16-10-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
तुम्हें मिलन पर खिदमत करके गायन लायक़ बनना है फिर मुस्तकबिल में रूह ए अफ़ज़ल बनने से तुम इबादत लायक़ बन जायेंगे

सवाल:-
कौन सी बीमारी जड़ से खत्म हो तब रब की दिल पर चढ़ेंगे?

जवाब:-
1. जिस्मानी हवास की बीमारी। इसी जिस्मानी हवास के सबब तमाम ख़बासतों ने आला मरीज़ बनाया है। यह जिस्मानी हवास ख़तम हो जाए तो तुम रब की दिल पर चढ़ो। 2. दिल पर चढ़ना है तो विशाल अक्ल बनो, इल्म की आग पर बैठो। रूहानी खिदमत में लग जाओ और तक़रीर के साथ-साथ रब को अच्छी तरह याद करो।

नग़मा:-
जाग सजनियां जाग........

आमीन।
मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने नग़मा सुना - रूहानी रब ने इस सादे पुराने जिस्म के ज़रिए मुंह से कहा। रब फ़रमाते हैं मुझे पुराने जिस्म में पुरानी दारूल हुकूमत में आना पड़ा। अभी यह शैतान की दारूल हुकूमत है। जिस्म भी पराया है क्योंकि इस जिस्म में तो पहले से ही रूह है। मैं पराये जिस्म में दाखिली करता हूँ। अपना जिस्म होता तो उसका नाम पड़ता। हमारा नाम बदलता नहीं। मुझे फिर भी कहते हैं शिवबाबा यानि कि रहमतुल्आल्मीन नग़में तो बच्चे रोज़ सुनते हैं। नया दौर यानि कि नई दुनिया सुनहरा दौर आया। अब किसको कहते हैं जागो? रूहों को क्योंकि रूहें घोर अन्धियारे में सोई पड़ी हैं। कुछ भी समझ नहीं। रब को ही नहीं जानती। अब रब जगाने आये हैं। अभी तुम बेहद के रब को जानते हो। उनसे बेहद की ख़ुशी मिलनी है नये दौर में। सुनहरे दौर को नया कहा जाता है, इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर को पुराना दौर कहेंगे। दानिश मन्द, मौलवी वगैरह कोई भी नहीं जानते। कोई से भी पूछो नया दौर फिर पुराना कैसे होता है, तो कोई भी बता नहीं सकेंगे। कहेंगे यह तो लाखों साल की बात है। अभी तुम जानते हो हम नये दौर से फिर पुराने दौर में कैसे आये हैं यानि कि जन्नत रिहाईश नशीन से जहन्नुम रिहाईश नशीन कैसे बने हैं। इन्सान तो कुछ भी नहीं जानते, जिनकी इबादत करते हैं उनकी बायोग्राफी को भी नहीं जानते। जैसे जगदम्बा की पूजा करते हैं अब वह अम्बा कौन है, जानते नहीं। अम्बा असल में माताओं को कहा जाता है। मगर पूजा तो एक की होनी चाहिए। शिवबाबा का भी एक ही अव्यभिचारी यादगार है। अम्बा भी एक है। मगर जगत अम्बा को जानते नहीं। यह है जगत अम्बा और लक्ष्मी है जगत की महारानी। तुमको मालूम है कि जगत अम्बा कौन है और जगत महारानी कौन है। यह बातें कभी कोई जान न सके। लक्ष्मी को हूरैन और जगत अम्बा को मोमिना कहेंगे। मोमिन मिलन पर ही होते हैं। इस मिलन के दौर को कोई नहीं जानते। बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए नयी रूह ए अफ़ज़ल खिल्क़त तामीर की जाती है। रूह ए अफ़ज़ल तुमको वहाँ देखने में आयेंगे। इस वक़्त तुम मोमिन गायन लायक़ हो। खिदमत कर रहे हो फिर तुम इबादत लायक़ बनेंगे। ब्रह्मा को इतनी बाज़ुए देते हैं तो अम्बा को भी क्यों नहीं देंगे। उनके भी तो तमाम बच्चे हैं ना। माँ-बाप ही बाप ए अवाम बनते हैं। बच्चों को बाप ए अवाम नहीं कहेंगे। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम को कभी सुनहरे दौर में जहान के बाप जहान की मां नहीं कहेंगे। बाप ए अवाम का नाम बाला है। जहान के बाप और जहान की मां एक ही है। बाक़ी हैं उनके बच्चे। अजमेर में प्रजापिता ब्रह्मा के मन्दिर में जायेंगे तो कहेंगे बाबा क्योंकि है ही बाप ए अवाम। हद के बाप बच्चे पैदा करते हैं तो वह हद के बाप ए अवाम ठहरे। यह है बेहद का। रहमतुल्आल्मीन तो तमाम रूहों का बेहद का बाप है। यह भी तुम बच्चों को कान्ट्रास्ट लिखना है। जगत अम्बा सरस्वती है एक। नाम कितने रख दिये हैं - दुर्गा, काली वगैरह। अम्बा और बाबा के तुम सब बच्चे हो। यह मख़लूक़ है ना। बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम की बेटी है सरस्वती, उनको अम्बा कहते हैं। बाक़ी हैं बच्चे और बच्चियां। हैं सब एडाप्टेड। इतने तमाम बच्चे कहाँ से आ सकते हैं। यह तमाम हैं मुंह निस्बनामा। मुंह से औरत को क्रियेट किया तो खालिक हो गया। कहते हैं यह मेरी है। मैंने इनसे बच्चे पैदा किये हैं। यह तमाम है एडाप्शन। यह फिर है इलाही, मुंह के ज़रिए मख़लूक़। रूहें तो हैं ही। उनको एडाप्ट नहीं किया जाता है। रब फ़रमाते हैं तुम रूहें हमेशा मेरे बच्चे हो। फिर अभी मैं आकर बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए बच्चों को एडाप्ट करता हूँ। बच्चों (रूहों) को नहीं एडाप्ट करते, बच्चे और बच्चियों को करते हैं। यह भी बड़ी महीन समझने की बातें हैं। इन बातों को समझने से तुम यह अफ़ज़ल ख्वातीन अफ़ज़ल हज़रात बनते हो। कैसे बनें, यह हम समझा सकते हैं। क्या ऐसे आमाल किये जो यह दुनिया के मालिक बनें। तुम नुमाइश वगैरह में भी पूछ सकते हो। तुमको मालूम है इन्हों ने यह जन्नत की दारूल हुकूमत कैसे ली। तुम्हारे में भी हक़ीक़ी तौर पर हर कोई नहीं समझा सकते। जिनमें हूरैन फ़ज़ीलत होंगी, इस रूहानी खिदमत में लगे हुए होंगे वह समझा सकते हैं। बाक़ी तो इबलीस की बीमारी में फँसे रहते हैं। कई तरह के बीमारी हैं। जिस्मानी तकब्बुर की भी बीमारी है। इन ख़बासतों ने ही तुमको बीमार बनाया है।
रब फ़रमाते हैं मैं तुमको पाकीज़ा हूरैन बनाता हूँ। तुम तमाम फ़ज़ीलतों से लबरेज़...... पाकीज़ा थे। अभी नापाक बन गये हो। बेहद का रब ऐसे कहेंगे। इसमें मज़मत की बात नहीं, यह समझाने की बात है। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीनियों को बेहद का रब फ़रमाते हैं मैं यहाँ हिन्दुस्तान में आता हूँ। हिन्दुस्तान की अज़मत तो बेशुमार है। यहाँ आकर जहन्नुम को जन्नत बनाते हैं, सबको सुकून देते हैं। तो ऐसे रब की भी अज़मत बेइंतहा है। पारावार नहीं। जगत अम्बा और उनकी अज़मत को कोई भी नहीं जानते। इनका भी कान्ट्रास्ट तुम बता सकते हो। यह जगत अम्बा की बायोग्राफी, यह लक्ष्मी की बायोग्राफी। वही जगत अम्बा फिर लक्ष्मी बनती है। फिर लक्ष्मी सो 84 विलादतों के बाद जगत अम्बा होगी। तस्वीर भी अलग-अलग रखने चाहिए। दिखाते हैं लक्ष्मी को कलष मिला मगर लक्ष्मी फिर मिलन पर कहाँ से आई। वह तो सुनहरे दौर में हुई है। यह तमाम बातें रब समझाते हैं। तस्वीर बनाने के ऊपर जो मुकरर हैं उनको इरादा ए ग़ौरतलब करना चाहिए। तो फिर समझाना आसान होगा। इतनी फाज़िल अक्ल चाहिए तब दिल पर चढ़े। जब रब्बा को अच्छी तरह याद करेंगे, इल्म की आग पर बैठेंगे तब दिल पर चढ़ेंगे। ऐसे नहीं कि जो निहायत अच्छी तक़रीर करते हैं, वह दिल पर चढ़ते हैं। नहीं, रब फ़रमाते हैं दिल पर आखरीन में चढ़ेंगे, नम्बरवार तजवीज़ के मुताबिक जब जिस्मानी हवास ख़तम हो जायेगा।
रब ने समझाया है ब्रह्म ज्ञानी, ब्रह्म में लीन होने की मेहनत करते हैं मगर ऐसे कोई लीन हो नहीं सकता। बाक़ी मेहनत करते हैं, आला मर्तबा पाते हैं। ऐसे-ऐसे अज़ीम हस्ती बनते हैं जो उनको प्लेटेनियम में वज़न करते हैं क्योंकि ब्रह्म में लीन होने की मेहनत तो करते हैं ना। तो मेहनत का भी सिला मिलता है। बाक़ी निजात-ज़िन्दग़ी ए निजात नहीं मिल सकती। तुम बच्चे जानते हो अब यह पुरानी दुनिया गई कि गई। इतने बॉम्ब्स बनाये हैं - रखने के लिए थोड़े ही बनाये हैं। तुम जानते हो पुरानी दुनिया की तबाही लिए यह बॉम्ब्स काम आयेंगे। कई तरह के बॉम्ब्स हैं। रब इल्म और इबादत सिखलाते हैं फिर राज-राजेश्वर डबल सिरताज हूर-हूरैन बनेंगे। कौन-सा आला मर्तबा है। मोमिन चोटी हैं ऊपर में। चोटी सबसे ऊपर है। अभी तुम बच्चों को नापाक से पाकीज़ा बनाने रब आये हैं। फिर तुम भी नापाक से पाक बनाने वाले बनते हो - यह नशा है? हम सबको पाकीज़ा बनाए राज-राजेश्वर बना रहे हैं? नशा हो तो निहायत ख़ुशी में रहें। अपनी दिल से पूछो हम कितने को अपने जैसा बनाते हैं? बाप ए अवाम और जगत-अम्बा दोनों एक जैसे हैं। मोमिनों के मख़लूक़ तामीर करते हैं। यज़ीद से मोमिन बनने का तरीक़ा रब ही बताते हैं। यह कोई सहीफों में नहीं है। यह है भी गीता का दौर। क़यामत की जंग भी बरोबर हुई थी। हक़ीक़ी इबादत एक को सिखाई होगी क्या। इन्सानों की अक्ल में फिर अर्जुन और कृष्ण ही हैं। यहाँ तो बेहिसाब पढ़ते हैं। बैठे भी देखो कैसे सादे हो। छोटे बच्चे अल्फ बे पढ़ते हैं ना। तुम बैठे हो तुमको भी अल्फ बे पढ़ा रहे हैं। अल्फ और बे, यह है वर्सा। रब फ़रमाते हैं मुझे याद करो तो तुम दुनिया के मालिक बनेंगे। कोई भी आसुरी काम नहीं करना है। दैवीगुण धारण करने हैं। देखना है हमारे में कोई अवगुण तो नहीं हैं? मैं निर्गुण हारे में कोई गुण नाहीं। अभी निर्गुण आश्रम भी है परन्तु अर्थ कुछ भी नहीं। निर्गुण अर्थात् मेरे में कोई गुण नहीं। अब गुणवान बनाना तो बाप का ही काम है। बाप के टाइटिल की टोपी फिर अपने ऊपर रख दी है। बाप कितनी बातें समझाते हैं। डायरेक्शन भी देते हैं। जगत अम्बा और लक्ष्मी का कान्ट्रास्ट बनाओ। ब्रह्मा-सरस्वती संगम के, लक्ष्मी-नारायण हैं सतयुग के। यह चित्र हैं समझाने के लिए। सरस्वती ब्रह्मा की बेटी है। पढ़ते हैं मनुष्य से देवता बनने के लिए। अभी तुम ब्राह्मण हो। सतयुगी देवता भी मनुष्य ही हैं परन्तु उन्हों को देवता कहते, मनुष्य कहने से जैसे उनकी इन्सल्ट हो जाती है इसलिए देवी-देवता वा भगवान-भगवती कह देते हैं। अगर राजा-रानी को भगवान-भगवती कहें तो फिर प्रजा को भी कहना पड़े, इसलिए देवी-देवता कहा जाता है। त्रिमूर्ति का चित्र भी है। सतयुग में इतने थोड़े मनुष्य, कलियुग में इतने बहुत मनुष्य हैं। वह कैसे समझायें। इसके लिए फिर गोला भी जरूर चाहिए। प्रदर्शनी में इतने सबको बुलाते हैं। कस्टम कलेक्टर को तो कभी कोई ने निमंत्रण नहीं दिया है। तो ऐसे-ऐसे विचार चलाने पड़ें, इसमें बड़ी विशालबुद्धि चाहिए।
बाप का तो रिगार्ड रखना चाहिए। हुसेन के घोड़े को कितना सजाते हैं। पटका कितना छोटा होता, घोड़ा कितना बड़ा होता है। आत्मा भी कितनी छोटी बिन्दी है, उनका श्रृंगार कितना बड़ा है। यह अकालमूर्त का तख्त है ना। सर्वव्यापी की बात भी गीता से उठाई है। बाप कहते हैं मैं आत्माओं को राजयोग सिखलाता हूँ फिर सर्वव्यापी कैसे होंगे। बाप-टीचर-गुरू सर्वव्यापी कैसे होंगे। बाप कहते हैं मैं तो तुम्हारा बाप हूँ फिर ज्ञान सागर हूँ। तुमको बेहद की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझने से बेहद का राज्य मिल जायेगा। दैवीगुण भी धारण करने चाहिए। माया एकदम नाक से पकड़ लेती है। चलन गन्दी हो पड़ती फिर लिखते हैं ऐसी-ऐसी भूल हो गई। हमने काला मुँह कर लिया। यहाँ तो पवित्रता सिखाई जाती है फिर अगर कोई गिरेंगे भी तो फिर उसमें बाप क्या कर सकते हैं। घर में कोई बच्चा गन्दा हो पड़ता है, काला मुँह कर देता है तो बाप कहते हैं तुम तो मर जाते तो अच्छा है। बेहद का बाप भल ड्रामा को जानते हैं फिर भी कहेंगे तो सही ना। तुम औरों को शिक्षा देकर खुद गिरते हो तो हज़ार गुणा पाप चढ़ जाता है। कहते हैं माया ने थप्पड़ मार दिया। माया ऐसा घूँसा मारती है जो एकदम अक्ल ही गुम कर देती है।
बाप समझाते रहते हैं, आंखें बड़ी धोखेबाज हैं। कभी भी कोई विकर्म नहीं करना है। तूफान तो बहुत आयेंगे क्योंकि युद्ध के मैदान में हो ना। पता भी नहीं पड़ता कि क्या होगा। माया झट थप्पड़ लगा देती है। अभी तुम कितने समझदार बनते हो। आत्मा ही समझदार बनती है ना। आत्मा ही बेसमझ थी। अब बाप समझदार बनाते हैं। बहुत देह-अभिमान में हैं। समझते नहीं कि हम आत्मा हैं। बाप हम आत्माओं को पढ़ाते हैं। हम आत्मा इन कानों से सुन रही हैं। अब बाप कहते हैं कोई भी विकार की बात इन कानों से न सुनो। बाप तुम्हें विश्व का मालिक बनाते हैं, मंजिल बहुत बड़ी है। मौत जब नज़दीक आयेगा तो फिर तुमको डर लगेगा। मनुष्यों को मरने के समय भी मित्र-सम्बन्धी आदि कहते हैं ना - भगवान को याद करो या कोई अपने गुरू आदि को याद करेंगे। देहधारी को याद करना सिखलाते हैं। बाप तो कहते हैं मामेकम् याद करो। यह तो तुम बच्चों की ही बुद्धि में है। बाप फरमान करते हैं - मामेकम् याद करो। देहधारियों को याद नहीं करना है। माँ-बाप भी देहधारी हैं ना। मैं तो विचित्र हूँ, विदेही हूँ, इसमें बैठ तुमको ज्ञान देता हूँ। तुम अभी ज्ञान और योग सीखते हो। तुम कहते हो ज्ञान सागर बाप द्वारा हम ज्ञान सीख रहे हैं, राज-राजेश्वरी बनने के लिए। ज्ञान सागर ज्ञान भी सिखलाते हैं, राजयोग भी सिखलाते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) समझदार बन माया के तूफानों से कभी हार नहीं खाना है। आंखें धोखा देती हैं इसलिए अपनी सम्भाल करनी है। कोई भी विकारी बातें इन कानों से नहीं सुननी हैं।

2) अपनी दिल से पूछना है कि हम कितनों को आपसमान बनाते हैं? मास्टर पतित-पावनी बन सबको पावन (राज़-राज़ेश्वर) बनाने की सेवा कर रहे हैं? हमारे में कोई अवगुण तो नहीं है? दैवीगुण कहाँ तक धारण किये हैं?

बरक़ात:-
सभी को ठिकाना देने वाले रहमदिल बाप के बच्चे रहमदिल भव

रहमदिल बाप के रहमदिल बच्चे किसी को भी भिखारी के रूप में देखेंगे तो उन्हें रहम आयेगा कि इस आत्मा को भी ठिकाना मिल जाए, इसका भी कल्याण हो जाए। उनके सम्पर्क में जो भी आयेगा उसे बाप का परिचय जरूर देंगे। जैसे कोई घर में आता है तो पहले उसे पानी पूछा जाता है, ऐसे ही चला जाए तो बुरा समझते हैं, ऐसे जो भी सम्पर्क में आता है उसे बाप के परिचय का पानी जरूर पूछो अर्थात् दाता के बच्चे दाता बनकर कुछ न कुछ दो ताकि उसे भी ठिकाना मिल जाए।

स्लोगन:-
यथार्थ वैराग्य वृत्ति का सहज अर्थ है - जितना न्यारा उतना प्यारा।

आमीन