15-09-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
रब आये हैं तुम्हें इल्म की तीसरी आंख देने, जिससे तुम खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर को जानते हो''

सवाल:-
शेरनी कुव्वतैन ही कौन सी बात हिम्मत के साथ समझा सकती हैं?

जवाब:-
दूसरे मज़हब वालों को यह बात समझाना है कि रब फ़रमाते हैं तुम अपने को रूह समझो, पाक परवरदिगार नहीं। रूह समझकर रब को याद करो तो गुनाहों का ख़ात्मा होंगा और तुम दारूल निजात में चले जायेंगे। पाक परवरदिगार समझने से तुम्हारे गुनाहों का ख़ात्मा नहीं हो सकता। यह बात निहायत हिम्मत से शेरनी कुव्वतैन ही समझा सकती हैं। समझाने की भी प्रेक्टिस चाहिए।

नग़मा:-
नयन हीन को राह दिखाओ........

आमीन।
बच्चे एहसास कर रहे हैं - रूहानी याद के सफ़र में मुश्किलात देखने में आती है। अकीदत मन्दी की राह में दर-दर ठोकरें खानी ही होती हैं। कई तरह की तस्बीह-नमाज़-सदक़ा करते, सहीफें वगैरह पढ़ते हैं, जिस के सबब ही आदम अलैहिस्सलाम की रात कहा जाता है। आधाकल्प रात, आधाकल्प दिन। आदम अलैहिस्सलाम अकेले तो नहीं होंगे ना। बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम है तो ज़रूर उनके बच्चे आदमज़ादा - आदमज़ादियां भी होंगी। मगर इन्सान नहीं जानते हैं। रब ही बच्चों को इल्म का तीसरी आंख देते हैं, जिससे तुमको खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का इल्म मिला हुआ है। तुम कल्प पहले भी मोमिन थे और हूरैन बने थे, जो बने थे वही फिर बनेंगे। अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन के तुम हो। तुम ही काबिल ए एहतराम और नाकाबिल बनते हो। इंग्लिश में काबिल ए एहतराम को वर्शिपवर्दी (Worshipworthy) और नाकाबिल को वर्शिपर (Worshiper) कहा जाता है। हिन्दुस्तान ही आधाकल्प नाकाबिल बनता है। रूह मानती है हम काबिल ए एहतराम थे फिर हम ही नाकाबिल बने हैं। काबिल ए एहतराम से नाकाबिल फिर काबिल ए एहतराम बनते हैं। रब तो काबिल ए एहतराम नाकाबिल नहीं बनते। तुम कहेंगे हम काबिल ए एहतराम पाकीज़ा सो हूर-हूरैन थे फिर 84 विलादतों के बाद कम्पलीट नापाक नाकाबिल बन जाते हैं। अभी हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन जो अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन वाले थे, उन्हों को अपने दीन का कुछ भी मालूम नहीं है। तुम्हारी इन बातों को तमाम दीन वाले नहीं समझेंगे, जो इस दीन के कहाँ कनवर्ट हो गये होंगे, वही आयेंगे। ऐसे कनवर्ट तो निहायत हो गये हैं। रब फ़रमाते हैं जो पाक परवरदिगार और हूरैन के इबादतगार हैं, उनको आसान है। बाक़ी मज़हब वाले माथा खपायेंगे, जो कनवर्ट होगा उनको टच होगा। और आकर समझने की कोशिश करेंगे। नहीं तो मानेंगे नहीं। आर्य समाजियों में से भी निहायत आये हुए हैं। सिक्ख लोग भी आये हुए हैं। अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन जो कनवर्ट हो गये हैं, उनको अपने मज़हब में ज़रूर आना पड़ेगा। दरख़्त में भी अलग-अलग सेक्शन हैं। फिर आयेंगे भी नम्बरवार। टाल-टालियाँ निकलती रहेंगी। वह पाकीज़ा होने सबब उन्हों का असर अच्छा निकलता है। इस वक़्त हूर हूरैन मज़हब का फाउन्डेशन है नहीं जो फिर लगाना पड़ता है। बहन-भाई तो बनाना ही पड़े। हम एक बाप के बच्चे तमाम रूहें भाई-भाई हैं। फिर भाई-बहन बनते हैं। अब जैसे कि नई खिल्क़त का क़याम हो रहा है, पहले-पहले हैं मोमिन। नई ख़िल्क़त के क़याम में बाप ए अवाम तो ज़रूर चाहिए। आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए मोमिन होंगे। इनको अल्ल्लाह् ताला इल्म यज्ञ भी कहा जाता है, इसमें मोमिन ज़रूर चाहिए। बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम की औलाद ज़रूर चाहिए। वह है ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर। मोमिन हैं पहले नम्बर में चोटी वाले। आदम बीबी, एडम ईव को मानते भी हैं। इस वक़्त तुम नाकाबिल से काबिल ए एहतराम बन रहे हो। तुम्हारा सबसे अच्छा यादगार मन्दिर देलवाड़ा मन्दिर है। नीचे इबादत में बैठे हैं, ऊपर में बादशाहत और यहाँ तुम ज़िन्दा बैठे हो। यह मन्दिर खलास हो जायेंगे फिर अकीदत मन्दी की राह में बनेंगे।
तुम जानते हो अभी हम हक़ीक़ी इबादत सीख रहे हैं फिर नई दुनिया में जायेंगे। वह जड़ मन्दिर, तुम ज़िन्दा बैठे हो। अहम मन्दिर यह दुरुस्त बना हुआ है। जन्नत को नहीं तो कहाँ दिखायें, इसलिए छत में जन्नत को दिखाया है। इस पर निहायत अच्छा समझा सकते हो। बोलो, हिन्दुस्तान ही जन्नत था फिर अब हिन्दुस्तान जहन्नुम है। इस मज़हब वाले झट समझेंगे। हिन्दुओं में भी देखेंगे तो कई तरह के मज़हबों में जाकर पड़े हैं। तुमको निहायत मेहनत करनी पड़ती है निकालने में। रब्बा ने समझाया है अपने को रूह समझ दिल से मुझे याद करो, बस, और कुछ बात ही नहीं करना चाहिए। जिनकी प्रेक्टिस नहीं, उनको तो बात करनी भी नहीं चाहिए। नहीं तो बी.के. का नाम बदनाम कर देते हैं। अगर दूसरे मज़हब वाले हैं तो समझाना चाहिए कि यदि तुम दारूल निजात में जाना चाहते हो तो अपने को रूह समझो, रब को याद करो। अपने को पाक परवरदिगार नहीं समझो। अपने को रूह समझ रब को याद करेंगे तो तुम्हारे विलादत दर विलादत के गुनाह कट जायेंगे और दारूल निजात में चले जायेंगे। तुम्हारे लिए यह दिल से मुझे याद करो की तस्बीह ही बस है। मगर बात करने की हिम्मत चाहिए। शेरनी कुव्वतैन ही खिदमत कर सकती हैं। सन्यासी लोग बाहर में जाकर विलायत वालों को ले आते हैं कि चलो तुमको स्प्रीचुअल नॉलेज देवें। अब वह रब को तो जानते ही नहीं। ब्रह्म को भगवान समझ कह देते, इसको याद करो। बस यह मंत्र दे देते हैं, जैसे किसी चिड़िया को अपने पिंजड़े में डाल देते हैं। तो ऐसे-ऐसे समझाने में भी टाइम लगता है। रब्बा ने फ़रमाया था-हर एक तस्वीर के ऊपर लिखा हुआ हो पाक परवरदिगार ने फ़रमाया।
तुम जानते हो इस दुनिया में धनी बिगर तमाम यतीम हैं। पुकारते हैं तुम मात-पिता.... अच्छा उनका मतलब क्या? ऐसे ही बोलते रहते तुम्हारी बरक़ात से ख़ुशी बेइंतहा। अब रब तुमको जन्नत की ख़ुशी के लिए तालीम दे रहे हैं, जिसके लिये तुम तजवीज़ कर रहे हो। जो करेगा वह पायेगा। इस वक़्त तो तमाम नापाक हैं। पाकीज़ा दुनिया तो एक जन्नत ही है, यहाँ कोई भी सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ हो न सके। सुनहरे दौर में जो ख़ैर रास्त थे, वही स्याह रास्त नापाक बन जाते हैं। क्राइस्ट के पिछाड़ी जो उनके मज़हब वाले आते हैं, वह तो पहले सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ होंगे ना। जब लाखों की अन्दाज़ में होते हो तब लश्कर तैयार होता है, लड़कर बादशाही लेने। उनको ख़ुशी भी कम तो ग़म भी कम। तुम्हारे जैसी ख़ुशी तो किसको मिल न सके। तुम अभी तैयार हो रहे हो - दारूल मसर्रत में आने के लिए। बाक़ी तमाम मज़हब कोई जन्नत में थोड़े ही आते हैं। हिन्दुस्तान जब जन्नत था तो उन जैसा पाकीज़ा खण्ड कोई होता नहीं। जब रब आते हैं तब ही इलाही सल्तनत क़ायम होती है। वहाँ जंग वगैरह की बात नहीं। लड़ना-झगड़ना तो निहायत पीछे शुरू होता है। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन इतना नहीं लड़े हैं। थोड़े आपस में लड़कर अलग हो गये हैं। द्वापर में एक-दो पर चढ़ाई करते हैं। यह तस्वीर वगैरह बनाने में भी बड़ी अक्ल चाहिए। यह भी लिखना चाहिए कि हिन्दुस्तान जो जन्नत था सो फिर जहन्नुम जैसा कैसे बना है, आकर समझो। भारत ख़ैर रफ़्तार में था, अब बुरी रफ़्तार में है। अब ख़ैर निजात को पाने के लिए रब ही नॉलेज देते हैं। इन्सान में यह रूहानी नॉलेज होती नहीं। यह होती है पाक परवरदिगार ए आलम में। रब यह नॉलेज देते हैं रूहों को। बाक़ी तो तमाम इन्सान, इन्सानो को ही देते हैं। सहीफें भी इन्सानों ने लिखे हैं, इन्सानों ने पढ़े हैं। यहाँ तो तुम्हें रूहानी रब तालीम देते हैं और रूह तालीम हासिल करती है। तालीम हासिल करने वाली तो रूह है ना। वह लिखने और पढ़ने वाले इन्सान ही हैं। पाक परवरदिगार को तो सहीफें वगैरह पढ़ने की दरकार नहीं। रब फ़रमाते हैं इन सहीफों वगैरह से किसकी भी ख़ैर निजात हो नहीं सकती। मुझे ही आकर सबको वापस ले जाना है। अभी तो दुनिया में करोड़ों इन्सान हैं। सुनहरे दौर में जब इन आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत था तो वहाँ 9 लाख होते हैं। निहायत छोटा दरख्त होगा। फिर इरादा करो इतनी तमाम रूहें कहाँ गई? ब्रह्म में और पानी में तो नहीं जज़्ब हो गई। वह तमाम आलम ए अरवाह में रहती हैं। हर एक रूह ला फ़ानी है। उनमें ला फ़ानी पार्ट नूंधा हुआ है जो कभी मिट नहीं सकता। रूह फ़ना हो न सके। रूह तो नुक्ता है। बाक़ी बरज़ख वगैरह में कोई भी जाता नहीं, सबको पार्ट बजाना ही है। जब तमाम रूहें आ जाती हैं तब मैं आकर सबको ले जाता हूँ। पिछाड़ी में है ही रब का पार्ट। नई दुनिया का क़याम फिर पुरानी दुनिया की तबाही । यह भी ड्रामा में नूंध है। तुम आर्य समाजियों के झुण्ड को समझायेंगे तो उसमें जो कोई इस हूरैन दीन का होगा उनको टच होगा। बरोबर यह बात तो दुरुस्त है, पाक परवरदिगार सब तरफ़ मौजूद कैसे हो सकता। अल्ल्लाह् ताला तो बाप है, उनसे वर्सा मिलता है। कोई आर्य समाजी भी तुम्हारे पास आते हैं ना। उनको ही सैपलिंग कहा जाता है। तुम समझाते रहो फिर तुम्हारे खानदान का जो होगा वह आ जायेगा। अल्ल्लाह् ताला बाप ही पाकीज़ा होने का तरीक़ा बताते हैं। अल्ल्लाह् ताला फ़रमाते हैं दिल से मुझे याद करो। मैं नापाक से पाक बनाने वाला हूँ, मुझे याद करने से तुम्हारे गुनाह ख़ाक होंगे और आलम ए अरवाह में आ जायेंगे। यह पैगाम तमाम दीन वालों के लिए है। बोलो, रब फ़रमाते हैं जिस्म के तमाम दीन छोड़ मुझे याद करो तो तुम स्याह रास्त से ख़ैर रास्त बन जायेंगे। मैं गुजराती हूँ, फलाना हूँ - यह सब छोड़ो। अपने को रूह समझो और रब को याद करो। यह है इबादत की आग। सम्भाल कर कदम उठाना है। सब नहीं समझेंगे। रब फ़रमाते हैं - नापाक से पाक बनाने वाला मैं ही हूँ। तुम सब हो नापाक, दारूल निजात में भी पाकीज़ा होने बिगर आ न सकें। खालिक़ के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर को भी समझना है। पूरा समझने से ही आला मर्तबा पायेंगे। थोड़ी अकीदत मन्दी की होगी तो थोड़ा इल्म समझेंगे। निहायत अकीदत मन्दी की होगी तो निहायत इल्म उठायेंगे। रब जो समझाते हैं उसको इख्तियार करना है। बुज़ुर्गों के लिए और ही आसान है। घरेलू राब्ते से किनारा कर लेते हैं। बुज़ुर्ग हालत 60 साल के बाद होती है। हादी भी तब करते हैं। आजकल तो छोटेपन में ही हादी करा देते हैं। नहीं तो पहले बाप, फिर उस्ताद फिर 60 साल के बाद हादी किया जाता। ख़ैर निजात देने वाला तो एक ही रब है, यह मुख्तलिफ़ हादी लोग थोड़े ही हैं। यह तो तमाम पैसे कमाने के तरीक़े हैं, हक़ीक़ी हादी है ही एक - तमाम की ख़ैर निजात करने वाला। रब फ़रमाते हैं मैं तुमको सब वेदों- सहीफों का खुलासा समझाता हूँ। यह तमाम है अकीदत मन्दी कीचीज़ें। सीढ़ी उतरना होता है। इल्म, अकीदत मन्दी फिर अकीदत मन्दी की बेनियाज़ी। जब इल्म मिलता है तब ही अकीदत मन्दी से बेनियाज़ी होती है। इस पुरानी दुनिया से तुमको बेनियाज़ी होती है। बाक़ी दुनिया को छोड़ कहाँ जायेंगे? तुम जानते हो यह दुनिया ही ख़त्म होनी है इसलिए अब बेहद की दुनिया से बेनियाज़ होना है। पाकीज़ा बनने बिगर घर जा न सकें। पाकीज़ा बनने के लिए याद का सफ़र चाहिए। हिन्दुस्तान में खून की नदियाँ होने के बाद फिर दूध की नदियाँ बहेंगी। विष्णु को भी क्षीर सागर में दिखाते हैं। समझाया जाता है - इस लड़ाई से निजात- ज़िन्दगी ए निजात के गेट खुलते हैं। जितना तुम बच्चे आगे बढ़ेंगे उतना ही आवाज़ निकलता रहेगा। अब लड़ाई लगी कि लगी। एक चिन्गारी से देखो आगे क्या हुआ था। समझते हैं कि लड़ेंगे ज़रूर। लड़ाई चलती ही रहती है। एक-दो के मददगार बनते रहते हैं। तुमको भी नई दुनिया चाहिए तो पुरानी दुनिया ज़रूर ख़त्म होनी चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) यह पुरानी दुनिया अब ख़त्म होनी है इसलिए इस दुनिया से बेनियाज़ करना है। दुनिया को छोड़कर कहाँ जाना नहीं है, लेकिन इसे अक्ल से भूलना है।

2) आलम ए निजात में जाने के लिए पूरा पाकीज़ा बनना है।खालिक के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर को पूरा समझकर नई दुनिया में आला मर्तबा पाना है।

बरक़ात:-
अलबेलेपन की नींद को तलाक देने वाले नींद फ़तहयाब, चक्कर नशीन बनो।

जलवा नशीन बन अकीदत मन्दों को जलवा अफ़रोज़ कराने के लिए अथवा चक्कर नशीन बनने के लिए नींद फ़तहयाब बनो। जब वक़्त ए तबाही भूलता है तब अलबेलेपन की नींद आती है। अकीदत मन्दों की पुकार सुनो, ग़मज़दा रूहों के दर्द की पुकार सुनो, प्यासी रूहों की दुआ की आवाज़ सुनो तो कभी भी अलबेलेपन की नींद नहीं आयेगी। तो अब हमेशा जागती ज्योत बन अलबेलेपन की नींद को तलाक दो और जलवा अफ़रोज़ बनो।

स्लोगन:-
जिस्म-ज़हन-दौलत, ज़हन-बोल-आमाल किसी भी तरह से रब के फराइज़ में मददगार बनो तो आसान इबादत नशीन बन जायेंगे।

आमीन