17-09-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
तुम्हें इस रूह ए अफ़ज़ल मिलन के दौर पर ही आला से आला हज़रात बनना है, सबसे आला हज़रात हैं यह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम

सवाल:-
तुम बच्चे रब के साथ-साथ कौन-सा एक बातिन काम कर रहे हो?

जवाब:-
अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन और हूरैन दारूल हुकूमत का क़याम - तुम रब के साथ बातिन रूप से यह कर रहे हो। रब बागवान है जो आकर कांटों के जंगल को फूलों का बगीचा बना रहे हैं। उस बगीचे में कोई भी ख़ौफनाक दु:ख देने वाली चीज़ें होती नहीं।

नग़मा:-
आखिर वह दिन आया आज........

आमीन।
रूहानी रब बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं। समझायेंगे तो ज़रूर जिस्म के ज़रिए। रूह जिस्म बिगर कोई भी काम कर नहीं सकती। रूहानी रब को भी एक ही बार रूह ए अफ़ज़ल मिलन का दौर पर जिस्म लेना पड़ता है। यह मिलन का दौर भी है, इनको रूह ए अफ़ज़ल मिलन का दौर भी कहेंगे क्योंकि इस मिलन का दौर के बाद फिर सुनहरा दौर आता है। सुनहरा दौर को भी रूह ए अफ़ज़ल दौर कहेंगे। रब आकर क़याम भी रूह ए अफ़ज़ल दौर की करते हैं। मिलन के दौर पर आते हैं तो ज़रूर वह भी रूह ए अफ़ज़ल दौर हुआ। यहाँ ही बच्चों को रूह ए अफ़ज़ल बनाते हैं। फिर तुम रूह ए अफ़ज़ल नई दुनिया में रहते हो। रूह ए अफ़ज़ल यानि कि आला ते आला रूह यह राधे-कृष्ण अथवा लक्ष्मी-नारायण यानि कि आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम हैं। यह इल्म भी तुमको है। और मज़हब वाले भी मानेंगे बरोबर यह हेविन के मालिक हैं। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन की बड़ी भारी अज़मत है। मगर हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन खुद नहीं जानते। कहते भी हैं ना-फलाना जन्नत रिहाईश नशीन हुआ मगर जन्नत क्या चीज़ है, यह समझते नहीं। आपे ही साबित करते हैं जन्नत गया, इसका मतलब जहन्नुम में था। हेविन तो जब रब क़ायम करे। वह तो नई दुनिया को ही कहा जाता है। दो चीज़ें हैं ना - जन्नतऔर जहन्नुम। इन्सान तो जन्नत को लाखों साल कह देते हैं। तुम बच्चे समझते हो कल जन्नत था, इन्हों की बादशाहत थी फिर रब से वर्सा ले रहे हो।
रब फ़रमाते हैं - मीठे लाडले बच्चे, तुम्हारी रूह नापाक है इसलिए हेल में ही है। कहते भी हैं अभी इख्तिलाफ़ी फ़ितने दौर के 40 हज़ार साल बाक़ी हैं, तो ज़रूर इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर रिहाईश नशीन कहेंगे ना। पुरानी दुनिया तो है ना। इन्सान बिचारे घोर अन्धियारे में हैं। पिछाड़ी में जब आग लगेगी तो यह सब ख़त्म हो जायेंगे। तुम्हारी मोहब्बत नशीन अक्ल है, नम्बरवार तजवीज़ के मुताबिक। जितना मोहब्बत नशीन अक्ल होगी उतना आला मर्तबा पायेंगे। सवेरे उठकर निहायत प्यार से रब को याद करना है। भल मोहब्बत के आंसू भी आयें क्योंकि निहायत वक़्त के बाद रब आकर मिले हैं। रब्बा आप आकर हमको दु:ख से छुड़ाते हो। हम ख़बासत के समन्दर में गोते खाते कितना दु:खी होते आये हैं। अभी यह है खौंफ नाक जहन्नुम है। अभी तुमको रब्बा ने तमाम चक्कर का राज़ समझाया है। बुनियादीवतन क्या है - वह भी आकर बताया है। पहले तुम नहीं जानते थे, इसको कहते ही हैं कांटों का जंगल। जन्नत को कहा जाता है गार्डन आॅफ अल्लाह, फूलों का बग़ीचा। रब को बागवान भी कहते हैं ना। तुमको फूल से फिर कांटा कौन बनाते हैं? शैतान। तुम बच्चे समझते हो हिन्दुस्तान फूलों का बग़ीचा था, अब जंगल है। जंगल में जानवर, बिच्छू वगैरह रहते हैं। सुनहरे दौर में कोई ख़ौफनाक जानवर वगैरह होते नहीं। सहीफों में तो निहायत बातें लिख दी हैं। कृष्ण को सर्प ने डसा, यह हुआ। कृष्ण को फिर द्वापर में ले गये हैं। रब ने समझाया है अकीदत मन्दी बिल्कुल अलग चीज़ है, दरिया ए इल्म एक ही रब है। ऐसे नहीं कि आदम अलैहिस्सलाम - मीकाईल अलैहिस्सलाम - इस्राफील अलैहिस्सलाम दरिया ए इल्म हैं। नहीं, नापाक से पाक बनाने वाले एक ही दरिया ए इल्म को कहेंगे। इल्म से ही इन्सान की ख़ैर निजात होती है। ख़ैर निजात के मुकाम हैं दो - दारूल निजात और दारूल ज़िन्दगी ए निजात। अभी तुम बच्चे जानते हो यह दारूल हुकूमत क़ायम हो रही है, मगर बातिन। रब ही आकर अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन को क़ायम करते हैं, तो तमाम अपने-अपने इन्सानी चोले में आते हैं। रब को अपना चोला तो है नहीं, इसलिए इनको ग़ैर मुजस्सम गॉड फादर कहा जाता है। बाक़ी सब हैं जिस्मानी। इनको कहा जाता है इनकारपोरियल गॉड फादर, इनकारपोरियल रूहों का। तुम रूहें भी वहाँ रहती हो। रब भी वहाँ रहते हैं। मगर है बातिन। रब ही आकर अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन को क़ायम करते हैं। बुनियादी वतन में कोई दु:ख नहीं। रब फ़रमाते हैं तुम्हारा फ़लाह है ही एक बात में - रब को याद करो, दिल से मुझे याद करो। बस, रब का बच्चा बना, बच्चे को वर्सा अन्डरस्टुड है। अल्फ को याद किया तो वर्सा ज़रूर है - सुनहरे दौर में नई दुनिया का। इस नापाक दुनिया की तबाही भी ज़रूर होनी ही है। आलम ए हयात में जाना ही है। आलम ए हयात तुम आबिदों को कहानी ए हयात सुना रहे हैं। ज़ियारतों पर कितने इन्सान जाते हैं, मालिक ए हयात पर कितने जाते हैं। वहाँ है कुछ भी नहीं। सब है ठगी। सच की रत्ती भी नहीं। गाया भी जाता है झूठी काया झूठी माया... इसका भी मतलब होना चाहिए। यहाँ है ही झूठ। यह भी इल्म की बात है। ऐसे नहीं कि ग्लास को ग्लास कहना झूठ है। बाक़ी रब के बारे जो कुछ बोलते हैं वह झूठ बोलते हैं। सच बोलने वाला एक ही रब है। अभी तुम जानते हो रब्बा आकर सच्ची-सच्ची हक़ीक़ी हज़रात की कहानी सुनाते हैं। झूठे हीरे-मोती भी होते हैं ना। आजकल झूठ का निहायत शो है। उनकी चमक ऐसी होती है सच्चे से भी अच्छे। यह झूठे पत्थर पहले नहीं थे। पिछाड़ी में विलायत से आये हैं। झूठे सच्चे साथ मिला देते हैं, मालूम नहीं पड़ता है। फिर ऐसी चीज़ें भी निकली जिससे परखते हैं। मोती भी ऐसे झूठे निकले जो ज़रा भी मालूम नहीं पड़ सकता। अभी तुम बच्चों को कोई शक नहीं रहता। शक वाले फिर आते ही नहीं। नुमाइश में कितने बेइंतहा आते हैं। रब फ़रमाते हैं अब बड़े-बड़े दुकान निकालो, यह एक ही तुम्हारा सच्चा दुकान है। तुम सच्ची दुकान खोलते हो। बड़े-बड़े राहिबों के बड़े-बड़े दुकान होते हैं, जहाँ बड़े-बड़े इन्सान जाते हैं। तुम भी बड़े-बड़े सेन्टर खोलो। अकीदत मन्दी की राह की चीज़ें बिल्कुल अलग है। ऐसे नहीं कहेंगे कि अकीदत मन्दी शुरू से ही चली आई है। नहीं। इल्म से होती है ख़ैर निजात यानि कि दिन। वहाँ मुकम्मल ग़ैर ख़बासती दुनिया के मालिक थे। इन्सानों को यह भी मालूम नहीं कि यह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम दुनिया के मालिक थे। खानदान ए आफ़ताबी और खानदान ए महताबी, और कोई दीन होता नहीं। बच्चों ने नग़मा भी सुना। तुम समझते हो आख़िर वह दिन आया आज मिलन का, जो हम आकर अपने बेहद के रब से मिले। बेहद का वर्सा पाने लिए तजवीज़ करते हैं। सुनहरे दौर में तो ऐसे नहीं कहेंगे-आखिर वह दिन आया आज। वो लोग समझते हैं- निहायत अनाज होगा, यह होगा। समझते हैं जन्नत का क़याम हम करते हैं। समझते हैं स्टूडेन्ट का नया ब्लड है, यह निहायत मदद करेंगे इसलिए गवर्मेन्ट निहायत मेहनत करती है उन्हों पर। और फिर पत्थर वगैरह भी वही मारते हैं। हंगामा मचाने में पहले-पहले स्टूडेन्ट ही आगे रहते हैं। वह बड़े होशियार होते हैं। उनका न्यु ब्लड कहते हैं। अब न्यु ब्लड की तो बात नहीं। वह है ब्लड कनेक्शन, अभी तुम्हारा यह है रूहानी कनेक्शन। कहते हैं ना रब्बा हम आपका दो मास का बच्चा हूँ। कई बच्चे रूहानी बर्थ डे मनाते हैं। ईश्वरीय बर्थ डे ही मनाना चाहिए। वह जिस्मानी बर्थ डे कैन्सिल कर देना चाहिए। हम मोमिनों को ही खिलायेंगे। मनाना तो यह चाहिए ना। वह है शैतानी विलादत, यह है इलाही विलादत। रात-दिन का फ़र्क है, मगर जब यक़ीन में बैठे। ऐसे नहीं, इलाही विलादत मनाकर फिर जाए शैतानी विलादत में पड़े। ऐसा भी होता है। इलाही विलादत मनाते-मनाते फिर रफू-चक्कर हो जाते हैं। आजकल तो मैरेज डे भी मनाते हैं, शादी को जैसे कि अच्छा नेक काम समझते हैं। जहन्नुम में जाने का भी दिन मनाते हैं। वन्डर है ना। रब बैठ यह तमाम बातें समझाते हैं। अब तुमको तो इलाही बर्थ डे मोमिनों के साथ ही मनाना है। हम पाक परवरदिगार के बच्चे हैं, हम बर्थ डे मनाते हैं तो पाक परवरदिगार की ही याद रहेगी। जो बच्चे यक़ीनी दानिशमंद हैं उनको विलादत दिन मनाना चाहिए। वह शैतानी विलादत ही भूल जाए। यह भी रब्बा राय देते हैं। अगर पक्का यक़ीनी दानिशमंद है तो। बस हम तो रब्बा के बन गये, दूसरा न कोई फिर अन्त मती सो गति हो जायेगी। रब की याद में मरा तो दूसरी विलादत भी ऐसी मिलेगी। नहीं तो अन्तकाल जो स्त्री सिमरे........ यह भी सहीफों में है। यहाँ फिर कहते हैं आख़िरी वक़्त गंगा का किनारा हो। यह तमाम है अकीदत मन्दी की राह की बातें। तुमको रब फ़रमाते हैं जिस्म छूटे तो भी दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन हो। अक्ल में रब और चक्कर याद हो। सो ज़रूर जब तजवीज़ करते रहेंगे तब तो आख़िरी वक़्त याद आयेगी। अपने को रूह समझो और रब को याद करो क्योंकि तुम बच्चों को अब वापिस जाना है बे जिस्म होकर। यहाँ पार्ट बजाते-बजाते ख़ैर रास्त से स्याह रास्त बने हो। अब फिर सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनना है। इस वक़्त रूह ही इमप्योर है, तो जिस्म प्योर फिर कैसे मिल सकेगा? रब्बा ने निहायत मिसाल समझाये हैं फिर भी जौहरी है ना। खाद ज़ेवर में नहीं, सोने में पड़ती है। 24 कैरेट से 22 कैरेट बनाना होगा तो चांदी डालेंगे। अभी तो सोना है नहीं। सबसे लेते रहते हैं। आजकल नोट भी देखो कैसे बनाते हैं। कागज़ भी नहीं है। बच्चे समझते हैं कल्प-कल्प ऐसा होता आया है। पूरी तफ़्तीश रखते हैं। लॉकर्स वगैरह खुलाते हैं। जैसे किसकी तलाशी वगैरह ली जाती है ना। गायन भी है-किनकी दबी रही धूल में........ आग भी ज़ोर से लगती है। तुम बच्चे जानते हो यह सब होना है इसलिए बैग-बैगेज तुम मुस्तकबिल के लिए तैयार कर रहे हो। और कोई को मालूम थोड़े ही है, तुमको ही वर्सा मिलता है 21 विलादत लिए। तुम्हारे ही पैसे से हिन्दुस्तान को जन्नत बना रहे हैं, जिसमें फिर तुम ही रिहाईश करेंगे।
तुम बच्चे अपनी ही तजवीज़ से आपे ही राजतिलक लेते हो। ग़रीब निवाज़ रब्बा जन्नत का मालिक बनाने आये हैं मगर बनेंगे तो अपनी तालीम से। बरक़ात या एहसान से नहीं। उस्ताद का तो पढ़ाना फ़र्ज़ है। बरक़ात की बात नहीं। उस्ताद को गवर्मेन्ट से पगार मिलती है। सो तो ज़रूर पढ़ायेंगे। इतना बड़ा इज़ाफा मिलता है। पद्मापद्मपति बनते हो। कृष्ण के पांव में पद्म की निशानी देते हैं। तुम यहाँ आये हो मुस्तकबिल में पद्मपति बनने। तुम निहायत खुशहाल, दौलत मन्द, हयाती बनते हो। मौत पर फ़तह पाते हो। इन बातों को इन्सान समझ न सके। तुम्हारी उम्र पूरी हो जाती है,हयाती बन जाते हो। उन्होंने फिर पाण्डवों के चित्र लम्बे-चौड़े बना दिये हैं। समझते हैं पाण्डव इतने लम्बे थे। अब पाण्डव तो तुम हो। कितना रात-दिन का फ़र्क है। इन्सान कोई जास्ती लम्बा तो होता नहीं। 6 फुट का ही होता है। अकीदत मन्दी की राह में पहले-पहले पाक परवरदिगार की अकीदत मन्दी होती है। वह तो बड़ा बनायेंगे नहीं। पहले पाक परवरदिगार की अव्याभिचारी अकीदत मन्दी चलती है। फिर हूरैन के बुत बनाते हैं। उनकी फिर बड़ी-बड़ी तस्वीर बनाते हैं। फिर पाण्डवों के बड़ी-बड़ी तस्वीर बनाते हैं। यह सब पूजा के लिए तस्वीर बनाते हैं। लक्ष्मी की पूजा 12 मास में एक बार करते हैं। जगत अम्बा की पूजा रोज़ करते रहते हैं। यह भी बाबा ने समझाया है तुम्हारी डबल पूजा होती है। मेरी तो सिर्फ आत्मा यानी लिंग की ही होती है। तुम्हारी सालिग्राम के रूप में भी पूजा होती है और फिर देवताओं के रूप में भी पूजा होती है। रूद्र यज्ञ रचते हैं तो कितने सालिग्राम बनाते हैं तो कौन बड़ा हुआ? तब रब्बा बच्चों को सलाम करते हैं। कितना आला मर्तबा हासिल कराते हैं।
रब्बा कितनी गहरी-गहरी बातें सुनाते हैं, तो बच्चों को कितनी ख़ुशी होनी चाहिए। हमको अल्ल्लाह् ताला पढ़ाते हैं भगवान-भगवती बनाने के लिए। कितना शुक्रिया मानना चाहिए। रब की याद में रहने से सपने भी अच्छे आयेंगे। जलवा भी होगा। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) अपना इलाही रूहानी बर्थ डे मनाना है, रूहानी कनेक्शन रखना है, ब्लड कनेक्शन नहीं।शैतानी जिस्मानी बर्थ डे भी कैन्सिल। वह फिर याद भी न आये।
2) अपना बैग बैगेज मुस्तकबिल के लिए तैयार करना है। अपने पैसे हिन्दुस्तान को जन्नत बनाने की खिदमत में कामयाब करने हैं। अपनी तजवीज़ से अपने को राजतिलक देना है।

बरक़ात:-
याददाश्त का स्विच ऑन कर सेकण्ड में बेजिस्म सूरत ए हाल का एहसास करने वाले मोहब्बत नशीन अक्ल बनो

जहाँ इलाही मोहब्बत है वहाँ बे जिस्म बनना एक सेकण्ड के खेल के बराबर है। जैसे स्विच ऑन करते ही अंधकार ख़त्म हो जाता है। ऐसे मोहब्बत नशीन अक्ल बन याददाश्त का स्विच ऑन करो तो जिस्म और जिस्म की दुनिया की याददाश्त का स्विच ऑफ हो जायेगा। यह सेकण्ड का खेल है। मुंह से रब्बा कहने में भी टाइम लगता है मगर याददाश्त में लाने में टाइम नहीं लगता। यह बाबा अल्फ़ाज़ ही पुरानी दुनिया को भूलने का रूहानी बाॅम्ब है।

स्लोगन:-
जिस्मानी हवास की मिट्टी के बोझ से बालातर रहो तो डबल लाइट फरिश्ता बन जायेंगे।

आमीन