15-11-2020 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 18-01-87


मुकम्मल नशीनी हालत की निशानियां


आज ग़ैबी रब उल हक़ अपने ग़ैबी सूरत ए हाल बनो' के बरक़ाती बच्चों और ग़ैबी फरिश्तों से मिलने आये हैं। यह ग़ैबी मिलन इस तमाम चक्कर में अब एक ही बार मिलन पर होता है। सुनहरे दौर में भी इलाही मिलन होगा मगर फरिश्तों का मिलन, ग़ैबी मिलन इस वक़्त ही होता है। ग़ैर मुजस्सम रब भी ग़ैबी जिब्राइल अलैहिस्सलाम बाप के ज़रिए मिलन मनाते हैं। ग़ैर मुजस्सम को भी यह फरिश्तों की महफिल बेइंतहा प्यारी लगती है, इसलिए अपना घर छोड़ मलक़ूती और जिस्मानी दुनिया में मिलन मनाने आये हैं। फरिश्ते बच्चों के प्यार की कशिश से रब को भी रूप बदल, लिबास बदल बच्चों के जहान में आना ही पड़ता है। यह मिलन का दौर रब और बच्चों का बेहिसाब प्यारा और न्यारा जहान है। प्यार सबसे बड़ी कशिश करने की कुव्वत है जो पाक परवरदिगार, बन्दिश से आज़ाद को भी, जिस्म से आज़ाद को भी प्यार की बन्दिश में बांध लेती है, बे जिस्म को भी लोन के जिस्म नशीन बना देती है। यही है बच्चों के प्यार का ज़ाहिर सबूत है।

आज का दिन कई चारों ओर के बच्चों के प्यार की लहरें, प्यार के समन्दर में समाने का दिन है। बच्चे कहते हैं - हम रब उल हक़ से मिलने आये हैं'। बच्चे मिलने आये हैं? और बच्चों से रब मिलने आये हैं? या दोनों ही मधुबन में मिलने आये हैं? बच्चे प्यार के समन्दर में नहाने आये हैं मगर रब हज़ारों गंगाओं में नहाने आते हैं इसलिए गंगा-समन्दर का मेला अजीब मेला है। प्यार के समन्दर में समाए समन्दर जैसे बन जाते हैं। आज के दिन को रब जैसा बनने की याददाश्त यानि कि क़ाबिल-दिन कहते हैं। क्यों? आज के दिन आदम अलैहिस्सलाम बाप के लबरेज़ और मुकम्मल रब जैसा बनने का यादगार दिन है। आदम बच्चा सो बाप, क्योंकि आदम बच्चा भी है, बाप भी है। आज के दिन आदम अलैहिस्सलाम ने बच्चे के रूप में लायक़ बच्चा बनने का सबूत दिया प्यार के खुद के रूप का, बराबर बनने का सबूत दिया; बेइंतहा प्यारे और बेइंतहा न्यारेपन का सबूत दिया; रब जैसा मुकम्मल नशीन यानि कि आमाल के बन्दिश से आज़ाद, न्यारा बनने का सबूत दिया; तमाम चक्कर के आमालों के हिसाब-किताब से आज़ाद होने का सबूत दिया। सिवाए खिदमत के प्यार के और कोई बंदिश नहीं। खिदमत में भी खिदमत की बन्दिश में बंधने वाले खिदमतगार नहीं क्योंकि खिदमत में कोई बन्दिश से आज़ाद बन खिदमत करते और कोई बन्दिश में मुब्तला बन खिदमत करते। ख़िदमतगार आदम अलैहिस्सलाम बाप भी है। मगर खिदमत के ज़रिए हद की रॉयल ख्वाहिशात खिदमत में भी हिसाब-किताब के बन्दिश में बांधती है। मगर सच्चे खिदमतगार इस हिसाब-किताब से भी आज़ाद हैं। इसी को ही मुकम्मल नशीनी सूरत ए हाल कहा जाता है। जैसे जिस्म की बन्दिश, जिस्म के रिश्तों की बन्दिश, ऐसे खिदमत में खुद गर्जी यह भी बन्दिश मुकम्मल नशीनी हालत बनने में रूकावट डालती है। मुकम्मल नशीन बनना यानि कि इस रॉयल हिसाब-किताब से भी आज़ाद।

मैजारिटी ज़रिया गीता-दारूल उलूमों के खिदमतगार आये हैं ना। तो खिदमत यानि कि औरों को भी आज़ाद बनाना। औरों को आज़ाद बनाते खुद को बन्दिश में बांध तो नहीं देते? खात्मा ए लगाव बनने के बजाए, जिस्मानी बच्चों वगैरह तमाम से लगाव छोड़ कर स्टूडेन्ट से लगाव तो नहीं करते? यह निहायत अच्छा है, निहायत अच्छा है, अच्छा-अच्छा समझते मेरे पन की खुवाहिशात की बन्दिश में तो नहीं बंध जाते? सोने की जंजीरें तो अच्छी नहीं लगती हैं ना? तो आज का दिन हद के मेरे-मेरे से आज़ाद होने का यानि कि मुकम्मल नशीन होने का ग़ैबी दिन मनाओ। इसी को ही प्यार का सबूत कहा जाता है। मुकम्मल नशीन बनना - यह मक़सद तो सबका अच्छा है। अब चेक करो - कहाँ तक आमालों के बन्दिश से न्यारे बने हो? पहली बात - जिस्मानी और मल्कूती, आमाल और रिश्ते दोनों में ख़ुद गर्ज़ी जज़्बे से आज़ाद। दूसरी बात पिछली विलादतों के आमालों के हिसाब-किताब और मौजूदा तजवीज़ की कमज़ोरी के सबब किसी भी फ़ालतू अखलाक़-आदत के बस होने से आज़ाद बने हैं? कभी भी कोई कमज़ोर अख़लाक-आदत और पिछले आदत-अखलाक़ बस में बनाता है तो बन्दिश-मुब्तला हैं, बन्दिश से आज़ाद नहीं। ऐसे नहीं सोचना कि चाहते नहीं हैं मगर अख़लाक़ या आदत करा देती हैं। यह भी निशानी बन्दिश से आज़ाद की नहीं मगर बन्दिश में मुब्तला की है। और बात - कोई भी खिदमत की, तनज़ीम की, कुदरत की हालात खुद की सूरत ए हाल को और अफ़ज़ल सूरत ए हाल को डगमग करती है - यह भी बन्दिश से आज़ाद सूरत ए हाल नहीं है। इस बन्दिश से भी आज़ाद। और तीसरी बात - पुरानी दुनिया में पुराने अाख़िरी जिस्म में किसी भी तरह की बीमारी अपनी अफ़ज़ल सूरत ए हाल को हलचल में लाये - इससे भी आज़ाद। एक है बीमारी आना, एक है बीमारी हिलाना। तो आना - यह भावी है मगर सूरत ए हाल हिल जाना - यह बन्दिश में मुब्तला की निशानी है। खुद का ग़ौरतलब, इल्म का ग़ौरतलब, नेक नीयत बनने का गौर तलब बदल जिस्म की बीमारी का ग़ौरतलब चलना - इससे आज़ाद क्योंकि ज़्यादा कुदरत का ग़ौरतलब फ़िक्र के रूप में बदल जाता है। तो इससे आज़ाद होना - इसी को ही मुकम्मल नशीनी सूरत ए हाल कहा जाता है। इन तमाम बन्दिशों को छोड़ना, यही मुकम्मल नशीनी हालत की निशानी है। आदम अलैहिस्सलाम बाप ने इन तमाम बंदिशों से आज़ाद हो मुकम्मल नशीनी हालत को दस्तयाब किया। तो आज का दिन आदम अलैहिस्सलाम बाप जैसा मुकम्मल नशीन बनने का दिन है। आज के दिन की अहमियत समझी? अच्छा।

आज की मजलिस खास खिदमतगार यानि कि सवाबी रूह बनने वालों की मजलिस है। गीता दारूल उलूम खोलना यानि कि सवाबी रूह बनना। सबसे बड़े ते बड़ा सवाब हर रूह को हमेशा के लिए यानि कि कई विलादतों के लिए गुनाहों से आज़ाद करना - यही सवाब है। नाम निहायत अच्छा है - गीता दारूल उलूम'। तो गीता दारूल उलूम वाले यानि कि हमेशा खुद गीता का सबक पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले। गीता-इल्म का पहला सबक - बे जिस्म रूह बनो और आख़िरी सबक - खात्मा ए लगाव, याददाश्त खुद का रूप बनो। तो पहला सबक है तरीक़ा और आखिरी सबक है तरीक़े से कामयाबी। तो गीता-दारुल उलूम वाले हर वक़्त यह सबक पढ़ते हैं कि सिर्फ नूरानी कलेमात सुनाते हैं? क्योंकि सच्चा गीता-दारूल उलूम का तरीक़ा यह है - पहले खुद पढ़ना यानि कि बनना फिर औरों को ज़रिया बन पढ़ाना। तो तमाम गीता-दारूल उलूम वाले इस तरीक़े से खिदमत करते हो? क्योंकि आप तमाम इस दुनिया के आगे इलाही-तालीम के सैम्पल हो। तो सैम्पल की अज़मत होती है। सैम्पल कई रूहों को ऐसा बनने की प्रेरणा देता है। तो गीता- दारूल उलूम वालों के ऊपर बड़ी ज़िम्मेवारी है। अगर ज़रा भी सैम्पल बनने में कमी दिखाई तो कई रूहों की क़िस्मत बनाने के बजाए, क़िस्मत बनाने से महरूम करने के ज़रिया भी बन जायेंगे क्योंकि देखने वाले, सुनने वाले जिस्मानी रूप में आप ज़रिया रूहों को देखते हैं। रब तो बातिन हैं ना इसलिए ऐसी अज़मत आमाल करके दिखाओ जो आपके अज़ीम आमालों को देख, कई रूहें अफ़ज़ल आमाल करके अपनी क़िस्मत की लक़ीर अफ़ज़ल बना सकें। तो एक तो अपने को हमेशा सैम्पल समझना और दूसरा, हमेशा अपना सिम्बल याद रखना। गीता-दारूल उलूम वालों का सिम्बल कौनसा है, जानते हो? कमल फूल। रब उल हक़ ने सुनाया है कि कमल बनो और अमल करो। कमल बनने का अस्बाब ही है अमल करना। अगर अमल नहीं करते तो कमल नहीं बन सकते इसलिए सैम्पल हैं' और कमलफूल' का सिम्बल हमेशा अक्ल में रखो। खिदमत कितनी भी इज़ाफें को दस्तयाब हो मगर खिदमत करते न्यारे बन प्यारे बनना। सिर्फ़ प्यारे नहीं बनना, न्यारे बन प्यारे बनना क्योंकि खिदमत से प्यार अच्छी बात है मगर प्यार लगाव के रूप में बदल नहीं जाये। इसको कहते हैं न्यारे बन प्यारा बनना। खिदमत के ज़रिया बने, यह तो निहायत अच्छा किया। सवाबी रूह का टाईटल तो मिल ही गया इसलिए देखो, ख़ास बुलावा दिया है, क्योंकि सवाब का काम किया है। अब आगे जो कामयाबी का सबक पढ़ाया, तो कामयाबी की सूरत ए हाल से इज़ाफ़े को हासिल करते रहना। समझा, आगे क्या करना है? अच्छा।

तमाम ख़ास एक बात की इन्तजार में हैं, वह कौनसी? (रिज़ल्ट सुनायें) रिज़ल्ट आप सुनायेंगे या रब सुनायेंगे? रब उल हक़ ने क्या कहा था - रिज़ल्ट लेंगे या देंगे? ड्रामा प्लैन के मुताबिक़ जो चला, जैसे चला उसको अच्छा ही कहेंगे। मकसद सबने अच्छा रखा,अलामात जिसकी कुव्वत आमाल में दिखायी। निहायत अरसे की बरक़ात नम्बरवार इख्तियार किया भी और अभी भी जो बरक़ात हासिल किया, वह बरक़ात याफ़्ता बन रब जैसी बरक़ात देने वाला बनते रहना। अभी रब उल हक़ क्या चाहते हैं? बरक़ात तो मिली, अब इस साल निहायत अरसे बन्दिश से आज़ाद यानि कि रब जैसा मुकम्मल नशीन सूरत ए हाल की ख़ास प्रेक्टिस करते दुनिया को न्यारे और प्यारे-पन का एहसास कराओ। कभी-कभी एहसास करना - अभी इस तरीक़े को बदल निहायत अरसे के एहसाससाती का ज़ाहिर निहायत अरसे अचल, अडोल, मुश्किल कुशा, ग़ैर बन्दिश, ग़ैर इरादा, ग़ैर गुनाहगार आमाल यानि कि ग़ैर मुजस्सम, ग़ैर ख़बासती, ग़ैर तकब्बुर नशीन - इसी सूरत ए हाल को दुनिया के आगे ज़ाहिर रूप में लाओ। इसको कहते हैं रब जैसा बनना। समझा?

रिज़ल्ट में पहले खुद से खुद मुत्मइन, वह कितने रहे? क्योंकि एक है खुद की मुत्मइन नशीनी, दूसरी है मुत्मइन फैमिली की मुत्मइन नशीनी, तीसरी है रब की मुत्मइन नशीनी। तीनों की रिज़ल्ट में अभी और मार्क्स लेनी हैं। तो मुत्मइन नशीन बनो, मुत्मइन करो। रब के मुत्मइन याफ़्ता बन हमेशा चमकते रहो। रब उल हक़ बच्चों का रिगार्ड रखते हैं, इसलिए बातिन रिकार्ड बताते हैं। होवन हार हैं, इसीलिए रब हमेशा लबरेज़ नशीनी की स्टेज देखते हैं। अच्छा।

तमाम मुत्मइन याफ़्ता हो ना? इज़ाफें को देख करके ख़ुश रहो। आप तमाम तो इन्तज़ार में हो कि आबू रोड तक क्यू लगे। तो अभी तो सिर्फ़ हाल भरा है, फिर क्या करेंगे? फिर सोयेंगे या बे साख्ता इबादत करेंगे? यह भी होना है इसलिए थोड़े में ही राज़ी रहो। तीन पैर के बजाए एक पैर ज़मीन भी मिले, तो भी राजी रहो। पहले ऐसे होता था - यह नहीं सोचो। फैमिली के इज़ाफें की ख़ुशी मनाओ। आसमान और ज़मीन तो खुटने वाली नहीं हैं ना। पहाड़ तो निहायत है। यह भी होना चाहिए, यह भी मिलना चाहिए यह बड़ी बात बना देते हो। यह दादियां भी सोच में पड़ जाती हैं - क्या करें, कैसे करें? ऐसे भी दिन आयेंगे जो दिन में धूप में सो जायेंगे, रात मे जागेंगे। वो लोग आग जलाकर आसपास बैठ जाते हैं गर्म हो करके, आप राब्ते की आग जलाकर के बैठ जायेंगे। पसन्द है ना या खटिया चाहिए? बैठने के लिए कुर्सी चाहिए? यह पहाड़ की पीठ कुर्सी बना देना। जब तक अस्बाब हैं तो ख़ुशी लो, नहीं हैं तो पहाड़ी को कुर्सी बनाना। पीठ को आराम चाहिए ना, और तो कुछ नहीं। पांच हज़ार आयेंगे तो कुर्सियां तो उठानी पड़ेगी ना। और जब क्यू लगेगी तो खटिया भी छोड़नी पड़ेगी। एवररेडी रहना। अगर खटिया मिले तो भी हाँ-जी', ज़मी मिले तो भी हाँ-जी'। ऐसे शुरू में निहायत प्रेक्टिस करायी हैं। 15-15 दिन तक दवाखाना बन्द रहता। दमा के पेशेन्ट भी ढोढा (बाजरे की रोटी) और लस्सी पीते थे। मगर बीमार नहीं हुए, तमाम तन्दरूस्त हो गये। तो यह शुरू में प्रेक्टिस करके दिखाया है, तो आखिर में भी होगा ना। नहीं तो, सोचो, दमा का पेशेन्ट और उसको लस्सी दो तो पहले ही घबरा जायेगा। मगर दुआ की दवा साथ में होती है, इसलिए ज़हन की तफ़रीह हो जाती है। पेपर नहीं लगता है। मुश्किल नहीं लगता। कुर्बानी नहीं, एक्सकर्शन हो जाती है। तो तमाम तैयार हो ना या निज़ाम करने वाले के पास टीचर्स लिस्ट ले जायेंगी? इसीलिए नहीं बुलाते हैं ना। वक़्त आने पर यह तमाम अस्बाब से भी बालातर इबादत की कामयाबी रूप में एहसास करेंगे। रूहानी मिलेट्री (फ़ोन) भी हो ना। मिलेट्री का पार्ट भी तो बजाना है। अभी तो प्यारी फैमिली है, घर है - यह भी एहसास कर रहे हो। मगर वक़्त पर रूहानी मिलेट्री बन जो वक़्त आया उसको उसी प्यार से पार करना - यह भी मिलेट्री की खासियत है। अच्छा।

गुजरात को यह ख़ास बरक़ात है जो एवररेडी रहते हैं। बहाना नहीं देते हैं - क्या करें, कैसे आयें, रिजर्वेशन नहीं मिलती - पहुँच जाते हैं। नज़दीक का फ़ायदा है। गुजरात को फ़रमान बरदार बनने की बरक़ाती रहमत है क्योंकि खिदमत में भी हाँ-जी' करते हैं ना। मेहनत की खिदमत गुजरात को देते हैं ना। रोटी की खिदमत कौन करता है? मुकाम देने की, भागदौड़ करने की खिदमत गुजरात करता है। रब उल हक़ तमाम देखता है। ऐसे नहीं रब उल हक़ को मालूम नहीं पड़ता। मेहनत करने वालों को ख़ास महबूब की मुहब्बत हासिल होती है। नज़दीक का क़िस्मत है और क़िस्मत को आगे बढ़ाने का तरीक़ा अच्छा रखते हैं। क़िस्मत को बढ़ाना सबको नहीं आता है। कोई को क़िस्मत हासिल होती है मगर उतने तक ही रहता है, बढ़ाना नहीं आता। मगर गुजरात की क़िस्मत है और बढ़ाना भी आती है इसलिए अपनी क़िस्मत बढ़ा रहे हो - यह देख रब उल हक़ भी खुश है। तो रब की ख़ास बरक़ात - यह भी एक क़िस्मत की निशानी है। समझा?

जो भी चारों ओर के प्यारे बच्चे पहुँचे हैं, रब उल हक़ भी उन तमाम वतन, विलायत दोनों के प्यारे बच्चों को प्यार का रिटर्न हमेशा ला फ़ानी प्यारे बनो' की बरक़ात दे रहे हैं। प्यार में जैसे दूर-दूर से दौड़कर पहुँचे हो, ऐसे ही जैसे मैकरू में दौड़ लगाई, नज़दीक पहुँचे, सामने पहुँचे, ऐसी तजवीज़ में भी ख़ास उड़ते फ़न के ज़रिए रब जैसा बनना मतलब हमेशा रब के नज़दीक रहना। जैसे यहाँ सामने पहुँचे हो, वैसे हमेशा उड़ते फ़न के ज़रिए रब के नज़दीक ही रहना। समझा, क्या करना है? यह प्यार, दिल का प्यार दिलाराम रब के पास आपके पहुँचने के पहले ही पहुँच जाता है। चाहे सामने हो, चाहे आज के दिन वतन-विलायत में जिस्म से दूर हैं मगर दूर होते हुए भी तमाम बच्चे नज़दीक से नज़दीक दिलतख्तनशीन हैं। तो सबसे नज़दीक का मुकाम है दिल। तो विलायत और वतन में नहीं बैठे हैं मगर दिलतख्त पर बैठे हैं। तो नज़दीक हो गये ना। तमाम बच्चों की यादप्यार, उल्हनें, मीठी-मीठी रूहरिहानें, सौगातें - तमाम रब के पास पहुँच गई। रब उल हक़ भी प्यार बच्चों को हमेशा मेहनत से आज़ाद हो मुहब्बत में तल्लीन रहो' - यह बरक़ात दे रहे हैं। तो तमाम को रिटर्न मिल गयी ना। अच्छा।

तमाम प्यारी रूहों को, हमेशा नज़दीक रहने वाली रूहों को, हमेशा बन्दिश ए आमाल, मुकम्मल नशीनी सूरत ए हाल में निहायत अरसे का एहसास करने वाली ख़ास रूहों को, तमाम दिल-तख्तनशीन मुत्मइन नशीन याफ़्ता को रब उल हक़ की ग़ैबी सूरत ए हाल बनो' की बरक़ात के साथ यादप्यार और गुडनाइट और गुडमार्निंग।

बरक़ात:-
पुराने खाते ख़त्म कर, नयी आदतों रूपी नये लिबास इख्तियार करने वाले रब जैसे लबरेज़ बनो।

जैसे दीपावली पर नया लिबास इख्तियार करते हैं, ऐसे आप बच्चे इस मरजीवा नयी विलादत में, नयी आदत रूपी लिबास इख्तियार कर नया साल मनाओ। अपनी कमज़ोरी, कमियां, डरपोक, नाज़ुक पना वगैरह के जो भी पुराने खाते रहे हुए हैं, उन्हें ख़त्म कर सच्ची दीपावली मनाओ। इस नयी विलादत में नयी आदत इख्तियार कर लो तो रब जैसे लबरेज़ बन जायेंगे।

स्लोगन:-
खालिस इरादे का खज़ाना जमा हो तो फ़ालतू इरादो में वक़्त नहीं जायेगा।

पैग़ाम- आज महीने का तीसरा रविवार है, तमाम हक़ीक़ी इबादत नशीन भाई बहिनें शाम 6.30 से 7.30 बजे तक, ख़ास इबादत की प्रेक्टिस के वक़्त अपनी अफ़ज़ल ज़ज्बात की अफ़ज़ल कैफियत के ज़रिए ज़हनी अज़ीम सदक़ा नशीन बन सबको बेखौफ की बरक़ात देने की खिदमत करें।
आमीन

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