09-09-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
हर बात में कुव्वत ए इबादत से काम लो, रब से कुछ भी पूछने की बात नहीं है, तुम इलाही औलाद हो इसलिए कोई भी शैतानी काम न करो''

सवाल:-
तुम्हारी इस कुव्वत ए इबादत की करामात क्या है?

जवाब:-
यही कुव्वत ए इबादत है जिससे तुम्हारे सब आज़ा बस हो जाते हैं। कुव्वत ए इबादत के सिवाए तुम पाकीज़ा बन नहीं सकते।कुव्वत ए इबादत से ही तमाम खिल्क़त पाकीज़ा बनती है इसलिए पाकीज़ा बनने के वास्ते और खाने को खालिस बनाने के लिए याद के सफ़र में रहो। तरीक़े से चलो। नरमाई से रवैया करो।

आमीन।
रूहानी रब रूहानी बच्चों को समझाते हैं। दुनिया में किसको मालूम नहीं है कि रूहानी रब आकर जन्नत की और नई दुनिया को क़याम कैसे करते हैं। कोई भी नहीं जानते हैं। तुम रब से कोई भी तरह की मांगनी नहीं कर सकते हो। रब सब कुछ समझाते हैं। कुछ भी पूछने की दरकार नहीं रहती, सब कुछ आपे ही समझाते रहते हैं। रब फ़रमाते हैं मुझे कल्प-कल्प इस हिन्दुस्तान खण्ड में आकर क्या करना है, सो मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते। रोज़-रोज़ समझाते रहते हैं। कोई भल एक अल्फ़ाज़ भी न पूछे तो भी सब कुछ समझाते रहते हैं। कभी पूछते हैं खान-पान की तकलीफ़ होती है। अब यह तो समझ की बात है। रब्बा ने कह दिया है हर बात में कुव्वत ए इबादत से काम लो, याद के सफ़र से काम लो और कहाँ भी जाओ तो अहम बात रब को ज़रूर याद करना है। और कोई भी शैतानी काम नहीं करना है। हम इलाही औलाद हैं वह है सबका रब, सबके लिए तालीम यह एक ही देंगे। रब तालीम देते हैं-बच्चे जन्नत का मालिक बनना है। बादशाहत में भी पोज़ीशन तो होती हैं ना। हर एक के तजवीज़ के मुताबिक मर्तबा होता है। तजवीज़ बच्चों को करनी है और क़िस्मत भी बच्चों को पानी है। तजवीज़ कराने लिए रब आते हैं। तुमको कुछ भी मालूम नहीं था कि रब कब आयेंगे, क्या आकर करेंगे, कहाँ ले जायेंगे। रब ही आकर समझाते हैं, ड्रामा के प्लैन के मुताबिक तुम कहाँ से गिरे हो। एकदम ऊंच चोटी से। ज़रा भी अक्ल में नहीं आता कि हम कौन हैं। अब महसूस करते हो ना। तुमको ख्वाब में भी नहीं था कि रब आकर क्या करेंगे। तुम भी कुछ नहीं जानते थे। अब रब मिला हुआ है तो समझते हो ऐसे रब के ऊपर तो न्योछावर होना पड़े। जैसे वफ़दार ख्वातीन होती है तो खाविन्द पर कितना न्योछावर जाती है। आग पर चढ़ने में भी डर नहीं होता है। कितनी बहादुर होती है। आगे आग पर निहायत चढ़ती थी। यहाँ रब्बा तो ऐसी कोई तकलीफ़ नहीं देते हैं। भल नाम इल्म की आग है मगर जलने करने की कोई बात नहीं। रब बिल्कुल ऐसे समझाते हैं जैसे मक्खन से बाल। बच्चे समझते हैं बरोबर विलादत दर विलादत का सिर पर बोझा है। कोई एक अजामिल नहीं। हर एक इन्सान एक-दो से जास्ती अजामिल हैं। इन्सानों को क्या मालूम पास्ट विलादत में क्या-क्या किया है। अभी तुम समझते हो गुनाह ही किये हैं, असल में नफ़ीस रूह एक भी नहीं है। तमाम हैं अज़ाबी रूहें। सवाब करें तो नफ़ीस रूह बन जायें। नफ़ीस रूहें होती हैं सुनहरे दौर में। कोई ने हॉस्पिटल वगैरह बनाई सो क्या हुआ। सीढ़ी उतरने से थोड़े ही बच जायेंगे। चढ़ता फ़न तो नहीं होता है ना। गिरते ही जाते हैं। यह रब तो ऐसा बील्वेड है जिस पर कहते हैं जीते जी कुर्बान जायें क्योंकि खाविन्दों का खाविन्द, बापों का बाप सबसे आला है।

बच्चों को अभी रब जगा रहे हैं। ऐसा रब्बा जो जन्नत का मालिक बनाते हैं, कितना सादा है। शुरू में बच्चियाँ जब बीमार पड़ती थी तो बाबा खुद उन्हों की खिदमत करते थे। तकब्बुर कुछ भी नहीं। बाप दादा आला ते आला है। कहते हैं जैसे आमाल मैं इनसे कराऊंगा, या करूंगा। दोनों जैसे एक हो जाते हैं। मालूम थोड़े ही पड़ता है। बाप क्या करते हैं, दादा क्या करते हैं। आमाल- न्युटरल आमाल - गुनाहगार आमाल की रफ्तार रब ही बैठकर समझाते हैं। रब निहायत आलातरीन है। इबलीस का भी कितना असर है। अल्ल्लाह् ताला बाप कहते हैं ऐसा मत करो तो भी नहीं मानते हैं। अल्ल्लाह् ताला फ़रमाते हैं - मीठे बच्चे, यह काम नहीं करना, फिर भी उल्टा काम कर देते हैं। उल्टे काम के लिए ही मना करेंगे ना। मगर इबलीस भी बड़ा जबरदस्त है। भूले-चूके भी रब को नहीं भूलना है। कुछ भी करें, मारे अथवा कूटे। ऐसा कुछ रब करते नहीं हैं मगर यह एक्स्ट्रीम में कहा जाता है। नग़मा भी है तुम्हारे दर को कभी नहीं छोड़ेंगे। चाहे कुछ भी कहो। बाहर में रखा ही क्या है। अक्ल भी कहती हैं जायेंगे कहाँ?रब बादशाही देते हैं फिर थोड़े ही कभी मिलती है। ऐसे थोड़े ही है दूसरी विलादत में कुछ मिल सकता है। नहीं। यह रूहानी रब है जो बेहद दारूल मसर्रत का तुमको मालिक बनाते हैं। बच्चों को हूरैन फ़ज़ीलत भी इख्तियार करनी हैं, सो भी रब सलाह देते हैं। अपना पुलिस वगैरह का काम भी करो, नहीं तो डिसमिस कर देंगे। अपना काम तो करना ही है, आंख दिखानी पड़ती है। जितना हो सके प्यार से काम लो। नहीं तो तरीक़े से आंख दिखाओ। हाथ नहीं चलाना है। रब्बा के कितने बेइंतहा बच्चे हैं। रब्बा को भी बच्चों का ओना (ख्याल) रहता है ना। असल बात है पाकीज़ा रहना। विलादत दर विलादत तुमने पुकारा है ना - ए नापाक से पाक बनाने वाले आकर हमको पाकीज़ा बनाओ। मगर मतलब कुछ भी नहीं समझते। बुलाते हैं तो ज़रूर नापाक हैं। नहीं तो बुलाने की दरकार नहीं। इबादत की भी दरकार नहीं। रब समझाते हैं तुम अबलाओं पर कितने ज़ुल्म होते हैं, बर्दाश्त करना ही है। तरीक़ा भी बतलाते रहते हैं। निहायत नरमी से चलो। बोलो, आप तो खुदा हो फिर यह क्या मांगते हो? हथियाला बांधते वक़्त कहते हैं - मैं तुम्हारा पति ईश्वर गुरू सब कुछ हूँ, अब मैं पाकीज़ा रहना चाहती हूँ, तो तुम रोकते क्यों हो। अल्ल्लाह् ताला को तो नापाक से पाक बनाने वाला कहा जाता है ना। आप ही पाकीज़ा बनाने वाले बन जाओ। ऐसे प्यार से नरमाई से बात करनी चाहिए। गुस्सा करे तो फूलों की बरसात करो। मारते हैं फिर अफसोस भी करते हैं। जैसे शराब पीते हैं तो बड़ा नशा चढ़ जाता है। अपने को बादशाह समझते हैं। तो यह ज़हर भी ऐसी चीज़ है बात मत पूछो। पछताते भी हैं मगर आदत पड़ी है तो वह टूटती नहीं है। एक-दो बार ख़बासत में गया, बस नशा चढ़ा फिर गिरते रहेंगे। जैसे नशे की चीज़ें ख़ुशी में लाती हैं, ख़बासत भी ऐसे हैं। यहाँ फिर बड़ी मेहनत है। सिवाए कुव्वत ए इबादत के कोई भी आज़ाओं को बस नहीं कर सकते। कुव्वत ए इबादत की ही करामात है, तब तो नाम मशहूर है, बाहर से आते हैं यहाँ इबादत सीखने। सुकून में बैठे रहेंगे। घरबार से दूर हो जाते हैं। वह तो है आधाकल्प के लिए आर्टीफीशियल सुकून। किसको सच्चा सुकून का मालूम ही नहीं। रब फ़रमाते हैं बच्चे, तुम्हारा दीन ए नफ़्स ही है सुकून, इस जिस्म से तुम आमाल करते हो। जब तक जिस्म इख्तियार न करे तब तक रूह सुकून में रहती है। फिर कहाँ न कहाँ जाकर दाखिल करती है। यहाँ तो फिर कोई-कोई महीन जिस्म से धक्के खाती रहती है। वह छाया के जिस्म होते हैं, कोई दु:ख देने वाले होते हैं, कोई अच्छे होते हैं, यहाँ भी कोई भले इन्सान होते हैं जो किसको दु:ख नहीं देते हैं। कोई तो निहायत दु:ख देते हैं। कोई जैसे औलिया वली होते हैं।
रब समझाते हैं मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों तुम 5 हज़ार साल के बाद फिर से आकर मिले हो। क्या लेने लिए? रब ने बताया है तुमको क्या मिलने का है। रब्बा आपसे क्या मिलना है, यह तो सवाल ही नहीं। आप तो हो ही हेविनली गॉड फादर। नई दुनिया के खालिक। तो ज़रूर आपसे बादशाही ही मिलेगी। रब फ़रमाते हैं थोड़ा भी कुछ समझकर जाते हैं तो जन्नत में ज़रूर आ जायेंगे। हम जन्नत की क़याम करने आये हैं। बड़े से बड़ा आसामी है अल्ल्लाह् ताला और बाप ए अवाम। तुम जानते हो इस्राफील अलैहिस्सलाम कौन है? और कोई को भी मालूम नहीं है। तुम तो कहेंगे हम इनके घराने के हैं, यह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम तो सुनहरे दौर में सल्तनत करते हैं। यह चक्कर वगैरह असल में इस्राफील को थोड़े ही है। यह ज़ेवर हम मोमिनों के हैं। अभी यह नॉलेज है। सुनहरे दौर में थोड़े ही यह समझायेंगे। ऐसी बातें बताने की कोई में ताक़त नहीं है। तुम इस 84 के चक्कर को जानते हो। इनका मतलब कोई समझ न सके। बच्चों को रब ने समझाया है। बच्चे समझ गये हैं, हमको तो यह ज़ेवर शोभते नहीं। हम अभी तालीम पा रहे हैं। तजवीज़ कर रहे हैं। फिर ऐसे बन जायेंगे। दीदार ए नफ़्स चक्कर फिराते-फिराते हम हूरैन बन जायेंगे। दीदार ए नफ़्स चक्कर यानि कि खालिक और मख़लूक़ के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर को जानना है। सारी दुनिया में कोई भी यह समझा नहीं सकते कि यह ख़िल्क़त का चक्कर कैसे फिरता है। रब कितना आसान कर समझाते हैं-इस चक्कर की उम्र इतनी बड़ी तो हो नहीं सकती। इन्सानी ख़िल्क़त का ही अख़बार सुनाया जाता है कि इतने इन्सान हैं। ऐसे थोड़े ही बताया जाता है कि कछुए कितने हैं, मछलियाँ वगैरह कितनी हैं, इन्सानों की ही बात है। तुमसे भी सवाल पूछते हैं, रब सब कुछ बतलाते रहते हैं। सिर्फ़ उस पर पूरा तवज्जों देना है।
रब्बा ने समझाया है - कुव्वत ए इबादत से तुम ख़िल्क़त को पाकीज़ा बनाते हो तो क्या कुव्वत ए इबादत से खाना खालिस नहीं हो सकता है? अच्छा, तुम तो ऐसे बने हो। फिर कोई को अपने जैसा बनाते हो? अभी तुम बच्चे समझते हो कि रब आया है जन्नत की बादशाही फिर से देने। तो इनको रिफ्यूज़ नहीं करना है। दुनिया की बादशाही रिफ्यूज़ की तो ख़त्म। फिर रिफ्यूज़ (किचड़े के डिब्बे) में जाकर पड़ेंगे। यह सारी दुनिया है किचड़ा। तो इनको रिफ्यूज़ ही कहेंगे। दुनिया का हाल देखो क्या है। तुम तो जानते हो हम दुनिया के मालिक बनते हैं। यह किसको मालूम नहीं है कि सुनहरे दौर में एक ही सल्तनत थी, मानेंगे नहीं। अपना घमण्ड रहता है तो फिर ज़रा भी सुनते नहीं, कह देते यह सब आपकी कल्पना है। कल्पना से ही यह जिस्म वगैरह बना हुआ है। मतलब कुछ नहीं समझते। बस यह अल्ल्लाह् ताला की कल्पना है, अल्ल्लाह् ताला जो चाहे सो बनते हैं, उनका यह खेल है। ऐसी बातें करते हैं, बात मत पूछो। अभी तुम बच्चे जानते हो रब्बा आया हुआ है। बुढ़ियाँ भी कहती हैं - रब्बा हर 5 हज़ार साल के बाद हम आपसे जन्नत का वर्सा लेते हैं। हम अभी आये हैं जन्नत की बादशाहत लेने। तुम जानते हो कि तमाम एक्टर्स का अपना पार्ट है। एक का पार्ट न मिले दूसरे से। तुम फिर इसी ही नाम रूप में आकर इसी वक़्त रब से वर्सा लेने की तजवीज़ करेंगे। कितनी बेशुमार कमाई है। भल रब्बा कहते हैं थोड़ा भी सुना है तो जन्नत में आ जायेंगे। मगर हर एक इन्सान तजवीज़ तो आला बनने का ही करते हैं ना। तो तजवीज़ है फर्स्ट। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. जैसे रब्बा बच्चों की खिदमत करते हैं, कोई तकब्बुर नहीं, ऐसे फालो करना है। रब की सिरात ए मुस्तकीम पर चलकर दुनिया की बादशाही लेनी है, रिफ्यूज़ नहीं करना है।

2. बापों का बाप, खाविन्दों का खाविन्द जो सबसे आला है, बील्वेड है उस पर जीते जी न्योछावर जाना है। इल्म की आग पर बैठना है। कभी भूले चूके भी रब को भूल उल्टा काम नहीं करना है।

बरक़ात:-
मास्टर दरिया ए इल्म बन इल्म की गहराई में जाने वाले एहसास रूपी जवाहिरात से लबरेज़ बनो।

जो बच्चे इल्म की गहराई में जाते हैं वे एहसास रूपी जवाहिरात से लबरेज़ बनते हैं। एक है इल्म सुनना और सुनाना, दूसरा है एहसास साती बनना। एहसास साती हमेशा ला फ़ानी और बेमुशकिल रहते हैं। उन्हें कोई भी हिला नहीं सकता। एहसास साती के आगे इबलीस की कोई भी कोशिश कामयाब नहीं होती। एहसास साती कभी धोखा नहीं खा सकते इसलिए एहसास को बढ़ाते हुए दरेक फ़ज़ीलत के एहसास साती बनो। गौरतलब की कुव्वत के ज़रिए खालिस इरादों का स्टॉक जमा करो।

स्लोगन:-
फरिश्ता वह है जो जिस्म के महीन तकब्बुर के रिश्ते से भी न्यारा है।

आमीन