14-10-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
मिलन के दौर पर ही तुम्हें रूहानी हवासी बनने की मेहनत करनी पड़ती सुनहरे दौर या इख्तिलाफी फितने के दौर में यह मेहनत होती नहीं

सवाल:-
आदम अलैहिस्सलाम का नाम उनके माँ बाप से भी ज़्यादा बाला है, क्यों?

जवाब:-
क्योंकि आदम अलैहिस्सलाम से पहले जिनकी भी विलादत होती है वो विलादत कुव्वत ए इबादत से नहीं होती। आदम अलैहिस्सलाम के माँ बाप ने कोई कुव्वत ए इबादत से विलादत नहीं लिया है। 2- पूरी मुकम्मल नशीनी हालत वाले हव्वा अलैहिस्सलाम और आदम अलैहिस्सलाम ही हैं, वही ख़ैर निजात को पाते हैं। जब तमाम गुनाहगार रूहें ख़त्म हो जाती हैं तब गुलगुल (पाकीज़ा) नई दुनिया में आदम अलैहिस्सलाम की विलादत होती है, उसे ही फिरदौस कहा जाता है। 3- मिलन पर आदम अलैहिस्सलाम की रूह ने, सबसे ज़्यादा तजवीज़ किया है इसलिए उनका नाम बाला है।

आमीन।
मीठे-मीठे रूहानी बच्चों को रूहानी रब बैठ समझाते हैं। 5 हज़ार साल के बाद एक ही बार बच्चों को आकर तालीम देते हैं, पुकारते भी हैं कि हम नापाकों को आकर पाकीज़ा बनाओ। तो साबित होता है कि यह नापाक दुनिया है। नई दुनिया, पाकीज़ा दुनिया थी। नया मकान खूबसूरत होता है। पुराना जैसे टूटा फूटा हो जाता है। बरसात में गिर पड़ता है। अभी तुम बच्चे जानते हो रब आया है नई दुनिया बनाने। अभी तालीम दे रहे हैं। फिर 5 हज़ार साल के बाद पढ़ायेंगे। ऐसे कभी कोई राहिब-वली वगैरह अपने फालोअर्स को नहीं पढ़ायेंगे। उनको यह मालूम ही नहीं है। न खेल का मालूम है क्योंकि बे नियाज़ी वाले हैं। रब बिगर कोई भी खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का राज़ समझा न सके। रूहानी हवासी बनने में ही बच्चों को मेहनत होती है क्योंकि आधाकल्प में तुम कभी रूहानी हवासी बने नहीं हो। अब रब फ़रमाते हैं अपने को रूह समझो। ऐसे नहीं कि रूह सो रब। नहीं, अपने को रूह समझ पाक परवरदिगार को याद करना है। याद का सफ़र अहम है, जिससे ही तुम नापाक से पाक बनते हो। इसमें कोई मैकरू बात नहीं। कोई नाक कान वगैरह नहीं बन्द करना है। असल बात है - अपने को रूह समझ रब को याद करना। तुम आधाकल्प से हिरे हुए हो - जिस्मानी हवास में रहने के। पहले अपने को रूह समझेंगे तब रब को याद कर सकेंगे। अकीदत मन्दी में भी रब्बा-रब्बा कहते आते हैं। बच्चे जानते हैं सुनहरे दौर में एक ही जिस्मानी बाप है। वहाँ रूहानी बाप को याद नहीं करते हैं क्योंकि ख़ुशी है। अकीदत मन्दी की राह में फिर दो बाप बन जाते हैं। जिस्मानी और रूहानी। दु:ख में सब रूहानी बाप को याद करते हैं। सुनहरे दौर में अकीदत मन्दी होती नहीं। वहाँ तो है ही इल्म का उजुरा । ऐसे नहीं कि इल्म रहता है। इस वक़्त के इल्म का उजुरा मिलता है। रब तो एक ही बार आते हैं। आधाकल्प बेहद के बाप का, ख़ुशी का वर्सा रहता है। फिर जिस्मानी बाप से कलील अरसे का वर्सा मिलता है। यह इन्सान नहीं समझा सकते। यह है नई बात, 5 हज़ार साल में मिलन के दौर पर एक ही बार रब आते हैं। जबकि इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर का आखिर, आला जन्नत का आग़ाज़ का मिलन होता है तब ही रब आते हैं - नई दुनिया फिर से क़ायम करने। नई दुनिया में इन आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत थी फिर अदना जन्नत में नूह अलैहिस्सलाम की सल्तनत थी। बाक़ी हूरैन वगैरह के जो इतनी तस्वीर बनायी हैं वह सब हैं अकीदत मन्दी की राह की चीज़ें। रब फ़रमाते हैं इन सबको भूल जाओ। अभी अपने घर को और नई दुनिया को याद करो।
इल्म की राह है समझ की राह, जिससे तुम 21 विलादत समझदार बन जाते हो। कोई दु:ख नहीं रहता। आला जन्नत में कभी कोई ऐसे नहीं कहेंगे कि हमको सुकून चाहिए। कहा जाता है ना - मांगने से मरना भला। रब तुमको ऐसा दौलत मन्द बना देते हैं जो हूरैन को अल्ल्लाह् ताला से कोई चीज़ मांगने की दरकार नहीं रहती। यहाँ तो दुआ मांगते हैं ना। पोप वगैरह आते हैं तो कितने दुआ लेने जाते हैं। पोप कितनों की शादियाँ कराते हैं। बाबा तो यह काम नहीं करते। अकीदत मन्दी की राह में जो पास्ट हो गया है सो अब हो रहा है सो फिर रिपीट होगा। रोज़ ब रोज़ हिन्दुस्तान कितना गिरता जाता है। अभी तुम हो मिलन पर। बाक़ी सब हैं इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर नशीन इन्सान। जब तक यहाँ न आयें तब तक कुछ भी समझ न सकें कि अभी मिलन है या इख्तिलाफी फितने का दौर है? एक ही घर में बच्चे समझते हैं मिलन पर हैं, बाप कहेंगे हम इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में हैं तो कितनी तकलीफ़ हो पड़ती है। खान-पान वगैरह का भी झंझट हो पड़ता है। तुम मिलन के दौर नशीनी हो खालिस पाकीज़ा खाना खाने वाले। हूरैन कभी प्याज़ वगैरह थोड़े ही खाते हैं। इन हूरैन को कहा ही जाता है ग़ैर ख़बासती। अकीदत मन्दी की राह में तमाम स्याह रास्त बन गये हैं। अब रब फ़रमाते हैं सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनो। कोई भी ऐसा नहीं है जो समझें कि रूह पहले सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ थी फिर स्याह रास्त बनी है क्योंकि वह तो रूह को निर्लेप समझते हैं। रूह सो रब है, ऐसे-ऐसे कह देते हैं।
रब फ़रमाते हैं दरिया ए इल्म मैं ही हूँ, जो इस हूर-हूरैन दीन के होंगे वह सब आकर फिर से अपना वर्सा लेंगे। अभी सैपलिंग लग रही है। तुम समझ जायेंगे - यह इतना आला मर्तबा पाने लायक़ नहीं है। घर में जाकर शादियां वगैरह करते छी-छी होते रहते हैं। तो समझाया जाता है आला मर्तबा पा नहीं सकते। यह सल्तनत क़ायम हो रही है। रब फ़रमाते हैं - मैं तुमको राजाओं का राजा बनाता हूँ तो अवाम ज़रूर बनानी पड़े। नहीं तो सल्तनत कैसे पायेंगे। यह गीता के अल्फाज़ हैं ना - इनको कहा ही जाता है गीता का दौर। तुम हक़ीक़ी इबादत सीख रहे हो - जानते हो अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन का फाउन्डेशन लग रहा है। खानदान ए आफ़ताबी-खानदान ए महताबी दोनों सल्तनत क़ायम हो रही हैं। मोमिन खानदान क़ायम हो चुका है। मोमिन ही फिर खानदान ए आफ़ताबी - खानदान ए महताबी बनते हैं। जो अच्छी तरह मेहनत करेंगे वह खानदान ए आफ़ताबी बनेंगे। और मज़हब वाले जो आते हैं वह आते ही हैं अपने मज़हब को क़ायम करने। पीछे उस मज़हब की रूहें आती रहती हैं, मज़हब का इज़ाफा होता जाता है। समझो कोई क्रिश्चियन है तो उन्हों का बीजरूप क्राइस्ट ठहरा। तुम्हारा बीजरूप कौन है? रब, क्योंकि रब ही आकर जन्नत का क़याम करते हैं आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए। आदम अलैहिस्सलाम को ही बाप ए अवाम कहा जाता है।खालिक नहीं कहेंगे। इन के ज़रिए बच्चे एडाप्ट किये जाते हैं। आदम अलैहिस्सलाम को भी तो क्रियेट करते हैं ना। रब आकर दाख़िली कर यह तामीर करते हैं। पाक परवरदिगार फ़रमाते हैं तुम मेरे बच्चे हो। आदम अलैहिस्सलाम भी कहते हैं तुम मेरे जिस्मानी बच्चे हो। अभी तुम काले छी-छी बन गये हो। अब फिर मोमिन बने हो। इस मिलन पर ही तुम रूह ए अफ़ज़ल बनने की मेहनत करते हो। हूरैन को और यज़ीदों को कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती, तुम मोमिनों को मेहनत करनी पड़ती है हूरैन बनने के लिए। रब आते ही हैं मिलन पर। यह है निहायत छोटा दौर इसलिए इनको लीप दौर कहा जाता है। इनको कोई जानते नहीं। रब को भी मेहनत लगती है। ऐसे नहीं कि झट से नई दुनिया बन जाती है। तुमको हूरैन बनने में टाइम लगता है। जो अच्छे आमाल करते हैं तो अच्छे खानदान में विलादत लेते हैं। अभी तुम नम्बरवार तजवीज़ के मुताबिक गुल-गुल बन रहे हो। रूह ही बनती है। अभी तुम्हारी रूह अच्छे आमाल सीख रही है। रूह ही अच्छी और बुरी आदत ले जाती है। अभी तुम गुल-गुल (फूल) बन अच्छे घर में विलादत लेते रहेंगे। यहाँ जो अच्छी तजवीज़ करते हैं, तो ज़रूर अच्छे खानदान में विलादत लेते होंगे। नम्बरवार तो हैं ना। जैसे-जैसे आमाल करते हैं ऐसी विलादत लेते हैं। जब बुरे आमाल करने वाले बिल्कुल ख़त्म हो जाते हैं फिर जन्नत क़ायम हो जाती है, छांटछूट होकर।स्याह रास्त जो भी हैं वह ख़त्म हो जाते हैं। फिर नये हूरैन का आना शुरू होता है। जब बद उनवानी तमाम ख़त्म हो जाते हैं तब आदम अलैहिस्सलाम की विलादत होती है, तब तक बदली सदली होती रहती है। जब कोई छी-छी नहीं रहेगा तब आदम अलैहिस्सलाम आयेंगे, तब तक तुम आते जाते रहेंगे। आदम अलैहिस्सलाम को रिसीव करने वाले माँ बाप भी पहले से चाहिए ना। फिर तमाम अच्छे-अच्छे रहेंगे। बाक़ी चले जायेंगे, तब ही उसको जन्नत कहा जायेगा। तुम आदम अलैहिस्सलाम को रिसीव करने वाले रहेंगे। भल तुम्हारी छी-छी विलादत होगी क्योंकि शैतानी सल्तनत है ना। खालिस विलादत तो हो न सके। गुल-गुल (पाकीज़ा) विलादत आदम अलैहिस्सलाम की ही पहले-पहले होती है। उसके बाद नई दुनिया फिरदौस कहा जाता है। आदम अलैहिस्सलाम बिल्कुल गुल-गुल नई दुनिया में आयेंगे। शैतानी सल्तनत बिल्कुल ख़त्म हो जायेगी। आदम अलैहिस्सलाम का नाम उनके माँ-बाप से भी निहायत बाला है। आदम अलैहिस्सलाम के माँ-बाप का नाम इतना बाला नहीं है। आदम अलैहिस्सलाम से पहले जिनकी विलादत होती है वो कुव्वत ए इबादत से विलादत नहीं कहेंगे। ऐसे नहीं आदम अलैहिस्सलाम के माँ-बाप ने कुव्वत ए इबादत से विलादत लिया है। नहीं, अगर ऐसा होता तो उन्हों का भी नाम बाला होता। तो साबित होता है उनके माँ-बाप ने इतनी तजवीज़ नहीं किया है जितनी आदम अलैहिस्सलाम ने किया है। यह तमाम बातें आगे चल तुम समझते जायेंगे। पूरी मुकम्मल नशीनी हालत वाले आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम ही हैं। वही ख़ैर निजात में आते हैं। गुनाहगार रूहें तमाम ख़त्म हो जाती हैं तब उन्हों की विलादत होती है फिर कहेंगे पाकीज़ा दुनिया इसलिए आदम अलैहिस्सलाम का नाम बाला है। माँ-बाप का इतना नहीं। आगे चल तुमको निहायत दीदार ए जलवा होंगे। टाइम तो पड़ा है। तुम किसको भी समझा सकते हो - हम यह बनने के लिए तालीम हासिल कर रहे हैं। दुनिया में इनकी सल्तनत अब क़ायम हो रही है। हमारे लिए तो नई दुनिया चाहिए। अभी तुमको हूरैन फ़ज़ीलत नहीं कहेंगे। तुम हो मोमिन फिरका। हूरैन बनने वाले हो। हूरैन फिरके बन जायेंगे फिर तुम्हारी रूह और जिस्म दोनों खालिस होंगे। अभी तुम मिलन के दौर के तजवीज़ नशीन बनने वाले हो। यह तमाम मेहनत की बात है। याद से ख़बासत फ़तहयाब बनना है। तुम खुद कहते हो याद घड़ी-घड़ी भूल जाती है।बाबा पिकनिक पर बैठते हैं तो बाबा को ख्याल रहता है। हम याद में नहीं रहेंगे तो रब्बा क्या कहेंगे इसलिए रब्बा फ़रमाते हैं तुम याद में बैठ पिकनिक करो। आमाल करते माशूक को याद करो तो गुनाहों का ख़ात्मा होंगा, इसमें ही मेहनत है। याद से रूह पाकीज़ा होगी,ला फ़ानी इल्म की दौलत भी जमा होगा। फिर अगर नापाक बन जाते हैं तो तमाम इल्म बह जाता है। पाकीज़गी ही अहम है। रब तो अच्छी-अच्छी बात ही समझाते हैं। यह खिल्क़त के आग़ाज़ - दरम्यान-आख़िर का इल्म और कोई में भी नहीं है। और जो भी इज्तेमाअ वगैरह हैं वह तमाम हैं अकीदत मन्दी के।
रब्बा ने समझाया है - अकीदत असल में कुन्बाई राह वालों को ही करनी है। तुम्हारे में तो कितनी ताक़त रहती है। घर बैठे तुमको ख़ुशी मिल जाती है। तमाम कुव्वत नशीन रब से तुम इतनी ताक़त लेते हो।राहिबों में भी पहले ताक़त थी, जंगलों में रहते थे। अभी तो कितने बड़े-बड़े फ्लैट बनाकर रहते हैं। अभी वह ताक़त नहीं है। जैसे तुम्हारे में भी पहले ख़ुशी की ताक़त रहती है। फिर गुम हो जाती है। उन्हों में भी पहले सुकून की ताक़त थी, अब वह ताक़त नहीं रही है। आगे तो सच कहते थे कि खालिक और मख़लूक़ को हम नहीं जानते। अभी तो अपने को भगवान शिवोहम् कह बैठते हैं। रब समझाते हैं - इस वक़्त तमाम दरख्त स्याह रास्त है इसलिए राहिबों वगैरह का भी फ़लाह करने मैं आता हूँ। यह दुनिया ही बदलनी है। तमाम रूहें वापिस चली जायेंगी। एक भी नहीं जिसको यह मालूम हो कि हमारी रूह में ला फ़ानी पार्ट भरा हुआ है जो फिर से रिपीट करेंगे।रूह इतनी छोटी है, इनमें ला फ़ानी पार्ट भरा है जो कभी तबाह नहीं होता। इसमें अक्ल बड़ी अच्छी पाकीज़ा चाहिए। वह तब होगी जब याद के सफ़र में मस्त रहेंगे। मेहनत सिवाए मर्तबा थोड़े ही मिलेगा इसलिए गाया जाता है चढ़े तो चाखे....... कहाँ आला ते आला बादशाहों का बादशाह डबल सिरताज, कहाँ अवाम । तालीम देने वाला तो एक ही है। इसमें समझ बड़ी अच्छी चाहिए। रब्बा बार-बार समझाते हैं याद का सफ़र है अहम। मैं तुमको तालीम दे कर दुनिया का मालिक बनाता हूँ। तो उस्ताद, हादी भी होगा। रब तो है ही उस्तादों का उस्ताद, बापों का बाप। यह तो तुम बच्चे जानते हो हमारा रब्बा निहायत प्यारा है। ऐसे रब को तो निहायत याद करना है। पढ़ना भी पूरा है। रब को याद नहीं करेंगे तो गुनाह ख़ाक़ नहीं होंगे। रब तमाम रूहों को साथ ले जायेंगे। बाक़ी जिस्म तमाम ख़त्म हो जायेंगे। रूहें अपने-अपने मज़हब के सेक्शन में जाकर रिहाईश करती हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. अक्ल को पाकीज़ा बनाने के लिए याद के सफ़र में मस्त रहना है। आमाल करते भी एक माशूक याद रहे - तब गुनाह फ़तहयाब बनेंगे।

2. इस छोटे से दौर में इन्सान से हूरैन बनने की मेहनत करनी है। अच्छे आमालों के मुताबिक अच्छी आदतों को इख्तियार कर अच्छे खानदान में जाना है।

बरक़ात:-
जहान के नूर बन अक़ीदत मन्दों को नज़र से निहाल करने वाले दीदार ए नज़र नशीन बनो।

तमाम दुनिया आप जहान के आंखों की नज़र लेने के लिए इंतज़ार में है। जब आप जहान के नूर अपनी मुकम्मल स्टेज तक पहुचेंगे यानि कि मुकम्मल नशीनी हालत की आंख खोलेंगे तब सेकण्ड में दुनिया तब्दील होगी। फिर आप दीदार ए नज़र नशीन रूहें अपनी नज़र से अकीदत मन्द रूहों को निहाल कर सकेंगी। नज़र से निहाल होने वालों की लम्बी क्यू है इसलिए मुकम्मल नशीनी की आंख खुली रहे। आंखों का मलना और इरादों का घुटका और झुटका खाना बन्द करो तब दीदार ए नज़र नशीन बन सकेंगे।

स्लोगन:-
नरमाई वाला रवैया हलीमी की निशानी है। नरम खूं बनो तो कामयाबी मिलेगी।

आमीन