14-02-2021 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 02-11-87


खुद की तब्दीली की बुनियाद सच्चे दिल की महसूसता


आज जहान तब्दीली नशीन, जहान फ़लाह नशीन रब उल हक़ अपने प्यारे, मददगार, जहान तब्दीली नशीन बच्चों को देख रहे हैं। हर एक खुद की तब्दीली के ज़रिए जहान तब्दीली करने की खिदमत में लगे हुए हैं। तमाम के ज़हन में एक ही जोश-हुल्लास है कि इस जहान को तब्दील करना ही है और यक़ीन भी है कि तब्दीली होनी ही है या यह कहें कि तब्दील हुआ ही पड़ा है। सिर्फ़ ज़रिया रब उल हक़ के मददगार, आसान इबादत नशीन बन मौजूदा और मुस्तकबिल अफ़ज़ल बना रहे हैं।

आज रब उल हक़ चारों ओर के ज़रिया जहान तब्दीली नशीन बच्चों को देखते हुए एक खास बात देख रहे थे - हैं तमाम एक ही काम के ज़रिया, मकसद भी तमाम का खुद की तब्दीली और खुद की बदलाव ही है मगर खुद की तब्दीली और जहान तब्दीली में ज़रिया होते हुए भी नम्बरवार क्यों? कोई बच्चे खुद की तब्दीली निहायत आसानी से और जल्दी कर लेते और कोई अभी-अभी तब्दीली का इरादा करेंगे मगर ख़ुद की आदत और इबलीस और कुदरत के ज़रिए आने वाले हालात और मोमिन फैमिली के ज़रिए चुक्तु होने वाले हिसाब-किताब अफ़ज़ल तब्दीली के जोश को कमज़ोर कर देते हैं और कई बच्चे तब्दील करने की हिम्मत में कमज़ोर हैं। जहाँ हिम्मत नहीं, वहाँ जोश-हुल्लास नहीं। और खुद की तब्दीली के बिना जहान की तब्दीली के काम में दिल-पसन्द कामयाबी नहीं होती क्योंकि यह रूहानी इलाही खिदमत एक ही वक़्त पर तीन तरह के खिदमत की सिद्धि है, वह तीन तरह की खिदमत साथ-साथ कौनसी है? एक - कैफियत, दूसरा - वायब्रेशन, तीसरा - बोल। तीनों ही कुव्वत नशीन ज़रिया, हलीम और बे गर्ज इस बुनियाद से हैं, तब दिल-पसन्द कामयाबी होती है। नहीं तो खिदमत होती है, अपने को या दूसरों को थोड़े वक़्त के लिए खिदमत की कामयाबी से ख़ुश तो कर लेते हैं मगर दिल-पसन्द कामयाबी जो रब उल हक़ कहते हैं, वह नहीं होती है। रब उल हक़ भी बच्चों की ख़ुशी में ख़ुश हो जाते हैं मगर दिलाराम की दिल पर जितनी कुव्वत रिज़ल्ट नोट ज़रूर होती रहती। शाबास, शाबाश!' ज़रूर कहेंगे क्योंकि रब के हर बच्चे के ऊपर हमेशा बरक़ात की नज़र और कैफ़ियत रहती है कि यह बच्चे आज नहीं तो कल सिद्धि-याफ्ता बनने ही हैं। मगर बरक़ात नशीन के साथ-साथ उस्ताद भी है, इसलिए आगे के लिए अटेन्शन भी दिलाते हैं।

तो आज रब उल हक़ जहान तब्दीली नशीन के काम की और जहान तब्दीली बच्चों की रिज़ल्ट को देख रहे थे। इज़ाफ़ा हो रहा है, आवाज़ चारों ओर फैल रहा है, ज़ुहूर का पर्दा खुलने की भी शुरुआत हो गयी है। चारों ओर की रूहों में अभी इच्छा पैदा हो रही है कि नज़दीक जाकर देखें। सुनी-सुनाई बातें अभी देखने के तब्दीली में बदल रही हैं। यह तमाम बदलाव हो रहा है। फिर भी ड्रामा के मुताबिक़ अभी तक रब और कुछ ज़रिए बनी हुई अफ़ज़ल रूहों के कुव्वत नशीन असर का नतीजा यह दिखाई दे रहा है। अगर मैजारिटी इस तरीके से सिद्धि को हासिल करें तो निहायत जल्दी तमाम मोमिन सिद्धि-याफ़्ता में ज़ाहिर हो जायेंगे। रब उल हक़ देख रहे थे - दिलपसन्द, अवामपसन्द, रब-पसन्द कामयाबी की बुनियाद खुद की तब्दीली ' की अभी कमी है और खुद की तब्दीली' की कमी क्यों हैं? उसकी असल बुनियाद एक ख़ास कुव्वत की कमी है। वह ख़ास कुव्वत है महसूसता की कुव्वत।

कोई भी तब्दीली की आसान बुनियाद महसूसता- कुव्वत है। जब तक महसूसता- कुव्वत नहीं आती, तब तक एहसास नहीं होता और जब तक एहसास नहीं तब तक मोमिन ज़िन्दगी की खासियत का फाउन्डेशन मज़बूत नहीं। शुरू से अपनी मोमिन ज़िन्दगी को सामने लाओ।

पहली तब्दीली - मैं रूह हूँ, रब मेरा है - यह तब्दीली किस बुनियाद से हुई? जब महसूस करते हो कि हाँ, मैं रूह हूँ, यही मेरा रब है।' तो महसूसता एहसास कराती है, तब ही तब्दीली होती है। जब तक महसूस नहीं करते, तब तक सादी रफ़्तार से चलते हैं और जिस घड़ी महसूसता की कुव्वत एहसास साती बनाती है तो तेज़ तजवीज़ नशीन बन जाते हैं। ऐसे जो भी तब्दीली की ख़ास बातें है - चाहे खालिक के बारे में, चाहे मख़लूक़ के बारे में, जब तक हर बात को महसूस नहीं करते कि हाँ, यह वही वक़्त है, वही इबादत है, मैं भी वही अफ़ज़ल रूह हूँ - तब तक जोश-हुल्लास की चाल नहीं रहती। कोई के माहौल के असर से थोड़े वक़्त के लिए तब्दीली होगी मगर हमेशा के अवक़ात की नही होगी। महसूसता की कुव्वत हमेशा के अवक़ात का आसान तब्दील कर लेगा।
इसी तरह खुद की तब्दीली में भी जब तक महसूसता की कुव्वत नहीं, तब तक हमेशा के अवक़ात का अफ़ज़ल बदलाव नहीं हो सकता है। इसमें ख़ास दो बातों की महसूसता चाहिए। एक -अपनी कमज़ोरी की महसूसता। दूसरा - जो हालात और इन्सान ज़रिए बनते हैं, उनकी खुवाहिश और उनके ज़हन के जज़्बात
और इन्सान की कमज़ोरी या दूसरों के बस की सूरत ए हाल की महसूसता। हालात के पेपर के सबब को जान खुद को पास होने की अफ़ज़ल याफ़्ता की महसूसता में हो कि मैं अफ़ज़ल हूँ, खुद की सूरत ए हाल अफ़ज़ल है, मुश्किलात पेपर है। यह महसूसता आसानी से बदलाव करा लेगी और पास कर लेंगे। दूसरे की खुवाहिश और दूसरे की खुद की तरक्की की भी महसूसता अपनी खुद की तरक्की की बुनियाद है। तो खुद की तब्दीली महसूसता की कुव्वत बिना नहीं हो सकती। इसमें भी एक है सच्चे दिल की महसूसता, दूसरी - चतुराई की महसूसता भी है क्योंकि नॉलेजफुल निहायत बन गये हैं। तो वक़्त देख अपना काम सिद्ध करने के लिए, अपना नाम अच्छा करने के लिए उस वक़्त महसूस भी कर लेंगे मगर उस महसूसता में कुव्वत नहीं होती जो बदलाव कर लेंवे। तो दिल की महसूसता दिलाराम की बरक़ात हासिल कराती है और चतुराई वाली महसूसता थोड़े वक़्त के लिए दूसरे को भी ख़ुश कर लेते, अपने को भी ख़ुश कर देते।

तीसरे तरह की महसूसता - ज़हन मानता है कि यह दुरूस्त नहीं है, अक्ल आवाज़ देती है कि यह हक़ीक़ी नहीं है मगर बाहर के रूप से अपने को अज़ीम हस्ती साबित करने के लिए, अपने नाम को किसी भी तरह से फैमिली के दरम्यान कमज़ोर या कम न करने के सबब अक्ल का खून करते रहते हैं। यह अक्ल का खून करना भी गुनाह है। जैसे खुदकुशी अज़ीम गुनाह है, वैसे यह भी गुनाह के खाते में जमा होता है इसलिए रब उल हक़ मुस्कराते रहते हैं और उनके ज़हन के डॉयलाग भी सुनते रहते हैं। निहायत खुबसूरत डॉयलाग होते हैं। असल बात - ऐसी महसूसता वाले यह समझते हैं कि किसको क्या मालूम पड़ता है, ऐसे ही चलता है मगर रब को मालूम हर पत्ते का है। सिर्फ़ मुंह से सुनने से मालूम नहीं पड़ता, मगर मालूम होते भी रब अन्जान बन भोलेपन में भोलानाथ के रूप से बच्चों को चलाते हैं। जबकि जानते हैं, फिर भोला क्यों बनते? क्योंकि रहमदिल रब है और गुनाह में गुनाह न बढ़ते जायें, यह रहम करते है। समझा? ऐसे बच्चे चतुरसुजान रब से भी और ज़रिए रूहों से भी निहायत चतुर बन सामने आते हैं इसलिए रब रहमदिल, भोलानाथ बन जाते हैं।

रब उल हक़ के पास हर बच्चे के आमाल का, ज़हन के इरादों का खाता हर वक़्त का साफ़ रहता है। दिलों को जानने की ज़रूरत नहीं है मगर हर बच्चे के दिल की हर धड़कन की तस्वीर साफ़ ही है इसलिए कहते हैं कि मैं हर एक के दिल को नहीं जानता क्योंकि जानने की ज़रूरत ही नहीं, साफ़ है ही। हर घड़ी के दिल की धड़कन और ज़हन के इरादे का चार्ट रब उल हक़ के सामने है। बता भी सकते हैं, ऐसे नहीं कि नहीं बता सकते हैं। तारीख़, मुकाम, वक़्त और क्या-क्या किया - तमाम बता सकते हैं। मगर जानते हुए भी अन्जान रहते हैं। तो आज तमाम चार्ट देखा।

खुद की तब्दीली तेज़ रफ़्तार से न होने के सबब सच्ची दिल के महसूसता' की कमी है। महसूसता की कुव्वत निहायत मीठे एहसास करा सकती है। यह तो समझते हो ना। कभी अपने को रब के नूरे रत्न रूह यानि कि दीदों में समाई हुई अफ़ज़ल नुक्ता महसूस करो। दीदों में तो नुक्ता ही समा सकता है, जिस्म तो नहीं समा सकेगा। कभी अपने को पेशानी पर चमकने वाली मस्तकमणि, चमकता हुआ सितारा महसूस करो, कभी अपने को जिब्राइल अलैहिस्सलाम बाप के मददगार, राइट हैण्ड जिस्मानी मोमिन रूप में जिब्राइल अलैहिस्सलाम की बाज़ुएं एहसास करो, महसूस करो। कभी ग़ैबी फरिश्ता याफ़्ता महसूस करो। ऐसे महसूसता की कुव्वत से निहायत अनोखे, रूहानी एहसास करो। सिर्फ़ नॉलेज की रीति बयान नही करो, महसूस करो। इस महसूसता- कुव्वत को बढ़ाओ तो दूसरी तरफ़ की कमज़ोरी की महसूसता अपने आप ही साफ़ होगी। कुव्वत नशीन आइने के दरम्यान छोटा-सा दाग भी साफ़ दिखाई देगा और तब्दील कर लेंगे। तो समझा, खुद की तब्दीली की बुनियाद महसूसता की कुव्वत है। कुव्वत को काम में लगाओ, सिर्फ़ गिनती करके ख़ुश न हो - हाँ, यह भी कुव्वत है, यह भी कुव्वत है। मगर खुद के वास्ते, तमाम के वास्ते, खिदमत के वास्ते हमेशा हर काम में लगाओ। समझा? कई बच्चे कहते कि रब यही काम करते रहते हैं क्या? मगर रब क्या करे, साथ तो ले ही जाना है। जब साथ ले जाना है तो साथी भी ऐसे ही चाहिए ना इसलिए देखते रहते हैं और ख़बर सुनाते रहते कि साथी बराबर बन जाएं। पीछे-पीछे आने वालों की तो बात ही नहीं है, वह तो ढेर के ढेर होंगे। मगर साथी तो बराबर चाहिए ना। आप साथी हो या बाराती हो? बारात तो निहायत बड़ी होगी, इसलिए रहमतुल्आल्मीन की बारात मशहूर है। बारात तो वैराइटी होगी मगर साथी तो ऐसे चाहिए ना। अच्छा।

यह ईस्टर्न ज़ोन है। ईस्टर्न ज़ोन क्या कर रहा है? ज़ुहूर का सूरज कहाँ से उगेगा ? बाप में ज़ुहूर हुआ, वह बात तो अब पुरानी हो गई। मगर अब क्या करेंगे? पुरानी गद्दी है - यह तो नशा अच्छा है मगर अब क्या करेंगे? अभी कोई नयेपन का सूरज उगाया करो जो तमाम के मुंह से निकले कि यह ईस्टर्न ज़ोन से नयेपन का सूरज बेदार हुआ! जो काम अभी तक किसी ने न किया हो, वह अब करके दिखाओ। फंक्शन, सेमीनार किये, आई. पी. (ख़ास इन्सान) की खिदमत की, अखबारों में डाला - यह तो तमाम करते मगर नयेपन की कुछ झलक दिखाओ। समझा।

रब का घर सो अपना घर है। आराम से तमाम पहुँच गये हैं। दिल का आराम मैकरू आराम भी दिला देता है। दिल का आराम नहीं तो आराम के अस्बाब होते भी बेआराम होते। दिल का आराम है यानि कि दिल में हमेशा अल्लाह ताला साथ में है, इसलिए कोई भी मुश्किलात में आराम एहसास करते हो। आराम है ना, कि आना-जाना बेआराम लगता है? फिर भी मीठे ड्रामा की भावी समझो। मेला तो मना रहे हो ना। रब से मिलना, फैमिली से मिलना - यह मेला मनाने की भी मीठी भावी है। अच्छा।

कुव्वत नशीन अफ़ज़ल रूहों को, हर कुव्वत को वक़्त पर काम में लाने वाले तमाम तेज़ तजवीज़ नशीन बच्चों को, हमेशा खुद की तब्दीली के ज़रिए खिदमत में दिलपसन्द कामयाबी पाने वाले दिलखुश बच्चों को, हमेशा दिलाराम रब के आगे सच्ची दिल से क्लीयर रहने वाले कामयाबी-याफ़्ता अफ़ज़ल रूहों को दिलाराम रब उल हक़ का दिल से यादप्यार और सलाम।

पार्टियों के साथ ग़ैबी- रब उल हक़ की मुलाक़ात

हमेशा अपने को रब के साये में रहने वाली ख़ास रूहें एहसास करते हो? जहाँ रब का साया है, वहाँ हमेशा इबलीस से सेफ रहेंगे। साये के अन्दर इबलीस आ नहीं सकती। मेहनत से अपने आप ही दूर हो जायेंगे। हमेशा मौज में रहेंगे क्योंकि जब मेहनत होती है, तो मेहनत मौज एहसास नहीं कराती। जैसे, बच्चों की तालीम जब होती है तो तालीम में मेहनत होती है ना। जब इम्तिहान के दिन होते हैं तो निहायत मेहनत करते हैं, मौज से खेलते नहीं है। और जब मेहनत ख़त्म हो जाती है, इम्तिहान ख़त्म हो जाते हैं तो मौज करते हैं। तो जहाँ मेहनत है, वहाँ मौज नहीं। जहाँ मौज है, वहाँ मेहनत नहीं। साये में रहने वाले यानि कि हमेशा मौज में रहने वाले क्योंकि यहाँ तालीम आला पढ़ते हो मगर आला तालीम होते हुए भी यक़ीन है कि हम फ़तहयाब हैं ही, पास हुए ही पड़े हैं इसलिए मौज में रहते हैं। चक्कर- चक्कर की तालीम है, नयी बात नहीं है। तो हमेशा मौज में रहो और दूसरों को भी मौज में रहने का पैगाम देते रहो, खिदमत करते रहो क्योंकि खिदमत का सिला इस वक़्त भी और मुस्तकबिल में भी खाते रहेंगे। खिदमत करेंगे तब तो सिला मिलेगा।

विदाई के वक़्त - अहम भाई-बहिनों के साथ

रब उल हक़ तमाम बच्चों को बराबर बनाने की नेक जज़्बात से उड़ाने चाहते हैं। हलीम बने हुए ख़िदमतगार रब-जैसे बनने ही हैं, कैसे भी रब को बनाना ही है क्योंकि ऐसे-वैसे को तो साथ ले ही नहीं जायेंगे। रब का भी तो शान है ना। रब लबरेज़ हो और साथी लंगड़ा या लूला हो तो सजेगा नहीं। लूले-लंगड़े बाराती होंगे, साथी नहीं, इसलिए रहमतुल्आल्मीन की बरात हमेशा लूली-लंगड़ी दिखाई गई है क्योंकि कुछ कमज़ोर रूहें धर्मराजपुरी में पास होते लायक़ बनेंगी। अच्छा।

बरक़ात:-
खिदमत की स्टेज पर समाने की कुव्वत के ज़रिए कामयाबी याफ़्ता बनने वाले मास्टर समन्दर बनो।

जब खिदमत की स्टेज पर आते हो तो कई तरह की बातें सामने आती हैं, उन बातों को खुद में समा लो तो कामयाबी नशीन बन जायेंगे। समाना यानि कि इरादे रूप में भी किसी की जिस्मानी बातों और जज़बें का आंशिक रूप समाया हुआ न हो। ग़ैर फ़लाह नशीन बोल फ़लाह के जज़्बें में ऐसे बदल दो जैसे गैर फ़लाह का बोल था ही नहीं। बुरी खस्लतों को फ़ज़ीलतों में, ग़ीबत को तारीफ़ में बदल दो - तब कहेंगे मास्टर समन्दर।

स्लोगन:-
तफ्सील को न देख खुलासे को देखने और खुद में समाने वाले ही तेज तजवीज़ नशीन हैं।

आमीन