10-01-2021 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 09-10-87


रूहानी सल्तनत-ए- दरबार की ख़बर


आज रब उल हक़ अपने सल्तनत- ए- नफ्स के हक़दार बच्चों की सल्तनत दरबार देख रहे हैं। यह मिलन के दौर की निराली, अफ़जल शान वाली रूहानी दरबार सारे चक्कर में न्यारी और बेइंतहा प्यारी है। इस मजलिस- ए -सल्तनत की रूहानी रौनक, रूहानी कमल तख्त, रूहानी ताज और तिलक, चेहरे की चमक, सूरत- ए- हाल की अफ़ज़ल याददाश्त के माहौल में रूहानी खुशबू बेइंतहा लिज़्ज़त बख्श़ मजलिस, बेइंतहा कशिश करने वाली है। ऐसी मजलिस को देख रब उल हक़ हर एक सल्तनत- ए- हक़दार रूह को देख खुशगवार हो रहे हैं। कितनी बड़ी दरबार है! हर एक मोमिन बच्चा सल्तनत- ए- नफ्स की हक़दार है। तो कितने मोमिन बच्चे हैं! तमाम मोमिनों की दरबार इकट्ठी करो तो कितनी बड़ी सल्तनत- ए- दरबार हो जायेगी! इतनी बड़ी सल्तनत- ए- दरबार किसी भी दौर में नहीं होती। यही मिलन के दौर की ख़ासियत है जो आला ते आला रब के तमाम बच्चे सल्तनत- ए- नफ्स के हक़दार बनते हैं। वैसे जिस्मानी फैमिली में हर एक बाप बच्चों को कहते हैं कि यह मेरा बच्चा राजा' बेटा है और खुवाहिश रखते हैं कि मेरा हर एक बच्चा राजा' बने। मगर तमाम बच्चे राजा बन ही नहीं सकते। यह कहावत पाक परवरदिगार बाप की काॅपी की है। इस वक़्त रब उल हक़ के तमाम बच्चे सल्तनत- ए- इबादत नशीन यानि कि खुद के राजे नम्बरवार ज़रूर हैं मगर हैं तमाम सल्तनत- ए- इबादत नशीन, अवाम-ए -इबादत नशीन कोई नहीं है। तो रब उल हक़ बेहद की मजलिस- ए- सल्तनत देख रहे थे। तमाम अपने को सल्तनत- ए- नफ्स के हक़दार समझते हो ना? नये-नये आये हुए बच्चे सल्तनत के हक़दार हो या अभी बनना है? नये-नये हैं तो मिलना-जुलना सीख रहे हैं। ग़ैबी बाप की ग़ैबी बातें समझने की भी आदत पड़ती जायेगी। फिर भी इस क़िस्मत को अभी से भी वक़्त पर ज़्यादा समझेंगे कि हम तमाम रूहें कितनी क़िस्मत नशीन हैं!

तो रब उल हक़ सुना रहे थे - रूहानी सल्तनत- ए- दरबार की खबर। तमाम बच्चों के ख़ास ताज और चेहरे की चमक के ऊपर न चाहते भी अटेन्शन जा रहा था। ताज मोमिन ज़िन्दगी की ख़ासियत - पाकीज़गी' की ही निशानी है। चेहरे की चमक रूहानी सूरत- ए- हाल में वाकेअ रहने की रूहानियत की चमक है। सादा हालत से भी किसी भी इन्सान को देखेंगे तो सबसे पहले नज़र चेहरे तरफ़ ही जायेगी। यह चेहरा ही कैफियत और सूरत- ए- हाल का आइना है। तो रब उल हक़ देख रहे थे। चमक तो तमाम में थी मगर एक थे हमेशा रूहानियत की सूरत- ए- हाल में वाकेअ रहने वाले, अपने आप और आसान सूरत- ए- हाल वाले और दूसरे थे हमेशा रूहानी सूरत- ए- हाल की प्रेक्टिस के ज़रिए वाक़ेअ रहने वाले। एक थे आसान सूरत- ए- हाल वाले, दूसरे थे कोशिश कर वाक़ेअ रहने वाले यानि कि एक थे आसान इबादत नशीन, दूसरे थे तजवीज़ से इबादत नशीन। दोनों की चमक में फर्क रहा। उनकी नैचुरल ब्युटी थी और दूसरों की तजवीज़ के ज़रिए ब्युटी थी। जैसे आजकल भी मेकअप कर ब्युटीफुल बनते हैं ना। नैचुरल (कुदरती) ब्युटी की चमक हमेशा एकरस रहती है और दूसरी ब्युटी कभी निहायत अच्छी और कभी परसेन्टेज में रहती है; एक जैसी, एक रस नहीं रहती। तो हमेशा आसान इबादत नशीन, अपने आप इबादत नशीन सूरत- ए- हाल नम्बरवन दीदार-ए-नफ़्स बनाती है। जब तमाम बच्चों का वायदा है - मोमिन ज़िन्दगी यानि कि एक रब ही जहान है और एक रब दूसरा न कोई; जब जहान ही रब है, दूसरा कोई है ही नहीं तो अपने आप और आसान इबादत नशीन सूरत- ए- हाल हमेशा रहेगी ना, और मेहनत करनी पड़ेगी? अगर दूसरा कोई है। तो मेहनत करनी पड़ती है - यहाँ अक्ल न जाए, वहाँ जाए। मगर एक रब ही सब कुछ है - फिर अक्ल कहाँ जायेगी? जब जा ही नहीं सकती तो प्रेक्टिस क्या करेंगे? प्रेक्टिस में भी फर्क होता है। एक है अपने आप प्रेक्टिस, है ही है और दूसरा होता है मेहनत वाली प्रेक्टिस। तो सल्तनत ए नफ्स के हक़दार बच्चों का आसान प्रेक्टिस नशीन बनना - यही निशानी है आसान इबादत नशीन, अपने आप इबादत नशीन की। उन्हों के चेहरे की चमक रूहानी होती है जो चेहरा देखते ही बाक़ी रूहें एहसास करती कि यह अफ़जल दस्तयाबी याफ़्ता आसान इबादत नशीन हैं। जैसे मैकरू दौलत और मैकरू मर्तबे की दस्तयाबी की चमक चेहरे से मालूम होती है कि यह दौलत मन्द खानदान का और आला मर्तबें का हक़दार है, ऐसे यह अफ़जल दस्तयाबी, अफ़ज़ल सल्तनत के हक़दार यानि कि अफ़जल मर्तबें की दस्तयाबी का नशा और चमक चेहरे से दिखाई देती है। दूर से ही एहसास करते कि इन्होंने कुछ पाया है। दस्तयाबी याफ़्ता रूहें हैं। ऐसे ही तमाम सल्तनत के हक़दार बच्चों के चमकते हुए चेहरे दिखाई दें। मेहनत के निशान नहीं दिखाई दें, दस्तयाबी की निशानी दिखाई दें। अभी भी देखो, कोई-कोई बच्चों के चेहरे को देख यही कहते हैं - इन्होंने कुछ पाया है और कोई-कोई बच्चों के चेहरे को देख यह भी कहते कि ऊंची मंजिल है मगर कुर्बानी भी निहायत आला की है। कुर्बानी दिखाई देती है, क़िस्मत नहीं दिखाई देगी चेहरे से। या यह कहेंगे कि मेहनत निहायत अच्छी कर रहे हैं।

रब उल हक़ यही देखने चाहते हैं कि हर एक बच्चे के चेहरे से आसान इबादत नशीनी की चमक दिखाई दे, अफ़ज़ल दस्तयाबी के नशे की चमक दिखाई दे क्योंकि दस्तयाबियों के भण्डार रब के बच्चे हो। मिलन के दौर की दस्तयाबियों के बरक़ाती वक्त के हक़दार हो। मुसलसल राब्ता कैसे हो और मुसलसल एहसास कर लबरेज़ नशीनी का एहसास कैसे करें - अब तक भी इसी मेहनत में ही वक्त नहीं गँवाओ मगर दस्तयाबी याफ़्ता की क़िस्मत को आसान एहसास करो। खात्में का वक्त नज़दीक आ रहा है। अब तक किसी न किसी बात की मेहनत में लगे रहेंगे तो दस्तयाबी का वक्त तो खत्म हो जायेगा। फिर दस्तयाबी याफ़्ता का एहसास कब करेंगे? मिलन के दौर को, मोमिन रूहों की बरक़ात है तमाम दस्तयाबी बनो''। हमेशा तजवीज़ नशीन बनो' की बरक़ात नहीं है, दस्तयाबी बनो' की बरक़ात है। दस्तयाबी बनो' की बरक़ाती रूह कभी भी अलबेले पन में आ नहीं सकती इसलिए उनको मेहनत नहीं करनी पड़ती। तो समझा, क्या बनना है?

मजलिस- ए- सल्तनत में सल्तनत की हक़दार बनने की ख़ासियत क्या है, यह क्लीयर हुआ ना? सल्तनत के हक़दार हो ना, या अभी सोच रहे हो कि हैं या नहीं हैं? जब खालिक के बच्चे, रहमतुल्आल्मीन के बच्चे बन गये; बादशाह यानि कि खालिक, देने वाला। ग़ैर दस्तयाबी कुछ नहीं तो लेंगे क्या? तो समझा, नये-नये बच्चों को इस एहसास में रहना है। जंग में ही वक्त नहीं गँवाना है। अगर जंग में ही वक्त गँवाया तो आखिर वक़्त भी जंग में रहेंगे। फिर क्या बनना पड़ेगा? खानदान ए महताबी में जायेंगे या खानदान ए आफ़ताबी में? जंग वाला तो खानदान ए महताबी में जायेगा। चल रहे हैं, कर रहे हैं, हो ही जायेंगे, पहुँच जायेंगे - अभी तक ऐसा मकसद नहीं रखो। अब नहीं तो कब नहीं। बनना है तो अब, पाना है तो अब - ऐसे जोश-हुल्लास वाले ही वक्त पर अपनी मुकम्मल मंजिल को पा सकेंगे। अदना जन्नत में नूह अलैहिस्सलाम और आबर अलैहिस्सलाम बनने के लिए तो कोई भी तैयार नहीं है। जब आला जन्नत खानदान ए आफ़ताबी में आना है, तो खानदान ए आफ़ताबी यानि कि हमेशा मास्टर खालिक और रहमतुल्आल्मीन, लेने की खुवाहिश वाला नहीं। मदद मिल जाए, यह हो जाए तो निहायत अच्छा, तजवीज़ में अच्छी नम्बर ले लेंगे - नहीं। मदद मिल रही है, तमाम हो रहा है - इसको कहते हैं सल्तनत- ए- नफ्स के हक़दार बच्चे। आगे बढ़ना है या पीछे आये है तो पीछे ही रहना है? आगे जाने का आसान रास्ता है - आसान इबादत नशीन, अपने आप इबादत नशीन बनो। निहायत आसान है। जब है ही एक रब, दूसरा कोई नहीं तो जायेंगे कहाँ? दस्तयाबी ही दस्तयाबी है फिर मेहनत क्यों लगेगी? तो दस्तयाबी के वक़्त का फ़ायदा उठाओ। तमाम दस्तयाबी याफ़्ता बनो। समझा? रब उल हक़ तो यही चाहते हैं कि एक-एक बच्चा - चाहे लास्ट आने वाला, चाहे क़याम के आग़ाज़ में आने वाला, हर एक बच्चा नम्बरवन बने। बादशाह बनना, न कि अवाम। अच्छा।

महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश का ग्रुप आया है। देखो, महा यानि कि अज़ीम अल्फ़ाज़ कितना अच्छा है। महाराष्ट्र मुकाम भी महा अल्फ़ाज़ का है और बनना भी अज़ीम है। अज़ीम तो बन गये ना क्योंकि रब के बने माना अज़ीम बने। अज़ीम रुहें हो। मोमिन यानि कि अज़ीम । दरेक आमाल अज़ीम, दरेक बोल अज़ीम, दरेक इरादा अज़ीम है। रुहानी हो गये ना। तो महाराष्ट्र वाले अज़ीम ही याददाश्त याफ़्ता बनो कि अज़ीम हैं। मोमिन यानि कि अज़ीम चोटी हैं ना।

मध्य प्रदेश - हमेशा मध्याजी भव यानि कि जन्नत नशीन बनो' के नशे में रहने वाले। मन्मनाभव यानि कि दिल से मुझे याद करो' के साथ मध्याजी भव यानि कि जन्नत नशीन बनो' की भी बरक़ात है। तो अपनी जन्नत याफ़्ता -इसको कहते हैं मध्याजी भव' तो अपनी अफ़जल दस्तयाबी के नशे में रहने वाले यानि कि मध्याजी भव' के मंत्र के खुद के रूप में वाक़ेअ रहने वाले। वह भी अज़ीम हो गये। मध्याजी भव' हैं तो मन्मनाभव' भी ज़रूर होंगे। तो मध्य प्रदेश यानि कि महामन्त्र का स्वरूप बनने वाले। तो दोनों ही अपनी-अपनी खासियत से अज़ीम हैं। समझा, कौन हो?

जब से पहला सबक़ शुरू किया, वह भी यही किया कि मैं कौन? रब भी वही बात याद दिलाते हैं। इसी पर ग़ौरतलब करना। अल्फ़ाज़ एक ही है कि मैं कौन' मगर इसके जवाब कितने हैं? लिस्ट निकालना - मैं कौन?' अच्छा।

चारों ओर के तमाम दस्तयाबीरूप, अफ़ज़ल रूहों को, तमाम रूहानी मजलिस- ए- सल्तनत की हक़दार अज़ीम रूहों को, हमेशा रूहानियत की चमक इख्तियार करने वाली ख़ास रूहों को, हमेशा अपने आप इबादत नशीन,आसान इबादत नशीन, आला ते आला रूहों को आला ते आला रब उल हक़ के प्यार से लबरेज़ यादप्यार क़बूल हो।

ग़ैबी रब उल हक़ से डबल विलायती भाई-बहनों की मुलाकात:-
डबल विलायती यानि कि हमेशा अपने खुद खुद के रूप, खुद के वतन, सल्तनत ए नफ्स की याददाश्त में रहने वाले। डबल विदेशियों को ख़ास कौन-सी खिदमत करनी है? अभी साइलेन्स की कुव्वत का एहसास ख़ास रूप से रूहों को कराना। यह भी ख़ास खिदमत है। जैसे साइंस की पाॅवर नामीग्रामी है ना। बच्चे-बच्चे को मालूम है कि साइंस क्या है। ऐसे साइलेन्स पाॅवर, साइंस से भी आलातरीन है। वह दिन भी आना है। साइलेन्स की पाॅवर का ज़हूर यानि कि रब का ज़हूर। जैसे साइंस ज़ाहिर सबूत दिखा रही है - वैसे साइलेन्स पाॅवर का प्रैक्टिकल प्रूफ है - आप सबकी ज़िन्दगी। जब इतने सब प्रैक्टिकल प्रूफ दिखाई देंगे, तो ना चाहते हुए तमाम की नज़र में आसानी से आ जायेंगे। जैसे यह (पिछले साल) पीस का काम किया ना, इसको स्टेज पर प्रैक्टिकल में दिखाया। ऐसे ही चलते-फिरते पीस के मॉडल दिखाई दें तो साइंस वालों की भी नज़र साइलेन्स वालों के ऊपर ज़रूर जायेगी। समझा? साइंस की इन्वेन्शन विलायत में ज़्यादा होती हैं। तो साइलेन्स की पाॅवर का आवाज़ भी वहाँ से आसानी से फैलेगा। खिदमत का मकसद तो है ही, तमाम को जोश-हुल्लास भी है। खिदमत के बिना रह नहीं सकते। जैसे खाने के बिना रह नहीं सकते, ऐसे खिदमत के बिना भी रह नहीं सकते इसलिए रब उल हक़ ख़ुश है। अच्छा!

पार्टियों से ग़ैबी रब उल हक़ की मुलाकात
दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन अफ़ज़ल रूहें बन गये, ऐसे एहसास करते हो? खुद का दीदार हो गया ना? अपने आपको जानना यानि कि खुद का दीदार होना और चक्कर का इल्म जानना यानि कि दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन बनना। जब दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन बनते हैं तो और तमाम चक्कर ख़त्म हो जाते हैं। जिस्मानी हवास का चक्कर, रिश्ते का चक्कर, मुसीबतों का चक्कर - इबलीस के कितने चक्कर हैं! मगर दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन बनने से यह तमाम चक्कर ख़त्म हो जाते हैं, तमाम चक्करों से निकल जाते हैं। नहीं तो जाल में फंस जाते हैं। तो पहले फंसे हुए थे, अब निकल गये। 63 विलादत तो कई चक्करों में फंसते रहे और इस वक़्त इन चक्करों से निकल आये, तो फिर फंसना नहीं है। एहसास करके देख लिया ना? कई चक्करों में फंसने से सब कुछ गंवा दिया और दीदार- ए- नफ़्स चक्कर नशीन बनने से रब मिला तो सब कुछ मिला। तो हमेशा दीदार- ए- नफ़्स चक्कर नशीन बन, इबलीस फ़तहयाब बन आगे बढ़ते चलो, इससे हमेशा हल्के रहेंगे, किसी भी तरह का बोझ एहसास नहीं होगा। बोझ ही नीचे ले आता है और हल्का होने से ऊंचे उड़ते रहेंगे। तो उड़ने वाले हो ना? कमज़ोर तो नहीं? अगर एक भी पंख कमज़ोर होगा तो नीचे ले आयेगा, उड़ने नहीं देगा इसलिए, दोनों ही पंख मज़बूत हों तो अपने आप उड़ते रहेंगे। दीदार- ए- नफ़्स चक्कर नशीन बनना यानि कि उड़ते फ़न में जाना। अच्छा।

सल्तनत- ए- इबादत नशीन, अफ़ज़ल इबादत नशीन रूहें हो ना? सादी ज़िन्दगी से आसान इबादत नशीन, सल्तनत- ए- इबादत नशीन बन गये। ऐसी अफ़ज़ल इबादत नशीन रूहें हमेशा ही हवास- ए- बालातर ख़ुशी के झूले में झूलती हैं। हठयोगी योग के ज़रिए जिस्म को ऊंचा उठाते हैं और उड़ने की प्रेक्टिस करते हैं। असल में आप सल्तनत- ए- इबादत नशीन आला सूरत- ए- हाल का एहसास करते हो। इसको ही काॅपी करके वो जिस्म को ऊंचा उठाते हैं। मगर आप कहाँ भी रहते आला सूरत ए हाल में रहते हो, इसलिए कहते हैं - योगी ऊंचा रहते हैं। तो ज़हन की सूरत- ए- हाल का मुकाम आला है क्योंकि डबल लाइट बन गये हो। वैसे भी फरिश्तों के लिए कहा जाता कि फरिश्तों के पैर ज़मीन पर नहीं होते। फरिश्ता यानि कि जिसका अक्ल रूपी पैर ज़मीन पर न हो, जिस्मानी हवास में न हो। जिस्मानी हवास से हमेशा ऊंचे - ऐसे फरिश्ते यानि कि सल्तनत- ए- इबादत नशीन बन गये। अभी इस पुरानी दुनिया से कोई लगाव नहीं। खिदमत करना अलग चीज़ है मगर लगाव न हो। इबादत नशीन बनना यानि कि रब और मैं, तीसरा न कोई। तो हमेशा इसी याददाश्त में रहो कि हम सल्तनत- ए- इबादत नशीन, हमेशा फरिश्ता हैं। इस याददाश्त से हमेशा आगे बढ़ते रहेंगे। सल्तनत- ए- इबादत नशीन हमेशा बेहद के मालिक हैं, हद के मालिक नहीं। हद से निकल गये। बेहद का हक़ मिल गया - इसी ख़ुशी में रहो। जैसे बेहद का रब है, वैसे बेहद की ख़ुशी में रहो, नशे में रहो। अच्छा।

विदाई के वक्त
तमाम वक्त ए श़फा के बरक़ाती बच्चों को रहमत नशीन बाप की सुनहरी यादप्यार क़बूल हो। साथ-साथ सुनहरी दुनिया बनाने की खिदमत के हमेशा प्लान ग़ौरतलब करने वाले और हमेशा खिदमत में दिल और जान, सिक और मोहब्बत से, जिस्म-ज़हन-दौलत से मददगार रूहें, तमाम को रब उल हक़ की गुडमार्निंग, डायमण्ड मार्निंग कर रहे हैं और हमेशा डायमण्ड बन इस डायमण्ड दौर की खासियत को बरक़ात और वर्से में लेकर खुद भी सुनहरी सूरत- ए- हाल में वाकेअ रहेंगे और औरों को भी ऐसे ही एहसास कराते रहेंगे। तो चारों ओर के डबल हीरो बच्चों को डायमण्ड मार्निंग। अच्छा।

बरक़ात:-
रहमदिल के जज़्बें के ज़रिए दुश्मन पर भी रहमत नाज़िल करने वाले नेक जज़्बाती बनो।

कैसी भी कोई रूह, चाहे सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़, चाहे बुरी खस्लतों से आरास्ता राब्ते में आये मगर तमाम के वास्ते नेक जज़्बात यानि कि दुश्मन पर भी रहमत करने वाले। कभी किसी रूह के वास्ते नफ़रत की नज़र न हो क्योंकि जानते हो यह बे इल्मी के बस है, बेसमझ है। उनके ऊपर रहम और प्यार आये,नफ़रत नहीं। नेक जज़्बाती रूह ऐसा नहीं सोचेगी कि इसने ऐसा क्यों किया मगर इस रूह का फ़लाह कैसे हो - यही है नेक जज़्बाती स्टेज।

स्लोगन:-
इबादत की कुव्वत से नामुमकिन को मुमकिन कर कामयाबी नशीन बनो।

आमीन