12-10-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
रब आये हैं तुम बच्चों को तैरना सिखलाने, जिससे तुम इस दुनिया से पार हो जाते हो, तुम्हारे लिए दुनिया ही बदल जाती है

सवाल:-
जो रब के मददगार बनते हैं, उन्हें मदद के रिटर्न में क्या हासिल होता है?

जवाब:-
जो बच्चे अभी रब के मददगार बनते हैं, उन्हें रब ऐसा बना देते हैं जो आधाकल्प कोई की मदद लेने या सलाह लेने की दरकार ही नहीं रहती है। कितना बड़ा रब है, फ़रमाते हैं बच्चे तुम मेरे मददगार नहीं होते तो हम जन्नत का क़याम कैसे करते।

आमीन।
मीठे-मीठे नम्बरवार बेइंतहा मीठे रूहानी बच्चों के वास्ते रूहानी रब समझाते हैं क्योंकि निहायत बच्चे बेसमझ बन गये हैं। शैतान ने निहायत बेसमझ बना दिया है। अब हमको कितना समझदार बनाते हैं। कोई आई.सी.एस. का इम्तहान पास करते हैं तो समझते हैं निहायत बड़ा इम्तहान पास किया है। अभी तुम तो देखो कितना बड़ा इम्तहान पास करते हो। ज़रा सोचो तो सही तालीम देने वाला कौन है! तालीम हासिल करने वाले कौन हैं! यह भी यक़ीन है - हम कल्प-कल्प दरेक 5 हज़ार साल बाद बाप, टीचर, हक़ीक़ी हादी से फिर मिलते ही रहते हैं। सिर्फ़ तुम बच्चे ही जानते हो - हम कितना आला ते आला रब के ज़रिए आलातरीन वर्सा पाते हैं। टीचर भी वर्सा देते हैं ना, तालीम दे करके। तुमको भी पढ़ा करके तुम्हारे लिए दुनिया को ही बदल देते हैं, नई दुनिया में सल्तनत करने के लिए। अकीदत मन्दी की राह में कितनी अज़मत गाते हैं। तुम उन के ज़रिए अपना वर्सा पा रहे हो। यह भी तुम बच्चे जानते हो कि पुरानी दुनिया बदल रही है। तुम कहते हो हम सब पाक परवरदिगार के बच्चे हैं। रब को भी आना पड़ता है - पुरानी दुनिया को नई बनाने। तीन मुजस्सम की तस्वीर में भी दिखाते हैं कि आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए नई दुनिया का क़याम। तो ज़रूर आदम अलैहिस्सलाम मुंह निस्बनामा मोमिन-मोमिना चाहिए। आदम अलैहिस्सलाम तो नई दुनिया क़ायम नहीं करते। तामीर करते है ही रब। फ़रमाते हैं मैं आकर तरीक़े से पुरानी दुनिया की तबाही कराए नई दुनिया बनाता हूँ। नई दुनिया के रहवासी निहायत थोड़े होते हैं। गवर्मेंन्ट कोशिश करती रहती है कि आबादी कम हो। अब कम तो नहीं होगी। लड़ाई में करोड़ों इन्सान मरते हैं फिर इन्सान कम थोड़े ही होते हैं, आबादी तो फिर भी बढ़ती जाती है। यह भी तुम जानते हो। तुम्हारी अक्ल में दुनिया के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का इल्म है। तुम अपने को स्टूडेण्ट भी समझते हो। तैरना भी सीखते हो। कहते हैं ना नईया मेरी पार करो। निहायत नामीग्रामी होते हैं जो तैरना सीखते हैं। अभी तुम्हारा तैरना देखो कैसा है, एकदम ऊपर में चले जाते हो फिर यहाँ आते हो। वह तो दिखलाते हैं इतने माइल्स ऊपर में गये। तुम रूहें कितना माइल्स ऊपर में जाते हो। वह तो मैकरू चीज़ है, जिसकी गिनती करते हैं। तुम्हारा तो अनगिनत है। तुम जानते हो हम रूहें अपने घर चली जायेंगी, जहाँ सूरज-चाँद वगैरह नहीं होते। तुमको ख़ुशी है - वह हमारा घर है। हम वहाँ के रहने वाले हैं। इन्सान अकीदत मन्दी करते हैं, तजवीज़ करते हैं - दारूल निजात में जाने के लिए। मगर कोई जा नहीं सकते। दारूल निजात में अल्ल्लाह् ताला से मिलने की कोशिश करते हैं। कई तरह के कोशिश करते हैं। कोई कहते हैं हम नूर नूर में समा जायें। कोई कहते हैं दारूल निजात में जायें। दारूल निजात का किसको मालूम नहीं है। तुम बच्चे जानते हो रब्बा आया हुआ है अपने घर ले जायेंगे। मीठा-मीठा रब्बा आया हुआ है, हमको घर ले जाने लायक़ बनाते हैं। जिसके लिए आधाकल्प तजवीज़ करते भी बन नहीं सके हैं। न कोई नूर में समा सके, न दारूल निजात में जा सके, न मोक्ष को पा सके। जो कुछ तजवीज़ किया वह फ़ालतू। अभी तुम मोमिन खानदान ए अज़ीम की तजवीज़ हक़ीक़ी साबित होती है। यह खेल कैसा बना हुआ है। तुमको अभी मोमिन कहा जाता है। रब को अच्छी तरह तुम जानते हो और रब के ज़रिए खिल्क़त के चक्कर को भी जाना है। रब फ़रमाते हैं निजात-ज़िन्दगी ए निजात का इल्म कोई में भी नहीं है। हूरैन में भी नहीं है। रब को कोई नहीं जानते तो किसको ले कैसे जायेंगे। कितने बेइंतहा हादी लोग हैं, कितने उन्हों के फालोअर्स बनते हैं। सच्चा-सच्चा हक़ीक़ी हादी है पाक परवरदिगार। उसको तो पैर हैं नहीं। वह फ़रमाते हैं हमको तो पैर हैं नहीं। मैं कैसे अपने को पुज-वाऊं। बच्चे दुनिया के मालिक बनते हैं, उनसे थोड़े ही पुजवाऊंगा। अकीदत मन्दी की राह में बच्चे बाप के पैर पड़ते हैं। असल में तो बाप की प्रापर्टी के मालिक बच्चे हैं। मगर नरमाई दिखलाते हैं। छोटे बच्चे वगैरह सब जाकर पैर पड़ते हैं। यहाँ रब फ़रमाते हैं तुमको पैर पड़ने से भी छुड़ा देता हूँ। कितना बड़ा रब है। फ़रमाते हैं तुम बच्चे मेरे मददगार हो। तुम मददगार नहीं होते तो हम जन्नत का क़याम कैसे करते। रब समझाते हैं - बच्चे, अभी तुम मददगार बनो फिर हम तुमको ऐसा बनाते हैं जो कोई की मदद लेने की दरकार ही नहीं रहेगी। तुमको कोई की सलाह की भी दरकार नहीं रहेगी। यहाँ रब बच्चों की मदद ले रहे हैं। फ़रमाते हैं - बच्चे, अब छी-छी मत बनो। इबलीस से हार नहीं खाओ। नहीं तो नाम बदनाम कर देते हैं। बॉक्सिंग होती है तो उसमें जब कोई जीतते हैं तो वाह-वाह हो जाती है। हार खाने वाले का मुँह पीला हो जाता है। यहाँ भी हार खाते हैं। यहाँ हार खाने वाले को कहा जाता है - काला मुँह कर दिया। आये हैं गोरा बनने के लिए फिर क्या कर देते हैं। की कमाई सारी चट हो जाती है, फिर नये सिर शुरू करना पड़े। रब के मददगार बन फिर हार खाए नाम बदनाम कर देते हैं। दो पार्टी हैं। एक हैं इबलीस के मुरीद, एक हैं अल्ल्लाह् ताला के। तुम रब को प्यार करते हो। गायन भी है तबाही के वक़्त उल्टी अक्ल। तुम्हारी है मोहब्बत भरी अक्ल । तो तुमको नाम बदनाम थोड़े ही करना है। तुम मोहब्बत भरी अक्ल फिर इबलीस से हार क्यों खाते हो। हारने वाले को दु:ख होता है। जीतने वाले पर ताली बजाते वाह-वाह करते हैं। तुम बच्चे समझते हो हम तो पहलवान हैं। अब इबलीस को जीतना ज़रूरी है। रब फ़रमाते हैं जिस्म के साथ जो कुछ देखते हो, उन सबको भूल जाओ। दिल से मुझे याद करो। इबलीस ने तुमको ख़ैर रास्त से स्याह रास्त बना दिया है। अब फिर सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनना है। इबलीस जीते जहान फ़तहयाब बनना है। यह है ही हार और जीत, ख़ुशी ग़म का खेल। शैतानी सल्तनत में हार खाते हैं। अब रब फिर वर्थ पाउण्ड बनाते हैं। रब्बा ने समझाया है - एक रहमतुल्आल्मीन की मीलाद ही वर्थ पाउण्ड है। अब तुम बच्चों को ऐसा अफ़ज़ल ख्वातीन अफ़ज़ल हज़रात बनना है। वहाँ पर घर-घर में दीपमाला रहती है, सबकी रोशनी जग जाती है। मेन पाॅवर से रोशनी जगती है। रब्बा कितना आसान तरीके से बैठ समझाते हैं। रब के सिवाए मीठे-मीठे लाडले सिकीलधे बच्चे कौन कहेगा। रूहानी रब ही कहते हैं - ए मेरे मीठे लाडले बच्चों, तुम आधाकल्प से अकीदत मन्दी करते आये हो। वापिस एक भी जा नहीं सकते। रब ही आकर सबको ले जाते हैं।
तुम मिलन के दौर पर अच्छी तरह समझा सकते हो। रब कैसे आकर तमाम रूहों को ले जाते हैं। दुनिया में इस बेहद के ड्रामा का कोई को मालूम नहीं है, यह बेहद का ड्रामा है। यह भी तुम समझते हो, और कोई कह न सके। अगर बोले बेहद का ड्रामा है तो फिर ड्रामा का बयान कैसे करेंगे। यहाँ तुम 84 के चक्कर को जानते हो। तुम बच्चों ने जाना है, तुमको ही याद करना है। रब कितना आसान बतलाते हैं। अकीदत मन्दी में तुम कितने धक्के खाते हो। तुम कितना दूर नहाने करने जाते हो। एक लेक है कहते हैं उसमें डुबकी लगाने से परियां बन जाते हैं। अभी तुम दरिया ए इल्म में डुबकी मार परीज़ादा बन जाते हो। कोई अच्छा फैशन करते हैं तो कहते हैं यह तो जैसे परी बन गई है। अभी तुम भी जवाहिरात बनते हो। बाक़ी इन्सान को उड़ने के पंख वगैरह हो नहीं सकते। ऐसे उड़ न सकें। उड़ने वाली है ही रूह। रूह जिसको रॉकेट भी कहते हैं, रूह कितनी छोटी है। जब तमाम रूहें जायेंगी तो हो सकता है तुम बच्चों को दीदार ए जलवा भी हो। अक्ल से समझ सकते हो - यहाँ तुम बयान कर सकते हो, हो सकता है जैसे तबाही देखी जाती है वैसे रूहों का झुण्ड भी देख सकते हैं कि कैसे जाते हैं। हनूमान, गणेश वगैरह तो हैं नहीं। मगर उनकी जज़्बात के मुताबिक दीदार ए जलवा हो जाता है। रब्बा तो है ही नुक्ता, उनका क्या बयान करेंगे। कहते भी हैं छोटा सा स्टॉर है जिसको इन आंखों से देख नहीं सकते। जिस्म कितना बड़ा है, जिससे आमाल करना है। रूह कितनी छोटी है उसमें 84 का चक्कर नूँधा हुआ है। एक भी इन्सान नहीं होगा जिसको यह अक्ल में हो कि हम 84 विलादत कैसे लेते हैं। रूह में कैसे पार्ट भरा हुआ है। वण्डर है। रूह ही जिस्म लेकर पार्ट बजाती है। वह होता है हद का ड्रामा, यह है बेहद का। बेहद का रब खुद आकर अपना तारूफ़ देते हैं। जो अच्छे खिदमतगार बच्चे हैं, वह इरादा ए ग़ौरतलब करते रहते हैं। किसको कैसे समझायें। कितना तुम एक-एक से माथा मारते हो। फिर भी कहते हैं रब्बा हम समझते ही नहीं। कोई नहीं पढ़ते हैं तो कहा जाता है यह तो पत्थर अक्ल हैं। तुम देखते हो यहाँ भी कोई 7 रोज़ में ही निहायत ख़ुशी में आकर कहते हैं - रब्बा पास चलें। कोई तो कुछ भी नहीं समझते। इन्सान तो सिर्फ़ कह देते हैं पत्थर अक्ल, पारस- अक्ल, मगर मतलब नहीं जानते। रूह पाकीज़ा बनती है तो पारसनाथ बन जाती है। पारसनाथ का मन्दिर भी है। तमाम सोने का मन्दिर नहीं होता है। ऊपर में थोड़ा सोना लगा देते हैं। तुम बच्चे जानते हो हमको बागवान मिला है, कांटे से फूल बनने का तरीका बतलाते हैं। गायन भी है ना गॉर्डन ऑफ अल्लाह। तुम्हारे पास शुरू में एक मुसलमान ट्रान्स में जाता था - कहता था खुदा ने हमको फूल दिया। खड़े-खड़े गिर पड़ता था, खुदा का बगीचा देखता था। अब खुदा का बगीचा दिखाने वाला तो खुद ही खुदा होगा। और कोई कैसे दिखलायेंगे। तुमको फ़िरदौस का दीदार ए जलवा कराते हैं। खुदा ही ले जाते हैं। खुद तो वहाँ रहते नहीं। खुदा तो दारूल सुकून में रहते हैं। तुमको फ़िरदौस का मालिक बनाते हैं। कितनी अच्छी-अच्छी बातें तुम समझते हो। ख़ुशी होती है। अन्दर में निहायत ख़ुशी होनी चाहिए - अभी हम दारूल मसर्रत में जाते हैं। वहाँ दु:ख की बात नहीं होती। रब फ़रमाते हैं दारूल मसर्रत, दारूल सुकून को याद करो। घर को क्यों नहीं याद करेंगे। रूह घर जाने के लिए कितना माथा मारती है।तस्बीह नमाज़ वगैरह निहायत मेहनत करती है मगर जा कोई भी नहीं सकते। दरख़्त से नम्बरवार रूहें आती रहती हैं फिर दरम्यान में जा कैसे सकती। जबकि रब ही यहाँ है। तुम बच्चों को रोज़ समझाते रहते हैं - दारूल सुकून और दारूल मसर्रत को याद करो। रब को भूलने के सबब ही फिर ग़मज़दा होते हैं। इबलीस का मोचरा लग जाता है। अब तो ज़रा भी मोचरा नहीं खाना है। असल है जिस्मानी हवास।

तुम अभी तक जिस रब को याद करते रहते थे - ए नापाक से पाक बनाने वाले आओ, उस रब से तुम तालीम हासिल कर रहे हो। तुम्हारा ओबीडियन्ट सर्वेन्ट टीचर भी है। ओबीडियन्ट सर्वेन्ट बाप भी है। बड़े आदमी नीचे हमेशा लिखते हैं ओबीडियन्ट सर्वेन्ट। रब फ़रमाते हैं मैं तुम बच्चों को देखो कैसे बैठ समझाता हूँ। लायक़ बच्चों पर ही रब का प्यार होता है, जो नालायक होते हैं यानि कि रब का बनकर फिर ट्रेटर बन जाते हैं, ख़बासत में चले जाते हैं तो रब कहेंगे ऐसा बच्चा तो नहीं पैदा होता तो अच्छा था। एक के सबब कितना नाम बदनाम हो जाता है। कितने को तकलीफ़ होती है। यहाँ तुम कितना आला काम कर रहे हो। दुनिया का फ़लाह कर रहे हो और तुमको 3 पैर ज़मीन के भी नहीं मिलते हैं। तुम बच्चे किसी का घरबार तो छुड़ाते नहीं हो। तुम तो राजाओं को भी कहते हो - तुम काबिल ए एहतराम डबल सिरताज थे, अब नाकाबिल बन पड़े हो। अब रब फिर से काबिल ए एहतराम बनाते हैं तो बनना चाहिए ना। थोड़ी देरी है। हम यहाँ किसके लाख लेकर क्या करेंगे। ग़रीबों को बादशाहत मिलनी है। रब ग़रीब निवाज़ है ना। तुम मतलब के साथ समझते हो कि रब को ग़रीब निवाज़ क्यों कहते हैं! हिन्दुस्तान भी कितना ग़रीब है, उनमें भी तुम ग़रीब मातायें हो। जो दौलत मन्द हैं वह इस इल्म को उठा न सकें। ग़रीब अबलायें कितनी आती हैं, उन पर ज़ुल्म होते हैं। रब फ़रमाते हैं माताओं को आगे बढ़ाना है। अलस्सुबह-फेरी में भी पहले-पहले मातायें हो। बैज भी तुम्हारे फर्स्टक्लास हैं। यह ट्रांसलाइट की तस्वीर तुम्हारे आगे हो। सबको सुनाओ दुनिया बदल रही है। रब से वर्सा मिल रहा है कल्प पहले मुआफिक। बच्चों को इरादा ए ग़ौरतलब करना है - कैसे खिदमत को अमल में लायें। टाइम तो लगता है ना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) रब से पूरी-पूरी मोहब्बत रख मददगार बनना है। इबलीस से हार खाकर कभी नाम बदनाम नहीं करना है। तजवीज़ कर जिस्म के साथ जो कुछ दिखाई देता है उसे भूल जाना है।

2) अन्दर में ख़ुशी रहे कि हम अभी दारूल सुकून, दारूल मसर्रत में जाते हैं। बाबा ओबीडियन्ट टीचर बन हमको घर ले जाने के लायक़ बनाते हैं। लायक, क़ाबिल बनना है, नालायक नहीं।

बरक़ात:-
तीन याददाश्त खुद के रूप का तिलक इख्तियार करने वाले मुकम्मल फ़तहयाब बनो।

खुद की याददाश्त, रब की याददाश्त और ड्रामा के नॉलेज की याददाश्त - इन्हीं तीन याददाश्तों में तमाम इल्म की तफ्सील समाई हुई है। नॉलेज के दरख्त की यह तीन याददाश्त हैं। जैसे दरख्त का पहले बीज होता है, उस बीज के ज़रिए दो पत्ते निकलते हैं फिर दरख्त की तफ्सील होती है, ऐसे अहम है बीज रब की याददाश्त फिर दो पत्ते यानि कि रुह और ड्रामा की तमाम नॉलेज। इन तीन याददाश्त को इख्तियार करने वाले याददाश्ती बनो और मुकम्मल फ़तहयाब बनो के बरक़ाती बन जाते हैं।

स्लोगन:-
दस्तयाबियों को हमेशा सामने रखो तो कमज़ोरियाँ आसानी से ख़त्म हो जायेंगी।

आमीन