11-02-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
जान ए रहमत रब आया है तुम बच्चों को सदक़ा ए जान देने, सदक़ा ए जान मिलना यानि कि बुरी खस्लतों से आरास्ता से सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनना

सवाल:-
ड्रामा के हर राज़ को जानने के सबब कौन-सी सीन तुम्हारे लिए नई नहीं है?

जवाब:-
इस वक़्त जो तमाम दुनिया में हंगामें हैं, तबाही के वक़्त उल्टी अक्ल बन अपने ही खानदान का खून करने लिए कई अस्बाब बनाते जाते हैं। यह कोई नई बात नहीं क्योंकि तुम जानते हो यह दुनिया तो बदलनी ही है। कयामत जंग के बाद ही हमारी नई दुनिया आयेगी।

नग़मा:-
यह कौन आज आया.......

आमीन।
सवेरे-सवेरे यह कौन आकर नूरानी कलेमात सुनाते हैं? दुनिया तो बिल्कुल ही घोर अन्धियारे में है। तुम अभी नूरानी कलेमात सुन रहे हो। दरिया ए इल्म, नापाक से पाक बनाने वाले जान ए रहमत रब से। वह है जान बचाने वाला अल्लाह ताला। कहते हैं ना - ए खुदा इस दु:ख से बचाओ। वह हद की मदद मांगते हैं। अभी तुम बच्चों को मिलती है बेहद की मदद क्योंकि बेहद का रब है ना। तुम जानते हो - रूह भी बातिन है। बच्चों का जिस्म ज़ाहिर है। तो रब की सिरात ए मुस्तकीम है बच्चों के वास्ते। सर्व शास्त्रमई शिरोमणी गीता मशहूर है। सिर्फ़ उनमें नाम डाल दिया है श्रीकृष्ण का। अब तुम जानते हो सिरात ए मुस्तकीम अल्लाह ताला फरमाते है। यह भी समझ गये कि बद उनवानी को अफ़ज़ल नशीन बनाने वाला एक ही रब है। वही हज़रात से अफ़ज़ल हज़रात बनाते हैं। रिवायत भी है हक़ीक़ी अफ़ज़ल हज़रात की। गाया जाता है रिवायत ए हयात।आलम ए हयात का मालिक बनाने या हज़रात से अफ़ज़ल हज़रात बनाने की बात एक ही है। यह है आलम ए मौत। हिन्दुस्तान ही आलम ए हयाती था। यह किसको भी मालूम नहीं है। यहाँ ही हयाती रब्बा ने पार वतनियों को सुनाया है। एक पार्वती वा एक द्रोपदी नहीं थी। यह तो निहायत बच्चे सुन रहे हैं। रहमतुल्आल्मीन सुनाते हैं जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिए। रब फ़रमाते हैं मैं जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिए मीठे-मीठे बच्चों को समझाता हूँ।

रब ने समझाया है बच्चों को रूहानी हवासी ज़रूर बनना है। रब ही बना सकते हैं। दुनिया में एक भी इन्सान नहीं जिसको रूह का इल्म हो। रूह का ही इल्म नहीं है तो पाक परवरदिगार का इल्म कैसे हो सकता है। कह देते हैं हम रूह सो रब। कितनी भारी भूल में तमाम दुनिया फँसी हुई है। बिल्कुल ही पत्थर अक्ल हैं। विलायत वाले भी पत्थर अक्ल कम नहीं हैं, यह अक्ल में नहीं आता है कि हम यह जो बॉम्ब्स वगैरह बना रहे हैं, यह तो अपना भी खून, सारी दुनिया का भी खून करने के लिए बना रहे हैं। तो इस वक़्त अक्ल कोई काम की नहीं रही है। अपनी ही तबाही के लिए तमाम तैयारी कर रहे हैं। तुम बच्चों के लिए यह कोई नई बात नहीं है। जानते हो ड्रामा के मुताबिक उन्हों का भी पार्ट है। ड्रामा की बन्दिशों में बांधे हुए हैं। पत्थर अक्ल न हों तो ऐसे काम कर सकते हैं क्या? तमाम खानदान की तबाही कर रहे हैं। वन्डर है ना - क्या कर रहे हैं। बैठे-बैठे आज दुरुस्त चल रहा है, कल मिलेट्री बिगड़ी तो प्रेजीडेंट को भी मार देते। ऐसे-ऐसे इत़फाक होते रहते हैं। किसको भी बर्दाश्त नहीं करते हैं। पाॅवरफुल हैं ना। आजकल की दुनिया में हंगामा निहायत है, पत्थर अक्ल भी बेशुमार हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो तबाही के वक़्त जो रब से उल्टी अक्ल हैं, उनके लिए तबाही गायी हुई है। अभी इस दुनिया को बदलना है। यह भी जानते हो बरोबर क़यामत जंग लगी थी। रब ने हक़ीक़ी इबादत सिखायी थी। सहीफों में तो टोटल तबाही दिखा दिया है। मगर टोटल तबाही तो होती नहीं है फिर तो प्रलय हो जाए। इन्सान कोई भी न रहें, सिर्फ़ 5 अनासर रह जाएं। ऐसे तो हो नहीं सकता। प्रलय हो जाए तो फिर इन्सान कहाँ से आये। दिखाते हैं श्रीकृष्ण अंगूठा चूसता हुआ पीपल के पत्ते पर समन्दर में आया। बालक ऐसे आ कैसे सकता? सहीफों में ऐसी-ऐसी बातें लिख दी हैं जो बात मत पूछो। अभी तुम कुमारियों के ज़रिए इन दानिशमंदों, भीष्म पितामह वगैरह को भी तीर ए इल्म लगते हैं। वह भी आगे चलकर आयेंगे। जितना-जितना तुम खिदमत में ज़ोर भरेंगे, रब का तारूफ सबको देते रहेंगे उतना तुम्हारा असर बढ़ेगा। हाँ मुश्किलात भी पड़ेंगी। यह भी गाया हुआ है शैतानी फ़िरकें की इस इल्म यज्ञ में निहायत मुश्किलात पड़ती हैं। बिचारे पत्थर अक्ल इन्सान कुछ नहीं जानते कि यह क्या है? कहते हैं इन्हों का तो इल्म ही न्यारा है। यह भी तुम समझते हो नई दुनिया के लिए नई बातें हैं। रब फ़रमाते हैं यह हक़ीक़ी इबादत तुमको और कोई सिखला नहीं सकेंगे। इल्म और इबादत रब ही सिखला रहे हैं। ख़ैर निजात दिलाने वाला एक ही रब है, वही नापाक से पाक बनाने वाला है तो ज़रूर नापाकों को ही इल्म देंगे ना। तुम बच्चे समझते हो - हम पारस अक्ल बन मालिक ए पारस बनते हैं। इन्सानों ने मन्दिर कितने बेइंतहा बनाये हैं। मगर वह कौन हैं, क्या करके गये हैं, मतलब कुछ भी नहीं समझते। पारसनाथ का भी मन्दिर है, मगर किसको भी मालूम नहीं है। हिन्दुस्तान पारसपुरी था, सोने हीरे-जवाहरातों के महल थे। कल की बात है। वह तो लाखों साल कह देते हैं सिर्फ़ एक सुनहरे दौर को। और रब फ़रमाते हैं तमाम ड्रामा ही 5 हज़ार साल का है इसलिए कहा जाता है - आज का हिन्दुस्तान क्या है! कल का हिन्दुस्तान क्या था! लाखों साल की तो किसको याददाश्त रह न सके। तुम बच्चों को अब याददाश्त मिली है। जानते हो रब्बा हर 5 हज़ार साल बाद आकर हमको याददाश्त दिलाते हैं। तुम बच्चे जन्नत के मालिक थे। 5 हज़ार साल की बात है। कोई से भी पूछा जाए, इन आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत कब थी? कितने साल हुए? तो लाखों साल कह देंगे। तुम समझा सकते हो यह तो 5 हज़ार साल की बात है। कहते भी हैं क्राइस्ट से इतना वक़्त पहले पैराडाइज़ था। रब आते ही हैं हिन्दुस्तान में। यह भी बच्चों को समझाया है - रब्बा की सालगिरह मनाते हैं तो ज़रूर कुछ करने आया होगा। नापाक से पाक बनाने वाला है तो ज़रूर आकर पाकीज़ा बनाता होगा। दरिया ए इल्म है तो ज़रूर इल्म देंगे ना। इबादत में बैठो, अपने को रूह समझ रब को याद करो, यह इल्म हुआ ना। वह तो हैं हठयोगी। टांग-टांग पर चढ़ाकर बैठते हैं। क्या-क्या करते हैं। तुम मातायें तो ऐसे कर न सको। बैठ भी न सको। रब फ़रमाते हैं मीठे बच्चे, यह कुछ करने की तुमको दरकार नहीं है। स्कूल में स्टूडेन्ट कायदे सिर तो बैठते हैं ना। रब तो वह भी नहीं कहते हैं। जैसे चाहे वैसे बैठो। बैठकर थक जाओ तो अच्छा सो जाओ। रब्बा कोई बात में मना नहीं करते हैं। यह तो बिल्कुल आसानी से समझने की बात है, इसमें कोई तकलीफ़ की बात नहीं। भल कितना भी बीमार हो। मालूम नहीं सुनते-सुनते रहमतुल्आल्मीन की याद में रहते-रहते और जान जिस्म से निकल जाएं। गाया जाता है ना - गंगा का तट हो, गंगा जल मुंह में हो तब जान जिस्म से निकलें। वह तो तमाम हैं अकीदत मन्दी की राह की बातें। असल में है यह जान जिस्म की बात। तुम जानते हो - सचमुच ऐसे ही जान निकलनी हैं। तुम बच्चे आते हो आलम ए अरवाह से। हमको छोड़कर जाते हो। रब फ़रमाते हैं मैं तो तुम बच्चों को साथ ले जाऊंगा। मैं आया हूँ तुम बच्चों को घर ले जाने के लिए। तुमको न अपने घर का मालूम है, न रूह का मालूम है। इबलीस ने बिल्कुल ही पंख काट डाले हैं, इसलिए रूह उड़ नहीं सकती क्योंकि स्याह रास्त है। जब तक सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बने तब तक दारूल सुकून में जा कैसे सकती। यह भी जानते हैं - ड्रामा प्लैन के मुताबिक सबको स्याह रास्त बनना ही है। इस वक़्त तमाम दरख्त बिल्कुल स्याह रास्त जड़-जड़ीभूत हो गया है। बच्चे जानते हैं तमाम रूहें स्याह रास्त हैं। नई दुनिया में होती हैं खैर रास्त। यहाँ किसकी ख़ैर रास्त हालत हो न सके। यहाँ रूह पाकीज़ा बन जाए तो फिर यहाँ ठहरे नहीं, एकदम भाग जाए। तमाम अकीदत करते ही हैं निजात के लिए और दारूल सुकून में जाने के लिए। मगर कोई भी वापिस जा नहीं सकते। लॉ नहीं कहता। रब यह तमाम राज़ बैठ समझाते हैं इख्तियार करने लिए, फिर भी अहम बात है रब को याद करना, दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन बनना। बीज को याद करने से सारा दरख्त अक्ल में आ जायेगा। दरख़्त पहले छोटा होता है फिर बड़ा होता जाता है। कई मज़हब हैं ना। तुम एक सेकेण्ड में जान लेते हो। दुनिया में किसको भी मालूम नहीं है। इन्सानी खिल्क़त का बीजरूप सबका एक रब है। रब कभी सब तरफ़ मौजूद थोड़े ही हो सकता। बड़े ते बड़ी भूल है यह। तुम समझाते भी हो इन्सान को कभी अल्लाह ताला नहीं कहा जाता है। रब बच्चों को तमाम बातें आसान करके समझाते हैं फिर जिनकी तकदीर में है, यक़ीन है तो वह ज़रूर रब से वर्सा लेंगे। यक़ीन नहीं होगा तो कभी भी नहीं समझेंगे। तक़दीर ही नहीं तो फिर तदबीर भी क्या करेंगे। तक़दीर में नहीं है तो वह बैठते ही ऐसे हैं जो कुछ भी समझते नहीं। इतना भी यक़ीन नहीं कि रब आये हैं बेहद का वर्सा देने। जैसे कोई नया आदमी मेडिकल कॉलेज में जाकर बैठे तो क्या समझेंगे? कुछ भी नहीं। यहाँ भी ऐसे आकर बैठते हैं। इस ला फ़ानी इल्म की तबाही नहीं होती है। यह भी रब ने समझाया है - दारूल हुकूमत क़ायम होती है ना। तो नौकर चाकर अवाम, अवाम के भी नौकर चाकर तमाम चाहिए ना। तो ऐसे भी आते हैं। कोई को तो निहायत अच्छी तरह समझ में आ जायेगा। ओपीनियन भी लिखते हैं ना। आगे चल कुछ चढ़ने की कोशिश करेंगे। मगर उस वक़्त है मुश्किल क्योंकि उस वक़्त तो निहायत हंगामा होगा। रोज़ ब रोज़ तूफ़ान बढ़ते जाते हैं। इतने सेन्टर्स हैं। अच्छी तरह समझेंगे भी। यह भी लिखा हुआ है - जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिए क़याम। तबाही भी सामने देखते हैं। तबाही तो होनी ही है। गवर्नमेन्ट कहती है विलादत कम हों, मगर इसमें कर ही क्या सकेंगे? दरख़्त का इज़ाफा तो होना है। जब तक रब है तब तक तमाम मज़हबों की रूहों को यहाँ रहना ही है। जब जाने का वक़्त होगा तब रूहों का आना बन्द होगा। अभी तो सबको आना ही है। मगर यह बातें कोई समझते नहीं हैं। बापू जी भी कहते थे रावण राज्य है, हमको रामराज्य चाहिए। कहते हैं फलाना जन्नत रिहाईश नशीन हुआ तो इसका मतलब यह जहन्नुम है ना। इन्सान इतना भी समझते नहीं। जन्नत रिहाईश नशीन हुआ तो अच्छा है ना। ज़रूर जहन्नुम रिहाईश नशीन था।रब्बा समझाते हैं इन्सानों की सूरत इन्सान की, सीरत बन्दर की है। तमाम गाते रहते हैं पतित-पावन सीता-राम। हम नापाक हैं, पाक बनाने वाला है रब। वह तमाम हैं अकीदत मन्दी की राह की सीतायें, रब है राम। किसको सीधा कहो तो मानते नहीं। अल्लाह ताला को बुलाते हैं। अभी तुम बच्चों को रब ने तीसरी आंख दिया है। तुम जैसे अलग दुनिया के हो गये हो। पुरानी दुनिया में क्या-क्या करते रहते हैं। अभी तुम समझते हो। तुम बच्चे बेसमझ से समझदार बने हो। शैतान ने तुमको कितना बेसमझ बना दिया है। रब समझाते हैं इस वक़्त तमाम इन्सान बुरी खस्लतों से आरास्ता बन गये हैं, तब तो रब आकर सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनाते हैं। रब फ़रमाते हैं भल तुम बच्चे अपनी खिदमत भी करते रहो सिर्फ़ एक बात याद रखो - रब को याद करो। स्याह रास्त से ख़ैर रास्त बनने का रास्ता और कोई बता नहीं सकता। तमाम का रूहानी सर्जन एक ही है। वही आकर रूहों को इन्जेक्शन लगाते हैं क्योंकि रूह ही स्याह रास्त बनी है। रब को ला फ़ानी सर्जन कहा जाता है। अभी रूह ख़ैर रास्त से स्याह रास्त बनी है, इनको इन्जेक्शन चाहिए। रब फ़रमाते हैं - बच्चे, अपने को रूह यक़ीन करो और अपने रब को याद करो। अक्ल का राब्ता ऊपर में लगाओ। जीते जी फाँसी पर लटक जाओ यानि कि अक्ल का राब्ता स्वीट होम में लगाओ। हमको स्वीट साइलेन्स होम में जाना है। दारूल निजात को स्वीट होम कहा जाता है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) यह पुरानी दुनिया तबाह हुई पड़ी है इसलिए इससे अपने आपको अलग समझना है। दरख़्त के इज़ाफ़े के साथ-साथ जो मुश्किलात रूपी तूफ़ान आते हैं, उनसे डरना नहीं है, पार होना है।

2) रूह को सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनाने के लिए अपने को इल्म-इबादत का इन्जेक्शन देना है। अपना अक्ल का राब्ता स्वीट होम में लगाना है।

बरक़ात:-
अपने क़िस्मत और क़िस्मत बनाने वाले की याददाश्त के ज़रिए तमाम उलझनों से आज़ाद रहने वाले मा. खालिक बनो।

हमेशा वाह मेरा क़िस्मत और वाह क़िस्मत बनाने वाले! इस ज़हन के महीन आवाज को सुनते रहो और ख़ुशी में नाचते रहो। जानना था वो जान लिया, पाना था वो पा लिया - इसी एहसासों में रहो तो तमाम उलझनों से आज़ाद हो जायेंगे। अब उलझी हुई रूहों को निकालने का वक्त है इसलिए मास्टर तमाम कुव्वत नशीन हूँ, मास्टर खालिक हूँ - इस याददाश्त से बचपन की छोटी-छोटी बातों में वक्त नहीं गंवाओ।

स्लोगन:-
कमल तख्त नशीन ही इबलीस की कशिश से न्यारे, रब की मोहब्बत में प्यारे अफ़ज़ल आमाल ए इबादत नशीन हैं।

आमीन