11-09-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे - हक़ीक़ी रब आलम ए हक़ क़ायम करते हैं, तुम रब के पास आये हो हज़रात से अफ़ज़ल हज़रात बनने की सच्ची-सच्ची नॉलेज सुनने

सवाल:-
तुम बच्चों को अपने घरेलू राब्ते में बहुत-बहुत सम्भाल कर चलना है - क्यों?

जवाब:-
क्योंकि तुम्हारी गत-मत सबसे न्यारी है। तुम्हारा बातिन इल्म है इसलिए बेहद अक्ल बन सबसे तोड़ निभाना है। अन्दर में समझना है हम सब भाई-भाई और भाई-बहिन हैं। बाक़ी ऐसे नहीं औरत अपने खाविन्द को कहे तुम मेरे भाई हो। इससे सुनने वाले कहेंगे इनको क्या हो गया। तरीक़े से चलना है।

आमीन।
रूहानी बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। रूहानी अल्फ़ाज़ न कह सिर्फ़ बाप कहें तो भी अन्डरस्टुड है यह रूहानी बाप है। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। तमाम अपने को भाई-भाई तो कहते ही हैं। तो बाप बैठ समझाते हैं बच्चों को। सबको तो नहीं समझाते होंगे। गीता में भी लिखा हुआ है भगवानुवाच। किसके वास्ते? अल्लाह ताला के हैं तमाम बच्चे। वह अल्लाह ताला बाप है तो अल्लाह ताला के बच्चे तमाम ब्रदर्स हैं। अल्लाह ताला ने ही समझाया होगा। सल्तनत ए इबादत सिखायी होगी। अभी तुम्हारी अक्ल का ताला खुला हुआ है, तुम्हारे सिवाए ऐसे ख्यालात और कोई के चल न सकें। जिन-जिन को पैगाम मिलता जायेगा वह स्कूल में आते जायेंगे, पढ़ते जायेंगे। समझेंगे नुमाइश तो देखी, अब जाकर ज़्यादा सुनें। पहली-पहली अहम बात है दरिया ए इल्म नापाक से पाक बनाने वाला, गीता ज्ञान दाता शिव भगवानुवाच। उनको यह मालूम पड़े कि इन्हों को सिखलाने वाला, समझाने वाला कौन है। वह सुप्रीम सोल, दरिया ए इल्म ग़ैर मुजस्सम है। वह है ही ट्रूथ। वह सच ही बतायेगा, फिर उसमें कोई सवाल उठ ही नहीं सकता। तुमने तमाम छोड़ दिया, ट्रूथ के ऊपर। तो पहले-पहले तो इस पर समझाना है कि हमको पाक परवरदिगार जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिए सल्तनत ए इबादत सिखलाते हैं। यह बादशाहत मर्तबा है, जिसको यक़ीन हो जायेगा कि जो तमाम का बाप है वह रूहानी बाप बैठ समझाते हैं, वही सबसे बड़ी अथॉरिटी है। तो दूसरा कोई सवाल उठ ही नहीं सकता। वह है नापाक से पाक बनाने वाला। वह जब यहाँ आते हैं तो ज़रूर अपने टाइम पर आते होंगे। तुम देखते भी हो यह वही क़यामत की जंग है। तबाही के बाद वाइसलेस दुनिया होनी है। यह इन्सान जानते नहीं कि हिन्दुस्तान ही वाइसलेस था। अक्ल चलती नहीं। गॉडरेज का ताला लगा हुआ है। उसकी चाबी एक रब के पास ही है इसलिए यह किसको मालूम नहीं है कि तुमको पढ़ाने वाला कौन है। दादा समझ लेते हैं, तब टीका करते हैं, कुछ बोलते हैं इसलिए पहले-पहले यह समझाओ - इसमें लिखा है रहमतुल्आल्मीन फ़रमाते हैं। वह तो है ही ट्रूथ। रब है ही नॉलेजफुल। खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का राज़ समझाते हैं। यह तालीम अभी तुमको उस बेहद के रब से मिलती है। वही खिल्क़त का खालिक है, नापाक खिल्क़त को पाकीज़ा बनाने वाला है। तो पहले-पहले रब का ही तारुफ़ देना है। उस पाक परवरदिगार से आपका क्या रिश्ता है। वह हज़रात से अफ़ज़ल हज़रात बनने की सच्ची नॉलेज देते हैं। बच्चे जानते हैं रब हक़ है, जो रब ही आलम ए हक़ीक़ी बनाते हैं। तुम यहाँ आए ही हो हज़रात से अफ़ज़ल हज़रात बनने। बैरिस्टर पास जायेंगे तो समझेंगे हम बैरिस्टर बनने आये हैं। अभी तुमको यक़ीन है हमको अल्लाह ताला पढ़ाते हैं। कई यक़ीन करते भी हैं फिर शक्की अक्ल हो जाते हैं, तो उनको तमाम कहते हैं तुम तो कहते थे - हमें अल्लाह ताला पढ़ाते हैं। फिर अल्लाह ताला को क्यों छोड़ आये हो? शक आने से ही भागन्ती हो जाते हैं। कोई न कोई गुनाह करते हैं। अल्लाह ताला फ़रमाते हैं - ज़िना अज़ीम दुश्मन है, उन पर फ़तह पाने से ही जहान फ़तहयाब बनेंगे। जो पाकीज़ा बनेंगे वही पाकीज़ा दुनिया में जायेंगे। यहाँ है ही सल्तनत ए इबादत की बात, तुम जाकर बादशाहत करेंगे। बाक़ी जो रूहें हैं वह अपना हिसाब चुक्तू कर वापिस चली जायेंगी। यह क़यामत का वक़्त है। अब यह अक्ल कहती है - सुनहरे दौर का क़याम ज़रूर होना है। पाकीज़ा दुनिया सुनहरे दौर को कहा जाता है। बाक़ी तमाम दारूल निजात में चले जायेंगे। उनको फिर अपना पार्ट रिपीट करना है। तुम भी अपनी तजवीज़ करते रहते हो। पाकीज़ा बन और पाकीज़ा दुनिया का मालिक बनने के लिए। मालिक तो अपने को समझेंगे ना। अवाम भी मालिक है। अभी अवाम भी कहती है ना - हमारा हिन्दुस्तान। तुम समझते हो अभी तमाम जहन्नुम रिहाईश नशीन हैं। अभी हम जन्नत रिहाईश नशीन बनने के लिए सल्तनत ए इबादत सीख रहे हैं। तमाम तो जन्नत रिहाईश नशीन नहीं बनेंगे। रब फ़रमाते हैं जब अकीदत मन्दी की राह पूरी होगी तब ही मैं आऊंगा। मुझे ही आकर तमाम अकीदत मन्दों को अकीदत मन्दी का सिला देना है। मैजारिटी तो अकीदत मन्दों की है ना। तमाम पुकारते रहते हैं हे गॉड फादर। अकीदत मन्दों के मुंह से ओ गॉड फादर, या अल्लाह - यह ज़रूर निकलेगा। अब अकीदत मन्दी और इल्म में फ़र्क है। तुम्हारे मुंह से कभी ए खुदा, या अल्लाह नहीं निकलेगा। इन्सानों को तो यह आधाचक्कर की प्रैक्टिस पड़ी हुई है। तुम जानते हो वह हमारा रब है, तुमको ए रब्बा थोड़े ही कहना है। रब से तुमको तो वर्सा लेना है। पहले तो यह यक़ीन हो कि हम रब से वर्सा लेते हैं। रब बच्चों को वर्सा लेने के हक़दार बनाते हैं। यह तो सच्चा बाप है ना। रब जानते हैं हमने जिन बच्चों को इल्म का आब ए हयात पिलाए, इल्म की आग पर बिठाय दुनिया का मालिक हूरैन बनाया था वही ज़िना की आग पर बैठ ख़ाक हो गये हैं। अब मैं फिर इल्म की आग पर बिठाए, घोर नींद से जगाए जन्नत में ले जाता हूँ।
रब ने समझाया है - तुम रूहें वहाँ दारूल सुकून और दारूल मसर्रत में रहती हो। दारूल मसर्रत को कहा जाता है वाइसलेस वर्ल्ड, मुकम्मल ग़ैर ख़बासती। वहाँ हूरैन रहते हैं और वह है स्वीट होम, रूहों का घर। तमाम एक्टर्स उस दारूल सुकून से आते हैं, यहाँ पार्ट बजाने। हम रूहें यहाँ की रहवासी नहीं हैं। वह एक्टर्स यहाँ के रहवासी होते हैं। सिर्फ़ घर से आकर ड्रेस बदली कर पार्ट बजाते हैं। तुम तो समझते हो हमारा घर दारूल सुकून है, जहाँ हम फिर वापिस जाते हैं। जब तमाम एक्टर्स स्टेज पर आ जाते हैं तब रब आकर सबको ले जायेंगे, इसलिए उनको लिबरेटर, गाइड भी कहा जाता है। दु:ख दूर करने वाला, ख़ुशी देने वाला है तो इतने तमाम इन्सान कहाँ जायेंगे। ख्याल तो करो - नापाक से पाक बनाने वाले को बुलाते हैं किसलिए? अपनी मौत के लिए। दु:ख की दुनिया में रहने नहीं चाहते हैं, इसलिए कहते हैं घर ले चलो। यह तमाम निजात को ही मानने वाले हैं। हिन्दुस्तान की कदीम इबादत भी कितनी मशहूर है, विलायत में भी जाते हैं कदीम सल्तनत ए इबादत सिखलाने। क्रिश्चियन में निहायत हैं जो राहिब की इज़्ज़त रखते हैं। गेरू कफनी की जो पहरवाइस है - वह है हठयोग की। तुमको तो घरबार छोड़ना नहीं है। न कोई सफेद कपड़े का बन्दिश है। मगर सफेद अच्छा है। तुम भट्ठी में रहे हो तो ड्रेस भी यह हो गई है। आजकल सफेद पसन्द करते हैं। इन्सान मरते हैं तो सफेद चादर डालते हैं। तो पहले कोई को भी रब का तारूफ देना है। दो बाप हैं, यह बातें समझने में टाइम लेती हैं। नुमाइश में इतना समझा नहीं सकेंगे। सुनहरे दौर में एक बाप, इस वक़्त हैं तुमको तीन बाप, क्योंकि अल्लाह ताला आते हैं बाप ए अवाम जिब्राइल अलैहिस्सलाम के जिस्म में। वह भी तो बाप है सबका। अच्छा अब तीनों बाप में आला वर्सा किसका? ग़ैर मुजस्सम बाप वर्सा कैसे दें? वह फिर देते हैं जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिए। जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिए क़याम करते और जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिए वर्सा भी देते हैं। इस तस्वीर पर तुम निहायत अच्छी तरह समझा सकते हो। रहमतुल्आल्मीन है, फिर यह बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम, हव्वा अलैहिस्सलाम। यह है ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर। रब फ़रमाते हैं मुझ रहमतुल्आल्मीन को ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर नहीं कहेंगे। मैं सबका बाप हूँ। यह है बाप ए अवाम जिब्राइल अलैहिस्सलाम। तुम हो गये भाई-बहिन, आपस में क्रिमिनल एसाल्ट कर न सकें। अगर दोनों की आपस में ख़बासत की नज़र खींचती है तो फिर गिर पड़ते हैं, रब को भूल जाते हैं। रब फ़रमाते हैं -तुम हमारा बच्चा बन काला मुँह करते हो। बेहद का बाप बच्चों को समझाते हैं। तुमको यह नशा चढ़ा हुआ है। जानते हो घरेलू राब्ते में भी रहना है। जिस्मानी रिश्तों को भी मुँह देना है। जिस्मानी बाप को तुम बाप कहेंगे ना। उनको तो तुम भाई नहीं कह सकते। आर्डनरी वे में बाप को बाप ही कहेंगे। अक्ल में है कि यह हमारा जिस्मानी बाप है। इल्म तो है ना। यह इल्म बड़ा अजब है। आजकल करके नाम भी ले लेते हैं मगर कोई विज़ीटर वगैरह बाहर के आदमी के सामने भाई कह दो तो वह समझेंगे इनका माथा ख़राब हुआ है। इसमें बड़ी तरीक़त चाहिए। तुम्हारा बातिन इल्म, बातिन रिश्ते है। अक्सर करके औरत खाविन्द का नाम नहीं लेती हैं। खाविन्द औरत का नाम ले सकते हैं। इसमें बड़ी तरीक़े से चलना है। जिस्मानी से भी तोड़ निभाना है। अक्ल चली जानी चाहिए ऊपर। हम रब से वर्सा ले रहे हैं। बाक़ी चाचे को चाचा, बाप को बाप कहना पड़ेगा ना। जो जिब्राइल ज़ादा ज़ादियां नहीं बने हैं वह भाई-बहन नहीं समझेंगे। जो बी.के. बने हैं, वही इन बातों को समझेंगे। बाहर वाले तो पहले ही चमकेंगे। इसमें समझने की अक्ल अच्छी चाहिए। रब तो बच्चों को बेहद अक्ल बनाते हैं। तुम पहले हद की अक्ल में थे। अभी अक्ल चली जाती है बेहद में। वह हमारा बेहद का बाप है। यह तमाम हमारे भाई-बहिन हैं। मगर घर में सासू को सासू ही कहेंगे, बहन थोड़े ही कहेंगे। घर में रहते बड़ी तरीक़े से चलना है, नहीं तो लोग कहेंगे यह तो खाविन्द को भाई, सासू को बहन कह देती, यह क्या है? यह इल्म की बातें तुम ही जानो और न जाने कोई। कहते हैं ना - प्रभू तेरी गति मत तुम ही जानो। अब तुम उनके बच्चे बनते हो तो तुम्हारी गत मत तुम ही जानो। बड़ी सम्भाल से चलना पड़ता है। कहाँ कोई मूँझे नहीं। तो नुमाइश में तुम बच्चों को पहले-पहले यह समझाना है कि हमको पढ़ाने वाला अल्लाह ताला है। अब तुम बताओ अल्लाह ताला कौन? ग़ैर मुजस्सम रहमतुल्आल्मीन या जिस्म नशीन आदम अलैहिस्सलाम। जो गीता में भगवानुवाच है वह शिव परमात्मा ने महावाक्य उच्चारे हैं या श्रीकृष्ण ने? कृष्ण तो है जन्नत का पहला प्रिन्स। ऐसे तो कह नहीं सकते कि कृष्ण जयन्ती सो शिव जयन्ती। शिव जयन्ती के बाद फिर कृष्ण जयन्ती। शिव जयन्ती से स्वर्ग का प्रिन्स श्रीकृष्ण कैसे बना, वह है समझने की बात। शिव जयन्ती फिर गीता जयन्ती फिर फट से है कृष्ण जयन्ती क्योंकि रब सल्तनत ए इबादत सिखलाते हैं ना। बच्चों की अक्ल में आया है ना। जब तक रहमतुल्आल्मीन पाक परवरदिगार ना आये तब तक रहमतुल्आल्मीन की सालगिरह मना नहीं सकते। जब तक रहमतुल्आल्मीन आकर जन्नत का क़याम न करे तो आदम अलैहिस्सलाम की सालगिरह भी कैसे मनाई जाये। आदम अलैहिस्सलाम की विलादत तो मनाते हैं मगर समझते थोड़े ही हैं। आदम अलैहिस्सलाम प्रिन्स थे तो ज़रूर सुनहरे दौर में होगी ना। हूर-हूरैनों की दारूल हुकूमत होगी ज़रूर। सिर्फ़ एक आदम अलैहिस्सलाम को बादशाही तो नहीं मिलेगी ना। ज़रूर जन्नत होगी ना! कहते भी हैं जन्नत... और फिर यह है जहन्नुम। जन्नत नई दुनिया, जहन्नुम है पुरानी दुनिया। कहते हैं हूरैनों और शैतानों की लड़ाई लगी। हूरैनों ने जीता। मगर ऐसे तो है नहीं। जहन्नुम खत्म हुई फिर जन्नत क़ायम हुई ना। जहन्नुम पुरानी दुनिया में होगी। नई दुनिया में थोड़े ही यह याजूज माजूज वगैरह होंगे। यहाँ तो देखो कितने इन्सान हैं। सुनहरे दौर में निहायत थोड़े हैं। यह भी तुम समझ सकते हो, अभी तुम्हारी अक्ल चलती है। हूरैनों ने तो कोई जंग की नहीं। हूरैन फिरक़ा सुनहरे दौर में ही होता हैं। शैतानी फिरक़ा यहाँ हैं। बाक़ी न हूरैनो और शैतानों की जंग हुई, न यज़ीदों और पन्जतनों की हुई है। तुम शैतान पर फ़तह पाते हो। रब फ़रमाते हैं - इन ख़बासतों पर फ़तह पानी है तो जहान फ़तहयाब बन जायेंगे। इसमें कोई लड़ना नहीं है। लड़ने का नाम लें तो वॉयलेन्स (तशदिद) बन जायें। शैतान पर फ़तह पानी है मगर नानवायलेन्स। सिर्फ़ रब को याद करने से हमारे गुनाह ख़ाक होते हैं। हिन्दुस्तान की कदीम सल्तनत ए इबादत मशहूर है।

रब फ़रमाते हैं - मेरे साथ अक्ल का राब्ता लगाओ तो तुम्हारे गुनाह ख़ाक होंगे। रब नापाक से पाक बनाने वाला है तो अक्ल का राब्ता उस रब से ही लगाना है, तो तुम नापाक से पाक बन जायेंगे। अभी तुम प्रैक्टिकल में उनसे राब्ता लगा रहे हो, इसमें जंग की कोई बात ही नहीं। जो अच्छी तरह पढ़ेंगे, रब के साथ राब्ता लगायेंगे, वही रब से वर्सा पायेंगे - चक्कर पहले मुआफिक। इस पुरानी दुनिया की तबाही भी होगी। तमाम हिसाब-किताब चुक्तू कर जायेंगे। फिर क्लास ट्रांसफर हो नम्बरवार जाकर बैठते हैं ना। तुम भी नम्बरवार जाकर वहाँ सल्तनत करेंगे। कितनी समझ की बातें हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) इस क़यामत के वक्त जबकि सुनहरे दौर का क़याम हो रहा है तो पाकीज़ा ज़रूर बनना है। रब और रब के काम में कभी शक नहीं उठाना है।

2) इल्म और रिश्ते बातिन है, इसलिए जिस्मानी में निहायत तरीक़त से बेहद अक्ल बनकर चलना है। कोई ऐसे अल्फ़ाज़ नहीं बोलने हैं जो सुनने वाले मूँझ जाएं।

बरक़ात:-
अपनी राय, दूसरों की राय को ख़त्म कर सिरात ए मुस्तकीम पर पदमों की कमाई जमा करने वाले पदमापदम तक़दीर वान बनो।

सिरात ए मुस्तकीम पर चलने वाले एक इरादा भी अपनी सलाह या दूसरे की सलाह पर नहीं कर सकते। सूरत ए हाल की स्पीड अगर तेज़ नहीं होती है तो ज़रूर कुछ न कुछ सिरात ए मुस्तकीम में अपनी राय और दूसरों की राय मिक्स है। अपनी राय यानि कि अल्पज्ञ रूह की आदत के मुताबिक जो इरादा पैदा होता है वह सूरत ए हाल को डगमग करता है इसलिए चेक करो और कराओ, एक कदम भी सिरात ए मुस्तकीम के बिना न हो तब पदमों की कमाई जमा कर पदमापदम तक़दीरवान बन सकेंगे।

स्लोगन:-
ज़हन में तमाम के फ़लाह का जज़्बा बना रहे - यही दुनिया फ़लाह नशीन रूह का फ़र्ज़ है।

आमीन