12-09-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
हमेशा यही याददाश्त रहे कि हम सिरात ए मुस्तकीम पर अपनी सुनहरे दौर की दारूल हुकूमत क़ायम कर रहे हैं, तो बेशुमार ख़ुशी रहेगी''

सवाल:-
यह इल्म का खाना किन बच्चों को हज़म नहीं हो सकता है?

जवाब:-
जो भूलें करके, छी-छी (नापाक) बनकर फिर क्लास में आकर बैठते हैं, उन्हें इल्म हज़म नहीं हो सकता। वह मुंह से कभी भी नहीं कह सकते कि अल्ल्लाह् ताला फ़रमाते हैं हवस अज़ीम दुश्मन है। उनका दिल अन्दर ही अन्दर खाता रहेगा। वह शैतानी फिरक़े के बन जाते हैं।

आमीन।
रब बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं, वह कौन-सा रब है, उस रब की अज़मत तुम बच्चों को करनी है। गाया भी जाता है हक़ीक़ी पाक परवरदिगार बाप, हक़ीक़ी पाक परवरदिगार उस्ताद, हक़ीक़ी पाक परवरदिगार हादी। सच तो वह है ना। तुम बच्चे जानते हो हमको हक़ीक़ी पाक परवरदिगार मिला है। हम बच्चे अब सिरात ए मुस्तकीम पर एक सलाह बन रहे हैं। तो सिरात ए मुस्तकीम पर चलना चाहिए ना। रब फ़रमाते हैं एक तो रूहानी हवासी बनो और रब को याद करो। जितना याद करेंगे, अपना फ़लाह करेंगे। तुम अपनी दारूल हुकूमत क़ायम कर रहे हो फिर से। आगे भी हमारी दारूल हुकूमत थी। हम हूर-हूरैन दीन वाले ही 84 विलादत भोग, अाखिरी विलादत में अभी मिलन पर हैं। इस रूह ए अफ़ज़ल मिलन का दौर के सिवाए तुम बच्चों के और कोई को मालूम नहीं है। रब्बा कितनी प्वाइंट्स देते हैं-बच्चे, अगर अच्छी तरह याद में रहेंगे तो निहायत ख़ुशी में रहेंगे। मगर रब को याद करने के बदले और दुनियावी बातों में पड़ जाते हैं। यह याद रहनी चाहिए कि हम सिरात ए मुस्तकीम पर अपनी सल्तनत क़ायम कर रहे हैं। गाया भी हुआ है आला ते आला अल्ल्लाह् ताला, उनकी ही आला ते आला सिरात ए मुस्तकीम है। सिरात ए मुस्तकीम क्या सिखलाती है? आसान हक़ीक़ी इबादत। बादशाहत के लिए पढ़ा रहे हैं। अपने रब के ज़रियें खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आखिर को जानकर फिर हूरैन फ़ज़ीलत भी इख्तियार करनी हैं। रब का कभी सामना नहीं करना चाहिए। निहायत बच्चे अपने को खिदमतगार समझ तकब्बुर में आ जाते हैं। ऐसे निहायत होते हैं। फिर कहाँ-कहाँ हार खा लेते हैं तो नशा ही उड़ जाता है। तुम मातायें तो अनपढ़ी हो। पढ़ी हुई होती तो कमाल कर दिखाती। मर्दों में फिर भी पढ़े लिखे कुछ हैं। तुम कुमारियों को कितना नाम बाला करना चाहिए। तुमने सिरात ए मुस्तकीम पर बादशाहत क़ायम की थी। ख्वातीन से अफ़ज़ल ख्वातीन बनी थी तो कितना नशा रहना चाहिए। यहाँ तो देखो पाई पैसे की पढ़ाई में जान कुर्बान कर रहे हैं। अरे तुम हसीन बनते हो फिर काले, स्याह रास्त से क्यों दिल लगाते हो। इस कब्रिस्तान से दिल नहीं लगानी है। हम तो रब से वर्सा ले रहे हैं। पुरानी दुनिया से दिल लगाना माना जहन्नुम (नर्क, दोज़ख) में जाना है। रब आकर दोज़ख से बचाते हैं फिर भी मुंह दोज़ख तरफ़ क्यों कर देते। तुम्हारी यह तालीम कितनी आसान है। कोई ऋषि-मुनि नहीं जानते। न कोई उस्ताद, न कोई राहिब-वली समझा सकते हैं। यह तो बाप-उस्ताद-हादी भी है। वो हादी लोग सहीफें सुनाते हैं। उनको उस्ताद नहीं कहेंगे वह कोई ऐसे नहीं कहते कि हम दुनिया की हिस्ट्री-जॉग्राफी सुनाते हैं। वह तो सहीफों की बातें ही सुनायेंगे। रब तुमको सहीफों का खुलासा समझाते हैं और फिर वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी भी बतलाते हैं। अब यह उस्ताद अच्छा या वह उस्ताद अच्छा? उस उस्ताद से तुम कितना भी पढ़ो, क्या कमायेंगे? सो भी नसीब। पढ़ते-पढ़ते कोई एक्सीडेंट हो जाए, मर जाए तो पढ़ाई ख़त्म। यहाँ तुम यह पढ़ाई जितनी भी पढ़ेंगे, वह ज़ाया जायेगी नहीं। हाँ, सिरात ए मुस्तकीम पर न चल कुछ उल्टा चल पड़ते या गटर में जाकर गिर पड़ते तो जितना पढ़ा वह कोई चला नहीं जाता, यह तालीम तो 21 विलादतों के लिए है। मगर गिरने से कल्प-कल्पान्तर का घाटा बहुत-बहुत पड़ जाता है। रब फ़रमाते हैं - बच्चे, काला मुंह नहीं करो। ऐसे निहायत हैं जो काला मुंह करके, छी-छी बनकर फिर आकर बैठ जाते हैं। उनको कभी यह इल्म हज़म नहीं होगा। बद-हाज़मा हो जाता है। जो सुनेगा वह बद-हाज़मा हो जायेगा, फिर मुंह से किसको कह न सके कि अल्ल्लाह् ताला फ़रमाते हैं। हवस अज़ीम दुश्मन है, उन पर फ़तह पानी है। खुद ही जीत नहीं पाते तो औरों को कैसे कहेंगे! अन्दर खायेगा ना! उनको कहा जाता है शैतानी फितरत,आब ए हयात पीते-पीते ज़हर खा लेते हैं तो 100 ज़रब काले बन जाते हैं। हड्डी-हड्डी टूट जाती है।
तुम माताओं की तनज़ीम तो निहायत अच्छी होनी चाहिए। एम ऑब्जेक्ट तो सामने हैं। तुम जानते हो इन आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत में एक हूर-हूरैन दीन था। एक दीन, एक ज़ुबां, 100 परसेन्ट प्योरिटी, पीस, प्रासपर्टी थी। उस एक सल्तनत की ही रब अभी क़ायम कर रहे हैं। यह है एम ऑब्जेक्ट। 100 परसेन्ट पाकीज़गी, ख़ुशी, सुकून, प्रोपर्टी का क़याम अब हो रहा है। तुम दिखाते हो तबाही के बाद आदम अलैहिस्सलाम आ रहे है। क्लीयर लिख देना चाहिए। सुनहरे दौर में एक ही हूर-हूरैन की सल्तनत, एक ज़ुबां, पाकीज़गी, ख़ुशी, सुकून फिर से क़ायम हो रही है। गवर्मेन्ट चाहती है ना। जन्नत होता ही है सुनहरे दौर-रूपहले दौर में। मगर इन्सान अपने को जहन्नुम रिहाईश नशीन समझते थोड़े ही हैं। तुम लिख सकते हो - द्वापर - इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में तमाम जहन्नुम रिहाईश नशीन हैं। अभी तुम मिलन के दौर नशीन हो। आगे तुम भी इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के जहन्नुम रिहाईश नशीन थे, अब तुम जन्नत रिहाईश नशीन बन रहे हो। हिन्दुस्तान को जन्नत बना रहे हैं सिरात ए मुस्तकीम पर। मगर वह हिम्मत, तनज़ीम होनी चाहिए। चक्कर पर जाते हैं तो यह तस्वीर अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़जल हज़रात की ले जाना पड़े। अच्छा है। इसमें लिख दो अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन, ख़ुशी-सुकून की सल्तनत क़ायम हो रही है - तीन मुजस्सम पाक परवरदिगार की सिरात ए मुस्तकीम पर। ऐसे-ऐसे बड़े-बड़े अल्फ़ाज़ में बड़ी-बड़ी तस्वीर हों। छोटे बच्चे छोटी तस्वीर पसन्द करते हैं। अरे, तस्वीर तो जितना बड़ा हो उतना अच्छा। यह अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़ज़ल हज़रात की तस्वीर तो निहायत अच्छी है। इसमें सिर्फ़ लिखना है एक ही हक़ीक़ी तीन मुजस्सम पाक परवरदिगार बाप, हक़ीक़ी तीन मुजस्सम पाक परवरदिगार उस्ताद,हक़ीक़ी तीन मुजस्सम पाक परवरदिगार हादी। तीन मुजस्सम अल्फ़ाज़ नहीं लिखेंगे तो समझेंगे पाक परवरदिगार तो ग़ैर मुजस्सम है, वह उस्ताद कैसे हो सकता है। इल्म तो नहीं है ना। अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़ज़ल हज़रात की तस्वीर टीन की सीट पर बनाकर हर एक जगह पर रखना है, यह क़याम हो रहा है। रब आये हैं आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए एक दीन का क़याम बाक़ी सबका खात्मा करा देंगे। यह बच्चों को हमेशा नशा रहना चाहिए। थोड़ी-थोड़ी बात में एक सलाह नहीं मिलती है तो झट बिगड़ जाते हैं। यह तो होता ही है। कोई किस तरफ़, कोई किस तरफ़, फिर मैजारिटी वाले को उठाया जाता है, इसमें रंज होने की बात नहीं। बच्चे रूठ पड़ते हैं। हमारी बात मानी नहीं गई। अरे, इसमें रूठने की क्या बात है। रब तो सबको रिझाने वाला है। इबलीस ने सबको रूसा दिया है, सब रब से रूठे हुए हैं, रूठे भी क्या - रब को जानते ही नहीं। जिस रब ने जन्नत की बादशाही दी उनको जानते ही नहीं। रब फ़रमाते हैं मैं तुम पर रहमत करता हूँ। तुम फिर मुझ पर अपकार यानि कि गलत करते हो। हिन्दुस्तान का हाल देखो क्या है। तुम्हारे में भी निहायत थोड़े हैं जिनको नशा रहता है। यह है इलाही नशा। ऐसे थोड़े ही कहना चाहिए कि हम तो नूह अलैहिस्सलाम और आबर अलैहिस्सलाम बनेंगे। तुम्हारी एम ऑब्जेक्ट ही है आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम बनना। तुम फिर नूह अलैहिस्सलाम-आबर अलैहिस्सलाम बनने में खुश हो जाते हो, हिम्मत दिखानी चाहिए ना। पुरानी दुनिया से बिल्कुल दिल नहीं लगानी चाहिए। कोई से दिल लगाई और मरे। विलादत दर विलादत का घाटा पड़ जायेगा। रब्बा से तो जन्नत की ख़ुशी मिलती हैं फिर हम जहन्नुम में क्यों पड़ें। रब फ़रमाते हैं तुम जब जन्नत में थे तो और कोई दीन नहीं था। अभी ड्रामा के मुताबिक़ तुम्हारा दीन है नहीं। कोई भी अपने को हूरैन दीन का नहीं समझते हैं। इन्सान होकर भी अपने दीन को न जानें तो क्या कहा जाए। हिन्दू कोई दीन थोड़े ही है। किसने क़ायम किया, यह भी नहीं जानते। तुम बच्चों को कितना समझाया जाता है। रब फ़रमाते हैं मैं कालों का काल अब आया हूँ - सबको वापिस ले जाने। बाक़ी जो अच्छी तरह पढ़ेंगे वह दुनिया का मालिक बनेंगे। अब चलो घर। यहाँ रहने लायक नहीं है, बहुत किचड़ा कर दिया है -शैतानी सलाह पर चलकर। रब तो ऐसे कहेंगे ना। तुम हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन जो दुनिया के मालिक थे, अब कितने धक्के खाते रहते हो। लज्जा नहीं आती है। तुम्हारे में भी कोई हैं जो अच्छी तरह समझते हैं। नम्बरवार तो हैं ना। बहुत बच्चे तो नींद में रहते हैं। वह ख़ुशी का पारा नहीं चढ़ता है। रब्बा हमको फिर से दारूल हुकूमत देते हैं। रब फ़रमाते हैं - इन राहिबों वगैरह का भी मैं फ़लाह करता हूँ। वह खुद न अपने को, न दूसरे को निजात दे सकते हैं। सच्चा हादी तो एक ही हक़ीक़ी हादी है, जो मिलन पर आकर सबकी खैर निजात करते हैं। रब फ़रमाते हैं मैं आता हूँ कल्प के संगम युगे युगे यानि कि मिलन के दौर पर, जबकि हमको तमाम दुनिया को पाकीज़ा बनाना है। इन्सान समझते हैं रब तमाम कुव्वत नशीन है, वह क्या नहीं कर सकते। अरे, मुझे बुलाते ही हो कि हम नापाकों को पाकीज़ा बनाओ तो मैं आकर पाकीज़ा बनाता हूँ। बाक़ी और क्या करुँगा। बाक़ी तो रिद्धि-सिद्धि वाले निहायत हैं, मेरा काम ही है जहन्नुम को जन्नत बनाना। वह तो हर 5 हज़ार साल के बाद बनता है। यह तुम ही जानते हो। अल्ल्लाह् अव्वल है हूर-हूरैन दीन। बाक़ी तो सब पीछे-पीछे आये हैं। अरविन्द घोस तो अभी आये तो भी देखो कितने उनके आश्रम बन गये हैं। वहाँ कोई ग़ैर ख़बासती बनने की बात थोड़े ही है। वह तो समझते हैं घरेलू राब्ते में रहते पाकीज़ा कोई रह नहीं सकता। रब फ़रमाते हैं घरेलू राब्ते में रहते सिर्फ़ एक विलादत पाकीज़ा रहो। तुम विलादत दर विलादत तो नापाक रहे हो। अब मैं आया हूँ तुमको पाकीज़ा बनाने। यह आखिरी विलादत पाकीज़ा बनो। सुनहरे दौर - रूपहलें दौर में तो खबासत होते ही नहीं।
यह अफ़ज़ल ख्वातीन अफ़ज़ल हज़रात की तस्वीर और सीढ़ी की तस्वीर निहायत अच्छी है। इनमें लिखा हुआ है - जन्नत में एक दीन, एक सल्तनत थी। समझाने की बड़ी तरीक़त चाहिए। बूढ़ी माताओं को भी सिखलाकर तैयार करना चाहिए, जो नुमाइश में कुछ समझा सकें। कोई को भी यह तस्वीर दिखाकर बोलो इनकी सल्तनत थी ना। अभी तो है नहीं। रब फ़रमाते हैं-अब तुम मुझे याद करो तो तुम पाकीज़ा बनकर पाकीज़ा दुनिया में चले जायेंगे। अब पाकीज़ा दुनिया क़ायम हो रही है। कितना आसान है। बुढ़ियाँ बैठकर नुमाइश पर समझायें तब नाम बाला हो। आदम अलैहिस्सलाम की तस्वीर में भी लिखत निहायत अच्छी है। बोलना चाहिए यह लिखत ज़रूर पढ़ो। इनको पढ़ने से ही तुमको अफ़ज़ल हज़राती नशा या दुनिया के मालिकपने का नशा चढ़ेगा।
रब फ़रमाते हैं मैं तुमको ऐसा अफ़ज़ल ख्वातीन अफ़ज़ल हज़रात बनाता हूँ तो तुम्हें भी औरों पर रहमदिल बनना चाहिए। जब अपना फ़लाह तब दूसरे का भी कर सकेंगे। बुढ़ियों को ऐसा सिखलाकर होशियार बनाओ जो नुमाइश पर रब्बा कहे कि 8-10 बुढ़ियों को भेजो तो झट आ जाएं। जो करेगा सो पायेगा। सामने एम ऑब्जेक्ट को देखकर ही ख़ुशी होती है। हम यह जिस्म छोड़ जाए दुनिया के मालिक बनेंगे। जितना याद में रहेंगे उतना गुनाह कटेंगे। देखो लिफाफे पर छपा है - वन रिलीजन, वन डीटी किंगडम, वन लैंगवेज..... वह जल्दी क़ायम होगी। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) कभी भी आपस में और रब से रूठना नहीं है, रब रिझाने आये हैं इसलिए कभी रंज नहीं होना है। रब का सामना नहीं करना है।

2) पुरानी दुनिया से, पुरानी जिस्म से दिल नहीं लगानी है। हक़ीक़ी बाप, हक़ीक़ी उस्ताद और हक़ीक़ी हादी के साथ सच्चा रहना है। हमेशा एक की सिरात ए मुस्तकीम पर चल रूहानी हवासी बनना है।

बरक़ात:-
जवाहिरात ए अबदी की याददाश्त से अपनी ज़िन्दगी का की क़ीमत जानने वाले हमेशा क़ाबिल बनो।

जैसे आदम अलैहिस्सलाम अबदी हूरैन है, ऐसे आदम ज़ादा, ज़ादियां भी अबदी जवाहिरात हैं। अबदी हूरैन के बच्चे मास्टर अबदी हूरैन हैं। अबदी हूरैन समझने से ही अपनी ज़िन्दगी की क़ीमत को जान सकेंगे क्योंकि अबदी जवाहिरात यानि कि अल्ल्लाह् ताला के जवाहिरात, इलाही जवाहिरात - तो कितनी वैल्यु हो गई इसलिए हमेशा अपने को अबदी जवाहिरात के बच्चे मास्टर अबदी हूरैन, अबदी जवाहिरात समझकर हर काम करो तो क़ाबिल बनो की बरक़ात मिल जायेगी। कुछ भी फ़ालतू जा नहीं सकता।

स्लोगन:-
इल्मी तू रूह वह है जो धोखा खाने से पहले परखकर खुद को बचा ले।

आमीन