11-10-2020 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 31-03-86


तमाम कुव्वत नशीन बनने और बरक़ात पाने का साल

आज तमाम खज़ानों के मालिक, अपने मास्टर बच्चों को देख रहे हैं। बालक सो मालिक, कहाँ तक बने हैं, यह देख रहे हैं। इस वक़्त जो अफ़ज़ल रूहें तमाम कुव्वतों की तमाम खज़ानों की मालिक बनती हैं वह मालिकपन की आदत मुस्तकबिल में भी जहान का मालिक बनाती हैं। तो क्या देखा? बालक तो तमाम हैं, रब्बा और मैं यह लगन तमाम बच्चों में अच्छी लग गई है। बालक पन का नशा तो तमाम में हैं मगर बालक सो मालिक यानि कि रब जैसा लबरेज़। तो बालकपन की सूरत ए हाल और मालिकपन की सूरत ए हाल, इसमें फ़र्क देखा। मालिकपन यानि कि हर कदम अपने आप ही लबरेज़ सूरत ए हाल में खुद का होगा और तमाम के वास्ते भी होगा। इसको कहते हैं मास्टर यानि कि बालक सो मालिक। मालिकपन की खासियत- जितना ही मालिकपन का नशा उतना ही जहान के फ़लाह नशीनी की आदत हमेशा इमर्ज रूप में हैं। जितना ही मालिकपन का नशा उतना ही साथ-साथ जहान फ़लाह नशीनी का नशा। दोनों का बराबर हो। यह है रब जैसा मालिक बनना। तो यह रिज़ल्ट देख रहे थे कि बालक और मालिक दोनों खुद का रूप हमेशा ही ज़ाहिर ए आमाल में आते हैं या सिर्फ़ नॉलेज तक हैं! मगर नॉलेज और ज़ाहिर ए आमाल में फ़र्क है। कई बच्चे इस बराबरी में रब जैसे ज़ाहिर ए आमाल रूप में अच्छे देखे। कई बच्चे अभी भी बालक-पन में रहते हैं मगर मालिकपन के उस रूहानी नशे में रब जैसा बनने की कुव्वत नशीन सूरत ए हाल में कभी वाक़ेअ होते हैं और कभी वाक़ेअ होने की कोशिश में वक़्त चला जाता है।

मकसद तमाम बच्चों का यही अफ़ज़ल है कि रब जैसा बनना ही है। मकसद कुव्वत नशीन है। अब मकसद को इरादा, बोल, आमाल, रिश्ते-राब्ते में लाना है। इसमें फ़र्क पड़ जाता है। कोई बच्चे इरादे तक बराबर सूरत ए हाल में वाकेअ रहते हैं। कोई इरादे के साथ बोली तक भी आ जाते हैं। कभी-कभी आमाल में भी आ जाते हैं। मगर जब रिश्ते, राब्ते में आते, खिदमत के रिश्ते में आते, चाहे कुनबे के रिश्ते में आते, इस रिश्ते और राब्ते में आने में परसेन्टेज कभी कम हो जाती है। रब जैसा बनना यानि कि एक ही वक्त इरादा, बोल, आमाल, रिश्ता सबमें रब जैसी सूरत ए हाल में रहना। कोई दो में रहते कोई तीन में रहते। मगर चारों ही सूरत ए हाल जो बताई उसमें कभी कैसे, कभी कैसे हो जाते हैं। तो रब उल हक़ बच्चों के वास्ते हमेशा बेइंतहा प्यारे भी हैं।प्यार का खुद का रूप सिर्फ़ रूहानी का जिस्मानी रूप में मिलना नहीं है। मगर प्यार का खुद का रूप है बराबर बनना। कई बच्चे ऐसे सोचते हैं कि रब उल हक़ ग़ैर लगाव बन रहे हैं। मगर यह ग़ैर लगाव बनना नहीं है। यह ख़ास प्यार का खुद का रूप है।

रब उल हक़ पहले से ही सुना चुके हैं कि निहायत-अरसे की दस्तयाबी के हिसाब का वक्त अभी निहायत कम है इसलिए रब उल हक़ बच्चों को हमेशा तवील अरसे के लिए ख़ास मज़बूती की इबादत के ज़रिए खुद को तपाना यानि कि मज़बूत करना, पुख्ता करना इसके लिए यह ख़ास वक़्त दे रहे हैं। वैसे तो गोल्डन जुबली में भी तमाम ने इरादा किया कि बराबर बनेंगे, मुश्किल कुशा बनेंगे, हल नशीन बनेंगे। यह सब वायदे रब के पास बातिन ए तसव्वुर के रूप में हिसाब के खाते में नूँधे हुए हैं। आज भी कई बच्चों ने मज़बूत इरादा किया। निसार होना यानि कि खुद को तमाम दस्तयाबियों में पुख्ता बनाना। निसार नशीन का मतलब ही है इरादा, बोल,आमाल और रिश्ता इन चारों में ही रब जैसा बनना। खत जो लिखकर दिया वह ख़त और इरादा मलक़ूतवतन में रब उल हक़ के पास हमेशा के लिए रिकार्ड में रह गया। सबकी फाइल्स वहाँ वतन में हैं। हर एक का यह इरादा ला फ़ानी हो गया।

इस साल बच्चों के मज़बूती की इबादत से दरेक इरादे को हयाती, ला फ़ानी बनाने के लिए खुद से बार-बार मज़बूती की प्रेक्टिस से रूह-रिहान करने के लिए, रियलाइजेशन करने के लिए और रीइनकारनेट खुद का रूप बन फिर आमाल में आने के लिए इस सूरत ए हाल को हमेशा के अवक़ात के लिए और मज़बूत करने के लिए, रब उल हक़ यह वक़्त दे रहे हैं। साथ-साथ खास रूप में खालिस इरादे की कुव्वत से जमा का खाता और बढ़ाना है। खालिस इरादे की कुव्वत का ख़ास एहसास अभी और हवास ए बातिन बन करने की ज़रूरत है। खालिस इरादों की कुव्वत आसानी से फ़ालतू इरादों को ख़त्म कर दूसरों के वास्ते भी नेक जज़्बात, खुवाहिशात के खुद के रूप से तब्दील कर सकते हैं। अभी इस खालिस इरादे की कुव्वत का ख़ास एहसास आसानी से ही फ़ालतू इरादों को ख़त्म कर देता है। न सिर्फ़ अपने फ़ालतू इरादे मगर आपके खालिस इरादे, दूसरों के वास्ते भी नेक जज़्बात नेक खुवाहिशात के खुद के रूप से तब्दील कर सकते हैं। अभी इस खालिस इरादे की कुव्वत का स्टॉक खुद के वास्ते भी जमा करने की निहायत ज़रूरत है। नूरानी कलेमात सुनना यह लगन तो निहायत अच्छी है। नूरानी कलेमात यानि कि खज़ाना। नूरानी कलेमात की हर पाइंट को कुव्वत के रूप में जमा करना - यह है खालिस इरादे की कुव्वत को बढ़ाना। कुव्वत के रूप में दरेक वक़्त काम में लगाना। अभी इस खासियत का ख़ास अटेन्शन रखना है। खालिस इरादे की कुव्वत की अज़मत को अभी जितना एहसास करते जायेगे उतना ज़हनी तौर पर खिदमत के भी आसानी से एहसास साती बनते जायेंगे। पहले तो खुद के वास्ते के खालिस इरादे की कुव्वत जमा चाहिए और फिर साथ-साथ आप तमाम रब के साथ जहान फ़लाह नशीन रूहें और जहान बदलने वाली रूहे हो। तो दुनिया के वास्ते भी यह खालिस इरादे की कुव्वत के ज़रिए तब्दील करने का काम अभी निहायत रहा हुआ है। जैसे मौजूदा वक़्त आदम अलैहिस्सलाम बाप रूहानी रूप नशीन बन खालिस इरादे की कुव्वत से आप सबकी परवरिश कर रहे हैं। खिदमत के इज़ाफ़े के मददगार बन आगे बढ़ा रहे हैं। यह खास खिदमत खालिस इरादे की कुव्वत की चल रही है। तो आदम अलैहिस्सलाम बाप जैसे अभी इस खासियत को अपने में इज़ाफ़ा करने की इबादत के रूप में प्रेक्टिस करनी है। इबादत यानि कि मज़बूत इरादे के साथ इबादत। सादे को इबादत नहीं कहेंगे तो अभी इबादत के लिए वक़्त दे रहे हैं। अभी ही क्यों दे रहे हैं? क्योंकि यह वक़्त आपके निहायत-अरसे में जमा हो जायेगा। रब उल हक़ तमाम को निहायत अरसे की दस्तयाबी कराने के ज़रिया हैं। रब उल हक़ तमाम बच्चों को निहायत अरसे की सल्तनती क़िस्मत के हकदार बनाना चाहते हैं। तो निहायत अरसे का वक्त निहायत थोड़ा है इसलिए हर बात की प्रैक्टिस को इबादत के रूप में करने के लिए यह ख़ास वक़्त दे रहे हैं क्योंकि वक़्त ऐसा आयेगा - जिसमें आप तमाम को सदक़ा नशीन और बरक़ात देने वाले बन थोड़े वक़्त में कईयों को देना पड़ेगा। तो तमाम खज़ानों के जमा का खाता लबरेज़ बनाने के लिए वक़्त दे रहे हैं।

दूसरी बात - मुश्किल कुशा और हल नशीन बनने का जो वायदा किया है तो मुश्किल कुशा खुद के वास्ते भी और तमाम के वास्ते भी बनने का ख़ास मज़बूत इरादा और मज़बूत खुद का रूप दोनों हो। सिर्फ़ इरादा नहीं मगर खुद का रूप भी हो। तो इस साल रब उल हक़ एकस्ट्रा चांस दे रहे हैं। जिसको भी यह मुश्किल कुशा बनने की ख़ास तक़दीर लेनी है वह इस साल में ले सकते हैं। इस साल को ख़ास बरक़ात है। मगर बरक़ात लेने के लिए ख़ास दो अटेन्शन देने पड़ेगे। एक तो हमेशा रब जैसा देने वाले बनना है, लेने की जज़्बात नहीं रखना है। रिगार्ड मिले, प्यार मिले तब प्यारें बनें, और रिगार्ड मिले तब रिगार्ड दें, नहीं। सदक़ा नशीन के बच्चे बन मुझे देना है। लेने का जज़्बा नहीं रखना। अफ़ज़ल आमाल करते हुए दूसरी तरफ़ से मिलना चाहिए यह जज़्बा नहीं रखना। अफ़ज़ल आमाल का सिला अफ़ज़ल होता ही है। यह नॉलेज आप जानते हो मगर करने वक़्त यह इरादा नहीं रखना। एक तो बरक़ात लेने के अहल बनने के लिए हमेशा सदक़ा नशीन बन करके रहना और दूसरा मुश्किल कुशा बनना है, तो समाने की कुव्वत हमेशा ख़ास रूप में अटेन्शन में रखना। खुद के वास्ते भी समाने की कुव्वत ज़रूरी है। समन्दर के बच्चे हैं, समन्दर की खासियत है ही समाना। जिसमें समाने की कुव्वत होगी वही नेक जज़्बात, फ़लाह की खुवाहिशात कर सकेंगे इसलिए सदक़ा नशीन बनना, समाने के कुव्वत नशीन समन्दर बनना। यह दो खासियतें हमेशा आमाल तक लाना। कई बार कई बच्चे कहते हैं सोचा तो था कि यही करेंगे मगर करने में बदल गया। तो इस साल में चारों ही बातों में एक ही वक्त बराबरी की ख़ास प्रेक्टिस करना है। समझा। तो एक बात खज़ानों को जमा करने का और सदक़ा नशीन बन देने की आदत नैचुरल रूप में इख्तियार हो जाए उसके लिए वक़्त दे रहे हैं। तो मुश्किल कुशा बनना और बनाना, इसमें हमेशा के लिए अपना नम्बर तय करने का चांस दे रहे हैं। कुछ भी हो खुद इबादत करो और किसकी मुश्किल खत्म करने में मददगार बनो। खुद कितना भी झुकना पड़े मगर यह झुकना हमेशा के लिए झूलों में झूलना है। जैसे श्रीकृष्ण को कितना प्यार से झुलाते रहते हैं। ऐसे अभी रब तुम बच्चों को अपनी गोदी के झूले में झुलायेंगे और मुस्तकबिल में जवाहिरात से बने झूलों में झूलेंगे और अकीदत मन्दी में काबिल ए एहतराम बन झुले में झूलेंगे। तो झुकना, मिटना यह अज़ीमियत है। मैं क्यों झुकूँ, यह झुकें, इसमें अपने को कम नहीं समझो। यह झुकना अज़ीमियत है। यह मरना, मरना नहीं, ला फ़ानी दस्तयाबियों में जीना है इसलिए हमेशा मुश्किल कुशा बनना और बनाना है। इसमें फर्स्ट डिवीज़न में आने का जिसको चांस लेना हो वह ले सकते हैं। यह ख़ास चांस लेने के वक़्त की रब उल हक़ अहमियत सुना रहे हैं। तो वक़्त की अहमियत को जान इबादत करना।

तीसरी बात - वक़्त के मुताबिक जितना माहौल बैचेनी और हलचल का बढ़ता जा रहा है उसी के मुताबिक अक्ल की लाइन निहायत क्लीयर होनी चाहिए क्योंकि वक़्त के मुताबिक टचिंग और कैचिंग इन दो कुव्वतों की ज़रूरत है। एक तो रब उल हक़ के डायरेक्शन को अक्ल के ज़रिये कैच कर सको। अगर लाइन क्लीयर नहीं होगी तो रब के डायरेक्शन साथ ज़हन की सलाह भी मिक्स हो जाती। और मिक्स होने के सबब वक़्त पर धोखा खा सकते हैं। जितनी अक्ल क्लीयर होगी उतना रब के डायरेक्शन को क्लीयर कैच कर सकेंगे। और जितना अक्ल की लाइन क्लीयर होगी, उतनी खुद की तरक्की के वास्ते,खिदमत के इज़ाफें के वास्ते और तमाम रूहों के सदक़ा नशीन बन देने की कुव्वतें आसानी से बढ़ती जायेंगी और टचिंग होगी इस वक़्त इस रूह के वास्ते आसान खिदमत का अस्बाब और खुद की तरक्की का अस्बाब यही हक़ीक़ी है। तो मौजूदा वक़्त के मुताबिक यह दोनों कुव्वतों की निहायत ज़रूरत है। इसको बढ़ाने के लिए एकनामी और एकानामी वाले बनना। एक रब दूसरा न कोई। दूसरे का लगाव और चीज़ है। लगाव तो रांग है ही है मगर दूसरे के रवैए का असर अपनी हालत को हलचल में लाता है। दूसरे की आदत अक्ल को टक्कर में लाती है। उस वक़्त अक्ल में रब है या आदत है? चाहे लगाव के रूप में अक्ल को मुतासिर करे, चाहे टकराव के रूप में अक्ल को मुतासिर करे मगर अक्ल की लाइन हमेशा क्लीयर हो। एक रब दूसरा न कोई इसको कहते हैं एकनामी और एकॉनामी क्या है? सिर्फ़ मैकरू दौलत की बचत को एकॉनामी नहीं कहते। वह भी ज़रूरी है मगर वक़्त भी दौलत है, इरादा भी दौलत है, कुव्वतें भी दौलत हैं, इन सबकी एकॉनामी। फ़ालतू नहीं गँवाओ। एकॉनामी करना यानि कि जमा का खाता बढ़ाना। एकनामी और एकॉनामी की आदत वाले यह दोनों कुव्वत (टचिंग और कैचिंग) का एहसास कर सकेंगे। और यह एहसास तबाही के वक़्त नहीं कर सकेंगे, यह अभी से प्रेक्टिस चाहिए। तब वक़्त पर इस प्रेक्टिस के सबब आखिर में अफ़ज़ल सलाह और रफ़्तार को पा सकेंगे। आप समझो कि अभी तबाही का वक्त कुछ तो पड़ा है। चलो 10 साल ही सही। मगर 10 साल के बाद फिर यह तजवीज़ नहीं कर सकेंगे। कितनी भी मेहनत करो, नहीं कर सकेंगे। कमज़ोर हो जायेंगे। फिर आखरीन जंग में जायेगी। कामयाबी में नहीं। अदना जन्नती तो नहीं बनना है ना। मेहनत यानि कि तीर कमान। और हमेशा मुहब्बत में रहना, ख़ुशी में रहना यानि कि मुरलीधर बनना, खानदान ए आफ़ताबी बनना। मुरली नचाती है और तीर कमान निशाना लगाने के लिए मेहनत कराता है। तो कमाननशीन नहीं मुरली वाला बनना है इसलिए पीछे कोई उल्हना नहीं देना कि थोड़ा-सा फिर से एकस्ट्रा वक़्त दे दो। चांस दे दो या बरक़ात कर लो। यह नहीं चलेगा इसलिए पहले से सुना रहे हैं। चाहे पीछे आया है या आगे मगर वक़्त के मुताबिक तो तमाम को लास्ट स्टेज पर पहुंचने का वक़्त है। तो ऐसी फास्ट रफ़्तार से चलना पड़े। समझा। अच्छा।

चारों ओर के तमाम प्यारे बच्चों को, हमेशा दिलतख्त नशीन बच्चों को, हमेशा इत्मीनान की झलक दिखाने वाले बच्चों को, हमेशा ख़ुशी की पर्सनैलिटी में रहने वाले बच्चों को, हमेशा बेहद बड़ी दिल, बेहद की बड़ी अक्ल इख्तियार करने वाली, दरिया दिल रूहों को रब उल हक़ का प्यार से लबरेज़ यादप्यार और सलाम।

बरक़ात:-
5 ख़बासत रूपी दुश्मन को तब्दील कर मददगार बनाने वाले इबलीस फ़तहयाब जहान फ़तहयाब बनो।

फ़तहयाब, दुश्मन का रूप तब्दील ज़रूर करता है। तो आप ख़बासत रूपी दुश्मन को तब्दील कर मददगार खुद का रूप बना दो जिससे वे हमेशा आपको सलाम करते रहेंगे। हवस खबासत को नेक खुवाहिशात के रूप में, गुस्से को रूहानी खुमारी के रूप में, लालच को बेनियाज़ कैफियत के रूप में, लगाव को प्यार के रूप में और जिस्मानी हवास को इज़्ज़त ए नफ़्स के रूप में तब्दील कर दो तो इबलीस फ़तहयाब जहान फ़तहयाब बन जायेंगे।

स्लोगन:-
रीयल गोल्ड में मेरा पन ही अलाए है, जो वैल्यु को कम कर देती है इसलिए मेरेपन को ख़त्म करो।

आमीन