08-11-2020 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 01-10-87


इलाही प्यार - ज़िन्दगी बदलने का फाउण्डेशन है


आज दरिया ए मोहब्बत अपने प्यारे बच्चों से मिलने आये हैं। रब और बच्चों का प्यार दुनिया को प्यार के धागे में बांध रहा है। जब प्यार के समन्दर और प्यार से लबरेज़ नदियों का मेल होता है तो प्यार-भरी नदी भी रब जैसे मास्टर प्यार का समन्दर बन जाती है इसलिए दुनिया की रूहें प्यार के एहसास से अपने आप ही नज़दीक आती जा रही हैं। पाकीज़ा प्यार और इलाही फैमिली के प्यार से - कितनी भी अन्जान रूहें हों, निहायत वक़्त से फैमिली के प्यार से महरूम पत्थर जैसी बनने वाली रूह हो मगर ऐसे पत्थर जैसी रूहें भी इलाही फैमिली के प्यार से पिघल पानी बन जाती है। यह है इलाही फैमिली के प्यार की कमाल। कितना भी खुद को किनारे करे इलाही प्यार चुम्बक के जैसा अपने आप ही नज़दीक ले आता है। इसको कहते हैं इलाही प्यार का ज़ाहिर सिला। कितना भी कोई खुद को अलग रास्ते वाला मानें मगर इलाही प्यार मददगार बनाए आपस में एक हो' आगे बढ़ने के धागे में बांध देता है। ऐसा एहसास किया ना।
प्यार पहले मददगार बनाता है, मददगार बनाते-बनाते अपने आप ही वक़्त पर तमाम को आसान इबादत नशीन भी बना देता है। मददगार बनने की निशानी है - आज मददगार हैं, कल आसान इबादत नशीन बन जायेंगे। इलाही प्यार तब्दीली का फाउन्डेशन (नींव) है यानि कि ज़िन्दगी-बदलाव का बीज रूप है। जिन रूहों में इलाही प्यार के एहसास का बीज पड़ जाता है, तो यह बीज मददगार बनने का दरख्त अपने आप ही पैदा करता रहेगा और वक़्त पर आसान इबादत नशीन बनने का सिला दिखाई देगा क्योंकि तब्दीली का बीज, फल ज़रूर दिखाता है। सिर्फ़ कोई फल जल्दी निकलता है, कोई फल वक़्त पर निकलता है। चारों ओर देखो, आप सभी मास्टर प्यार के समन्दर, जहान-खिदमतगार बच्चे क्या काम कर रहे हो? दुनिया में इलाही फैमिली के प्यार का बीज बो रहे हो। जहाँ भी जाते हो - चाहे कोई नास्तिक हो या आस्तिक हो, रब को न भी जानते हों, न भी मानते हों मगर इतना ज़रूर एहसास करते हैं कि ऐसी इलाही फैमिली का प्यार जो आप खानदान ए रहमतुल्आल्मीन आदम ज़ादा/ आदमज़ादियों से मिलता है, यह कहीं भी नहीं मिलता और यह भी मानते हैं कि यह प्यार सादा नहीं है, यह रूहानी प्यार है और इलाही प्यार है। तो इन्डायरेक्ट नास्तिक से आस्तिक हो गया ना। इलाही प्यार है, तो वह कहाँ से आया? किरणें सूरज को अपने आप ही साबित करती हैं। इलाही प्यार, रूहानी प्यार, बे गरज़ प्यार अपने आप ही देने वाले रब को साबित करती ही है। इन्डायरेक्ट इलाही प्यार के प्यार के ज़रिए प्यार के समन्दर रब से राब्ता क़ायम हो जाता है मगर जानते नहीं हैं क्योंकि बीज पहले बातिन रहता है, दरख्त साफ़ दिखाई देता है। तो इलाही प्यार का बीज तमाम को मददगार सो आसान इबादत नशीन, ज़ाहिर याफ़्ता में वक़्त मुताबिक ज़ाहिर कर रहा है और करता रहेगा। तो तमाम ने इलाही प्यार के बीज डालने की खिदमत की। मददगार बनाने का नेक जज़्बात और नेक ख्वाहिशात के खास दो पत्ते भी ज़ाहिर देखे। अभी यह दरख्त इज़ाफ़े को हासिल करते ज़ाहिर सिला दिखायेगा।
रब उल हक़ तमाम बच्चों के वैराइटी (अलग-अलग) तरह की खिदमत को देख खुशहाल होते हैं। चाहे तक़रीर करने वाले बच्चे, चाहे मैकरू खिदमत करने वाले बच्चे - तमाम की मदद की खिदमत से कामयाबी का सिला हासिल होता है। चाहे पहरा देने वाले हों, चाहे बर्तन सम्भालने वाले हों मगर जैसे पांच अंगुलियों के मदद से कितना भी अफ़ज़ल काम, बड़ा काम आसानी से हो जाता है, ऐसे हर एक मोमिन बच्चों की मदद से जितना सोचा था कि ऐसा होगा, उस सोचने से हज़ार गुणा ज़्यादा आसानी से काम हो गया। यह किसकी कमाल है? तमाम की। जो भी काम में मददगार बने - चाहे सफ़ाई भी रखी, चाहे टेबल (मेज़) साफ़ किया मगर तमाम की मदद की रिज़ल्ट (नतीजा) कामयाबी है। यह तनज़ीम की कुव्वत अज़ीम है। रब उल हक़ देख रहे थे - न सिर्फ़ मधुबन में आने वाले बच्चे मगर जो जिस्मानी में भी नहीं थे, चारों ओर के मोमिन बच्चों की, चाहे देस, चाहे विदेश - सबके ज़हन की नेक जज़्बात और नेक ख्वाहिशात की इमदाद रही। यह तमाम रूहों के नेक जज़्बात, नेक खुवाहिशात का किला रूहों को तब्दील कर लेता है। चाहे ज़रिया कुव्वतैन भी रहीं, पन्जतन भी रहे। ज़रिया खिदमतगार ख़ास दरेक काम में बनते ही हैं मगर फ़िज़ा का किला तमाम की इमदाद से ही बनता है। ज़रिया बनने वाले बच्चों को भी रब उल हक़ मुबारक देते हैं, मगर सबसे ज़्यादा मुबारक तमाम बच्चों को। रब को बच्चे मुबारक क्या देंगे क्योंकि रब तो ग़ैबी हो गया। जिस्मानी में तो बच्चों को ज़रिया बनाया इसलिए रब उल हक़ हमेशा बच्चों के ही नग़में गाते हैं। आप रब के नग़में गाओ, रब आपके नग़में गाये।
जो भी किया, निहायत अच्छा किया। तक़रीर करने वालों ने तक़रीर अच्छी किये, स्टेज सजाने वालों ने स्टेज अच्छी सजाई और खास इबादत-याफ़्ता खाना बनाने वाले, खिलाने वाले, सब्जी काटने वाले रहे। पहले फाउन्डेशन तो सब्जी कटती है। सब्जी नहीं कटे तो खाना क्या बनेगा? तमाम डिपार्टमेन्ट वाले आलराउन्ड (तमाम तरह की) खिदमत के ज़रिया रहे। सुनाया ना - अगर सफ़ाई वाले सफ़ाई नहीं करते तो भी असर नहीं पड़ता। हर एक का चेहरा इलाही प्यार से लबरेज़ नहीं होता तो खिदमत की कामयाबी कैसे होती। तमाम ने जो भी काम किया, खुलूस भरकर के किया इसलिए, उन्हों में भी प्यार का बीज पड़ा। जोश-हुल्लास से किया, इसलिए उन्हों में भी जोश-हुल्लास रहा। कसरतीत होते भी प्यार के धागे के सबब तनज़ीम की ही बातें करते रहे। यह माहौल की हिफ़ाज़त की खासियत रही। माहौल हिफ़ाज़त बन जाती है। तो हिफ़ाज़त के अन्दर होने के सबब कैसी भी आदत वाले प्यार के असर में समाये हुए थे। समझा? तमाम की बड़े ते बड़ी ड्यूटी (जिम्मेवारी) थी। तमाम ने खिदमत की। कितना भी वो और कुछ बोलने चाहें, तो भी बोल नहीं सकते माहौल के सबब। ज़हन में कुछ सोचें भी मगर मुंह से निकल नहीं सकता क्योंकि ज़ाहिर आप सबकी ज़िन्दगी के बदलाव को देख उन्हों में भी तब्दीली की प्रेरणा अपने आप ही आती रही। ज़ाहिर सबूत देखा ना। सहीफें मुताबिक से भी, सबसे बड़ा ज़ाहिर सबूत है। ज़ाहिर सबूत के आगे और सब सबूत समा जाते हैं। यह रही ख़िदमत की रिज़ल्ट। अभी भी उसी प्यार की मदद की खासियत से और नज़दीक लाते रहेंगे तो और भी मदद में आगे बढ़ते जायेंगे। फिर भी ज़ुहुर का आवाज़ बुलन्द तभी होगा, जब तमाम ताकतों की इमदाद होगी।
ख़ास तमाम ताक़तें जब मिलकर एक आवाज़ बुलन्द करें, तब ही ज़हूर का पर्दा दुनिया के आगे खुलेगा। ज़ाहिर वक़्त जो खिदमत का प्लान बनाया है, वह इसलिए ही बनाया है ना। तमाम फिरक़े वाले यानि कि ताक़त वाले राब्ते में, मदद में आयें,प्यार में आयें तो फिर राब्ते में आकर आसान इबादत नशीन बन जायेंगे। अगर कोई भी ताक़त इमदाद में नहीं आती है तो तमाम की मदद का जो काम रखा है, वह कामयाब कैसे होगा?
अभी फाउन्डेशन पड़ा ख़ास ताक़त का। मज़हब ताक़त सबसे बड़े ते बड़ी ताक़त है ना। उस ख़ास ताक़त के ज़रिए फाउन्डेशन शुरू हुआ। प्यार का असर देखा ना। वैसे लोग क्या कहते थे कि - यह इतने तमाम इकट्ठे कैसे बुला रहे हो? यह लोग भी सोचते रहे ना।मगर इलाही प्यार का धागा एक था, इसलिए,कसरतीत के इरादा होते हुए भी मददगार बनने का ख्याल एक ही रहा। ऐसे अभी तमाम ताकतों को मददगार बनाओ। बन भी रहे हैं मगर और भी नज़धीक, मददगार बनाते चलो क्योंकि अभी गोल्डन जुबली (सुनहरी जुबली) ख़त्म हुई, तो अभी से, और ज़ुहूर के नज़दीक आ गये। डायमन्ड जुबली यानि कि ज़ुहूर का नारा बुलन्द करना। तो इस साल से ज़ूहूर का पर्दा अभी खुलना शुरू हुआ है। एक तरफ़ विदेश के ज़रिए हिन्दुस्तान में ज़ुहूर हुआ, दूसरी तरफ़ ज़रिया महामण्डलेश्वरों के ज़रिए काम की अफ़ज़ल नशीनी की कामयाबी। विदेश में यू.एन. वाले ज़रिया बने, वे भी ख़ास नामीग्रामी और हिन्दुस्तान में भी नामीग्रामी मज़हबी ताक़त है। तो मज़हबी ताक़त वालों के ज़रिए मज़हबी-रूहों का ज़हूर हो - यह है ज़हूर का पर्दा खुलना शुरू होना। अजुन खुलना शुरू हुआ है। अभी खुलने वाला है। पूरा नहीं खुला है, शुरू हुआ है। विदेश के बच्चे जो काम के ज़रिया बने, यह भी ख़ास काम रहा। ज़हूर के खास काम में इस काम के सबब ज़रिया बन गये। तो रब उल हक़ विदेश के बच्चों को इस आख़िरी ज़हूर के हीरो पार्ट में ज़रिया बनने के खिदमत की भी ख़ास मुबारक दे रहे हैं। हिन्दुस्तान में हलचल तो मचा ली ना। सबके कानों तक आवाज़ गया। यह विदेश का बुलन्द आवाज़ हिन्दुस्तान के कुम्भकरणों को जगाने के ज़रिया तो बन गया। मगर अभी सिर्फ़ आवाज़ गया है, अभी और जगाना है, उठाना है। अभी सिर्फ़ कानों तक आवाज़ पहुँचा है। सोये हुए को अगर कान में आवाज़ जाता है तो थोड़ा हिलता है ना, हलचल तो करता है ना। तो हलचल पैदा हुई। हलचल में थोड़े जागे हैं, समझते कि यह भी कुछ हैं। अभी जागेंगे तब जब और ज़ोर से आवाज़ करेंगे। अभी पहले भी थोड़ा ज़ोर से हुआ। ऐसे ही कमाल तब हो जब तमाम ताक़त वाले इकट्ठे स्टेज पर प्यार मिलन करें। तमाम ताक़त की रूहों के ज़रिए इलाही काम का ज़हूर शूरू हो, तब ज़हूर का पर्दा पूरा खुलेगा। इसलिए अभी जो प्रोग्राम बना रहे हो उसमें यह मकसद रखना कि तमाम ताकतों का प्यार मिलन हो। तमाम फ़िरकों का प्यार मिलन तो हो सकता है। जैसे सादा राहिबों को बुलाते तो कोई बड़ी बात नहीं, मगर यह महामण्डलेश्वरों को बुलाया ना। ऐसे तो शंकराचार्य की भी इस तनज़ीम में और ही फ़ज़ीलत होती। मगर अब उसका भी क़िस्मत खुल जायेगा। अन्दर से तो फिर भी मददगार है। बच्चों ने मेहनत भी अच्छी की। मगर फिर भी लोक-लाज तो रखनी पड़ती है। वह भी दिन आयेगा जब तमाम ताक़त वाले मिल करके कहेंगे कि अफ़ज़ल ताक़त, इलाही ताक़त, रूहानी ताक़त है तो एक इलाही-ताक़त ही है इसलिए लम्बे वक़्त का प्लान बनाया है ना। इतना वक़्त इसलिए मिला है कि तमाम को प्यार के धागे में बांध नज़दीक लाओ। यह प्यार चुम्बक बनेगा जो तमाम एक साथ तनज़ीम रूप में रब की स्टेज पर पहुँच जाए। ऐसा प्लान बनाया है ना? अच्छा।
ख़िदमतगार को खिदमत का ज़ाहिर सबूत भी मिल गया। नहीं तो, अभी नम्बर नये बच्चों का है ना। आप लोग तो मिलन मनाते - मनाते अब बुज़ुर्ग हालत तक पहुँचे हो। अभी अपने छोटे भाई-बहिनों को टर्न दे रहे हो। खुद बुज़ुर्ग बने तब औरों को चांस दिया। इच्छा तो सबकी बढ़ती ही जायेगी। सब कहेंगे - अभी भी मिलने का चांस मिलना चाहिए। जितना मिलेंगे, उतना और इच्छा बढ़ती जायेगी। फिर क्या करेंगे? औरों को चांस देना भी खुद इत्मीनान का एहसास करना है क्योंकि पुराने तो एहसास साती हैं, लबरेज़ याफ़्ता हैं। तो दस्तयाबी याफ़्ता रूहें तमाम पर नेक जज़्बात रखने वाले, औरों को आगे रखने वाले हो। या समझते हो हम तो मिल लेवें? इसमें भी बे गर्ज बनना है। समझदार हो। आग़ाज़, दरम्यान, आख़िर को समझने वाले हो। वक़्त को भी समझते हो। कुदरत के असर को भी समझते हो। पार्ट को भी समझते हो। रब उल हक़ भी हमेशा ही बच्चों से मिलने चाहते हैं। अगर बच्चे मिलने चाहते तो पहले रब चाहता, तब बच्चे भी चाहते। मगर रब को भी वक़्त को, कुदरत को देखना तो पड़ता है ना। जब इस दुनिया में आते हैं तो दुनिया की तमाम बातों को देखना पड़ता है। जब इनसे दूर रूहानी वतन में हैं तो वहाँ तो पानी की, वक़्त की, रहने वगैऊ की प्राबलम (मसला) ही नहीं। गुजरात वाले नज़दीक रहते हैं। तो इसका भी सिला मिला है ना। यह भी गुजरात वालों की खासियत है, हमेशा एवररेडी रहते हैं। हाँ जी' का सबक पक्का है और जहाँ भी रहने का मुकाम मिले, तो रह भी जाते हैं। हर हालात में ख़ुश रहने की भी खासियत है। गुजरात में इज़ाफ़ा भी अच्छा हो रहा है। खिदमत का जोश-हुल्लास खुद को भी बे मुश्किल बनाता, दूसरों का भी फ़लाह करता है। खिदमत का जज़्बे की भी कामयाबी है। खिदमत-जज़्बे में अगर तकब्बुर-जज़्बा आ गया तो उसको ख़िदमत-जज़्बा नहीं कहेंगे। खिदमत-जज़्बा कामयाबी दिलाता है। तकब्बुर-जज़्बा अगर मिक्स होता है तो मेहनत भी ज़्यादा, वक़्त भी ज़्यादा, फिर भी खुद को इत्मीनान नहीं होता। खिदमत-जज़्बा वाले बच्चे हमेशा खुद भी आगे बढ़ते और दूसरों को भी आगे बढ़ाते हैं। हमेशा उड़ते फ़न का एहसास करते हैं। अच्छी हिम्मत वाले हैं। जहाँ हिम्मत है वहाँ रब उल हक़ भी हर वक़्त काम में मददगार हैं।
अज़ीम हस्ती तो हैं ही अज़ीम सदक़ा नशीन। जो भी अज़ीम हस्ती खिदमत के वास्ते आये हैं, अज़ीम सदक़ा नशीन बरक़ाती हो ना? औरों को चांस देना - यह भी अज़ीम सदक़ा, बरक़ात है। जैसा वक़्त, वैसा पार्ट बजाने में भी तमाम सिकीलधे बच्चे हमेशा ही मददगार रहे हैं और रहेंगे। ख्वाहिश तो होगी क्योंकि यह नेक ख्वाहिश है। मगर इसको समाने भी जानते हैं इसलिए तमाम हमेशा मुत्मइन है।
रब उल हक़ भी चाहते हैं कि एक-एक बच्चे से मिलन मनावें और वक़्त की हद भी नहीं होनी चाहिए। मगर आप लोगों की दुनिया में यह तमाम हदें भी देखनी पड़ती है। नहीं तो, एक-एक ख़ास रतन की अज़मत अगर गायें तो कितनी बड़ी है। कम से कम एक-एक बच्चे की खासियत का एक-एक नग़मा तो बना सकते हैं। मगर... इसलिए कहते हैं वतन में आओ जहाँ कोई हद नहीं। अच्छा।
हमेशा इलाही प्यार में समाये हुए, हमेशा हर सेकेण्ड तमाम के मददगार बनने वाले, हमेशा ज़हूर के पर्दे को हटाए रब को दुनिया के आगे ज़ाहिर करने वाले, हमेशा तमाम रूहों को ज़ाहिर सबूत याफ़्ता बन कशिश करने वाले, हमेशा रब और तमाम के दरेक काम में मददगार बन एक का नाम बाला करने वाले - ऐसे दुनिया के हूरैन बच्चों को, दुनिया के ख़ास बच्चों को रब उल हक़ का बेइंतहा प्यार से लबरेज़ यादप्यार। साथ-साथ तमाम देस-विदेस के प्यार से रब के सामने पहुँचने वाले तमाम नज़दीक बच्चों को खिदमत की मुबारक के साथ-साथ रब उल हक़ का ख़ास यादप्यार कबूल हो।

बरक़ात:-
नॉलेजफुल की खासियत के ज़रिए आदतों की टक्कर से बचने वाले कमल फूल जैसे न्यारे और साक्षी बनो।

आदत तो आख़िर तक किसी की गुलाम की रहेंगी, किसी की बादशाह के। आदत बदल जाएं यह इन्तजार नहीं करो। मगर मेरे ऊपर किसी का असर न हो क्योंकि एक तो हर एक के आदत अलग हैं, दूसरा इबलीस का भी रूप बनकर आती हैं इसलिए कोई भी बात का फैसला शाइस्तगी की लकीर के अन्दर रहकर करो, अलग-अलग आदत होते हुए भी टक्कर न हो इसके लिए नॉलेजफुल बन कमल फूल जैसे न्यारे और बेनियाज़ रहो।

स्लोगन:-
ज़िद्द और मेहनत करने के बजाए खुबसूरती से तजवीज़ करो।

आमीन