09-04-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे - रब जैसा लवली बनने के लिए अपने को रूह नुक्ता समझ नुक्ता रब को याद करो

सवाल:-
याद में रहने की बातिन हड्डी मेहनत हर एक बच्चे को करनी है - क्यों?

जवाब:-
क्योंकि याद के बिगर रूह, ख़बीस रूह से नफ़ीस रूह नहीं बन सकती। जब बातिन याद में रहे, रूहानी हवासी बनें, तब गुनाहों का ख़ात्मा हों। धर्मराज की सज़ाओं से बचने का अस्बाब भी याद है। इबलीस के तूफ़ान याद में ही रूकावट डालते हैं इसलिए याद की बातिन मेहनत करो तभी आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम जैसा लवली बन सकेंगे।

नग़मा:-
ओम् नमो शिवाए

आमीन।
यह अज़मत है सबके रब की। याद किया जाता है अल्लाह ताला यानि कि बाप को, उन्हें मात-पिता कहते हैं ना। गॉड फादर भी कहा जाता है। ऐसे नहीं तमाम इन्सानों को गॉड फादर कहेंगे। बाबा तो उनको (जिस्मानी बाप को) भी कहते हैं। जिस्मानी बाप जिसको कहते हैं वह भी फिर रूहानी बाप को याद करते हैं। असल में याद करने वाली रूह है, जो जिस्मानी बाप को भी याद करती है। वह रूह अपने रूप को, आक्युपेशन को नहीं जानती है।रूह अपने को ही नहीं जानती तो गॉड फादर को कैसे जानेगी। अपने जिस्मानी फादर को तो तमाम जानते हैं, उनसे वर्सा मिलता है। नहीं तो याद क्यों करें। रूहानी बाप से ज़रूर वर्सा मिलता होगा। कहते हैं ओ गॉड फादर। उनसे रहम, माफ़ी मागेंगे क्योंकि गुनाह करते रहते हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है। मगर रूह को जानना और फिर पाक परवरदिगार को जानना, यह डिफीकल्ट सब्जेक्ट है। इज़ी ते इज़ी और डिफीकल्ट ते डिफीकल्ट। भल कितना भी साइन्स वगैरह सीखते हैं, जिससे मून तक चले जाते हैं। तो भी इस नॉलेज के आगे वह कमतर है। अपने को और बाप को जानना बड़ा मुश्किल है। जो भी बच्चे अपने को जिब्राइल ज़ादा-ज़ादियाँ कहलाते हैं, वह भी अपने को रूह यक़ीन करें। मैं रूह नुक्ता हूँ, हमारा बाप भी नुक्ता है - यह भूल जाते हैं। यह है डिफीकल्ट सब्जेक्ट। अपने को रूह भी भूल जाते तो रब को याद करना भी भूल जाते। रूहानी हवासी बनने की प्रेक्टिस नहीं है। रूह नुक्ता है, उनमें ही 84 विलादतों का पार्ट नूँधा हुआ है। जो मैं रूह अलग-अलग जिस्म ले पार्ट बजाती हूँ, यह घड़ी-घड़ी भूल जाता है। अहम बात यही समझने की है। रूह और रब को समझने के सिवाए बाक़ी नॉलेज तो सबकी अक्ल में आ जाती है। हम 84 विलादत लेते हैं, खानदान ए आफ़ताबी, खानदान ए महताबी ... बनते हैं। यह चक्कर तो निहायत आसान है। समझ जाते हैं। मगर सिर्फ़ चक्कर को जानने से इतना फ़ायदा नहीं है, जितना अपने को रूह यक़ीन कर रब को याद करने में फ़ायदा है। मैं रूह स्टार हूँ। फिर रब भी स्टार बेइंतहा महीन है। वही ख़ैर निजात दिलाने वाला है। उनको याद करने से ही गुनाहों का ख़ात्मा होना हैं। इस तरीक़े से कोई भी मुसलसल याद नहीं करते। रूहानी हवासी नहीं बनते हैं। घड़ी-घड़ी यह याद रहे मैं रूह हूँ। रब का फरमान है मुझे याद करो तो गुनाहों का ख़ात्मा होंगा। मैं नुक्ता हूँ। यहाँ पार्ट नशीन आकर बना हूँ। मेरे में 5 ख़बासतों की कट चढ़ी हुई है। आइरन एज़ में हैं। अब गोल्डन एज़ में जाना है इसलिए रब को निहायत प्यार से याद करना है। इस तरह रब को याद करेंगे तब कट निकल जायेगी। यह है मेहनत। खिदमत की लबार तो निहायत मारते हैं। आज यह खिदमत की, निहायत मुतासिर हुए मगर रहमतुल्आल्मीन समझते हैं। रूह और रब के इल्म पर कुछ भी मुतासिर नहीं हुआ। हिन्दुस्तान हेविन और हेल कैसे बनता है। 84 विलादत कैसे लेते हैं, सतो रजो तमो में कैसे आते हैं। सिर्फ़ यह सुनकर मुतासिर होते हैं। पाक परवरदिगार ग़ैर मुजस्सम है, यह भी समझ जाते हैं। बाक़ी मैं रूह हूँ, मेरे में 84 विलादतों का पार्ट भरा हुआ है। रब भी नुक्ता है, उनमें तमाम इल्म है। उनको याद करना है। यह बातें कोई भी समझते नहीं। अहम बात समझते नहीं हैं। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी की नॉलेज रब ही देते हैं। गवर्मेंन्ट भी चाहती है कि वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी होनी चाहिए। यह तो उनसे भी महीन बातें हैं। रूह क्या है, उनमें कैसे 84 विलादतों का पार्ट है। वह भी ला फ़ानी है। यह याद करना, अपने को नुक्ता समझना और रब को याद करना जिससे गुनाहों का ख़ात्मा हों - इस इबादत में कोई भी तैयार नहीं रहते हैं। इस याद में रहें तो निहायत लवली हो जाएं। यह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम देखो कितने लवली हैं। यहाँ के इन्सान तो देखो कैसे हैं। खुद भी कहते हैं हमारे में कोई फ़ज़ीलत नहीं। हम जैसे ख़बीस हैं, आप खालिस हैं। जब अपने को रूह यक़ीन कर रब को याद करें तब कामयाबी मिले। नहीं तो कामयाबी निहायत थोड़ी मिलती है। समझते हैं हमारे में निहायत अच्छा इल्म है। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी हम जानते हैं। मगर इबादत का चार्ट नहीं बताते हैं। मुश्किल कोई हैं जो इस हालत में रहते हैं यानि कि अपने को रूह समझ रब को याद करते हैं। बहुतों को प्रेक्टिस नहीं है। रब्बा समझते हैं कि बच्चे सिर्फ़ इल्म का चक्कर अक्ल में फिराते हैं। बाक़ी मैं रूह हूँ, रब्बा से हमको राब्ता लगाना है, जिससे आइरन एज़ से निकल गोल्डन एज़ में जायेंगे। मुझ रूह को रब को जानना है, उसकी याद में ही रहना है, यह बहुतों की प्रेक्टिस कम है। बहुत आते भी हैं। अच्छा-अच्छा भी कहते हैं। बाक़ी उनको यह मालूम नहीं पड़ता कि अन्दर कितनी कट लगी हुई है। हसीन से स्याह बन गये हैं। फिर हसीन कैसे बने? यह कोई भी नहीं जानते हैं। सिर्फ़ हिस्ट्री-जॉग्राफी जानने का काम नहीं है। पाकीज़ा कैसे बनें? सज़ा न खाने का तरीक़ा है - सिर्फ़ याद में रहना। इबादत दुरूस्त नहीं होगी तो धर्मराज की सज़ायें खायेंगे। यह निहायत बड़ी सब्जेक्ट है, जिसको कोई उठा नहीं सकते। इल्म में अपने को मियाँ मिट्ठू समझ बैठते हैं, इसमें कोई शक नहीं। असल बात है इबादत की। इबादत में निहायत कच्चे हैं इसलिए रब फ़रमाते हैं खबरदार रहो, सिर्फ़ पण्डित नहीं बनना है। मैं रूह हूँ, मुझे रब को याद करना है। रब ने फरमान दिया है - दिल से मुझे याद करो। यह है अज़ीम दुआ। अपने को स्टार समझ रब को भी स्टार समझो फिर रब को याद करो। रब का कोई बड़ा रूप नहीं सामने आता है। तो रूहानी हवासी बनने में ही मेहनत है। दुनिया के मलिक ए आज़म-मल्लिकाए आज़म एक बनते हैं, जिनकी लाखों अवाम बनती है। अवाम तो निहायत है ना। हिस्ट्री-जॉग्राफी को जानना तो आसान है मगर जब अपने को रूह समझ रब को याद करेंगे तब पाकीज़ा बनेंगे। यह प्रेक्टिस बड़ी डिफीकल्ट है। याद करने बैठेंगे तो निफ़ायत तूफान मुश्किलात डालेंगे। कोई आधा घण्टा भी एकरस हो बैठे, बड़ा मुश्किल है। घड़ी-घड़ी भूल जायेंगे। इसमें सच्ची-सच्ची बातिन मेहनत है। चक्कर का राज़ जानना आसान है। बाक़ी रूहानी हवासी हो रब को याद करना, यह मुश्किल कोई समझते हैं और उस एक्ट में आते हैं। रब की याद से ही तुम पाकीज़ा बनेंगे। सेहतयाब जिस्म, बड़ी उम्र मिलेगी। सिर्फ़ वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझाने से माला का दाना नहीं बन सकते। दाना बनेंगे याद से। यह मेहनत कोई से पहुँचती नहीं है। खुद भी समझते हैं कि हम याद में नहीं रहते। अच्छे-अच्छे अज़ीम हस्ती इस बात में ढीले हैं। अहम बात समझाना आता ही नहीं है। यह बात है भी मुश्किल। चक्कर की उम्र इन्होंने बड़ी कर दी है। तुम 5 हज़ार साल साबित करते हो। मगर रूह-रब का राज़ कुछ भी नहीं जानते हैं, याद ही नहीं करते हैं इसलिए हालत डगमगाती रहती है। जिस्मानी हवास निहायत है। रूहानी हवासी बनें तब माला का दाना बन सकें। ऐसे नहीं वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझाते हैं इसलिए हम माला में नज़दीक आ जायेंगे, नहीं। रूह इतनी छोटी है, इसमें 84 विलादत का पार्ट भरा हुआ है। इस बात को पहले-पहले अक्ल में लाना है, फिर चक्कर को याद करना है। असल बात है इबादत की। आबिद हालत चाहिए। ख़बीस रूह से नफ़ीस रूह बनना है। रूह पाकीज़ा होगी इबादत से। कुव्वत ए इबादत वाले ही धर्मराज के डन्डों से बच सकते हैं। यह मेहनत बड़ी मुश्किल कोई से होती है। इबलीस के तूफ़ान भी निहायत आयेंगे। यह निहायत हड्डी बातिन मेहनत है।आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम बनना मासी का घर नहीं है। यह प्रेक्टिस हो जाए तो चलते फिरते रब की याद आती रहे, इसको ही इबादत कहा जाता है। बाक़ी यह इल्म की बातें तो छोटे-छोटे बच्चे भी समझ जायेंगे। तस्वीरों में तमाम दौर वगैरह लगे हुए हैं। यह तो कॉमन है। जब कोई भी काम शुरू करते हैं तो स्वास्तिका लगाते हैं। यह निशानी है सतयुग, त्रेता.. यानि कि आदम अलैहिस्सलाम दौर, नूह अलैहिस्सलाम दौर, इब्राहिम अलैहिस्सलाम का दौर,मूसा अलैहिस्सलाम का दौर,ईसा अलैहिस्सलाम का दौर, मोहम्मद अलैहिस्सलाम का दौर की बाक़ी ऊपर में है छोटा-सा मिलन का दौर यानि कि क़यामत का दौर। तो पहले अपने को रूह समझ रब को याद करते रहेंगे तब ही वह सुकून फैल सकता। इबादत से गुनाह ख़ाक होंगे। तमाम दुनिया इस बात में भूली हुई है। रूह और रब के बारे में, कोई कहते पाक परवरदिगार हज़ारों आफ़ताबो से नूरानी है, मगर यह हो कैसे सकता। जबकि कहते हैं - रूह सो रब फिर तो दोनों एक हुए ना। छोटे बड़े का फर्क नहीं पड़ सकता। इस पर भी समझाना है। रूह का रूप नुक्ता है।रूह सो रब है तो पाक परवरदिगार भी नुक्ता ठहरा ना। इसमें फ़र्क तो हो न सके। तमाम पाक परवरदिगार हो जाएं तो तमाम क्रियेटर हो जाएं। तमाम की ख़ैर निजात करने वाला तो एक रब है ना। बाक़ी तो हर एक को अपना पार्ट मिला हुआ है। यह अक्ल में बिठाना पड़े, समझ की बात है। रब फ़रमाते हैं मुझे याद करो तो कट निकल जायेगी। यह मेहनत है। एक तो आधा चक्कर जिस्मानी हवासी हो रहे हो। सुनहरे दौर में रूहानी हवासी रहते भी रब को नहीं जानते। इल्म को नहीं जानते। इस वक़्त जो तुमको नॉलेज मिलती है वह नॉलेज गुम हो जाती है। वहाँ सिर्फ़ इतना जानते हैं कि हम रूह एक जिस्म छोड़कर दूसरा लेते हैं। पार्ट बजाते हैं। इसमें फिकर की क्या बात है। हर एक को अपना-अपना पार्ट बजाना है। रोने से क्या होगा? यह समझाया जाता है अगर कुछ समझें तो सुकून आ जाए। खुद समझेंगे तो औरों को भी समझायेंगे। बुजुर्ग लोग समझाते भी हैं, रोने से क्या वापिस थोड़े ही आयेंगे। जिस्म छोड़ रूह निकल गई, इसमें रोने की क्या बात है। बे इल्मी वक़्त में भी ऐसे समझते हैं। मगर वह यह थोड़े ही जानते हैं कि रूह और रब क्या चीज़ है। रुह में खाद पड़ी है, वह तो समझते रूह निर्लेप है। तो यह निहायत महीन बातें हैं। रब्बा जानते हैं निहायत बच्चे याद में रहते नहीं हैं। सिर्फ़ समझाने से क्या होगा। निहायत मुतासिर हुआ, मगर इससे उसका कोई फ़लाह थोड़े ही हुआ।रूह-रब की पहचान मिले तब समझें बरोबर हम उनके बच्चे हैं। रब ही नापाक से पाक बनाने वाला है। हमको आकर दु:ख से छुड़ाता है। वह भी नुक्ता है। तो रब को मुसलसल याद करना पड़े। बाक़ी हिस्ट्री-जॉग्राफी जानना कोई बड़ी बात नहीं है। भल समझने लिए आते हैं मगर इस हालत में तैयार रहे कि मैं रूह हूँ, इसमें ही मेहनत है। रूह रब की बात तो तुमको भी रब ही आकर समझाते हैं। खिल्क़त का चक्कर तो आसान है। जितना हो सके उठते बैठते रूहानी हवासी बनने की मेहनत करनी है। रूहानी हवासी निहायत सुकून याफ़्ता रहते हैं। समझते हैं मुझे साइलेन्स में जाना है। ग़ैर मुजस्सम दुनिया में जाकर मुकीम होना है। हमारा पार्ट अभी पूरा हुआ। रब का रूप छोटा नूक्ता समझेंगे। वह कोई बड़ा लिंग नहीं है। रब्बा निहायत छोटा है। वही नॉलेजफुल, तमाम को ख़ैर निजात दिलाने वाला सदक़ा नशीन हैं। मैं रूह भी नॉलेजफुल बन रही हूँ। ऐसा ग़ौरतलब जब चले तब आला मर्तबा पा सकें। दुनिया भर में कोई रूह और रब को नहीं जानते।

तुम मोमिनों ने अब जाना है। राहिब भी नहीं जानते। न आकर समझेंगे। वह तो सब अपने-अपने मज़हबों में ही आने वाले हैं। हिसाब-किताब चुक्तू कर चले जायेंगे। तुमको ही यह मेहनत करने से रब से वर्सा मिलेगा। अब फिर रूहानी हवासी बनना है। दिल तो रूह में है ना। रूह को ही दिल रब से लगाना है। दिल जिस्म में नहीं है। जिस्म के तो तमाम मैकरू आरगन्स हैं। दिल को लगाना यह रूह का काम है। अपने को रूह समझ फिर पाक परवरदिगार बाप से दिल लगानी है। रूह निहायत महीन है। कितनी छोटी महीन रूह, पार्ट कितना बजाती है। यह है कुदरत। इतनी छोटी चीज़ में कितना ला फ़ानी पार्ट भरा हुआ है। वह कभी मिटने वाला नहीं है। निहायत महीन है। तुम कोशिश करेंगे तो भी बड़ी चीज़ याद आ जायेगी। मैं रूह छोटा स्टार हूँ तो रब भी छोटा है। तुम बच्चों को पहले-पहले मेहनत यह करनी है। इतनी छोटी सी रूह ही इस वक़्त नापाक बनी है। रूह को पाकीज़ा बनाने का पहले-पहले यह तरीका है। तालीम हासिल करनी है। बाक़ी खेलना, कूदना तो अलग बात है। खेलने का भी एक हुनर है। तालीम से मर्तबा मिलता है। खेल कूद से मर्तबा नहीं मिलता है। खेल वगैरह की डिपार्टमेन्ट अलग होती है। उनसे इल्म‌ और इबादत का कनेक्शन नहीं है। यह तबर्रुक वगैरह लगाना भी खेल है। अहम बात है याद की। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. धर्मराज की सज़ाओं से बचने के लिए याद की बातिन मेहनत करनी है। पाकीज़ा बनने का तरीक़ा है अपने को रूह नूक्ता समझ नुक्ता रब को याद करना।

2. इल्म में अपने आपको मिया मिट्ठू नहीं समझना है, एकरस हालत बनाने की प्रेक्टिस करनी है। रब का जो फरमान है उसकी ताबेदारी करनी है।

बरक़ात:-
सच्चाई-सफाई की इख्तियारात के ज़रिए नज़दीकियत का एहसास करने वाले मुकम्मल नशीनी बनो।

तमाम इख्तियारात में अहम इख्तियारात है सच्चाई और सफाई। एक दो के वास्ते दिल में बिल्कुल सफ़ाई हो। जैसे साफ़ चीज़ में तमाम कुछ साफ़ दिखाई देता है। वैसे एक दो की जज़्बात, जज़्बात-रवैये साफ़ दिखाई दे। जहाँ सच्चाई-सफाई है वहाँ नज़दीकियत है। जैसे रब उल हक़ के नज़दीकी हो ऐसे आपस में भी दिल की नज़दीकियत हो। रवैये का इख्तिलाफ़ ख़तम हो जाए। इसके लिए ज़हन के जज़्बे और रवैये को मिलाना है। जब रवैये में फ़र्क दिखाई न दे तब कहेंगे मुकम्मल नशीनी सीरत।

स्लोगन:-
बिगड़े हुए को सुधारना - यह सबसे बड़ी खिदमत है।

आमीन