13-01-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
तुम्हारे मुंह से हमेशा जवाहिरात ए इल्म निकलने चाहिए, तुम्हारा चेहरा हमेशा ख़ुशग्वार रहना चाहिए

सवाल:-
जिन बच्चों ने मोमिन ज़िन्दगी में इल्म की इख्तियारात की है उनकी निशानी क्या होगी?

जवाब:-
1- उनकी अख्लाक़ हूरैन मिसल होगी, उनमें हुरैन फ़ज़ीलत का अमल होगा। 2- उन्हें इल्म का इरादा ए ग़ौरतलब करने की प्रेक्टिस होगी। वे कभी शैतानी बातों का यानि कि किचड़े को ग़ौरतलब नहीं करेंगे। 3-उनकी ज़िन्दगी से गाली देना और ग़ीबत करना बन्द हो जाता है। 4- उनका चेहरा हमेशा ख़ुशग्वार रहता है।

आमीन।
रब बैठ समझाते हैं इल्म और अकीदत मन्दी के ऊपर। यह तो बच्चे समझ गये हैं अकीदत मन्दी से ख़ैर निजात नहीं होती है और सुनहरे दौर में अकीदत होती नहीं। इल्म भी सुनहरे दौर में मिलता नहीं। कृष्ण न अकीदत करते हैं, न इल्म की मुरली बजाते हैं। मुरली माना ही इल्म देना। गायन भी है ना मुरली में जादू। तो ज़रूर कोई जादू होगा ना! सिर्फ़ मुरली बजाना, वह तो कॉमन फकीर लोग भी बजाते रहते हैं। इस मुरली ( नूरानी कलेमात) में इल्म का जादू है। बे इल्मी को जादू तो नहीं कहेंगे। नूरानी कलेमात को जादू कहते हैं। इन्सान से हूरैन बनते हैं इल्म से। जब सुनहरा दौर है तो इस इल्म का वर्सा है। वहाँ अकीदत मन्दी होती नहीं। अकीदत मन्दी होती है इब्राहिम अलैहिस्सलाम के दौर से, जबकि हूरैन से इन्सान बन जाते हैं। इन्सानों को ख़बासती, हूरैन को ग़ैर ख़बासती कहा जाता है। हूरैन की खिल्क़त को पाकीज़ा दुनिया कहा जाता है। अभी तुम हुरैन बन रहे हो। इल्म किसको कहा जाता है? एक तो खुद की और रब की पहचान और फिर खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर की नॉलेज को इल्म कहा जाता है। इल्म से होती है ख़ैर निजात। फिर अकीदत मन्दी शुरू होती है तो उतरता फ़न कहा जाता है क्योंकि अकीदत मन्दी को रात, इल्म को दिन कहा जाता है। यह तो कोई की भी अक्ल में बैठ सकता है मगर हूरैन फ़ज़ीलत इख्तियार नहीं करते हैं। हूरैन फ़ज़ीलत हों तो समझा जाए इल्म की इख्तियारात है। इल्म की इख्तियारात वालों के अख्लाक़ हूरैन मिसल होते है। कम इख्तियारात वाले के अख्लाक़ मिक्स रहते है। इख्तियारात नहीं तो गोया वह बच्चे ही नहीं। इन्सान रब की कितनी तौहीन करते हैं। मोमिन खानदान में आते हैं तो गाली देना, ग़ीबत करना बन्द हो जाता है। तुमको इल्म मिलता है, उस पर अपना इरादा ए ग़ौरतलब करने से हयाती मिलेगी। इरादा ए ग़ौरतलब ही नहीं करते तो बाक़ी क्या ग़ौरतलब होगा? शैतानी ख्याल। उनसे किचड़ा ही निकलेगा। अभी तुम इलाही स्टूडेन्ट हो। जानते हो इन्सान से हूरैन बनने की तालीम हासिल कर रहे हैं। हूरैन यह तालीम नहीं पढ़ायेंगे। हूरैनों को कभी इल्म का समन्दर नहीं कहा जाता है। दरिया ए इल्म तो एक को ही कहा जाता है। हूरैन फ़ज़ीलत भी इल्म से इख्तियार होती हैं। यह इल्म जो तुम बच्चों को अभी मिलता है, यह सुनहरे दौर में नहीं होता। इन हूरैनों में हूरैन फ़ज़ीलत हैं। तुम अज़मत भी करते हो तमाम फ़ज़ीलतों से लबरेज़.... तो अभी तुमको ऐसा बनना है। अपने से पूछना चाहिए हमारे में तमाम हूरैन फ़ज़ीलत हैं या कोई शैतानी खस्लत हैं? अगर शैतानी खस्लत हैं तो उनको निकाल देना चाहिए तब ही हूरैन कहेंगे। नहीं तो कम दर्जा पा लेंगे।

अभी तुम बच्चे हूरैन फ़ज़ीलत इख्तियार करते हो। निहायत अच्छी-अच्छी बातें सुनाते हो। इनको ही कहा जाता है दीदार ए नफ़्स मिलन का दौर जबकि तुम अफ़जल रूह बन रहे हो, तो माहौल भी निहायत अच्छा होना चाहिए। मुंह से कोई भी छी-छी बात न निकले, नहीं तो कहा जायेगा यह कम दर्जे का है। बोलचाल और माहौल से झट मालूम पड़ जाता है। तुम्हारा चेहरा हमेशा ख़ुशग्वार होना चाहिए। नहीं तो उनमें इल्म नहीं कहा जायेगा। मुंह से हमेशा जवाहिरात निकलें। यह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम देखो कितने ख़ुशग्वार चेहरे हैं। इन्हों की रूह ने जवाहिरात ए इल्म इख्तियार किये थे। मुंह से हमेशा जवाहिरात ए इल्म निकलते हैं। जवाहिरात ही सुनते-सुनाते कितनी ख़ुशी रहती है। जवाहिरात ए इल्म जो अभी तुम लेते हो, फिर ये तमाम हीरे-जवाहरात बन जाते हैं। 9 जवाहिरात की माला कोई हीरों-जवाहरातों की नहीं है। इन जवाहिरात ए इल्म की माला है। इन्सान लोग फिर वह जवाहिरात समझ अंगूठियां वगैरह पहन लेते हैं। इन जवाहिरात ए इल्म की माला रूह ए अफ़ज़ल मिलन के दौर पर पड़ती है। यह जवाहिरात ही तुमको मुस्तकबिल 21 विलादतों के लिए मालामाल बनाते हैं। इनको कोई लूट न सके। यहाँ तुम यह हीरे जवाहरात पहनों तो झट कोई लूट ले जाए। तो अपने को बहुत-बहुत समझदार बनाना है। शैतानी खस्लतों को निकालना है। शैतानी खस्लतों से शक्ल ही ऐसी हो जाती है। गुस्से में लाल-लाल ताम्बे जैसी शक्ल हो जाती है। ख़बासत वाले तो काले बन जाते हैं। तो बच्चों को हर बात में इरादा ए ग़ौरतलब करना चाहिए। यह तालीम है ही निहायत दौलत पाने की। वह तालीम कोई जवाहिरात थोड़े ही है। हाँ, नॉलेज पढ़कर बड़ी पोज़ीशन पा लेते हैं। तो तालीम काम आई, न कि पैसा। तालीम ही दौलत है। वह है हद की दौलत, फिर यह है बेहद की दौलत। हैं दोनों तालीम। अभी तुम समझते हो रब हमको तालीम देकर दुनिया का मालिक बना देते हैं। वह कलील अरसे की वक्तियां तालीम है एक विलादत के लिए। फिर दूसरे विलादत में नये सिर पढ़ना पड़े। वहाँ दौलत के लिए तालीम की दरकार नहीं। वहाँ तो अभी की तजवीज़ से अकीचार (बेशुमार) दौलत मिल जाती है। दौलत ला फ़ानी बन जाती है। हूरैन के पास दौलत निहायत थी फिर जब अकीदत मन्दी यानि कि शैतानी सल्तनत में आये तो कितना था, कितने मन्दिर बनाये हुए हैं। फिर आकर मुसलमानों वगैरह ने दौलत लूटी। कितने दौलत मन्द थे! आज की तालीम से इतना दौलत मन्द कोई बन नहीं सकेंगे। तुम अभी जानते हो हम इतनी आलातरीन तालीम पढ़ते हैं जिससे यह (हूर-हूरैन) बनते हैं। तो तालीम से देखो इन्सान क्या बन जाते हैं! ग़रीब से दौलत मन्द। अभी हिन्दुस्तान भी कितना ग़रीब है। दौलत मन्दों को तो फुर्सत ही नहीं है। अपना तकब्बुर रहता है - मैं फलाना हूँ। इसमें तकब्बुर वगैरह मिट जाना चाहिए। हम रूह हैं, रूह के पास तो धन-दौलत, हीरे-जवाहरात वगैरह कुछ भी नहीं हैं। रब भी फ़रमाते हैं जिस्म के साथ तमाम राब्ते छोड़ो। रूह जिस्म छोड़ती है तो दौलत मन्दी वगैरह तमाम ख़त्म हो जाती है। जब नये सिर पढ़कर फिर दौलत कमावे या तो सदक़ा-सवाब अच्छा किया हो तो दौलत मन्द के घर विलादत लेंगे। कहते हैं ना पास्ट के आमालों का सिला है। नॉलेज का सदक़ा किया होगा या कॉलेज-मुसाफिरखाना वगैरह बनाया है तो उसका सिला मिलता है मगर क़लील अरसे के लिए। यह सदक़ा-सवाब भी यहाँ किया जाता है। जन्नत में नहीं किया जाता है। सुनहरे दौर में अच्छे ही आमाल होते हैं क्योंकि अभी का वर्सा मिला हुआ है। वहाँ कोई का भी गुनाहगार आमाल होता नहीं क्योंकि शैतान ही नहीं है। गरीबों का भी गुनाह नहीं बनेगा। यहाँ तो दौलत मन्द के भी गुनाह बनते हैं। तब तो यह बीमारियां वगैरह दु:ख होते हैं। वहाँ ख़बासत में जाते ही नहीं तो गुनाह कैसे बनेंगे? तमाम मदार है आमालों पर। यह इबलीस शैतान की सल्तनत है, जो इन्सान ख़बासती बन जाते हैं। रब आकर तालीम देते हैं ग़ैर ख़बासती बनाने लिए। रब ग़ैर ख़बासती बनाते हैं, इबलीस फिर ख़बासती बना देता है। खानदान ए इलाही और खानदान ए शैतानी की जंग चलती है। तुम रब के बच्चे हो, वह शैतान के बच्चे हैं। कितने अच्छे-अच्छे बच्चे इबलीस से हार खा लेते हैं। इबलीस बड़ा ज़बरदस्त है। फिर भी उम्मींद रखते हैं। अधम से अधम (बिल्कुल नापाक) का भी फ़लाह करना होता है ना। रब को तो तमाम दुनिया का फ़लाह करना होता है।निहायत गिरते हैं। एकदम चट खाते में अधम से अधम बन जाते हैं। ऐसे का भी रब फ़लाह करते हैं। अधम तो तमाम हैं शैतानी सल्तनत में, मगर रब बचाते हैं। फिर भी गिरते रहते हैं, तो निहायत अधम बन जाते हैं। उनका फिर इतना चढ़ना नहीं होता है। वह अधमपना अन्दर खाता रहता है। जैसे तुम कहते हो अन्तकाल जो.. उनकी अक्ल में वह अधमपना ही आता रहेगा। तो रब बैठ बच्चों को समझाते हैं, चक्कर-चक्कर तुम ही हूरैन बनते हो। जानवर बनेंगे क्या? इन्सान ही बनते हैं और समझते हैं। इन आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम को भी नाक कान वगैरह हैं, इन्सान हैं ना! मगर हूरैन फ़ज़ीलत वाले इसलिए इनको हूरैन कहा जाता है। यह ऐसा खुबसूरत हूरैन कैसे बनते हैं, फिर कैसे गिरते हैं, इस चक्कर का तुमको मालूम पड़ गया है। जो इरादा ए ग़ौरतलब करते होंगे उनको इख्तियारात भी अच्छी होगी। इरादा ए ग़ौरतलब ही नहीं करते तो बुद्धू बन पड़ते, नूरानी कलेमात चलाने वाले का इरादा ए ग़ौरतलब चलता रहेगा। इस टॉपिक पर यह-यह समझाना है। ऑटोमेटिकली इरादा ए ग़ौरतलब चलता है। फलाने आने वाले हैं उन्हों को भी हुल्लास से समझायेंगे। हो सकता है कुछ समझ जाए। क़िस्मत पर है। कोई झट यक़ीन करेंगे, कोई नहीं करेंगे। उम्मींद रखी जाती है। अभी नहीं तो आगे चलकर समझेंगे ज़रूर। उम्मीद रखनी चाहिए ना! उम्मीद रखना माना खिदमत का शौक है। थकना नहीं है। भल कोई पढ़कर फिर अधम बना है, आता है तो ज़रूर उनको विज़िटिंग रूम में बिठायेंगे। और कहेंगे चले जाओ? ज़रूर पूछेंगे इतने दिन क्यों नहीं आये? कहेंगे इबलीस से हार खा ली। ऐसे बेइंतहा आते हैं। समझते हैं इल्म निहायत अच्छा था मगर इबलीस ने हरा दिया। याददाश्त तो रहती है ना। अकीदत मन्दी में तो हारने और जीतने की बात ही नहीं रहती। यह नॉलेज इख्तियार करने की है। अभी तुम रब के ज़रिए सच्ची गीता सुनते हो जिससे हूरैन बन जाते। बिगर मोमिन बने हूरैन बन नहीं सकते। क्रिश्चियन, पारसी, मुसलमानों में ब्राह्मण होते ही नहीं। यह सब बातें अभी तुम समझते हो।

तुम जानते हो अल्फ को याद करना है। अल्फ को याद करने से ही बादशाही मिलती है। जब भी तुमको कोई मिले बोलो अल्फ अल्लाह को याद करो। अल्फ को ही आला कहा जाता है। अंगुली से अल्फ का इशारा करते हैं ना! अल्फ को एक भी कहा जाता है। एक ही अल्ल्लाह् ताला है। बाक़ी तो तमाम हैं बच्चे। रब तो हमेशा अल्फ ही रहते हैं। बादशाही करते नहीं। इल्म भी देते हैं, अपना बच्चा भी बनाते हैं तो बच्चों को कितनी ख़ुशी में रहना चाहिए। रब्बा हमारी कितनी खिदमत करते हैं। हमको दुनिया का मालिक बनाते हैं। फिर खुद उस नई पाकीज़ा दुनिया में आते ही नहीं। पाकीज़ा दुनिया में उनको कोई बुलाते ही नहीं। नापाक ही बुलाते हैं। पाकीज़ा दुनिया में क्या आकर करेंगे। उनका नाम ही है नापाक से पाक बनाने वाला, तो पुरानी दुनिया को नया बनाने की उनकी ड्युटी है। रब का नाम है रहमतुल्आल्मीन,और सालिग्राम बच्चों को कहा जाता है। उनकी बुतपरस्ती होती है। रहमतुल्आल्मीन कह सब याद करते हैं। दूसरा जिब्राइल अलैहिस्सलाम को भी बाबा कहते हैं। बाप ए अवाम जिब्राइल अलैहिस्सलाम कहते तो निहायत हैं मगर उनको हक़ीक़ी तौर पर जानते नहीं हैं। जिब्राइल अलैहिस्सलाम किसका बच्चा है? तुम कहेंगे पाक परवरदिगार रहमतुल्आल्मीन ने उनको एडाप्ट किया है। यह तो जिस्म नशीन है ना! अल्ल्लाह् ताला की औलाद सब रूहें हैं। तमाम रूहों को अपना-अपना जिस्म है। अपना-अपना पार्ट मिला है, जो बजाना ही है। यह रिवाज़ से चला आता है। अबदी यानि कि उनका आग़ाज़ दरम्यान आख़िर नहीं। इन्सान सुनते हैं, एण्ड होती है, तो फिर मूँझते हैं कि फिर बनेंगे कैसे? रब समझाते हैं यह अबदी है। कब बने हैं, यह पूछने का नहीं रहता। तबाही होती ही नहीं। यह भी गपोड़ा लगा दिया है। थोड़े इन्सान हो जाते हैं इसलिए कहा जाता है जैसे तबाही हो गई। रब्बा में जो इल्म है वह अभी ही इमर्ज होता है। इनके लिए ही कहते हैं - सारा समन्दर स्याही (मस) बनाओ...... तो भी पूरा नहीं होगा। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) अपने ख़ुशग्वार चेहरे से रब का नाम बाला करना है। जवाहिरात ए इल्म ही सुनने और सुनाने हैं। गले में जवाहिरात ए इल्म की माला पड़ी रहे। शैतानी खस्लतों को निकाल देना है।

2) खिदमत में कभी थकना नहीं है। उम्मीद रख शौक से खिदमत करनी है। इरादा ए ग़ौरतलब कर हुल्लास में रहना है।

बरक़ात:-
प्यार के रिटर्न में बराबरी का एहसास करने वाले तमाम कुव्वत नशीन लबरेज़ बनो

जो बच्चे रब के प्यार में हमेशा समाये हुए रहते हैं उन्हें प्यार के रेसपॉन्स में रब जैसे बनने की बरक़ात दस्तयाब हो जाता है। जो हमेशा प्यार भरा और राब्ते याफ़्ता हैं वह तमाम कुव्वतों से लबरेज़ अपने आप बन जाते हैं। तमाम कुव्वतें हमेशा साथ हैं तो फ़तह हुई पड़ी है। जिन्हें याददाश्त रहती कि तमाम कुव्वत नशीन रब हमारा साथी है, वह कभी किसी भी बात से डिस्टर्ब नहीं हो सकते।

स्लोगन:-
तजवीज़ नशीन ज़िन्दगी में जो हमेशा मुत्मइन नशीनी और ख़ुश रहने वाले हैं वही खुशनसीब हैं।

आमीन