16-11-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
तुम इस रूहानी युनिवर्सिटी के स्टूडेण्ट हो, तुम्हारा काम है तमाम युनिवर्स को रब का मैसेज देना

सवाल:-
अभी तुम बच्चे कौन सा ढिंढोरा पीटते और कौन सी बात समझाते हो?

जवाब:-
तुम ढिंढोरा पीटते हो कि यह नई हूरैन दारूल हुकूमत फिर से क़ायम हो रही है। अनेक मज़हबों को अब फ़ना होना है। तुम सबको समझाते हो कि तमाम बेफिकर रहो, यह इन्टरनेशनल रोला है। जंग ज़रूर लगनी है, इसके बाद हूरैन दारूल हुकूमत आयेगी।

आमीन।
यह है रूहानी युनिवर्सिटी। तमाम युनिवर्स की जो भी रूहें हैं, युनिवर्सिटी में रूहें ही पढ़ती हैं। युनिवर्स यानि कि कायनात। अब क़ायदे मुताबिक युनिवर्सिटी अल्फ़ाज़ तुम बच्चों का है। यह है रूहानी युनिवर्सिटी। जिस्मानी युनिवर्सिटी होती ही नहीं। यह एक ही गॉड फादरली युनिवर्सिटी है। तमाम रूहों को लेसन मिलता है। तुम्हारा यह पैगाम कोई न कोई तरह से सबको ज़रूर पहुँचना चाहिए, मैसेज देना है ना और यह मैसेज बिल्कुल सिम्पुल है। बच्चे जानते हैं वह हमारा बेहद का रब है, जिसको तमाम याद करते हैं। ऐसे भी कहें वह हमारा बेहद का माशूक है, जो भी दुनिया में ज़िस्म नशीन रूहें हैं वह उस माशूक को याद ज़रूर करती हैं। यह प्वाइंट्स अच्छी तरह इख्तियार करनी है। जो फ्रेश अक्ल होंगे वह अच्छी तरह इख्तियार कर सकेंगे। युनिवर्स में जो भी रूहें हैं उन सबका रब एक ही है। युनिवर्सिटी में तो इन्सान ही पढ़ेंगे ना। अभी तुम बच्चे यह भी जानते हो - हम ही 84 विलादत लेते हैं। 84 लाख की तो बात ही नहीं। युनिवर्स में जो भी रूहें हैं, इस वक़्त तमाम नापाक हैं। यह है ही छी-छी दुनिया, दारूल ग़म। उसे दारूल मसर्रत में ले जाने वाला एक ही रब है, उनको लिबरेटर भी कहते हैं। तुम तमाम युनिवर्स और दुनिया के मालिक बनते हो ना। रब सबके लिए फ़रमाते हैं यह मैसेज पहुँचाकर आओ। रब को तमाम याद करते हैं, उनको गाइड, लिबरेटर, मर्सीफुल (रहमदिल) भी कहते हैं। कई ज़ुबां हैं ना। तमाम रूहें एक को पुकारती हैं तो वह एक ही तमाम युनिवर्स का उस्ताद भी हुआ ना। बाप तो है ही मगर यह किसको मालूम नहीं कि वह हम तमाम रूहों के उस्ताद भी है, हादी भी है। सबको गाइड भी करते हैं। इस बेहद के गाइड को सिर्फ़ तुम बच्चे ही जानते हो। तुम मोमिनों के सिवाए और कोई नहीं जानते। रूह को भी तुमने जाना है कि रूह क्या चीज़ है। दुनिया में तो एक भी इन्सान नहीं, ख़ास हिन्दुस्तान आम दुनिया किसको भी मालूम नहीं कि रूह क्या चीज़ है। भल कहते हैं पैशानी के बीच चमकता है अजब सितारा। मगर समझ कुछ नहीं। अभी तुम जानते हो रूह तो ला फ़ानी है। वह कभी बड़ी या छोटी नहीं होती। जैसे तुम्हारी रूह है, रब भी वही नुक्ता है। बड़ा छोटा नहीं। वह भी है रूह सिर्फ़ सुप्रीम रूह है, सुप्रीम है। बरोबर तमाम रूहे आलम ए अरवाह में रहने वाली हैं। यहाँ आती हैं पार्ट बजाने। फिर अपने आलम ए अरवाह जाने की कोशिश करते हैं। पाक परवरदिगार को तमाम याद करते हैं क्योंकि रूहों को पाक परवरदिगार ने ही निजात में भेजा था तो उनको ही याद करते हैं। रूह ही स्याह रास्त बनी है। याद क्यों करते हैं? इतना भी मालूम नहीं। जैसे बच्चा कहेगा - रब्बा'', बस। उनको कुछ भी मालूम ही नहीं। तुम भी बाबा मम्मा कहते हो, जानते कुछ नहीं हो। हिन्दुस्तान में एक नेशनल्टी थी, उनको डीटी नेशनल्टी कहा जाता है। फिर बाद में और भी उनमें इन्टर हुए हैं। अभी कितने बेइंतहा हो गये हैं, इसलिए इतने झगड़े वगैरह होते हैं। जहाँ-जहाँ जास्ती घुस गये हैं, उनको वहाँ से निकालने की कोशिश करते रहते हैं। निहायत झगड़े हो गये हैं। अन्धियारा भी निहायत हो गया है। कुछ तो लिमिट भी होनी चाहिए ना। एक्टर्स की लिमिट होती है। यह भी बना बनाया खेल है। इसमें जितने भी एक्टर्स हैं, उसमें कम जास्ती हो न सके। जब सब एक्टर्स स्टेज पर आ जाते हैं फिर उनको वापिस भी जाना है। जो भी एक्टर्स रहे हुए होंगे, आते रहेंगे। भल कितना भी कन्ट्रोल वगैरह करने के लिए माथा मारते रहते हैं, मगर कर नहीं सकते। बोलो, हम बी.के. ऐसा बर्थ कन्ट्रोल कर देते हैं जो बाक़ी 9 लाख जाकर रहेंगे। फिर तमाम आदमशुमारी ही कम हो जायेगी। हम आपको सच बताते हैं, अब क़याम कर रहे हैं। नई दुनिया, नया दरख्त ज़रूर छोटा ही होगा। यहाँ तो यह कन्ट्रोल कर नहीं सकेंगे क्योंकि स्याह रास्त और होता जाता है। इज़ाफ़ा होता जाता है। एक्टर्स जो भी आने वाले हैं, यहाँ ही आकर जिस्म इख्तियार करेंगे। इन बातों को कोई समझते नहीं हैं। शुरूड़ अक्ल समझते हैं दारूल हुकूमत में तो हर तरह के पार्ट नशीन होते हैं। सुनहरे दौर में जो दारूल हुकूमत थी वह फिर से क़ायम हो रही है। ट्रांसफर हो जायेंगे। तुम अभी स्याह रास्त से ख़ैर रास्त क्लास में ट्रांसफर होते हो। पुरानी दुनिया से नई दुनिया में जाते हो। तुम्हारी तालीम इस दुनिया के लिए नहीं है। ऐसी युनिवर्सिटी और कोई हो न सके। गॉड फादर ही कहते हैं हम तुमको आलम ए हयात के लिए तालीम देते हैं। यह आलम ए मौत खलास होनी है। जन्नत में इन आदम अलैहिस्सलाम-हव्वा अलैहिस्सलाम की दारूल हुकूमत थी। यह क़ायम कैसे हुई, यह किसको मालूम नहीं है।
रब्बा हमेशा फ़रमाते हैं जहाँ तुम तक़रीर करते हो तो यह अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़ज़ल हज़रात की तस्वीर ज़रूर रखो। इनमें डेट भी ज़रूर लिखी हुई हो। तुम समझा सकते हो कि नयी दुनिया की शुरूआत से 1250 साल तक इस डिनायस्टी की सल्तनत थी। जैसे कहते हैं ना - क्रिश्चियन डिनायस्टी की सल्तनत थी। एक दो के पिछाड़ी चले आते हैं। तो जब ये हूरैन डिनायस्टी थी तो दूसरा कोई थी नहीं। अब फिर यह डिनायस्टी क़ायम हो रही है। बाक़ी तमाम की तबाही होनी है। जंग भी सामने खड़ी है। भागवत वगैरह में इस पर भी कहानी लिख दी है। छोटे-पन में यह कहानियां वगैरह सुनते रहते थे। अभी तुम जानते हो यह बादशाहत कैसे क़ायम होती है। ज़रूर रब ने ही हक़ीक़ी इबादत सिखायी है। जो पास होते हैं वह फ़तह माला का दाना बनते हैं और कोई इस माला को जानते नहीं। तुम ही जानते हो। तुम्हारा कुन्बाई राह है। ऊपर में रब्बा खड़ा है, उनको अपना जिस्म है नहीं। फिर ब्रह्मा सरस्वती सो लक्ष्मी-नारायण। पहले चाहिए रब फिर जोड़ा। रूद्राक्ष के दाने होते हैं ना। नेपाल में एक दरख्त है, जहाँ से यह रूद्राक्ष के दाने आते हैं। उनमें सच्चे भी होते हैं। जितना छोटे उतनी क़ीमत निहायत। अभी तुम मतलब को समझ गये हो। यह मीकाइल अलैहिस्सलाम की फ़तह माला और हूरैन माला बनती है। वो लोग तो सिर्फ़ तस्बीह फेरते-फेरते अल्ल्लाह्-अल्लाह करते रहेंगे, मतलब कुछ भी नहीं। तस्बीह का जाप करते हैं। यहाँ तो रब फ़रमाते हैं मुझे याद करो। यह है अजपाजाप। मुंह से कुछ बोलना नहीं है। नग़मा भी मैकरू हो जाता है। बच्चों को तो सिर्फ़ रब को याद करना है। नहीं तो फिर नग़मा वगैरह याद आते रहेंगे। यहाँ असल बात है ही याद की। तुमको आवाज़ से बालातर जाना है। रब का डायरेक्शन है ही दिल से मुझे याद करो। रब थोड़े ही फ़रमाते हैं नग़में गाओ, रड़ी मारो। मेरी अज़मत गायन करने की भी दरकार नहीं है। यह तो तुम जानते हो वह दरिया ए इल्म, ख़ुशी- दरिया ए सुकून है। इन्सान नहीं जानते। ऐसे ही नाम रख दिये हैं। तुम्हारे सिवाए और कोई भी नहीं जानते। रब ही आकर अपना नाम रूप वगैरह बताते हैं - मैं कैसा हूँ, तुम रूह कैसी हो! तुम निहायत मेहनत करते हो - पार्ट बजाने। आधा चक्कर अक़ीदत मन्दी का है, मैं तो ऐसे पार्ट में आता नहीं हूँ। मैं ग़म ख़ुशी से न्यारा हूँ। तुम दु:ख भोगते हो फिर तुम ही ख़ुशी भोगते हो - सुनहरे दौर में। तुम्हारा पार्ट मेरे से भी आला है। मैं तो आधा चक्कर वहाँ ही आराम से बैठा रहता हूँ आवाज़ से बालातर में। तुम मुझे पुकारते आते हो। ऐसे नहीं कि मैं वहाँ बैठ तुम्हारी पुकार सुनता हूँ। मेरा पार्ट ही इस वक़्त का है। ड्रामा के पार्ट को मैं जानता हूँ। अब ड्रामा पूरा हुआ है, मुझे जाकर नापाक को पाकीज़ा बनाने का पार्ट बजाना है और कोई बात है नहीं। इन्सान समझते हैं पाक परवरदिगार तमाम कुव्वत नशीन है, अन्दरूनी कैफियत जानने वाला है। सबके अन्दर क्या-क्या चलता है, वह जानते हैं। रब फ़रमाते हैं ऐसे है नहीं। तुम जब बिल्कुल स्याह रास्त बन जाते हो - तब एक्यूरेट टाइम पर मुझे आना पड़ता है। सादे जिस्म में ही आता हूँ। तुम बच्चों को आकर दु:ख से छुड़ाता हूँ। एक दीन का क़याम आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए, कई दीनों का तबाही इस्राफील के ज़रिए...हाहाकार के बाद जयजयकार हो जायेगी। कितना हाहाकार होना है। आफ़तों में मरते रहेंगे। नेचुरल कैलेमिटीज की भी निहायत मदद रहती है। नहीं तो इन्सान निहायत बीमार, ग़मज़दा हो जाएं। रब फ़रमाते हैं बच्चे ग़मज़दा न पड़े रहें इसलिए नेचुरल कैलेमिटीज भी ऐसी ज़ोर से आती हैं जो सबको खत्म कर देती हैं। बाम्बस तो कुछ नहीं हैं, नेचुरल कैलेमिटीज निहायत मदद करती हैं। अर्थक्वेक में बेइंतहा ख़त्म हो जाते हैं। पानी का एक दो घुटका आया यह खत्म। समुद्र भी जरूर उछल खायेगा। ज़मीन को हप करेगा, 100 फुट पानी उछल खाये तो क्या कर देगा। यह है हाहाकार की सीन। ऐसी सीन देखने के लिए हिम्मत चाहिए। मेहनत भी करनी है, बेखौफ भी बनना है। तुम बच्चों में तकब्बुर बिल्कुल नहीं होना चाहिए। रूहानी हवासी बनो। रूहानी हवासी रहने वाले बड़े मीठे होते हैं। रब फ़रमाते हैं - मैं तो हूँ ग़ैर मुजस्सम और अजूबा। यहाँ आता हूँ - खिदमत करने के लिए। हमारी बड़ाई देखो कितनी करते हैं। दरिया ए इल्म या रब्बा और फिर कहते हैं नापाक दुनिया में आओ। तुम बुलावा तो बड़ा अच्छा देते हो। ऐसा भी नहीं कहते कि जन्नत में आकर ख़ुशी तो देखो। कहते हैं ए नापाक से पाक बनाने वाले आओ हम नापाक हैं, हमको पाकीज़ा बनाने आओ। बुलावा देखो कैसा है। एकदम स्याह रास्त नापाक दुनिया और फिर नापाक जिस्म में बुलाते हैं। बड़ा अच्छा बुलावा देते हैं हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन! ड्रामा में राज़ ही ऐसा है। इनको भी थोड़े ही मालूम था कि मेरा निहायत विलादतों के आख़िर की विलादत है। रब्बा ने दाखिली किया है तब बताते हैं। रब्बा ने हर एक बात का राज़ समझाया है। आदम अलैहिस्सलाम को ही वन्नी (ख्वातीन) बनना है। रब्बा खुद फ़रमाते हैं - मेरी यह वन्नी है। मैं इनमें दाखिल कर इन ज़रिए तुमको अपना बनाता हूँ। यह सच्ची-सच्ची बड़ी माँ हो गई और वह एडाप्टेड मॉ ठहरी। मॉ बाप तुम इनको कह सकते हो। पाक परवरदिगार को सिर्फ़ फादर ही कहेंगे। यह है आदम अलैहिस्सलाम बाबा। मम्मा बातिन है। आदम अलैहिस्सलाम
है मॉ मगर जिस्म हज़रात का है। यह तो सम्भाल नहीं सकेंगे इसलिए एडाप्ट किया है बच्ची को। नाम रख दिया है मातेश्वरी। हेड हो गई। ड्रामा के मुताबिक है ही एक सरस्वती। बाक़ी दुर्गा, काली वगैरह तमाम कई नाम हैं। मॉ बाप तो एक ही होते हैं ना। तुम सब हो बच्चे। गायन भी है ब्रहमा की बेटी सरस्वती। तुम आदम ज़ादा- आदम ज़ादियां हो ना। तुम्हारे ऊपर नाम निहायत हैं। यह तमाम बातें तुम्हारे में भी नम्बरवार समझेंगे। तालीम में भी नम्बरवार तो होते हैं ना। एक न मिले दूसरे से। यह दारूल क़याम हो रही है। यह बना बनाया ड्रामा है। इनको खुलासा से समझना है। निहायत बेइंतहा प्वाइंट्स हैं। बैरिस्टरी पढ़ते हैं फिर उनमें भी नम्बरवार होते हैं। कोई बैरिस्टर तो 2-3 लाख कमाते हैं। कोई देखो कपड़े भी फटे हुए पहनेंगे। इसमें भी ऐसे हैं।
तो बच्चों को समझाया गया है कि यह इन्टरनेशनल रोला है। अभी तुम समझाते हो कि तमाम बेफिकर रहो। जंग तो ज़रूर लगनी ही है। तुम ढिंढोरा पीटते हो कि नई हूरैन दारूल हुकूमत फिर से क़ायम हो रही है। कई मज़हब का तबाही होगी। कितना क्लीयर है। बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम से यह अवाम तामीर की जाती है। कहते हैं यह है मेरी मुंह निस्ब नामा। तुम मुंह निस्ब नामा मोमिन हो। वह कोख निस्ब नामा मोमिन हैं। वह हैं नाकाबिल, तुम अभी काबिल बन रहे हो। तुम जानते हो हम सो हूरैन काबिल ए एहतराम बन रहे हैं। तुम्हारे ऊपर अभी लाइट का ताज नहीं है। तुम्हारी रूह जब पाकीज़ा बनेंगी तब यह जिस्म छोड़ देगी। इस जिस्म पर तुमको लाइट का ताज नहीं दे सकते, शोभेगा नहीं। इस वक़्त तुम हो गायन लायक़। इस वक़्त कोई की भी रूह पाकीज़ा नहीं है, इसलिए किसके ऊपर भी इस रूहानी लाइट नहीं होनी चाहिए। लाइट सुनहरे दौर में होती है। दो फ़न कम वाले को भी यह लाइट नहीं देनी चाहिए। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुड़मार्निग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) अपनी सूरत ए हाल ऐसी अचल और बेखौफ़ बनानी है जो आखिरी तबाही की सीन को देख सकें। मेहनत करनी है रूहानी हवासी बनने की।

2) नई दारूल हुकूमत में आला मर्तबा पाने के लिए तालीम पर पूरा-पूरा तवज्जों देना है। पास होकर फ़तह माला का दाना बनना है।

बरक़ात:-
कमज़ोर, दिलशिकस्त, नाकाबिल रूह को एकस्ट्रा कुव्वत देने वाले रूहानी रहमदिल बनो।

जो रूहानी रहमदिल बच्चे हैं-वह अज़ीम सदक़ा नशीन बन बिल्कुल होपलेस केस में होप पैदा कर देते हैं। कमज़ोर को कुव्वत नशीन बना देते हैं। सदक़ा हमेशा ग़रीब को, बेसहारे को दिया जाता है। तो जो कमज़ोर दिलशिकस्त, नाकाबिल अवाम क्वालिटी की रूहें हैं उनके वास्ते रूहानी रहमदिल बन अज़ीम सदक़ा नशीन बनो। आपस में एक दूसरे के वास्ते अज़ीम सदक़ा नशीन नहीं। वह तो मददगार साथी हो, भाई भाई हो, हमशरीक तजवीज नशीन हो, मदद दो, सदक़ा नहीं।

स्लोगन:-
हमेशा एक रब के अफ़ज़ल सोहबत में रहो तो और किसी की सोहबत का रंग असर नहीं डाल सकता।

आमीन