14-09-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
तुम अभी सच्चे-सच्चे दारूल उलूम में बैठे हो, यह सोहबत ए हक़ भी है, यहाँ तुम्हें हक़ीक़ी रब की सोहबत मिली है, जो पार लगा देती है''

सवाल:-
हिसाब-किताब के खेल में इन्सानों की समझ और तुम्हारी समझ में कौन सा फर्क है?

जवाब:-
इन्सान समझते हैं - यह जो दु:ख-सुख का खेल चलता है, यह दु:ख-सुख तमाम पाक परवरदिगार ही देते हैं और तुम बच्चे समझते हो कि यह हर एक के आमालों के हिसाब का खेल है। रब किसी को भी दु:ख नहीं देते। वह तो आते ही हैं सुख का रास्ता बताने। रब्बा फ़रमाते हैं - बच्चे, मैंने किसी को भी दु:खी नहीं किया है। यह तो तुम्हारे ही आमालों का सिला है।
नग़मा:-
इस पाप की दुनिया से........

आमीन।
मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने नग़मा सुना। किसको पुकारते हैं? रब को। रब्बा आकर इस अज़ाब की इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर की दुनिया से सुनहरे दौर की सवाब की दुनिया में ले चलो। अभी ज़िन्दा रूहें तमाम इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर की हैं। उन्हों की अक्ल ऊपर जाती है। रब फ़रमाते हैं मैं जो हूँ, जैसा हूँ, ऐसा कोई नहीं जानते हैं। राहिब-वली भी कहते हैं हम खालिक मालिक यानि कि बेहद के रब और उनकी बेहद की मख़लूक़ के आग़ाज़ - दरम्यान-आख़िर को नहीं जानते हैं। रूहें जहाँ रहती हैं वह है ब्रह्म महतत्व यानि कि छठा अनासर, जहाँ सूरज चांद नहीं होते हैं। न मैकरू वतन, न मल्क़ूतवतन में। बाक़ी इस माण्डवे में तो बिजलियाँ वगैरह तमाम चाहिए ना। तो इस माण्डवे को बिजली मिलती है-रात को चांद सितारे, दिन में सूरज। यह हैं बत्तियाँ। इन बत्तियों के होते हुए भी अन्धियारा कहा जाता है। रात को तो फिर भी बत्ती जलानी पड़ती है।आला जन्नत-अदना जन्नत को कहा जाता है दिन और अकीदत मन्दी की राह को कहा जाता है रात। यह भी समझ की बात है। नई दुनिया सो फिर पुरानी ज़रूर बनेंगी। फिर नई होगी तो पुरानी की ज़रूर तबाही होगी। यह है बेहद की दुनिया। मकान भी कोई निहायत बड़े-बड़े होते हैं बादशाहों वगैरह के। यह है बेहद का घर, माण्डवा यानि कि स्टेज़, इनको रक़बा ए आमाल भी कहा जाता है। आमाल तो ज़रूर करना होता है। तमाम इन्सानों के लिए यह रक़बा ए आमाल है। सबको आमाल करना ही है, पार्ट बजाना ही है। पार्ट हर एक रूह को पहले से मिला हुआ है। तुम्हारे में भी कोई हैं जो इन बातों को अच्छी तरह से समझ सकते हैं। असल में यह दारूल उलूम है। दारूल उलूम में कभी बुज़ुर्ग वगैरह पढ़ते हैं क्या? यहाँ तो बुज़ुर्ग, जवान वगैरह तमाम पढ़ते हैं। वेदों की पाठशाला नहीं कहेंगे। वहाँ कोई भी एम ऑब्जेक्ट होती नहीं है। हम इतने वेद-शास्त्र वगैरह पढ़ते हैं, इनसे क्या बनेंगे - वह जानते नहीं। कोई भी जो इज्तेमाअ हैं, एम ऑब्जेक्ट कुछ नहीं है। अब तो उनको सतसंग कहने से लज्जा आती है।हक़ तो एक रब ही है, जिसके लिए कहा जाता है संग तारे.... कुसंग बोरे.....। कुसंग इख्तिलाफी फितने के दौर के इन्सानों का। हक़ की सोहबत तो एक ही है। अभी तुमको वण्डर लगता है। तमाम खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आखिर का इल्म कैसे रब देते हैं, तुमको तो ख़ुशी होनी चाहिए। तुम सच्चे-सच्चे दारूल उलूम में बैठे हो। बाक़ी सब हैं झूठे दारूल उलूम, उन इज्तेमाअ वगैरह से कुछ भी बनकर निकलते नहीं। स्कूल-कॉलेज वगैरह से फिर भी कुछ बनकर निकलते हैं क्योंकि पढ़ते हैं। बाक़ी कहाँ भी तालीम नहीं है। इज्तेमाअ को तालीम नहीं कहेंगे। सहीफें वगैरह तो पढ़कर फिर दुकान खोल बैठते हैं, पैसा कमाते हैं। क़िताब थोड़ा सीखकर, गुरूद्वारा खोल बैठ जाते हैं। गुरूद्वारे भी कितने खोलते हैं। गुरू का द्वार यानि कि घर कहेंगे ना। फाटक खुलता है, वहाँ जाकर सहीफें वगैरह पढ़ते हैं। तुम्हारा गुरुद्वारा है - निजात और दारूल ज़िन्दगी ए निजात का, हक़ीक़ी हादी का दरवाज़ा। हक़ीक़ी हादी का नाम क्या है?ला फ़ानी मुजस्सम। हक़ीक़ी हादी को ला फ़ानी मुजस्सम कहते हैं, वह आकर निजात-ज़िन्दग़ी ए निजात का दरवाज़ा खोलते हैं। ला फ़ानी मुजस्सम हैं ना। जिसको मौत भी खा नहीं सकती। रूह है ही नुक्ता, उनको मौत कैसे खायेगा। वह रूह तो जिस्म छोड़कर भाग जाती है। इन्सान समझते थोड़े ही हैं कि एक पुराना जिस्म छोड़ फिर जाए दूसरा लेगी। फिर इसमें रोने की क्या दरकार है। यह तुम जानते हो-ड्रामा अबदी बना हुआ है। हर एक को पार्ट बजाना ही है। रब ने समझाया है - जन्नत में हैं खात्मा ए लगाव। लगाव फ़तहयाब की भी कहानी है ना। पण्डित लोग सुनाते हैं, मातायें भी सुन-सुन कर फिर सहीफें रख बैठ जाती हैं - सुनाने के लिए। निहायत इन्सान जाकर सुनते हैं। उनको कहा जाता है कनरस। ड्रामा प्लैन के मुताबिक़ इन्सान तो कहेंगे हमारी ख़राबी क्या है। रब फ़रमाते हैं तुम हमको बुलाते हो कि दु:ख की दुनिया से ले जाओ। अब मैं आया हूँ तो मेरा सुनना चाहिए ना। रब बच्चों को बैठ समझाते हैं, अच्छी सलाह मिलती है तो वह लेनी चाहिए ना। तुम्हारी भी कोई खराबी नहीं है। यह भी ड्रामा था। इलाही सल्तनत, शैतानी सल्तनत का खेल बना हुआ है। खेल में कोई हार जाते हैं तो उनकी खराबी थोड़े ही है। फ़तह और हार होती है, इसमें लड़ाई की बात नहीं। तुमको बादशाहत थी। यह भी आगे तुमको मालूम नहीं था, अभी तुम समझते हो जो खिदमतगार हैं, जिसका नाम बाला है। देहली में सबसे नामीग्रामी समझाने वाला कौन है? तो झट नाम लेंगे जगदीश का। तुम्हारे लिए मैगज़ीन भी निकालते हैं। उसमें सब कुछ आ जाता है। कई तरह की प्वाइंट्स लिखते हैं, बृजमोहन भी लिखते हैं। लिखना कोई मासी का घर थोड़े ही है। ज़रूर इरादा ए ग़ौरतलब करते हैं, अच्छी खिदमत करते हैं। कितने लोग पढ़कर ख़ुश होते हैं। बच्चों को भी रिफ्रेशमेंट मिलती है। कोई कोई नुमाइश में निहायत माथा मारते हैं, कोई-कोई बन्दिश ए आमाल में फंसे हुए हैं, इसलिए इतना उठा नहीं सकते हैं। यह भी कहेंगे ड्रामा, अबलाओं पर भी ज़ुल्म होने का ड्रामा में पार्ट है। ऐसा पार्ट क्यों बजाया, यह सवाल ही नहीं उठता। यह तो अबदी बना बनाया ड्रामा है। उनको कुछ कर थोड़े ही सकते हैं। कोई कहते हैं हमने गुनाह क्या किया जो ऐसा पार्ट रखा है। अब गुनाह की तो बात नहीं। यह तो पार्ट है। अबलायें कोई तो ज़रिया बनेंगी, जिन पर सितम होंगे। ऐसे तो फिर सब कहेंगे हमको यह पार्ट क्यों? नहीं, यह बना-बनाया ड्रामा है। मर्दों पर भी सितम होते हैं। इन बातों में बर्दाश्त नशीनी कितनी रखनी पड़ती है। निहायत बर्दाश्त नशीनी चाहिए। इबलीस की मुश्किलात तो निहायत पड़ेंगी। दुनिया की बादशाहत लेते हो तो कुछ मेहनत करनी पड़े। ड्रामा में आफ़तें, खिटपिट वगैरह कितनी है। अबलाओं पर ज़ुल्म लिखा हुआ है। खून की नदियाँ भी बहेंगी। कहाँ भी सेफ्टी नहीं रहेगी। अभी तो सुबह को क्लास वगैरह में जाते हो, सेन्टर्स पर। वह भी वक़्त आयेगा जो तुम बाहर निकल भी नहीं सकेंगे। रोज़-ब-रोज़ ज़माना बिगड़ता जाता है और बिगड़ना है। दु:ख के दिन निहायत ज़ोर से आयेंगे। बीमारी वगैरह में दु:ख होता है तो फिर अल्ल्लाह् ताला को याद करते, पुकारते हैं। अभी तुमको मालूम है बाक़ी थोड़े दिन हैं। फिर हम अपने दारूल सुकून, दारूल मसर्रत ज़रूर जायेंगे। दुनिया को तो यह भी मालूम नहीं है। अभी तुम बच्चे फील करते हो ना। अभी रब को पूरी तरह जान गये हैं। वह सब तो समझते हैं परमात्मा लिंग है। शिवलिंग की पूजा भी करते हैं। तुम शिव के मन्दिर में जाते थे, कभी यह ख्याल किया कि शिवलिंग क्या चीज़ है? ज़रूर यह जड़ है तो चैतन्य भी होगा! यह तब क्या है? अल्ल्लाह् ताला तो खालिक है ऊपर में। उनकी निशानी है सिर्फ़ इबादत के लिए। क़ाबिल ए एहतराम होंगे तो फिर यह चीज़ें नहीं होंगी। शिव काशी के मंदिर में जाते हैं, किसको मालूम थोड़े ही है अल्ल्लाह् ताला ग़ैर मुजस्सम है। हम भी उनके बच्चे हैं। रब के बच्चे होकर फिर हम दु:खी क्यों हैं? ख्याल करने की बात है ना। रूह कहती है हम पाक परवरदिगार की औलाद हैं फिर हम दु:खी क्यों हैं? रब तो है ही ख़ुशी देने वाला। बुलाते भी हैं - या अल्ल्लाह्, हमारे दु:ख मिटाओ। वह कैसे मिटाये? दु:ख-सुख यह तो अपने आमालों का हिसाब है। इन्सान समझते हैं सुख का एवज़ा सुख, दु:ख का एवज़ा दु:ख पाक परवरदिगार ही देते हैं। उन पर रख देते हैं, रब फ़रमाते हैं मैं कभी दु:ख नहीं देता हूँ। मैं तो आधा-कल्प के लिए सुख देकर जाता हूँ। यह फिर सुख और दु:ख का खेल है। सिर्फ़ सुख का ही खेल होता फिर तो यह अकीदत मन्दी वगैरह कुछ न हो, अल्ल्लाह् ताला से मिलने के लिए ही यह अकीदत मन्दी वगैरह तमाम करते हैं ना। अब रब बैठ तमाम अखबार सुनाते हैं। रब फ़रमाते हैं तुम बच्चे कितने क़िस्मत नशीन हो। उन औलिया ए क़िराम-असफ़िया ए क़िराम वगैरह का कितना नाम है। तुम हो राज ऋषि, वह हैं हठयोग ऋषि। ऋषि यानि कि पाकीज़ा। तुम जन्नत के बादशाह बनते हो तो पाकीज़ा ज़रूर बनना पड़े। आला जन्नत-अदना जन्नत में जिनकी सल्तनत थी उनकी ही फिर होगी। बाक़ी तमाम पीछे आयेंगे। तुम अभी कहते हो हम सिरात ए मुस्तकीम पर अपनी सल्तनत क़ायम कर रहे हैं। पुरानी दुनिया की तबाही होने में भी वक़्त तो लगेगा ना। सुनहरे दौर में आना है, इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर को जाना है।
कितनी बड़ी दुनिया है। एक-एक शहर इन्सानों से कितने भरे हुए है। दौलत मन्द इन्सान दुनिया का चक्कर लगाते हैं। मगर यहाँ तमाम दुनिया को कोई देख न सके। हाँ सुनहरे दौर में देख सकते हैं क्योंकि सुनहरे दौर में है ही एक सल्तनत, इतने थोड़े बादशाह होंगे, यहाँ तो देखो कितनी बड़ी दुनिया है। इतनी बड़ी दुनिया का चक्कर कौन लगाये। वहाँ तुमको समुन्दर में जाने का नहीं है। वहाँ सीलॉन, बर्मा वगैरह होंगे? नहीं, कुछ भी नहीं। यह करांची नहीं होगी। तुम सब मीठी नदियों के किनारे पर रहते हो। खेती बाड़ी वगैरह तमाम होती है, खिल्क़त तो बड़ी है। इन्सान निहायत थोड़े रहते हैं फिर पीछे इज़ाफ़ा होता है। फिर वहाँ जाकर अपनी सल्तनत क़ायम की। आहिस्ता-आहिस्ता हप करते गये। अपनी सल्तनत क़ायम कर दिया। अभी तो सबको छोड़ना पड़ता है। एक हिन्दुस्तान ही है, जिसने किसी की भी सल्तनत छीनी नहीं है क्योंकि हिन्दुस्तान असुल में इद्दम तशदिद है ना। हिन्दुस्तान ही तमाम दुनिया का मालिक था और सब पीछे आये हैं जो टुकड़े-टुकड़े लेते गये हैं। तुमने कोई को हप नहीं किया है, अंग्रेजों ने हप कर लिया है। तुम हिन्दुस्तान रिहाईश नशीनियों को तो रब दुनिया का मालिक बनाते हैं। तुम कहाँ गये थोड़े ही हो। तुम बच्चों की अक्ल में यह तमाम बातें हैं, बुज़ुर्ग मातायें तो इतना सब समझ न सकें। रब फ़रमाते हैं अच्छा है जो तुम कुछ भी पढ़ी नहीं हो। पढ़ा हुआ सब अक्ल से निकालना पड़ता है, एक बात सिर्फ़ इख्तियार करनी है - मीठे बच्चे रब को याद करो। तुम कहते भी थे ना रब्बा आप आयेंगे तो हम वारी जायेंगे, कुर्बान जायेंगे। तुम्हें फिर हमारे पर कुर्बान जाना है। लेन-देन होती है ना। शादी के टाइम ख्वातीन-हज़रात एक दो के हाथ में नमक देते हैं। रब को भी कहते हैं, हम पुराना सब कुछ आपको देते हैं। मरना तो है, यह सब ख़त्म होना है। आप हमको फिर नई दुनिया में देना। रब आते ही हैं सबको ले जाने। मौत है ना। सिन्ध में कहते थे - यह कौन सा काल है जो सबको भगाकर ले जाते हैं, तुम बच्चे तो ख़ुश होते हो। रब आते ही हैं ले जाने। हम तो ख़ुशी से अपने घर जायेंगे। बर्दाश्त भी करना पड़ता है। अच्छे-अच्छे बड़े-बड़े घर की मातायें मारें खाती हैं। तुम सच्ची कमाई करते हो। इन्सान थोड़े ही जानते हैं, वह हैं ही इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के यज़ीदी फिरक़ा। तुम हो मिलन के दौर नशीन,रूह ए अफ़ज़ल बन रहे हो। जानते हो पहले नम्बर में रूह ए अफ़ज़ल यह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम हैं ना। फिर डिग्री कम होती जायेगी। ऊपर से नीचे आते रहेंगे। फिर आहिस्ते-आहिस्ते गिरते रहेंगे। इस वक़्त सब गिर चुके हैं। दरख़्त पुराना हो चुका है, तना सड़ गया है। अब फिर क़याम होती है। फाउन्डेशन लगता है ना। कलम कितना छोटा होता है फिर उनसे कितना बड़ा दरख्त बढ़ जाता है। यह भी दरख्त है, सुनहरे दौर में निहायत छोटा दरख्त होता है। अब कितना बड़ा दरख्त है। वैराइटी फूल कितने हैं, इन्सानी ख़िल्क़त के। एक ही दरख्त में कितनी वैराइटी है। अनेक वैराइटी मज़हबों का दरख्त है इन्सानों का। एक सूरत न मिले दूसरे से। बना-बनाया ड्रामा है ना। एक जैसा पार्ट कोई का हो नहीं सकता। इनको कहा जाता है कुदरती बना-बनाया बेहद का ड्रामा, इनमें भी बनावट निहायत है। जो चीज़ रीयल होती है वह ख़त्म भी होती है। फिर 5 हज़ार साल के बाद रीयल्टी में आयेंगे। तस्वीर वगैरह भी कोई रीयल बनी हुई थोड़े ही हैं। आदम अलैहिस्सलाम की भी शक्ल फिर 5 हज़ार साल बाद तुम देखेंगे। इस ड्रामा के राज़ को समझने में अक्ल बड़ी विशाल चाहिए। और कुछ न समझो सिर्फ़ एक बात अक्ल में रखो - एक पाक परवरदिगार दूसरा न कोई। यह रूह ने कहा - रब्बा, हम आपको ही याद करेंगे। यह तो आसान है ना। हाथों से आमाल करते रहो और अक्ल से रब को याद करते रहो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1.बर्दाश्त नशीनी की फ़ज़ीलत इख्तियार कर इबलीस की मुश्किलात में पास होना है। अनेक आफ़तें आयेंगी, ज़ुल्म होंगे-ऐसे वक़्त पर बर्दाश्त करते रब की याद में रहना है, सच्ची कमाई करनी है।

2. वसीअ अक्ल बन इस बने बनाये ड्रामा को अच्छी तरह समझना है, यह कुदरती ड्रामा बना हुआ है इसलिए सवाल उठ नहीं सकता। रब जो अच्छी सलाह देते हैं, उस पर चलते रहना है।

बरक़ात:-
रब जैसे बरक़ाती बन हर एक के दिल को आराम देने वाले मास्टर दिलाराम बनो।

जो रब जैसे बरक़ाती मुजस्सम बच्चे हैं वह कभी किसी की कमज़ोरी को नहीं देखते, वह सबके ऊपर रहमदिल होते हैं। जैसे रब किसी की कमज़ोरियां दिल पर नहीं रखते ऐसे बरक़ाती बच्चे भी किसी की कमज़ोरी दिल में इख्तियार नहीं करते, वे हरेक की दिल को आराम देने वाले मास्टर दिलाराम होते हैं इसलिए साथी हो या अवाम तमाम उनका तारीफ़ करते हैं। तमाम के अन्दर से यही बरक़ात निकलती है कि यह हमारे हमेशा प्यारे, मददगार हैं।

स्लोगन:-
मिलन के दौर पर अफ़ज़ल रूह वह है जो हमेशा बेफिक्र बादशाह है।

आमीन