15-10-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
नाज़ुकपना भी जिस्मानी हवास है, रूसना, रोना यह तमाम शैतानी आदतें तुम बच्चों में नहीं होने चाहिए, ग़म-ख़ुशी, इज़्ज़त-तौहीन तमाम बर्दाश्त करना है

सवाल:-
खिदमत में ढीलापन आने का अहम सबब क्या है?

जवाब:-
जब जिस्मानी हवास के सबब एक दो की खामियां देखने लगते हैं तब खिदमत में ढीलापन आता है। आपस में अनबनी होना भी जिस्मानी हवास है। मैं फलाने के साथ नहीं चल सकता, मैं यहाँ नहीं रह सकता...... यह सब नाज़ुकपना है। यह अल्फ़ाज़ मुंह से निकालना माना कांटे बनना, नाफरमानबरदार बनना। रब्बा फ़रमाते बच्चे, तुम रूहानी मिलेट्री हो इसलिए ऑर्डर हुआ तो फौरन हाज़िर होना चाहिए। कोई भी बात में आनाकानी मत करो।

आमीन।
रूहानी रब बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं। बच्चों को पहले-पहले यह तालीम मिलती है कि अपने को रूह यक़ीन करो। जिस्मानी हवास छोड़ रूहानी हवासी बनना है। हम रूह हैं, रूहानी हवासी बनें तब ही रब को याद कर सकें। वह है बेइल्मी। यह है इल्म। इल्म तो एक ही रब देते हैं जो तमाम की ख़ैर निजात करते हैं। और वह है ग़ैर मुजस्सम यानि कि उनका कोई इन्सानी शक्ल नहीं है। जिसको इन्सान की शक्ल है उनको अल्ल्लाह् ताला नहीं कह सकते। अब रूहें तो तमाम ग़ैर मुजस्सम ही हैं। मगर जिस्मानी हवास में आने से अपने को रूह भूल गये हैं। अब रब फ़रमाते हैं तुमको वापिस जाना है। अपने को रूह समझो, रुह समझ रब को याद करो तब विलादत दर विलादत के अज़ाब ख़ाक हों, और कोई तरीक़ा नहीं। रूह ही नापाक, रूह ही पाकीज़ा बनती है। रब ने समझाया है पाकीज़ा रूहें हैं आला जन्नत-अदना जन्नत में। नापाक रूह फिर शैतानी सल्तनत में बनती हैं। सीढ़ी में भी समझाया है जो पाकीज़ा थे वह नापाक बने हैं। 5 हज़ार साल पहले तुम तमाम रूहें दारूल सुकून में पाकीज़ा थी। उसको कहा ही जाता है दारूल निजात। फिर इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में नापाक बनते हैं तब चिल्लाते हैं - ए नापाक से पाक बनाने वाले आओ। रब्बा समझाते हैं - बच्चे, मैं जो तुमको इल्म दे रहा हूँ नापाक से पाक होने का, वह सिर्फ मैं ही देता हूँ जो फिर आम तौर पर गायब हो जाता है। रब को ही आकर सुनाना पड़ता है। यहाँ इन्सानों ने बेइंतहा सहीफें बनाये हैं। सुनहरे दौर में कोई सहीफा होता ही नहीं। वहाँ अकीदत मन्दी की राह रिंचक भी नहीं।
अभी रब फ़रमाते हैं तुम मेरे ज़रिए ही नापाक से पाक बन सकते हो। पाकीज़ा दुनिया ज़रूर बननी ही है। मैं तो बच्चों को ही आकर हक़ीक़ी इबादत सिखाता हूँ। हूरैन फ़ज़ीलत भी इख्तियार करनी हैं। रूसना, रोना यह तमाम शैतानी रवैया है। रब फ़रमाते हैं ग़म-ख़ुशी इज़्ज़त-तौहीन, तमाम बच्चों को बर्दाश्त करना है। नाज़ुकपना नहीं। मैं फलाने मुकाम पर नहीं रह सकती हूँ, यह भी नाज़ुकपना है। इनका रवैया ऐसा है, यह ऐसा है, वैसा है, यह कुछ भी रहना नहीं चाहिए। मुंह से हमेशा फूल ही निकलें। कांटा नहीं निकलना चाहिए। कितने बच्चों के मुंह से कांटे निहायत निकलते हैं। किसको गुस्सा करना भी कांटा है। एक-दो में बच्चों की अनबनी निहायत होती है। जिस्मानी हवास होने सबब एक दो की खामियां देखते खुद में कई तरह की खामियां रह जाती हैं, इसलिए फिर खिदमत ढीली पड़ जाती है। रब्बा समझते हैं - यह भी ड्रामा के मुताबिक होता है। सुधरना भी तो है। मिलेट्री के लोग जब लड़ाई में जाते हैं तो उन्हों का काम ही है दुश्मन से लड़ना। फ्लड्स होती हैं और कुछ हंगामा हुआ तो भी निहायत मिलेट्री को बुलाते हैं। फिर मिलेट्री के लोग मज़दूरों वगैरह का काम भी करने लग पड़ते हैं। गवर्मेंन्ट मिलेट्री को ऑर्डर करती है - यह मिट्टी तमाम भरो। अगर कोई न आया तो गोली के मुँह में। गवर्मेन्ट का ऑर्डर मानना ही पड़े। रब फ़रमाते हैं तुम भी खिदमत के लिए बांधे हुए हो। रब जहाँ भी खिदमत पर जाने के लिए बोले, झट हाज़िर होना चाहिए। नहीं माना तो मिलेट्री नहीं कहेंगे। वह फिर दिल पर नहीं चढ़ते। तुम रब के मददगार हो सबको पैगाम देने में। अब समझो कहाँ बड़ा म्युजियम खोलते हैं, कहते हैं 10 माइल दूर है, खिदमत पर तो जाना पड़े ना। खर्चे का ख्याल थोड़े ही करना है। बड़े से बड़ी गवर्मेन्ट बेहद के रब का ऑर्डर मिलता है, जिसका राइट हैण्ड फिर धर्मराज है। उनकी सिरात ए मुस्तकीम पर न चलने से फिर गिर पड़ते हैं। सिरात ए मुस्तकीम कहती है अपनी आंखों को सिविल बनाओ।हवस पर फ़तह पाने की हिम्मत रखनी चाहिए। रब्बा का हुक्म है, अगर हम नहीं मानेंगे तो एकदम चकनाचूर हो जायेंगे। 21 विलादतों की बादशाहत में रोला पड़ जायेगा। रब फ़रमाते हैं मुझे बच्चों के बिगर तो कभी कोई जान न सके। कल्प पहले वाले ही आहिस्ते-आहिस्ते निकलते रहेंगे। यह हैं बिल्कुल नई-नई बातें। यह है गीता का दौर। मगर सहीफों में इस मिलन के दौर का बयान नहीं है। गीता को ही द्वापर में ले गये हैं। मगर जब राजयोग सिखाया तो जरूर मिलन का दौर होगा ना। मगर किसकी भी अक्ल में यह बातें नहीं हैं। अभी तुम्हें इल्म का नशा चढ़ा हुआ है। इन्सानों को है अकीदत मन्दी का नशा। कहते हैं अल्ल्लाह् ताला भी आ जाए तो भी हम अकीदत मन्दी नहीं छोड़ेंगे। यह उरूज और ज़वाल की सीढ़ी निहायत अच्छी है, तो भी इन्सान की आंखें नहीं खुलती हैं। इबलीस के नशे में एकदम चकनाचूर हैं। इल्म का नशा निहायत देरी से चढ़ता है। पहले तो हूरैन फ़ज़ीलत भी चाहिए। रब का कोई भी ऑर्डर हुआ तो उसमें आनाकानी नहीं करनी है। यह मैं नहीं कर सकता हूँ, इसको कहा जाता है नाफरमानबरदार। सिरात ए मुस्तकीम मिलती है ऐसा-ऐसा करना है तो समझना चाहिए कि पाक परवरदिगार की अफ़ज़ल सलाह है। वह है ही खैर निजात दिलाने वाला। दाता कभी उल्टी सलाह नहीं देंगे। रब फ़रमाते हैं मैं इनके निहायत विलादतों के आख़िर में दाखिली करता हूँ। इनसे भी देखो हव्वा अलैहिस्सलाम आला चली जाती है। गायन भी है - फीमेल को आगे रखा जाता है। पहले लक्ष्मी फिर नारायण, जैसा राजा रानी और अवाम हो जाती है। तुमको भी ऐसा अफ़ज़ल बनना है। इस वक़्त तो तमाम दुनिया में शैतानी सल्तनत है। तमाम कहते हैं इलाही सल्तनत चाहिए। अब है मिलन। जब इन अफ़ज़ल ख्वातीन और अफ़ज़ल हज़रात की सल्तनत थी तो इलाही सल्तनत थी, फिर चेन्ज कैसे होती है, यह कोई नहीं जानते। तमाम घोर अन्धियारे में हैं। समझते हैं - इख्तिलाफ़ी फ़ितने का दौर तो अभी छोटा बच्चा, रेगड़ी पहन रहा है। तो इन्सान और ही नींद में सोये हुए हैं। यह रूहानी नॉलेज, रूहानी रब ही रूहों को देते हैं, हक़ीक़ी इबादत भी सिखलाते हैं। आदम अलैहिस्सलाम को रूहानी रब नहीं कहेंगे। वह ऐसे नहीं कहेंगे कि ए रूहानी बच्चों। यह भी लिखना चाहिए - रूहानी नॉलेजफुल रब स्प्रीचुअल नॉलेज रूहानी बच्चों को देते हैं।
रब समझाते हैं दुनिया में तमाम इन्सान हैं जिस्मानी हवासी। मैं रूह हूँ, यह कोई नहीं जानते हैं। रब फ़रमाते हैं किसकी भी रूह लीन नहीं होती है। अभी तुम बच्चों को समझाया जाता है, दशहरा, दीपावली क्या है। इन्सान तो जो भी पूजा वगैरह करते हैं, तमाम ब्लाइन्डफेथ की, जिसको गुड्डी पूजा कहा जाता है, पत्थर पूजा कहा जाता है। अभी तुम पारस अक्ल बनते हो तो पत्थर की पूजा नहीं कर सकते हो। तस्वीरों के आगे जाकर माथा टेकते हैं। कुछ भी समझते नहीं। कहते भी हैं इल्म, अकीदत मन्दी और बेनियाज़ी। इल्म आधाकल्प चला फिर अकीदत मन्दी शुरू हुई। अब तुमको इल्म मिलता है तो अकीदत मन्दी से बेनियाज़ी आ जाती है। यह दुनिया ही बदलती है। इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में अकीदत मन्दी है। सुनहरे दौर में अकीदत मन्दी होती नहीं। वहाँ है ही काबिल ए एहतराम। रब फ़रमाते हैं - बच्चे, तुम माथा क्यों टेकते हो। आधाकल्प तुमने माथा भी घिसाया, पैसे भी गँवाये, मिला कुछ नहीं। इबलीस ने एकदम माथा मूड लिया है। कंगाल बना दिया है। फिर रब आकर सबका माथा दुरूस्त कर देते हैं। अभी आहिस्ते-आहिस्ते कुछ यूरोपियन लोग भी समझते हैं। रब्बा ने समझाया है - यह हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन तो बिल्कुल स्याह रास्त बन गये हैं। वह और मज़हब वाले फिर भी पीछे आते हैं तो ख़ुशी भी थोड़ी, ग़म भी थोड़ा मिलता है। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीनियों को ख़ुशी निहायत तो ग़म भी निहायत है। शुरू में ही कितने दौलतमंद एकदम दुनिया के मालिक होते हैं। और मज़हब वाले कोई पहले थोड़े ही दौलत मन्द होते हैं। पीछे इज़ाफें को पाते-पाते अभी आकर दौलतमंद हुए हैं। अब फिर सबसे भिखारी भी हिन्दुस्तान बना है। अन्धश्रद्वालू भी हिन्दुस्तान है। यह भी ड्रामा बना हुआ है। रब फ़रमाते हैं मैंने जिसको हेविन बनाया, वह हेल बन गया है। इन्सान बन्दर अक्ल बन गये हैं, उनको मैं आकर मन्दिर लायक़ बनाता हूँ। ख़बासत बड़ी कड़ी होते हैं। गुस्सा कितना है। तुम्हारे में कोई गुस्सा नहीं होना चाहिए। बिल्कुल मीठे, सुकून परस्त, बेइंतहा मीठे बनो। यह भी जानते हो कोटो में कोई ही निकलते हैं - बादशाहत मर्तबा पाने वाले। रब फ़रमाते हैं मैं आया हूँ तुमको हज़रात से अफ़ज़ल हज़रात बनाने। उसमें भी 8 जवाहिरात अहम गाये जाते हैं। 8 जवाहिरात और दरम्यान में है रब। 8 हैं पास विद् ऑनर्स, सो भी नम्बरवार तजवीज़ के मुताबिक जिस्मानी हवास को तोड़ने में बड़ी मेहनत लगती है। जिस्म का हवास बिल्कुल निकल जाए। कोई-कोई पक्के ब्रह्म ज्ञानी जो होते हैं, उन्हों का भी ऐसे होता है। बैठे-बैठे जिस्म को छोड़ देते हैं। बैठे-बैठे ऐसे जिस्म छोड़ते हैं, माहौल एकदम शान्त हो जाता है और अक्सर करके अलस्सुबह के खालिस अवक़ात में जिस्म छोड़ते हैं। रात को इन्सान निहायत गंद करते हैं, सुबह को नहाना वगैरह करके या अल्ल्लाह् या अल्ल्लाह् कहने लगते हैं। नमाज़ पढ़ते हैं। रब तमाम बातें समझाते रहते हैं। नुमाइश वगैरह में भी पहले-पहले तुम अल्फ का तारूफ दो। पहले अल्फ और बे। रब तो एक ही ग़ैर मुजस्सम है। रब खालिक ही बैठ मख़लूक़ के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का इल्म समझाते हैं। वही रब फ़रमाते हैं दिल से मुझे याद करो। जिस्म का राब्ता छोड़ अपने को रूह समझ दिल से मुझे याद करो। रब का तारूफ तुम देंगे फिर किसको हिम्मत नहीं रहेगी सवाल - जवाब करने की। पहले रब का यक़ीन पक्का हो जाए तब बोलो 84 विलादत ऐसे लिये जाते हैं। चक्कर को समझ लिया, रब को समझ लिया फिर कोई सवाल उठेगा नहीं। रब का तारूफ देने बिगर बाक़ी तुम तिक-तिक करते हो तो उसमें तुम्हारा टाइम निहायत वेस्ट हो जाता है। गले ही घुट जाते हैं। पहली-पहली बात अल्फ की उठाओ। तिक-तिक करने से समझ थोड़े ही सकते हैं। बिल्कुल सिम्पुल तरह और आहिस्ता से बैठ समझाना चाहिए, जो रूहानी हवासी होंगे वही अच्छा समझा सकेंगे। बड़े-बड़े म्युज़ियम में अच्छे-अच्छे समझाने वालों को मदद देनी पड़े। थोड़े रोज़ अपना सेन्टर छोड़ मदद देने आ जाना है। पिछाड़ी में सेन्टर सम्भालने कोई को बिठा दो। अगर गद्दी सम्भालने लायक़ कोई को अपने जैसा नहीं बनाया है, तो रब समझेंगे कोई काम के नहीं, खिदमत नहीं की। रब्बा को लिखते हैं खिदमत छोड़ कैसे जायें! अरे बाबा हुक्म करते हैं फलानी जगह नुमाइश है खिदमत पर जाओ। अगर गद्दी लायक़ किसको नहीं बनाया है तो तुम किस काम के। रब्बा ने हुक्म किया - झट भागना चाहिए। अज़ीम हस्ती मोमिना उनको कहा जाता है। बाक़ी तो सब हैं घोड़ेसवार, प्यादे। सबको खिदमत में मदद देनी है। इतने साल में तुमने किसको अपने जैसा नहीं बनाया है तो क्या करते थे। इतने वक़्त में मैसेन्जर नहीं बनाया है, जो सेन्टर सम्भालें। कैसे-कैसे इन्सान आते हैं - जिनसे बात करने का भी अक्ल चाहिए। नूरानी कलेमात भी ज़रूर रोज़ पढ़नी है या सुननी है। नूरानी कलेमात नहीं पढ़ा गोया अबसेन्ट पड़ गई। तुम बच्चों को तमाम दुनिया पर घेराव डालना है। तुम तमाम दुनिया की खिदमत करते हो ना। नापाक दुनिया को पाकीज़ा बनाना यह घेराव डालना है ना। तमाम को निजात-ज़िन्दगी ए निजात घर का रास्ता बताना है, दु:ख से छुड़ाना है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. निहायत मीठे, सुकून परस्त, बेइंतहा मीठे अख़लाक का बनना है। कभी भी गुस्सा नहीं करना है। अपनी आंखों को बहुत-बहुत सिविल बनाना है।

2. बाबा जो हुक्म करे, उसे फौरन मानना है। तमाम दुनिया को नापाक से पाक बनाने की खिदमत करनी है यानि कि घेराव डालना है।

बरक़ात:-
अपनी अहमियत और फ़र्ज़ को जानने वाले हमेशा बेदार नूर बनो

आप बच्चे जहान का नूर हो, आपकी तब्दीली से जहान की तब्दीली होनी है इसलिए बीती सो बीती कर अपनी अहमियत और फ़र्ज़ को जानकर हमेशा बेदार नूर बनो। आप सेकण्ड में अपनी तब्दीली से दुनिया तब्दील कर सकते हो। सिर्फ़ प्रैक्टिस करो अभी-अभी आमाल ए इबादती, अभी-अभी मुकम्मल स्टेज। जैसे आपका मख़लूक़ कछुआ सेकण्ड में तमाम आज़ा समेट लेता है। ऐसे आप मास्टर मख़लूक़ समेटने की कुव्वत की बुनियाद से सेकण्ड में तमाम इरादों को समाकर एक इरादे में वाक़ेअ हो जाओ।

स्लोगन:-
लवलीन स्थिति का अनुभव करने के लिए स्मृति-विस्मृति की युद्ध समाप्त करो।

आमीन