11-09-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
यह ड्रामा का खेल एक्यूरेट चल रहा है, जिसका जो पार्ट जिस घड़ी होना चाहिए, वही रिपीट हो रहा है, यह बात हक़ीक़ी तौर पर समझना है''

सवाल:-
तुम बच्चों का असर कब निकलेगा? अभी तक किस कुव्वत की कमी है?

जवाब:-
जब इबादत में मज़बूत होंगे तब असर निकलेगा। अभी वह जौहर नहीं है। याद से ही कुव्वत मिलती है। इल्म तलवार में याद का जौहर चाहिए, जो अभी तक कम है। अगर अपने को रूह समझ रब को याद करते रहो तो बेड़ा पार हो जायेगा। यह सेकण्ड की ही बात है।

आमीन।
रूहानी बच्चों को रूहानी रब बैठ समझाते हैं। रूहानी रब एक को ही कहा जाता है। बाक़ी तमाम हैं रूहें। उनको सुप्रीम रूह कहा जाता है। रब फ़रमाते हैं मैं भी हूँ रूह। मगर मैं सुप्रीम रूह हक़ हूँ। मैं ही नापाक से पाक बनाने वाला, दरिया ए इल्म हूँ। रब फ़रमाते हैं मैं आता ही हूँ हिन्दुस्तान में, बच्चों को जहान का मालिक बनाने। तुम ही मालिक थे ना। अब याददाश्त आई है। बच्चों को याददाश्त दिलाते हैं - तुम पहले-पहले सुनहरे दौर में आये फिर पार्ट बजाते, 84 विलादत भोग अब पिछाड़ी में आ गये हो। तुम अपने को रूह समझो। रूह ला फ़ानी है, जिस्म फ़ानी है। रूह ही जिस्म के साथ रूहों से बात करती है। रूहानी हवासी हो करके नहीं रहते हैं तो ज़रूर जिस्मानी हवास है। मैं रूह हूँ, यह सब भूल गये हैं। कहते भी हैं ख़बीस रूह, नफ़ीस रूह, अज़ीम रूह। वह फिर सुप्रीम रूह तो बन नहीं सकते। कोई भी अपने को शिव कह न सके। जिस्मों के शिव नाम तो निहायत के हैं। रूह जब जिस्म में दाखिली करती है तो नाम पड़ता है क्योंकि जिस्म से ही पार्ट बजाना होता है। तो इन्सान फिर जिस्म के हवास में आ जाते हैं, मैं फलाना हूँ। अभी समझते - हाँ मैं रूह हूँ। हमने 84 का पार्ट बजाया है। अभी हम रूह को जान गया हूँ। हम रूह सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ थी, फिर अभी स्याह बनी हूँ। रब आते ही तब हैं जब सब रूहों पर कट लगी हुई है। जैसे सोने में खाद पड़ती है ना। तुम पहले सच्चा सोना हो फिर चांदी, तांबा, लोहा पड़कर तुम बिल्कुल काले हो गये हो। यह बात और कोई समझा न सके। सब कह देते हैं रूह निर्लेप है। खाद कैसे पड़ती है, यह भी रब ने समझाया है बच्चों को। रब फ़रमाते हैं मैं आता ही हिन्दुस्तान में हूँ। जब बिल्कुल स्याह रास्त बन जाते हैं, तब आता हूँ। एक्यूरेट टाइम पर आते हैं। जैसे ड्रामा में एक्यूरेट खेल चलता है ना। जो पार्ट जिस घड़ी होना होगा उस वक़्त फिर रिपीट होगा, उसमें ज़रा भी फर्क पड़ नहीं सकता। वह है हद का ड्रामा, यह है बेहद का ड्रामा। यह सब निहायत महीन समझने की बातें हैं। रब फ़रमाते हैं तुम्हारा जो पार्ट बजा, वह ड्रामा के मुताबिक़। कोई भी इन्सान ज़रा भी न खालिक को, न मख़लूक़ के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर को जानते हैं। ऋषि-मुनि भी नेती-नेती करते गये। अब तुमसे कोई पूछे खालिक और मख़लूक़ के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर को जानते हो? तो तुम झट कहेंगे हाँ, सो भी तुम सिर्फ़ अभी ही जान सकते हो फिर कभी नहीं। रब्बा ने समझाया है तुम ही मुझ खालिक और मख़लूक़ के आग़ाज़-दरम्यान-आखिरी को जानते हो। अच्छा, यह अफ़ज़ल ख्वातीन अफ़ज़ल हज़रात की सल्तनत कब होगी, यह जानते होंगे? नहीं, इनमें कोई इल्म नहीं। यह तो वण्डर है। तुम कहते हो हमारे में इल्म है, यह भी तुम समझते हो। रब का पार्ट ही एक बार का है। तुम्हारी एम ऑब्जेक्ट ही है - यह अफ़ज़ल ख्वातीन अफ़ज़ल हज़रात बनने की। बन गये फिर तो तालीम की दरकार नहीं रहेगी। बैरिस्टर बन गया सो बन गया। रब जो पढ़ाने वाला है, उनको याद तो करना चाहिए। तुमको सब आसान कर दिया है। रब्बा बार-बार तुम्हें कहते हैं पहले अपने को रूह समझो। मैं रब्बा का हूँ। पहले तुम मल्हिद थे, अभी आस्तिक बने हो। इन आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम ने भी आस्तिक बनकर ही यह वर्सा लिया है, जो अभी तुम ले रहे हो। अभी तुम आस्तिक बन रहे हो। आस्तिक-नास्तिक यह अल्फ़ाज़ इस वक़्त के हैं। वहाँ यह अल्फ़ाज़ ही नहीं। पूछने की बात ही नहीं रह सकती। यहाँ सवाल उठते हैं तब तो पूछते हैं-खालिक और मख़लूक़ को जानते हो? तो कह देते नहीं। रब ही आकर अपना तारूफ देते हैं और मख़लूक़ के आग़ाज़-दरम्यान-आखिर का राज़ समझाते हैं। रब है बेहद का मालिक तामीर करनें वाला। बच्चों को समझाया गया है और मज़हब के पैगम्बर भी यहाँ ज़रूर आते हैं। तुमको मोजिज़ा कराया था - इब्राहम, क्राइस्ट वगैरह कैसे आते हैं। वह तो पिछाड़ी में जब निहायत आवाज़ निकलेगा तब आयेंगे। रब फ़रमाते हैं - बच्चे, जिस्म के साथ जिस्म के तमाम दीन के सब मज़हबों को छोड़ मुझे याद करो। अभी तुम सामने बैठे हो। अपने को जिस्म नहीं समझना है, मैं रूह हूँ। अपने को रूह समझ रब को याद करते रहो तो बेड़ा पार हो जायेगा। सेकण्ड की बात है। निजात में जाने के लिए ही अकीदत मन्दी आधा-कल्प करते हैं। मगर कोई भी रूह वापिस जा नहीं सकती।
5 हज़ार साल पहले भी रब ने यह समझाया था अभी भी समझाते हैं। आदम अलैहिस्सलाम यह बातें समझा नहीं सकते। उनको बाप भी नहीं कहेंगे। बाप है जिस्मानी, आफ़ाकी और रूहानी। हद का बाप जिस्मानी, बेहद का बाप है-रूहानी, रूहों का। और एक यह है मिलन के दौर का वन्डरफुल बाप, इनको आफ़ाकी कहा जाता है। बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम को कोई याद ही नहीं करते। वह हमारा ग्रेट-ग्रेट ग्रैण्ड फादर है, यह अक्ल में नहीं आता है। कहते भी हैं आदि देव, एडम, आदम अलैहिस्सलाम.... मगर कहने बराबर। मन्दिरों में भी आदि देव की तस्वीर है ना। तुम वहाँ जायेंगे तो समझेंगे यह तो हमारा यादगार है। रब्बा भी बैठे हैं, हम भी बैठे हैं। यहाँ बाप ज़िन्दा तौर पर बैठे हैं, वहाँ जड़ तस्वीर रखे हैं। ऊपर में जन्नत भी दुरूस्त है, जिन्होंने मन्दिर देखा है वह जानते हैं कि रब्बा हमको अब ज़िन्दा तौर से हक़ीक़ी इबादत सिखा रहे हैं। फिर बाद में मन्दिर बनाते हैं। यह याददाश्त में आना चाहिए कि यह सब हमारे यादगार हैं। यह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम अब हम बन रहे हैं। थे, फिर सीढ़ी उतरते आये हैं, अब फिर हम घर जाकर इलाही सल्तनत में आयेंगे। पीछे होती है शैतानी सल्तनत फिर हम उल्टी राह में चले जाते हैं। रब कितना अच्छी तरह समझाते हैं-इस वक़्त तमाम इन्सान बराबर नापाक हैं इसलिए पुकारते हैं- ए नापाक से पाक बनाने वाले आओ। आकर हमको पाकीज़ा बनाओ। दु:ख हर कर ख़ुशी का रास्ता बताओ। कहते भी हैं अल्ल्लाह् ताला ज़रूर कोई लिबास में आ जायेगा। अब कुत्ते-बिल्ली, ठिक्कर-भित्तर वगैरह में तो नहीं आयेंगे। गाया हुआ है क़िस्मत नशीन गाड़ी पर आते हैं। रब खुद फ़रमाते हैं मैं इस सादी गाड़ी में दाखिली करता हूँ। यह अपने विलादतों को नहीं जानते हैं, तुम अभी जानते हो। इनके निहायत विलादतों के अाख़िर में जब बुज़ुर्ग हालत होती है तब मैं दाखिल करता हूँ। अकीदत मन्दी की राह में पाण्डवों के निहायत बड़ी-बड़ी तस्वीर बनायी हैं, रंगून में बुद्ध की भी निहायत बड़ी तस्वीर है। इतना बड़ा कोई इन्सान होता थोड़े ही है। बच्चों को तो अब हंसी आती होगी, रावण की तस्वीर कैसी बनायी है। रोज़-ब- रोज़ बड़ी करते जाते हैं। यह क्या चीज़ हैं, जो हर साल जलाते हैं। ऐसा कोई दुश्मन होगा! दुश्मन की ही तस्वीर बनाकर जलाते हैं। अच्छा, रावण कौन है, कब दुश्मन बना है जो हर साल जलाते आते हैं? इस दुश्मन का किसको भी मालूम नहीं है। उनका मतलब कोई बिल्कुल नहीं जानते। रब समझाते हैं वह है ही रावण यानि कि शैतानी फिरक़ा, तुम हो राम सम्प्रदाय यानि कि इलाही फ़िरका। अब रब फ़रमाते हैं - घरेलू राब्ते में रहते कमल फूल जैसे बनो और मुझे याद करते रहो। कहते हैं रब्बा हंस और बगुले इकट्ठे कैसे रह सकते हैं, खिट-खिट होती है। सो तो ज़रूर होगी, बर्दाश्त करनी पड़ेगी। इसमें बड़ी तरीक़त भी हैं। रब को कहा जाता है रांझू रमज़बाज। सब उनको याद करते हैं ना - या अल्ल्लाह् दु:ख दूर करो, रहम करो, लिबरेट करो। वो लिबरेटर रब सबका एक ही है। तुम्हारे पास कोई भी आते हैं तो उनको अलग-अलग समझाओ, कराची में एक-एक को अलग-अलग बैठ समझाते थे।
तुम बच्चे जब इबादत में मज़बूत हो जायेंगे तो फिर तुम्हारा असर निकलेगा। अभी अजुन वह जौहर नहीं है। याद से कुव्वत मिलती है। पढ़ाई से कुव्वत नहीं मिलती है। इल्म तलवार है, उसमें याद का जौहर भरना है। वह कुव्वत कम है। रब रोज़ कहते रहते हैं - बच्चे, याद के सफ़र में रहने से तुमको ताक़त मिलेगी। पढ़ाई में इतनी ताक़त नहीं है। याद से तुम तमाम दुनिया के मालिक बनते हो। तुम अपने लिए ही सब कुछ करते हो। निहायत आये फिर गये। इबलीस भी दुश्तर है। निहायत नहीं आते हैं, कहते हैं इल्म तो निहायत अच्छा है, ख़ुशी भी होती है। बाहर गया खलास। ज़रा भी ठहरने नहीं देता। कोई-कोई को निहायत ख़ुशी होती है। ओहो! अब रब्बा आये हैं, हम तो चले अपने दारूल मसर्रत। रब फ़रमाते हैं - अभी पूरी दारूल हुकूमत क़ायम ही कहाँ हुई है। तुम इस वक़्त हो इलाही औलाद फिर होंगे हूरैन। डिग्री कम हो गई ना। मीटर में प्वाइन्ट होती हैं, इतनी प्वाइन्ट कम। तुम अभी एकदम आला बनते हो फिर कम होते-होते नीचे आ जाते हो। सीढ़ी नीचे उतरना ही है। अब तुम्हारी अक्ल में सीढ़ी का इल्म है। चढ़ता फ़न, तमाम का भला। फिर आहिस्ते-आहिस्ते उतरता फ़न होता है। शुरू से लेकर इस चक्कर को अच्छी तरह समझना है। इस वक़्त तुम्हारी चढ़ता फ़न होता है क्योंकि रब साथ है ना। अल्ल्लाह् ताला जिसको इन्सान सब तरफ मौजूद कह देते हैं, वह रब्बा मीठे-मीठे बच्चे कहते रहते हैं और बच्चे फिर रब्बा-रब्बा कहते रहते हैं। रब्बा हमको तालीम देने आये हैं, रूह पढ़ती है। रूह ही आमाल करती है। हम रूह सुकून परस्त है। इस जिस्म के ज़रिए आमाल करते हैं।बे सुकूनियत अल्फ़ाज़ ही तब कहा जाता है जब दु:ख होता है। बाक़ी सुकून तो हमारा दीन ए नफ़्स है। निहायत कहते हैं ज़हन को सुकून हो। अरे रूह तो खुद ही सुकून परस्त है, उनका घर ही है दारूल सुकून। तुम अपने को भूल गये हो। तुम तो दारूल सुकून के रहने वाले थे, सुकून वहाँ ही मिलेगा। आजकल कहते हैं एक सल्तनत, एक दीन, एक ज़ुबां हो। वन कास्ट, वन रिलीजन, वन गॉड। अब गवर्मेन्ट लिखती भी है वन गॉड है, फिर सब तरफ़ मौजूद क्यों कहते हैं? वन गॉड तो कोई मानता ही नहीं है। तो अब तुमको फिर यह लिखना है। अफ़ज़ल ख्वातीन अफ़ज़ल हज़रात की तस्वीर बनाते हो, ऊपर में लिख दो सुनहरे दौर में जब इन्हों की सल्तनत थी तो वन गॉड, वन डीटी रिलीजन था। मगर इन्सान कुछ समझते नहीं हैं, अटेन्शन नहीं देते। अटेन्शन उनका जायेगा जो हमारे मोमिन खानदान का होगा। और कोई नहीं समझेंगे इसलिए रब्बा फ़रमाते हैं अलग-अलग बिठाओ फिर समझाओ। फार्म भराओ तो मालूम पड़ेगा क्योंकि कोई किसको मानने वाला होगा, कोई किसको। सबको इकट्ठा कैसे समझायेंगे। अपनी-अपनी बात सुनाने लग पड़ेंगे। पहले-पहले तो पूछना चाहिए कहाँ आये हो? बी.के. का नाम सुना है? बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम तुम्हारा क्या लगता है? कभी नाम सुना है? तुम बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम की औलाद नहीं हो, हम तो प्रैक्टिकल में हैं। हो तुम भी मगर समझते नहीं हो। समझाने की बड़ी तरीक़त चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. मन्दिरों वगैरह को देखते हमेशा यह याददाश्त रहे कि यह सब हमारे ही यादगार हैं। अब हम ऐसा अफ़ज़ल ख्वातीन अफ़ज़ल हज़रात बन रहे हैं।

2. घरेलू राब्ते में रहते कमल फूल जैसे रहना है। हंस और बगुले साथ हैं तो निहायत तरीक़े से चलना है। बर्दाश्त भी करना है।

बरक़ात:-
इबलीस के बन्दिशों से हमेशा ग़ैर बन्दिश रहने वाले इबादत नशीन, बन्दिशों से आज़ाद बनो।

बन्दिशों से आज़ाद की निशानी है हमेशा इबादत नशीन। इबादत नशीन बच्चे जिम्मेवारियों की बंदिश और इबलीस की बंदिशों से आज़ाद होंगे। ज़हन की भी बन्दिश न हो। जिस्मानी जिम्मेवारी तो खेल हैं, इसलिए डायरेक्शन के मुताबिक खेल की तरह से हंसकर खेलो तो कभी छोटी-छोटी बातों में थकेंगे नहीं। अगर बंदिश समझते हो तो तंग होते हो। क्या, क्यों के सवाल उठते है। लेकिन जिम्मेवार रब है आप ज़रिया हो। इस याददाश्त से बन्दिशों से आज़ाद बनो तो इबादत नशीन बन जायेंगे।

स्लोगन:-
करनकरावनहार की याददाश्त से हवास और तकब्बुर को खत्म करो।

आमीन