14-01-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
रब तुम्हें जो तालीम देते हैं वह अक्ल में रख सबको पढ़ानी है, हर एक को रब का और खिल्क़त के चक्कर का तारूफ देना है

सवाल:-
रूह सुनहरे दौर में भी पार्ट बजाती और इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में भी मगर फर्क क्या है?

जवाब:-
सुनहरे दौर में जब पार्ट बजाती है तो उसमें कोई गुनाहगार आमाल नहीं होता है, हर आमाल वहाँ न्युटरल आमाल हो जाता है क्योंकि शैतान नहीं है। फिर इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में जब पार्ट बजाती है तो हर आमाल गुनाहगार आमाल या अज़ाब बन जाता है क्योंकि यहाँ खबासत हैं। अभी तुम हो मिलन पर। तुम्हें तमाम इल्म है।

आमीन।
अब यह तो बच्चे जानते हैं कि हम रब्बा के सामने बैठे हैं। रब्बा भी जानते हैं - बच्चे हमारे सामने बैठे हैं। यह भी तुम जानते हो - रब हमको तालीम देते हैं, जो फिर औरों को देनी है। पहले-पहले तो रब का ही तारूफ देना है क्योंकि तमाम रब को और रब की तालीम को भूले हुए हैं। अभी जो रब तालीम देते हैं, यह तालीम फिर 5 हज़ार साल बाद मिलेगी। यह इल्म और कोई को है नहीं। अहम हुआ रब का तारूफ। फिर यह भी समझाना है हम तमाम भाई-भाई हैं। तमाम दुनिया की जो तमाम रूहें हैं, सब आपस में भाई-भाई हैं। सब अपना मिला हुआ पार्ट इस जिस्म के ज़रिए बजाते हैं। अब तो रब आये हैं नई दुनिया में ले जाने के लिए, जिसको जन्नत कहा जाता है। मगर हम तमाम भाई नापाक हैं, एक भी पाक़ीज़ा नहीं। तमाम नापाकों को पाकीज़ा बनाने वाला है ही एक रब। यह है ही नापाक, ख़बासती, बद उनवानी शैतान की दुनिया। शैतान का मतलब ही है 5 ख़बासत औरत में, 5 ख़बासत मर्द में। रब्बा निहायत सिम्पल तरीक़े से समझाते हैं। तुम भी ऐसे समझा सकते हो। तो पहले-पहले यह समझाओ हम रूहों का वह रब है। हम सब ब्रदर्स हैं। पूछो यह दुरूस्त है? लिखो - हम सब भाई-भाई हैं। हमारा रब भी एक है, हम सब सोल्स का वह है सुप्रीम सोल, उनको फादर कहा जाता है। यह पक्का-पक्का अक्ल में बिठाओ तो सब तरफ़ मौजूद वगैरह पहले निकल जाए। अल्फ पहले पढ़ना है। बोलो, यह अच्छी तरह बैठ लिखो। आगे सब तरफ़ मौजूद कहते थे, अब समझते हैं कि सब तरफ़ मौजूद नहीं है। हम सब भाई-भाई हैं, सब रूहें कहती हैं - गॉड फादर, पाक परवरदिगार। पहले तो यह यकीन बिठाना है कि हम रूह हैं, पाक परवरदिगार नहीं हैं। न हमारे में पाक परवरदिगार मौजूद है। सब में रूह मौजूद है। रूह जिस्म की बुनियाद से पार्ट बजाती है, यह पक्का कराओ। अच्छा, फिर वह रब खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का इल्म भी सुनाते हैं, और तो कोई भी जानते नहीं कि इस खिल्क़त के चक्कर की एज कितनी है। रब ही उस्ताद के रूप में बैठ समझाते हैं। लाखों साल की तो बात ही नहीं। यह चक्कर अबदी, एक्यूरेट बना-बनाया है, इसको जानना पड़े। आला जन्नत-अदना जन्नत पास्ट हुए, नोट करो। उसको कहा जाता है जन्नत और सेमी जन्नत। जहाँ हूर-हूरैन की सल्तनत चलती है, वह 16 फ़न, वह 14 फ़न। आहिस्ता आहिस्ता फ़न कम होती जाती हैं। दुनिया पुरानी तो ज़रूर होगी ना। सुनहरे दौर का असर निहायत भारी है। नाम ही है जन्नत, हेविन, नई दुनिया.... उसकी ही अज़मत करनी है। नई दुनिया में है ही एक अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन। पहले रब का तारूफ फिर चक्कर का तारूफ दिया जाता है। तस्वीर भी तुम्हारे पास हैं - यक़ीन कराने के लिए। यह खिल्क़त का चक्कर फिरता रहता है। सुनहरे दौर में आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत थी, अदना जन्नत में नूह अलैहिस्सलाम और आबर अलैहिस्सलाम का। यह हुआ आधा चक्कर, दो दौर पास्ट हुए फिर आता है इखतिलाफ़ी दौर-इख्तिलाफ़ी फितने का दौर। इख्तिलाफ़ी दौर में शैतानी सल्तनत। हूरैन उल्टी राह में चले जाते हैं तो ख़बासत की सिस्टम बन जाती है। आला जन्नत-अदना जन्नत में तमाम ग़ैर ख़बासती रहते हैं। एक अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन रहता है। तस्वीर भी दिखानी है, ओरली भी समझाना है। रब हमको उस्ताद बन ऐसे पढ़ाते हैं। रब अपना तारूफ खुद ही आकर देते हैं। खुद फ़रमाते हैं मैं आता हूँ नापाकों को पाकीज़ा बनाने तो मुझे जिस्म ज़रूर चाहिए। नहीं तो बात कैसे करूँ। मैं ज़िन्दा हूँ,हक़ हूँ और हयाती हूँ। रूह सतो, रजो, तमो में आती है। रूह ही पाकीज़ा और नापाक बनती है इसलिए कहा जाता है नापाक रूह, पाकीज़ा रूह। रूह में ही तमाम आदत हैं। पास्ट के आमाल और गुनाह की आदत रूह ले आती है। आला जन्नत में गुनाह होता ही नहीं। आमाल करते हैं, पार्ट बजाते हैं मगर वह आमाल न्युटरल आमाल हो जाता है। गीता में भी अल्फ़ाज़ हैं, अभी तुम प्रैक्टिकल में समझ रहे हो। जानते हो रब्बा आया हुआ है पुरानी दुनिया को बदलने, नई दुनिया बनाने। जहाँ आमाल न्युटरल आमाल हो जाते हैं उसको ही सुनहरा दौर कहा जाता है और फिर जहाँ तमाम आमाल, गुनाह होते हैं उसको इख्तिलाफ़ी फ़ितने का दौर कहा जाता है। तुम अभी हो मिलन पर। रब्बा दोनों तरफ़ की बात समझाते हैं। आला जन्नत-अदना जन्नत तो है पाकीज़ा दुनिया, वहाँ कोई गुनाह होता नहीं। जब शैतानी सल्तनत शुरू होती है तब ही गुनाह होते हैं। वहाँ ख़बासत का नाम नहीं होता। तस्वीर तो सामने हैं इलाही सल्तनत और शैतानी सल्तनत। रब समझाते हैं यह तालीम है। रब के सिवाए और कोई नहीं जानता। यह तालीम तो तुम्हारी अक्ल में रहनी चाहिए, रब भी याद आता है, चक्कर भी अक्ल में आ जाती है। सेकेण्ड में तमाम याद आ जाता है। बयान करने में देरी लगती है। इनके 3 फाउन्टेन हैं। दरख़्त ऐसा होता है, बीज और दरख्त सेकेण्ड में याद आ जायेंगे। यह बीज फलाने दरख्त का है, ऐसे इनसे सिला निकलता है। यह बेहद का इन्सान खिल्क़त रूपी दरख्त कैसे है, इनका राज़ तुम समझाते हो। बच्चों को तमाम समझाया है - आधा चक्कर डिनायस्टी कैसे चलती है फिर शैतानी सल्तनत होती है तो जो आला जन्नत-अदना जन्नत रिहाईश नशीन हैं, वही इख्तिलाफी दौर रिहाईश नशीन बनते हैं। दरख़्त इज़ाफें को पाता रहता है। आधा चक्कर के बाद शैतानी सल्तनत होती है, ख़बासती बन जाते हैं। रब से जो वर्सा मिला वह आधा चक्कर चला। नॉलेज सुनाकर वर्सा दिया, वह उजूरा ऐशो आराम किया यानि कि आला जन्नत-अदना जन्नत में ख़ुशी पायी। उसको दारूल मसर्रत, आला जन्नत कहा जाता है। वहाँ दु:ख होता ही नहीं। कितना सिम्पल समझाते हैं। एक को समझाते हो या बहुतों को समझाते हो - तो ऐसे अटेन्शन देना है, समझता है, हाँ-हाँ करता है? बोलो नोट करते जाओ। कोई शक हो तो पूछना। जो बात कोई नहीं जानता वह हम समझाते हैं। तुम कुछ भी जानते नहीं हो, पूछेंगे फिर क्या?

रब्बा तो इस बेहद दरख्त का राज़ समझाते हैं। यह नॉलेज अभी तुम समझते हो। रब ने समझाया है तुम 84 के चक्कर में कैसे आते हो। यह अच्छी तरह नोट करो फिर इस पर ख्याल करना है। जैसे उस्ताद एसे (मज़मून) देते हैं फिर घर में जाकर रिवाइज़ कर आते हैं ना। तुम भी यह नॉलेज देते हो फिर देखो क्या होता है। पूछते रहो। एक-एक बात अच्छी तरह समझाओ। बाप-उस्ताद का फ़र्ज़ समझाकर फिर हादी का समझाओ। उनको बुलाया ही है कि आकर हम नापाकों को पाकीज़ा बनाओ। रूह पाकीज़ा बनती है तो फिर जिस्म भी पाक़ीज़ा मिलता है। जैसा सोना वैसा जेवर बनता है। 24 कैरेट का सोना उठायेंगे, खाद नहीं डालेंगे तो जेवर भी ऐसे ख़ैर रास्त बनेंगे। अलाए डालने से स्याह रास्त बन पड़े हैं। पहले-पहले हिन्दुस्तान 24 कैरेट पक्के सोने की चिड़िया था यानि कि सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ नई दुनिया थी फिर बुरी खस्लतों से आरास्ता बनी है। यह रब ही समझाते हैं, और कोई इन्सान हादी लोग नहीं जानते। बुलाते हैं आकर पाकीज़ा बनाओ। सो तो हादी का काम है। बुज़ुर्ग हालत में इन्सान हादी करते हैं। आवाज़ से बालातर मुकाम तो है इनकारपोरियल वर्ल्ड, जहाँ रूहें रहती हैं। यह है कारपोरियल वर्ल्ड। दोनों का यह मेल है। वहाँ तो जिस्म है नहीं। वहाँ कोई आमाल नहीं होता है। रब में तो तमाम नॉलेज है। ड्रामा प्लैन के मुताबिक उनको कहा ही जाता है नॉलेजफुल। वह ज़िन्दा हक़ीक़ी-चित-निशात याफ़्ता होने के सबब उनको नॉलेजफुल कहा जाता है। बुलाते भी हैं नापाक से पाक बनाने वाले, नॉलेजफुल रहमतुल्आल्मीन, उनका नाम हमेशा रहमतुल्आल्मीन ही है। बाक़ी रूहें तमाम आती हैं पार्ट बजाने। तो अलग-अलग नाम इख्तियार करती हैं। रब को बुलाते हैं मगर उनको कुछ भी समझ नहीं रहती। ज़रूर क़िस्मत नशीन गाड़ी भी होगी, जिसमें रब दाखिल कर तुमको पाकीज़ा दुनिया में ले जाये। तो रब समझाते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, मैं उनके जिस्म में आता हूँ जो निहायत विलादतों के आख़िर में है, पूरे 84 विलादत लेते हैं। क़िस्मत नशीन गाड़ी पर आना पड़ता है। पहले नम्बर में तो है आदम अलैहिस्सलाम। वह है नई दुनिया का मालिक। फिर वही नीचे उतरते हैं। गोल्डन से सिल्वर, कॉपर, आइरन एज में आकर पड़ते हैं। अभी फिर तुम आइरन से गोल्डन बन रहे हो। रब फ़रमाते हैं सिर्फ़ मुझ अपने रब को याद करो। जिसमें दाख़िली किया है उनकी रूह में तो ज़रा भी नॉलेज नहीं थी। इनमें मैं दाखिल करता हूँ इसलिए इनको क़िस्मत नशीन गाड़ी कहा जाता है। नहीं तो सबसे आला तो यह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम हैं, इनमें दाखिल करना चाहिए। मगर उनमें पाक परवरदिगार दाखिल नहीं करते इसलिए उनको क़िस्मत नशीन गाड़ी नहीं कहा जाता है। गाड़ी में आकर नापाक को पाक बनाना है, तो ज़रूर इख्तिलाफी फितने के दौर में स्याह रास्त होगा ना। खुद कहते हैं मैं निहायत विलादतों के आख़िर में आता हूँ। गीता में भी अल्फ़ाज़ एक्यूरेट हैं। गीता को ही सर्व शास्त्रमई शिरोमणी कहा जाता है। इस मिलन के दौर पर ही रब आकर मोमिन खानदान और हूरैन खानदान क़ायम करते हैं। निहायत विलादतों के आख़िर में यानि कि मिलन के दौर पर ही रब आते हैं। रब फ़रमाते हैं मैं बीजरूप हूँ। आदम अलैहिस्सलाम तो है आला जन्नत के रिहाईश नशीन । उनको दूसरी जगह तो कोई देख न सके। दोबारा विलादत में तो नाम, रूप, वतन, वक़्त तमाम बदल जाता है। फीचर्स ही बदल जाते हैं। पहले छोटा बच्चा खुबसूरत होता है फिर बड़ा होता है वह फिर जिस्म छोड़ दूसरा छोटा लेता है। यह बना-बनाया खेल ड्रामा के अन्दर फिक्स है। दूसरा जिस्म लिया तो उनको आदम अलैहिस्सलाम नहीं कहेंगे। उस दूसरे जिस्म पर नाम वगैरह फिर दूसरा पड़ेगा। वक़्त, फीचर्स, तिथि-तारीख वगैरह तमाम बदल जाता है। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी हूबहू रिपीट कही जाती है। तो यह ड्रामा रिपीट होता रहता है। सतो, रजो, तमो में आना ही है। खिल्क़त का नाम, दौर का नाम तमाम बदलते रहते हैं। अभी यह है मिलन का दौर। मैं आता ही हूँ मिलन पर। मैं तुमको तमाम दुनिया की हिस्ट्री-जॉग्राफी हक़ीक़ी बताता हूँ। आग़ाज़ से लेकर आख़िर तक और कोई भी जानता ही नहीं। सुनहरे दौर की उम्र कितनी थी, यह मालूम न होने सबब लाखों साल कह देते हैं। अभी तुम्हारी अक्ल में तमाम बातें हैं। तुम्हें अन्दर में यह पक्का करना है कि बाप, बाप-उस्ताद-हक़ीक़ी हादी है, जो फिर से सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनने के लिए निहायत अच्छा तरीक़ा बताते हैं। गीता में भी है जिस्म के साथ जिस्म के तमाम मज़हब छोड़ अपने को रूह समझो। वापिस अपने घर ज़रूर जाना है। अकीदत मन्दी की राह में कितनी मेहनत करते हैं, अल्ल्लाह् ताला के पास जाने के लिए। वह है दारूल निजात

,आमाल से आज़ाद। हम इनकारपोरियल दुनिया में जाकर बैठते हैं। पार्ट नशीन घर गया तो पार्ट से आज़ाद हुआ। तमाम चाहते हैं हम निजात पायें। क़ायम निजात तो किसको मिल न सके। यह ड्रामा अबदी-ला फ़ानी है। कोई कहे यह पार्ट आने-जाने का हमको पसन्द नहीं, मगर इसमें कुछ कर न सकें। यह अबदी ड्रामा बना हुआ है। एक भी क़ायम निजात पा नहीं सकते। वह तमाम है कई तरह की इन्सानी राय। यह है सिरात ए मुस्तकीम, अफ़ज़ल बनाने के लिए। इन्सान को अफ़ज़ल नहीं कहेंगे। हूरैन को अफ़ज़ल कहा जाता है। उन्हों के आगे तमाम सजदा करते हैं। तो वह अफज़ल ठहरे ना। आदम अलैहिस्सलाम हूरैन है फ़िरदौस के प्रिन्स। वह यहाँ कैसे आयेंगे। न उसने गीता सुनाई। रहमतुल्आल्मीन के आगे जाकर कहते हैं हमको निजात दो। वह तो कभी ज़िन्दगी ए निजात, ज़िन्दगी ए बन्दिश में आते ही नहीं इसलिए उनको पुकारते हैं निजात दो। ज़िन्दगी ए निजात भी वह देते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) हम तमाम रूह रूप में भाई-भाई हैं, यह सबक पक्का करना और कराना है। अपनी आदतों को याद से मुकम्मल पाक बनाना है।

2) 24 कैरेट सच्चा सोना (सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़) बनने के लिए आमाल- न्युटरल आमाल-गुनाहगार आमाल की गहरी रफ़्तार को अक्ल में रख अब कोई भी गुनाह नहीं करना है।

बरक़ात:-
वक्त पर हर फ़ज़ीलत और कुव्वत को यूज़ करने वाले एहसास साती याफ़्ता बनो।

मोमिन ज़िन्दगी की खासियत है एहसास। अगर एक भी फ़ज़ीलत और कुव्वत का एहसास नहीं तो कभी न कभी मुश्किलात के बस हो जायेंगे। अभी एहसास का कोर्स शुरू करो। हर फ़ज़ीलत और कुव्वत रूपी ख़ज़ाने को यूज़ करो। जिस वक़्त जिस फ़ज़ीलत की ज़रूरत है उस वक़्त उसका रूप बन जाओ। नॉलेज की तरह से अक्ल के लाॅकर में ख़ज़ाने को रख नहीं दो, यूज़ करो तब फ़तहयाब बन सकेंगे और वाह रे मैं का नग़मा हमेशा गाते रहेंगे।

स्लोगन:-
नाज़ुकपन के इरादों को ख़त्म कर कुव्वत नशीन इरादे तामीर करने वाले ही डबल लाइट रहते हैं।

आमीन