17-11-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
रब आये हैं वाइसलेस दुनिया बनाने, तुम्हारे कैरेक्टर सुधारने, तुम भाई-भाई हो तो तुम्हारी नज़रें निहायत खालिस होनी चाहिए

सवाल:-
तुम बच्चे बेफिक्र बादशाह हो फिर भी तुम्हें एक असल फिक़रात ज़रूर होनी चाहिए - कौन सी?

जवाब:-
हम नापाक से पाकीज़ा कैसे बनें - यह है असल फिकरात। ऐसा न हो रब का बनकर फिर रब के आगे सज़ायें खानी पड़ें। सज़ाओं से छूटने की फिक़रात रहे, नहीं तो उस वक़्त निहायत शर्मसार होना पड़ेगा। बाक़ी तुम बेपरवाह बादशाह हो, सबको रब का तारूफ़ देना है। कोई समझता है तो बेहद का मालिक बनता, नहीं समझता है तो उसकी तक़दीर। तुम्हें परवाह नहीं।

आमीन।
रूहानी रब जिसका नाम रहमतुल्आल्मीन है, वह बैठ अपने बच्चों को समझाते हैं। रूहानी रब तमाम का एक ही है। पहले-पहले यह बात समझानी है तो फिर आगे समझना आसान होगा। अगर रब का तारूफ़ ही नहीं मिला होगा तो सवाल करते रहेंगे। पहले-पहले तो यह यक़ीन कराना है। तमाम दुनिया को यह मालूम नहीं है कि गीता का भगवान कौन है। वह कृष्ण के लिए कह देते, हम कहते पाक परवरदिगार रहमतुल्आल्मीन गीता का भगवान है। वही दरिया ए इल्म है। अहम है सर्वशास्त्र मई शिरोमणी गीता। अल्ल्लाह् ताला के लिए ही कहते हैं - या अल्ल्लाह् तेरी गत मत न्यारी। आदम अलैहिस्सलाम के लिए ऐसे नहीं कहेंगे। रब जो सच है वह ज़रूर सच ही सुनायेंगे। दुनिया पहले नई सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ थी। अभी दुनिया पुरानी स्याह रास्त है। दुनिया को बदलने वाला एक रब ही है। रब कैसे बदलते हैं वह भी समझाना चाहिए। रूह जब सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनें तब दुनिया भी सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ क़ायम हो। पहले-पहले तुम बच्चों को हवास ए बातिन होना है। जास्ती तीक-तीक नहीं करनी है। अन्दर घुसते हैं तो निहायत तस्वीर देख पूछते ही रहते हैं। पहले-पहले समझानी ही एक बात चाहिए। जास्ती पूछने की मार्जिन न मिले। बोलो, पहले तो एक बात पर यक़ीन करो फिर आगे समझायें फिर तुम 84 विलादत के चक्कर पर ले आ सकते हो। रब फ़रमाते हैं मैं निहायत विलादतों के आख़िर में दाखिली करता हूँ। इनको ही रब फ़रमाते हैं - तुम अपने विलादतों को नहीं जानते हो। रब हमको बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए समझाते हैं। पहले-पहले अल्फ पर ही समझाते हैं। अल्फ समझने से फिर कोई शक नहीं होगा। बोलो रब हक़ है, वह भी झूठ नहीं सुनाते। बेहद का रब ही हक़ीक़ी इबादत सिखलाते हैं। शब ए बारात गाई जाती है तो ज़रूर रहमतुल्आल्मीन यहाँ आये होंगे ना। जैसे कृष्ण जयन्ती भी यहाँ मनाते हैं। कहते हैं मैं आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए क़याम करता हूँ। उस एक ही ग़ैर मुजस्सम रब के तमाम बच्चे हैं। तुम भी उनकी औलाद हो और फिर बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम की भी औलाद हो। बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए क़याम किया तो ज़रूर मोमिन-मोमिना होंगे। बहन-भाई हो गये, इसमें पाकीज़गी रहती है। घरेलू राब्तें में रहते पाकीज़ा रहने की यह है भीती। बहन-भाई हैं तो कभी क्रिमिनल नज़र नहीं होनी चाहिए। 21 विलादत नज़र सुधर जाती है। रब ही बच्चों को तालीम देंगे ना। कैरेक्टर सुधारते हैं। अभी सारी दुनिया के कैरेक्टर सुधरने हैं। इस पुरानी नापाक दुनिया में कोई कैरेक्टर नहीं। सबमें ख़बासत हैं। यह है ही नापाक विशश दुनिया। फिर वाइसलेस दुनिया कैसे बनेंगी? सिवाए रब के कोई बना न सके। अभी रब पाकीज़ा बना रहे हैं। यह हैं तमाम बातिन बातें। हम रूह हैं, रूह को पाक परवरदिगार बाप से मिलना है। तमाम तजवीज़ करते ही हैं अल्ल्लाह् ताला से मिलने के लिए। अल्ल्लाह् ताला ग़ैर मुजस्सम है। लिबरेटर, गाइड भी पाक परवरदिगार को ही कहा जाता है। दूसरे मज़हब वाले कोई को लिबरेटर, गाइड नहीं कहेंगे। पाक परवरदिगार ही आकर लिबरेट करते हैं यानि कि स्याह रास्त से ख़ैर रास्त बनाते हैं। गाइड भी करते हैं तो पहले-पहले यह एक ही बात अक्ल में बिठाओ। अगर न समझें तो छोड़ देना चाहिए। अल्फ को नहीं समझा तो बे से क्या फ़ायदा, भल चले जायें। तुम मूँझो नहीं। तुम बेपरवाह बादशाह हो। शैतानों की मुश्किलात पड़नी ही हैं। यह है ही रूद्र इल्म यज्ञ। तो पहले-पहले रब का तारूफ़ देना है। रब फ़रमाते हैं दिल से मुझे याद करो। जितनी तजवीज़ करेंगे उस के मुताबिक मर्तबा पायेंगे। अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन की सल्तनत क़ायम हो रही है। इन अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़ज़ल हज़रात की डिनायस्टी है। और मज़हब वाले कोई डिनायस्टी क़ायम नहीं करते हैं। रब तो आकर सबको आज़ाद करते हैं। फिर अपने-अपने वक़्त पर और-और मज़हब के पैगम्बर को आकर अपना मज़हब क़ायम करना है। इज़ाफ़ा होना है। नापाक बनना ही है। नापाक से पाक बनाना यह तो रब का ही काम है। वह तो सिर्फ़ आकर मज़हब क़ायम करेंगे। उसमें बड़ाई की बात ही नहीं। अज़मत है ही एक की। वो तो क्राइस्ट के पिछाड़ी कितना करते हैं। उनको भी समझाया जाए लिबरेटर गाइड तो गॉड फादर ही है। बाक़ी क्राइस्ट ने क्या किया? उनके पिछाड़ी क्रिश्चियन मज़हब की रूहें आती रहती हैं, नीचे उतरती रहती हैं। दु:ख से छुड़ाने वाला तो एक ही रब है। यह तमाम प्वाइंट्स अक्ल में अच्छी तरह इख्तियार करनी है। एक गॉड को ही मर्सीफुल कहा जाता है। क्राइस्ट कोई रहम नहीं करते। एक भी इन्सान किसी पर मर्सी नहीं करते। मर्सी होती है बेहद की। एक रब ही तमाम पर रहम करते हैं। सुनहरे दौर में तमाम ख़ुशी-सुकून में रहते हैं। दु:ख की बात ही नहीं। बच्चे एक बात अल्फ पर किसको यक़ीन कराते नहीं, और-और बातों में चले जाते हैं फिर कहते गला ही ख़राब हो गया। पहले-पहले रब का तारूफ देना है। तुम और बातों में जाओ ही नहीं। बोलो, रब तो सच बोलेंगे ना। हम बी.के. को रब ही सुनाते हैं। यह तस्वीर तमाम उसने बनवाये हैं, इसमें शक नहीं लाना चाहिए। शक्की अक्ल फ़ना। पहले तुम अपने को रूह समझ रब को याद करो तो गुनाहों का ख़ात्मा होंगा। और कोई तरीक़ा नहीं। नापाक से पाक बनाने वाला तो एक ही है ना। रब फ़रमाते हैं जिस्म के तमाम रिश्ते छोड़ दिल से मुझे याद करो। रब जिसमें दाख़िली करते हैं, उनको भी फिर तजवीज़ कर सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनना है। बनेंगे तजवीज़ से फिर आदम अलैहिस्सलाम और मीकाईल अलैहिस्सलाम का कनेक्शन भी बताते हैं। रब तुम मोमिनों को हक़ीक़ी इबादत सिखलाते हैं तो तुम आलम ए पाक के मालिक बनते हो। फिर तुम ही 84 विलादत ले अाखिर में यज़ीद बनते हो। फिर रब आकर यज़ीद से मोमिन बनाते हैं। ऐसे और कोई बता न सके। पहली-पहली बात है रब का तारूफ़ देना। रब फ़रमाते हैं मुझे ही नापाको को पाक बनाने वाले यहाँ आना पड़ता है। ऐसे नहीं कि ऊपर से प्रेरणा देता हूँ। इनका ही नाम है क़िस्मत नशीन गाड़ी। तो ज़रूर इनमें ही दाखिली करेंगे। यह है भी निहायत विलादतों के अाख़िर की विलादत। फिर सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनते हैं। उसके लिए रब तरीक़ा बताते हैं कि अपने को रूह समझ दिल से मुझे याद करो। मैं ही तमाम कुव्वत नशीन हूँ। मुझे याद करने से तुम्हारे में कुव्वत आयेगी। तुम दुनिया के मालिक बनेंगे। यह अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़ज़ल हज़रात का वर्सा इन्हों को रब से मिला है। कैसे मिला वह समझाते हैं। नुमाइश, म्युजियम वगैरह में भी तुम कह दो कि पहले एक बात को समझो, फिर और बातों में जाना। यह निहायत ज़रूरी है समझना। नहीं तो तुम दु:ख से छूट नहीं सकेंगे। पहले जब तक यक़ीन नहीं किया है तो तुम कुछ समझ नहीं सकेंगे। इस वक़्त है ही बद उन्वान दुनिया। हूर-हूरैन की दुनिया अफ़ज़ल नशीन थी। ऐसे-ऐसे समझाना है। इन्सानों की नब्ज भी देखनी चाहिए-कुछ समझता है या तवाई है? अगर तवाई है तो फिर छोड़ देना चाहिए। टाइम वेस्ट नहीं करना चाहिए। चात्रक, किरदार को परखने की भी अक्ल चाहिए। जो समझने वाला होगा उनका चेहरा ही बदल जायेगा। पहले-पहले तो ख़ुशी की बात देनी है। बेहद के रब से बेहद का वर्सा मिलता है ना। रब्बा जानते हैं याद के सफ़र में बच्चे निहायत ढीले हैं। रब को याद करने की मेहनत है। उसमें ही इबलीस निहायत मुश्किलात डालता है। यह भी खेल बना हुआ है। रब बैठ समझाते हैं - कैसे यह खेल बना-बनाया है। दुनिया के इन्सान तो रिंचक भी नहीं जानते।
रब की याद में रहने से तुम किसको समझाने में भी एकरस होंगे। नहीं तो कुछ न कुछ नुक्स (कमी) निकालते रहेंगे। रब्बा फ़रमाते हैं तुम जास्ती कुछ भी तकलीफ़ न लो। क़याम तो ज़रूर होना ही है। भावी को कोई भी टाल नहीं सकते। हुल्लास में रहना चाहिए। रब से हम बेहद का वर्सा ले रहे हैं। रब फ़रमाते हैं दिल से मुझे याद करो। निहायत प्यार से बैठ समझाना है। रब को याद करते प्यार में आंसू आ जाने चाहिए। और तो तमाम रिश्ते हैं इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में। यह है रूहानी रब का रिश्ता। यह तुम्हारे आंसू भी फ़तह माला के दाने बनते हैं। निहायत थोड़े हैं - जो ऐसा प्यार से रब को याद करते हैं। कोशिश कर जितना हो सके अपना टाइम निकाल अपने मुस्तकबिल को आला बनाना चाहिए। नुमाइश में इतने बेइंतहा बच्चे नहीं होने चाहिए। न इतनी तस्वीरों की दरकार है। नम्बरवन तस्वीर है गीता का भगवान कौन? उसके बाज़ू में अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़ज़ल हज़रात का, सीढ़ी का। बस। बाक़ी इतनी तस्वीर कोई काम की नहीं। तुम बच्चों को जितना हो सके याद के सफ़र को बढ़ाना है। असल फिकरात रखनी है कि नापाक से पाक कैसे बनें! रब्बा का बनकर और फिर रब्बा के आगे जाकर सज़ा खायें यह तो बड़ी बुरी रफ़्तार की बात है। अभी याद के सफ़र पर नहीं रहेंगे तो फिर रब के आगे सज़ा खाने वक़्त बहुत-बहुत शर्म आयेगी। सज़ा न खानी पड़े, यह सबसे जास्ती फुरना रखना है। तुम रूप भी हो, बसन्त भी हो। रब्बा भी कहते हैं मैं रूप भी हूँ, बसन्त भी हूँ। छोटी सी बिन्दी हूँ और फिर इल्म का समन्दर भी हूँ। तुम्हारी रूह में तमाम इल्म भरते हैं। 84 विलादतों का तमाम राज़ तुम्हारी अक्ल में है। तुम इल्म का रूप बन इल्म की बरसात करते हो।इल्म का एक-एक जवाहिरात कितना बेशकीमती है, इनकी वैल्यु कोई कर न सके इसलिए रब्बा फ़रमाते हैं पदमापदम क़िस्मत नशीन। तुम्हारे पैरों में पदम की निशानी भी दिखाते हैं, इनको कोई समझ न सके। इन्सान पदमपति नाम रखते हैं। समझते हैं इनके पास निहायत दौलत है। पदमपति का एक सरनेम भी रखते हैं। रब सब बातें समझाते हैं। फिर कहते हैं - असल बात है कि रब को और 84 के चक्कर को याद करो। यह नॉलेज हिन्दुस्तान रिहाईश नशीनियों के लिए ही है। तुम ही 84 विलादत लेते हो। यह भी समझ की बात है ना। और कोई राहिब वगैरह को दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन भी नहीं कहेंगे। हूरैनों को भी नहीं कहेंगे। हूरैनों में इल्म होता ही नहीं। तुम कहेंगे हमारे में तमाम इल्म है, इन अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़ज़ल हज़रात में नहीं है। रब तो हक़ीक़ी बात समझाते हैं ना।
यह इल्म बड़ा वन्डरफुल है। तुम कितने बातिन स्टूडेन्ट हो। तुम कहेंगे हम दारूल उलूम में जाते हैं, अल्ल्लाह् ताला हमको पढ़ाते हैं। एम ऑबजेक्ट क्या है? हम यह (अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़ज़ल हज़रात) बनेंगे। इन्सान सुनकर वन्डर खायेंगे। हम अपने हेड ऑफिस में जाते हैं। क्या पढ़ते हो? इन्सान से हूरैन, बेगर से प्रिन्स बनने की तालीम पढ़ रहे हो। तुम्हारी तस्वीर भी फर्स्टक्लास हैं। दौलत का सदक़ा भी हमेशा किरदार को किया जाता है। किरदार तुमको कहाँ मिलेंगे? शिव के, लक्ष्मी-नारायण के, राम-सीता के मन्दिरों में। वहाँ जाकर तुम उन्हों की खिदमत करो। अपना टाइम वेस्ट नहीं करो। गंगा नदी पर भी जाकर तुम समझाओ नापाक से पाक बनाने वाली गंगा है या पाक परवरदिगार है? तमाम की ख़ैर निजात यह पानी करेगा या बेहद का रब करेगा? तुम इस पर अच्छी तरह समझा सकते हो। दुनिया का मालिक बनने का रास्ता बताते हो। सदक़ा करते हो, कौड़ी जैसे इन्सान को हीरे जैसे दुनिया का मालिक बनाते हो। हिन्दुस्तान दुनिया का मालिक था ना। तुम मोमिनों का हूरैन से भी अफ़ज़ल खानदान है। यह रब्बा तो समझते हैं - मैं रब का एक ही सिकीलधा बच्चा हूँ। रब्बा ने हमारा यह जिस्म लोन पर लिया है। तुम्हारे सिवाए और कोई भी यह बातें समझ न सकें। रब्बा की हमारे पर सवारी की हुई है। हमने बाबा को कुल्हे पर बिठाया है यानि कि जिस्म दिया है कि खिदमत करो। उनका एवजा फिर वह कितना देते हैं। जो हमको सबसे आला कन्धे पर चढ़ाते हैं। नम्बरवन ले जाते हैं। रब को बच्चे प्यारे लगते हैं, तो उनको कन्धे पर चढ़ाते हैं ना। मॉ बच्चे को सिर्फ़ गोद तक लेती है रब तो कन्धे पर चढ़ाते हैं। दारूल उलूम को कभी तख़ील नहीं कहा जाता। स्कूल में हिस्ट्री-जॉग्राफी पढ़ते हैं तो क्या वह तख़ील हुई? यह भी वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी है ना। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. निहायत प्यार से बैठकर रूहानी रब को याद करना है। याद में प्यार के ऑसू आ जायें तो वह ऑसू फ़तह माला का दाना बन जायेंगे। अपना वक्त मुस्तकबिल क़िस्मत बनाने में कामयाब करना है।

2. हवास ए बातिन हो सबको अल्फ का तारूफ देना है, ज़्यादा तीक-तीक नहीं करनी है। एक ही फुरना रहे कि ऐसा कोई फ़र्ज़ न हो जिसकी सज़ा खानी पड़े।

बरक़ात:-
नेक जज़्बात से खिदमत करने वाले रब जैसे दुश्मन पर भी रहमत करो।

जैसे बाप दुश्मन पर रहमत करते हैं, ऐसे आपके सामने कैसी भी रूह हो मगर अपने रहमत की कैफियत से, नेक जज़्बात से उसे तब्दील कर दो-यही है सच्ची खिदमत। जैसे साइन्स वाले रेत में भी खेती पैदा कर देते हैं ऐसे साइलेन्स की कुव्वत से रहमदिल बन दुश्मन पर भी रहमत कर सरज़मी को तब्दील करो। खुद की तब्दीली से, नेक जज़्बात से कैसी भी रूह तब्दील हो जायेगी क्योंकि नेक जज़्बात कामयाबी ज़रूर दस्तयाब कराती है।

स्लोगन:-
इल्म को याद करना ही हमेशा खुशग्वार रहने की बुनियाद है।

आमीन