आसानी से साबित हो जायेंगे। इसके लिए खामोश नशीन बनो बनो।

स्लोगन:-
एक बार की हुई गलती को बार-बार सोचना यानि कि दाग पर दाग लगाना इसलिए बीती को बिन्दी लगाओ।

आमीन