10-09-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे - तुम रूहानी रब से नई-नई रूहानी बातें सुन रहे हो, तुम जानते हो जैसे हम रूहें अपना रूप बदलकर आये हैं, वैसे रब भी आये हैं

सवाल:-
छोटे-छोटे बच्चे रब की समझानी पर अच्छी तरह तवज्जों दें, तो कौन सा टाइटल ले सकते हैं?

जवाब:-
स्प्रीचुअल लीडर का। छोटे बच्चे अगर कोई हिम्मत का काम करके दिखायें, रब से जो सुनते हैं उस पर तवज्जों दें और दूसरों को समझायें तो उन्हें तमाम निहायत प्यार करेंगे। रब का नाम भी बाला हो जायेगा।

नग़मा:-
छोड़ भी दे आकाश सिंहासन....

आमीन।
बच्चों ने बुलाया, रब ने रेसपान्ड किया - प्रैक्टिकल में बच्चे क्या कहते हैं कि रब्बा आप फिर से शैतानी सल्तनत में आ जाओ। अल्फ़ाज़ भी है ना - फिर से इबलीस का परछाया पड़ा है। इबलीस कहा जाता है शैतान को। तो पुकारते हैं - शैतानी सल्तनत आ गयी है इसलिए अब फिर से आ जाओ। शैतान की सल्तनत में यहाँ निहायत दु:ख है। हम निहायत दु:खी, ख़बीस रूह बन पड़े हैं। अभी रब प्रैक्टिकल में है। बच्चे जानते हैं फिर से वही क़यामत जंग भी खड़ी है। रब इल्म और हक़ीक़ी इबादत सिखला रहे हैं। बुलाते भी है ए ग़ैर मुजस्सम पाक परवरदिगार, ग़ैर मुजस्सम से आकर जिस्मानी रूप लो, रूप बदलो। रब समझाते हैं तुम भी वहाँ के रहने वाले हो - ब्रह्म अनासर और ग़ैर मुजस्सम दुनिया में। तुमने भी रूप बदला है। यह कोई नहीं जानते हैं। जो रूह ग़ैर मुजस्सम है, वही आकर जिस्मानी जिस्म इख्तियार करती है। वह है ग़ैर मुजस्सम वर्ल्ड। यह है जिस्मानी दुनिया और वह है सटल वर्ल्ड (रूहानी दुनिया)। वह अलग है। तुम्हारी अक्ल में है हम दारूल सुकून और दारूल निजात से आते हैं। रब को जब पहले-पहले नई मख़लूक़ तामीर करनी होती है तो मल्क़ूतीवतन को ही तामीर करते हैं। मल्क़ूतीवतन में अभी तुम जा सकते हो फिर कभी जाने का नहीं होता। पहले-पहले तुम वाया मल्क़ूतीवतन से नहीं आते हो। सीधे आते हो। अभी तुम मल्क़ूतीवतन में आ-जा सकते हो। पैदल वगैरह जाने की बात नहीं है। यह दीदार ए जलवा होता है, तुम बच्चों को। आलम ए अरवाह का भी दीदार ए जलवा हो सकता है, मगर जा नहीं सकते। फ़िरदौस का भी दीदार ए जलवा हो सकता है, जा नहीं सकते हैं। जब तक मुकम्मल पाकीज़ा नहीं बने हैं। तुम ऐसे नहीं कह सकते कि हम मल्क़ूतीीवतन में जा सकते हैं। तुम दीदार ए जलवा कर सकते हो। शिवबाबा और दादा और तुम बच्चे हो। तुम बच्चे कैसे नई-नई रूहानी बातें सुनते हो। यह बातें दुनिया में कोई नहीं जानते। भल कहते हैं इनकारपोरियल वर्ल्ड मगर यह मालूम नहीं है कि वह कैसी होती है। पहले तो रूह को ही नहीं जानते तो ग़ैर मुजस्सम दुनिया को फिर क्या जानेंगे! रब पहले-पहले आकर रूह की रियलाइजेशन कराते हैं। तुम रूह हो फिर रूप बदला है यानि कि ग़ैर मुजस्सम से मुजस्सम में आये हो।

अभी तुम समझते हो हमारी रूह 84 विलादत कैसे भोगती है। वह तमाम पार्ट रूह में रिकार्ड मुआफिक भरा हुआ है। पहले यह बातें सुनाते थे। रब फ़रमाते हैं - अभी तुमको गहरी खुशगवार बातें सुनाता हूँ। जो तुम आगे नहीं जानते थे, वह अभी जानते हो। नई-नई प्वाइंट्स अक्ल में आती-जाती हैं इसलिए दूसरों को भी झट समझा सकते हो। रोज़ ब रोज़ यह मोमिनों का दरख्त बढ़ता जाता है। यही फिर हूरैन दरख्त बनना है, मोमिन ही इज़ाफ़े को पायेंगे। देखने में कैसे छोटे आते हैं। जैसे वर्ल्ड के नक्शे में इण्डिया देखते हैं तो कितनी छोटी दिखाई पड़ती है। असल में इण्डिया है कितनी बड़ी। वैसे ही इल्म के लिए कहा जाता है - दिल से मुझे याद करो यानि कि अल्फ को याद करो। बीज कितना छोटा होता है। दरख़्त कितना बड़ा निकलता है। तो यह मोमिन खानदान भी छोटा है, इज़ाफें को पाता जाता है।तुम्हारी अक्ल में है कि हम इस वक़्त मोमिन हैं फिर हूरैन बनेंगे। 84 विलादतों की सीढ़ी तो निहायत अच्छी है। बच्चे समझा सकते हैं जो 84 विलादत लेते हैं वही आकर समझते हैं फिर कोई 84, कोई 80 भी लेते होंगे। यह तो समझते हैं हम इस हूरैन खानदान के हैं। हम खानदान ए आफ़ताबी घराने के बनेंगे। अगर नापास होंगे तो फिर देरी से आयेंगे। तमाम इकट्ठे तो नहीं आयेंगे। भल निहायत इल्म लेते रहते हैं मगर इकट्ठे तो नहीं आयेंगे ना। जायेंगे इकट्ठे, आयेंगे थोड़े-थोड़े यह तो समझ की बात है ना। तमाम कैसे इकट्ठे 84 विलादत लेंगे। रब को बुलाते ही हैं, रब्बा फिर से आकर गीता का इल्म सुनाओ। तो साबित होता है, जब महाभारत लड़ाई यानि कि क़यामत जंग होती है, उस वक़्त ही आकर गीता का इल्म सुनाते हैं। उनको ही सल्तनत ए इबादत कहा जाता है। अभी तुम सल्तनत ए इबादत सीख रहे हो। चक्कर-चक्कर, 5 हज़ार साल बाद रब्बा हमको आकर इल्म देते हैं। हक़ीक़ी अफ़ज़ल हज़रात की रिवायत सुनते हैं ना। यह कहाँ से आये, फिर कहाँ गये! जानते नहीं हैं। रब समझाते हैं बच्चे यह शैतान का परछाया जो पड़ा है, अब ड्रामा के मुताबिक शैतानी सल्तनत ख़त्म होनी है। सुनहरे दौर में है इलाही सल्तनत और इस वक़्त है शैतानी सल्तनत। अभी तुम समझते हो हमारे में जो इल्म आया है वह इस दुनिया में किसको है नहीं। हमारी यह नई तालीम है, नई दुनिया के लिए। गीता में कृष्ण का नाम लिखा है, वह तो पुरानी बात हुई ना। तुम अभी नई बातें सुन रहे हो। कहेंगे यह तो कभी नहीं सुना, शिव भगवानुवाच हम तो कृष्ण भगवानुवाच सुनते आये थे। तुम नई दुनिया के लिए एवरीथिंग न्यु सुनते हो। यह तमाम जानते हैं कि हिन्दुस्तान कदीम है। मगर कब था, इन आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत कैसे चली, इन्होंने कैसे सल्तनत पायी फिर कहाँ चला गया, यह किसकी भी अक्ल में नहीं आता। क्या हुआ जो इन्हों की सल्तनत ख़त्म हो गयी। किसने जीत पाई, कुछ भी समझते नहीं वो लोग तो सुनहरे दौर को लाखों साल दे देते हैं, यह हो नहीं सकता कि आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम ने लाखों साल सल्तनत की होगी। फिर तो खानदान ए आफ़ताबी बादशाहें बेहिसाब हों। किसका भी तो नाम है नहीं। 1250 साल का किसको मालूम नहीं है फिर आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत कहाँ तक चला, यह भी किसको मालूम नहीं तो फिर लाखों साल का मालूम किसको कैसे पड़ सकता। किसकी भी अक्ल काम नहीं करती। अभी तुम छोटे-छोटे झट समझा सकते हो। यह है निहायत आसान। हिन्दुस्तान की कहानी है, तमाम स्टोरी है। आला जन्नत-अदना जन्नत में भी हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन बादशाह थे। अलग-अलग तस्वीर भी हैं। यहाँ तो हजारों साल कह देते हैं, रब फ़रमाते हैं - यह है ही 5 हज़ार साल की कहानी। आज से 5 हज़ार साल पहले आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत था, डिनॉयस्टी थी फिर दोबारा विलादत लेनी पड़े। छोटी-छोटी बच्चियां इतना थोड़ा भी बैठ समझायें तो समझेंगे यह तो निहायत अच्छी नॉलेज पढ़ी हुई हैं। यह स्प्रीचुअल नॉलेज सिवाए स्प्रीचुअल फादर और कोई के पास है नहीं। तुम कहेंगे हमको भी स्प्रीचुअल फादर ने आकर बताया है।रूह जिस्म के ज़रिए सुनती है। रूह ही कहेगी कि हम फलाना बनते हैं। सेल्फ को इन्सान रियलाइज़ नहीं करते हैं। हमको रब ने रियलाइज़ कराया है। हम रूह 84 विलादत पूरे लेते हैं। ऐसी-ऐसी बातें बैठ समझायें तो कहेंगे इनको तो निहायत अच्छी नॉलेज है। गॉड नॉलेजफुल है ना। गाते भी हैं गॉड इज़ नॉलेजफुल, ब्लिसफुल, लिबरेटर, गाइड मगर कहाँ ले जाने वाला है, यह कोई नहीं जानते हैं। यह बच्चे समझा सकते हैं। स्प्रीचुअल फादर नॉलेजफुल है, इसको ब्लिसफुल कहा जाता है। लिबरेट तब आकर करते हैं जब इन्सान निहायत दु:खी होते हैं। एक शैतान की सल्तनत होती है। हेविनली गॉड फादर कहा जाता है। हेल को शैतानी सल्तनत कहा जाता है। यह नॉलेज किसको बैठ सुनाओ, झट कहेंगे यह सबको चलकर सुनाओ। मगर इख्तियारात निहायत अच्छी चाहिए। नुमाइश की तस्वीर की मैगजीन भी है और भी समझेंगे तो इस पर निहायत खिदमत कर सकते हैं।

यह बच्ची भी (जयन्ती बहन) लन्दन में वहाँ अपनी टीचर को समझा सकती है। वहाँ लन्दन में यह खिदमत कर सकते हैं। दुनिया में ठगी निहायत है ना। शैतान ने एकदम सबको ठग बना दिया है। बच्चे सारे वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझा सकते हैं। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत कितना वक़्त चला फिर फलाने संवत से इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन आते हैं। इज़ाफ़ा होते-होते वैराइटी मज़हबों का दरख्त कितना बड़ा हो जाता है। आधा चक्कर बाद और मज़हब आते हैं। ऐसी-ऐसी बातें यह बैठ सुनाये तो सुनने वाले इनको कहेंगे यह तो स्प्रीचुअल लीडर है, इनमें स्प्रीचुअल नॉलेज है। यह फिर कहेंगी - यह नॉलेज तो इंडिया में मिल रही है। स्प्रीचुअल गॉड फादर दे रहे हैं। वह है बीजरूप। यह उल्टा दरख्त है। बीज है नॉलेजफुल। बीज को दरख़्त की नॉलेज होगी ना। यह वैराइटी रिलीजन का दरख्त है। हिन्दुस्तान का डीटी रिलीजन इनको कहा जाता है। पहले आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत, फिर होता है नूह अलैहिस्सलाम और आबर अलैहिस्सलाम की सल्तनत। आधा चक्कर यह चलता है फिर बाद में आते हैं इस्लामीदरख्त इज़ाफ़े को पाता रहता है। ऐसे जाकर यह बच्ची तकरीर करे और समझाये कि यह दरख्त कैसे इमर्ज होता है। यह खिल्क़त का चक्कर कैसे फिरता है, हम समझा सकते हैं। विलायत में तो और कोई है नहीं। यह बच्ची जाकर समझाये कि अभी आइरन एज का आखिर है, गोल्डन एज आने वाला है तो वे लोग निहायत ख़ुश होंगे। रब्बा तरीक़ा बतलाते रहते हैं, इस पर तवज्जों देना चाहिए। छोटे बच्चों को इज़्ज़त निहायत मिले। छोटा कोई हिम्मत का काम करते हैं तो उनको निहायत प्यार करते हैं। बाप को यह होता है कि ऐसे-ऐसे बच्चे इसमें अटेन्शन दें तो स्प्रीचुअल लीडर बन जायें। स्प्रीचुअल गॉड फादर ही बैठ नॉलेज देते हैं। आदम अलैहिस्सलाम को गॉड फादर कहना भूल है। गॉड तो है निराकार। हम तमाम रूहें ब्रदर्स हैं, वह रब है। तमाम आइरन एज में जब दु:खी होते हैं तब रब आते हैं। जब फिर आइरन एज होता है तो रब को गोल्डन एज क़ायम करने आना होता है। हिन्दुस्तान कदीम दारूल मसर्रत थी, हेविन थी। निहायत थोड़े इन्सान थे। बाक़ी इतनी तमाम रूहें कहाँ थी। दारूल सुकून में थी ना। तो ऐसे समझाना चाहिए। इसमें डरने की बात नहीं, यह तो रिवायत है। रिवायत ख़ुशी से बताई जाती है। वर्ल्ड की हिस्ट्री - जॉग्राफी कैसे रिपीट होती है, उनको कहानी भी कह सकते हैं। नॉलेज भी कह सकते हैं। तुमको तो यह पक्की याद होनी चाहिए। रब फ़रमाते हैं - मेरी रूह में तमाम दरख्त का इल्म है जो मैं रिपीट करता हूँ। नॉलेजफुल रब बच्चों को नॉलेज दे रहे हैं। यह जाकर नॉलेज देंगी तो कहेंगे आप औरों को भी बुलाओ। बोलो हाँ बुला सकते हैं क्योंकि वो लोग जानना चाहते हैं कि हिन्दुस्तान का कदीम सल्तनत ए इबादत क्या थी! जिससे हिन्दुस्तान हेविन बना - वह कोई समझाये। अब राहिब क्या सुनायेंगे? स्प्रीचुअल इल्म सिर्फ़ गीता में है। तो वह जाकर गीता ही सुनाते हैं। गीता कितनी पढ़ते हैं, कण्ठ करते रहते हैं। क्या यह स्प्रीचुअल नॉलेज है? यह तो बनाई है इन्सान के नाम पर। स्प्रीचुअल नॉलेज तो इन्सान दे न सकें। तुम अभी फ़र्क समझते हो - उस गीता में और जो रब्बा सुनाते हैं उसमें रात-दिन का फ़र्क है। दिया फादर ने और नाम डाल दिया है कृष्ण का। सुनहरे दौर में कृष्ण को यह नॉलेज है नही। नॉलेजफुल है ही फादर। कितनी अटपटी बातें हैं। कृष्ण की रूह जब सुनहरे दौर में थी तब तो नॉलेज है नहीं। कितना सूत मूँझा हुआ है। यह तमाम विलायत में जाकर नाम निकाल सकते हैं। तकरीर कर सकते हैं। बोलो, वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी की नॉलेज हम आपको दे सकते हैं। गॉड हेविन क़ायम कैसे करते हैं, वह हेविन से फिर हेल कैसे बनता है, सो हम आपको समझाते हैं। यह बैठ लिखें फिर देखें हम कोई प्वाइंट भूले तो नहीं हैं। फिर याद करके लिखें। ऐसे प्रैक्टिस करने से निहायत अच्छा लिखेंगे, निहायत अच्छा समझायेंगे तो नाम बाला हो जायेगा। यहाँ से भी बाबा कोई को बाहर भेज सकते हैं। यह जाकर समझायें तो भी निहायत अच्छा है। 7 दिन में भी निहायत होशियार हो सकते हैं। अक्ल में इख्तियारात करना है, बीज और दरख़्त, डीटेल समझानी है। तस्वीरों पर निहायत अच्छी तरह समझा सकते हैं। खिदमत का शौक होना चाहिए। निहायत आला मर्तबा हो जायेगा। नॉलेज बड़ी आसान है। यह है पुरानी छी-छी दुनिया। जन्नत के आगे यह पुरानी दुनिया जैसे गोबर मिसल है, इनसे बांस आती है। वह है सोने की दुनिया, यह है गोबर की दुनिया। तुम बच्चे जानते हो अभी हम यह जिस्म छोड़ जाकर प्रिन्स-प्रिन्सेज बनेंगे। ऐसे स्कूल में पढ़ने जायेंगे। वहाँ ऐसे एरोप्लेन होंगे, फुल प्रूफ होंगे। यह खुशी बच्चों को अन्दर रहे तो कभी भी कोई बात में रोना नहीं आये। तुम समझते हो ना कि हम प्रिन्स-प्रिन्सेज बनेंगे। तो तुमको क्यों नहीं अन्दर में ख़ुशी होनी चाहिए। मुस्तकबिल में ऐसे स्कूल में जायेंगे, यह-यह करेंगे। बच्चों को मालूम नहीं क्यों भूल जाता है। निहायत नशा चढ़ना चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) इस पुरानी छी-छी गोबर मिसल दुनिया को अक्ल से भूल सुनहरे दौर वाली दुनिया को याद कर बेशुमार ख़ुशी और नशे में रहना है। कभी भी रोना नहीं है।

2) रब जो गहरी खुशगवार बातें सुनाते हैं उन्हें इख्तियारात कर सबको समझाना है। स्प्रीचुअल लीडर का टाइटल लेना है।

बरक़ात:-
आमाल करते हुए आमाल की बन्दिशों से आज़ाद रहने वाले आसान आबिद अपने आप इबादत नशीन बनो।

जो अज़ीम बहादुर बच्चे हैं उन्हें जिस्मानी दुनिया की कोई भी कशिश अपनी तरफ़ कशिश नहीं कर सकती। वे खुद को एक सेकण्ड में न्यारा और रब का प्यारा बना सकते हैं। डायरेक्शन मिलते ही जिस्म से बालातर बे जिस्म, रूहानी हवासी, बन्धनों से आज़ाद, आबेदीन सूरत ए हाल का एहसास करने वाले ही आसान आबिद, अपने आप आबिद, हमेशा आबिद, आमाल करते आबिद और अफ़ज़ल आबिद हैं। वह जब चाहें, जितना वक़्त चाहें अपने इरादे, सांस को एक जान ए जिगर रब की याद में वाक़ेअ कर सकते हैं।

स्लोगन:-
एकरस सूरत ए हाल के अफ़ज़ल तख्त पर तख्त नशीन रहना - यही आबिद रूह की निशानी है।

आमीन