19-11-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
यह तमाम दुनिया मरीज़ो की बड़ी हॉस्पिटल है, रब्बा आये हैं तमाम दुनिया को सेहतमंद बनाने

सवाल:-
कौन-सी याददाश्त रहे तो कभी भी मुरझाइस और ग़म की लहर नहीं आ सकती है?

जवाब:-
अभी हम इस पुरानी दुनिया, पुराने जिस्म को छोड़ घर में जायेंगे फिर नई दुनिया में दोबारा विलादत लेंगे। हम अभी हक़ीक़ी इबादत सीख रहे हैं - बादशाहत में जाने के लिए। रब हम बच्चों के लिए रूहानी मुकाम ए बादशाहत क़ायम कर रहे हैं, यही याददाश्त रहे तो दु:ख की लहर नहीं आ सकती।

नग़मा:-
तुम्हीं हो माता........

आमीन।
नग़मा कोई तुम बच्चों के लिए नहीं हैं, नये-नये को समझाने के लिए हैं। ऐसे भी नहीं कि यहाँ तमाम समझदार ही हैं। नहीं, बेसमझ को समझदार बनाया जाता है। बच्चे समझते हैं हम कितने बेसमझ बन गये थे, अब रब हमको समझदार बनाते हैं। जैसे स्कूल में पढ़कर बच्चे कितना समझदार बन जाते हैं। हर एक अपनी-अपनी समझ से बैरिस्टर, इन्जीनियर वगैरह बनते हैं। यह तो रूह को समझदार बनाना है। पढ़ती भी रूह है जिस्म के ज़रिए। मगर बाहर में जो भी तालीम मिलती है, वह है क़लील अरसे के लिए जिस्म रवादारी के वास्ते। भल कोई कनवर्ट भी करते हैं, हिन्दुओं को क्रिश्चियन बना देते हैं - किसलिए? थोड़ी ख़ुशी पाने के लिए। पैसे नौकरी वगैरह आसानी से मिलने के लिए, आजीविका के लिए। अब तुम बच्चे जानते हो हमको पहले-पहले तो रूहानी हवासी बनना पड़े। यह है अहम बात क्योंकि यह है ही बीमार दुनिया। ऐसा कोई इन्सान नहीं जो बीमार नहीं बनता हो। कुछ न कुछ होता ज़रूर है। यह तमाम दुनिया बड़े ते बड़ी हॉस्पिटल है, जिसमें तमाम इन्सान नापाक बीमार हैं। उम्र भी निहायत कम होती है। अचानक मौत को पा लेते हैं। मौत के चम्बे में आ जाते हैं। यह भी तुम बच्चे जानते हो। तुम बच्चे सिर्फ़ हिन्दुस्तान की ही नहीं, तमाम दुनिया की खिदमत करते हो बातिन तरीके से। असल बात है कि रब को कोई नहीं जानते। इन्सान होकर और रूहानी रब को नहीं जानते, उनसे प्यार नहीं रखते। अब रब फ़रमाते हैं मेरे साथ प्यार रखो। मेरे साथ प्यार रखते-रखते तुमको मेरे साथ ही वापिस चलना है। जब तक वापिस चलो तब तक इस छी-छी दुनिया में रहना पड़ता है। पहले-पहले तो जिस्मानी हवासी से रूहानी हवासी बनो तब तुम इख्तियार कर सकते हो और रब को याद कर सकते हो। अगर रूहानी हवासी नहीं बनते तो कोई काम के नहीं। जिस्मानी हवासी तो तमाम हैं। तुम समझते भी हो कि हम रूहानी हवासी नहीं बनते, रब को याद नहीं करते तो हम वही हैं जो पहले थे। असल बात ही है रूहानी हवासी बनने की। न कि मख़लूक़ को जानने की। गाया भी जाता है खालिक और मख़लूक़ का इल्म। ऐसे नहीं कि पहले मख़लूक़ फिर खालिक का इल्म कहेंगे। नहीं, पहले खालिक, वही बाप है। कहा भी जाता है-हे गॉड फादर। वह आकर तुम बच्चों को अपने जैसा बनाते हैं। रब तो हमेशा रूहानी हवासी है ही इसलिए वह सुप्रीम है। रब फ़रमाते हैं मैं तो रूहानी हवासी हूँ। जिसमें दाख़िली किया है उनको भी रूहानी हवासी बनाता हूँ। इनमें दाखिल करता हूँ इनको कनवर्ट करने क्योंकि यह भी जिस्मानी हवासी थे, इनको भी कहता हूँ अपने को रूह समझ मुझे हक़ीक़ी तौर पर याद करो। ऐसे निहायत इन्सान हैं जो समझते हैं रूह अलग है, जिस्म अलग है। रूह जिस्म से निकल जाती है तो दो चीज़ हुई ना। रब समझाते हैं तुम रुह हो। रूह ही दोबारा विलादत लेती है। रूह ही जिस्म लेकर पार्ट बजाती है। रब्बा बार-बार समझाते हैं अपने को रूह समझो, इसमें बड़ी मेहनत चाहिए। जैसे स्टूडेण्ट पढ़ने के लिए खामोशी में, बग़ीचे वगैरह में जाकर पढ़ते हैं। पादरी लोग भी घूमने जाते हैं तो एकदम खामोश रहते हैं। वह कोई रूहानी हवासी नहीं रहते। क्राइस्ट की याद में रहते हैं। घर में रहकर भी याद तो कर सकते हैं मगर ख़ास खामोशी में जाते हैं क्राइस्ट को याद करने और कोई तरफ़ देखते भी नहीं। जो अच्छे-अच्छे होते हैं, समझते हैं हम क्राइस्ट को याद करते-करते उनके पास चले जायेंगे। क्राइस्ट हेविन में बैठा है, हम भी हेविन में चले जायेंगे। यह भी समझते हैं क्राइस्ट हेविनली गॉड फादर के पास गया। हम भी याद करते-करते उनके पास जायेंगे। तमाम क्रिश्चियन उस एक के बच्चे ठहरे। उनमें कुछ इल्म दुरूस्त है। क्योंकि क्राइस्ट की रूह तो ऊपर गई ही नहीं। क्राइस्ट नाम तो जिस्म का है, जिसको फाँसी पर चढ़ाया। रूह तो फाँसी पर नहीं चढ़ती है। अब क्राइस्ट की रूह गॉड फादर के पास गई, यह कहना भी रांग हो जाता है। वापिस कोई कैसे जायेंगे? हर एक को क़याम फिर परवरिश ज़रूर करनी होती है। मकान को पोताई वगैरह कराई जाती है, यह भी परवरिश है ना।
अब बेहद के रब को तुम याद करो। यह नॉलेज बेहद के रब के सिवाए कोई दे न सके। अपना ही फलाह करना है। बीमार से सेहत मन्द बनना है। यह मरीज़ों की बड़ी हॉस्पिटल है। तमाम दुनिया मरीज़ों की हॉस्पिटल है। मरीज़ ज़रूर जल्दी मर जायेंगे, रब आकर इस तमाम दुनिया को सेहतमंद बनाते हैं। ऐसे नहीं कि यहाँ ही सेहतमंद बनेंगे। रब फ़रमाते हैं - सेहतमंद होते ही हैं नई दुनिया में। पुरानी दुनिया में सेहतमंद हो न सकें। यह अफ़ज़ल ख्वातीन अफ़ज़ल हज़रात सेहतमंद, एवरहेल्दी हैं। वहाँ उम्र भी बड़ी होती है, मरीज़ विशश होते हैं। वाइसलेस मरीज़ नहीं होते। वह है ही मुकम्मल ग़ैर ख़बासती। रब खुद फ़रमाते हैं इस वक़्त तमाम दुनिया, ख़ास हिन्दुस्तान मरीज़ है। तुम बच्चे पहले-पहले सेहतमंद दुनिया में आते हो, सेहतमंद बनते हो याद के सफ़र से। याद से तुम चले जायेंगे अपने स्वीट होम। यह भी एक सफ़र है। रूह का सफ़र है, रब पाक परवरदिगार के पास जाने की। यह है स्प्रीचुअल सफ़र। यह अल्फ़ाज़ कोई समझ नहीं सकेंगे। तुम भी नम्बरवार जानते हो,मगर भूल जाते हो। असल बात है यह, समझाना भी निहायत आसान है। मगर समझाये वह जो खुद भी रूहानी सफ़र पर हो। खुद होगा नहीं, दूसरे को बतायेंगे तो तीर नहीं लगेगा। सच्चाई का जौहर चाहिए। हम रब्बा को इतना याद करते हैं जो बस। ख्वातीन खाविन्द को कितना याद करती है। यह है खाविन्दों का खाविन्द, बापों का बाप, हादियों का हादी। हादी लोग भी उस रब को ही याद करते हैं। क्राइस्ट भी रब को ही याद करते थे। मगर उनको कोई जानते नहीं हैं। रब जब आये तब आकर अपनी पहचान देवे। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीनियों को ही रब का मालूम नहीं है तो औरों को कहाँ से मिल सकता। विलायत से भी यहाँ आते हैं, इबादत सीखने के लिए। समझते हैं क़दीम इबादत अल्ल्लाह् ताला ने सिखायी। यह है जज़्बात। रब समझाते हैं सच्चा-सच्चा राब्ता तो मैं ही चक्कर-चक्कर आकर सिखलाता हूँ, एक ही बार। अहम बात है अपने को रूह समझ रब को याद करो, इसको ही रूहानी इबादत कहा जाता है। बाक़ी सबका है जिस्मानी राब्ता। ब्रह्म से राब्ता रखते हैं। वह भी रब तो नहीं है। वह तो अज़ीम अनासर है, रहने का मुकाम। तो राइट एक ही रब है। एक रब को ही सच कहा जाता है। यह भी हिन्दुस्तान रिहाईश नशीनियों को मालूम नहीं कि रब ही सच कैसे है। वही सच हिस्से की क़याम करते हैं। सच हिस्सा और झूठ हिस्सा। तुम जब सच हिस्से में रहते हो तो वहाँ शैतानी सल्तनत ही नहीं होती। आधा चक्कर बाद शैतानी सल्तनत झूठ हिस्सा शुरू होता है। सच हिस्सा पूरा सुनहरा दौर को कहेंगे। फिर झूठ हिस्सा पूरा इख्तिलाफी फितने का दौर का आख़िर। अभी तुम मिलन पर बैठे हो। न इधर हो, न उधर हो। तुम ट्रेवल (सफ़र) कर रहे हो। रूह ट्रेवल कर रही है, जिस्म नहीं। रब आ करके सफ़र करना सिखलाते हैं। यहाँ से वहाँ जाना है। तुमको यह सिखलाते हैं। वो लोग फिर स्टॉर्स मून वगैरह तरफ़ जाने की ट्रेवल करते हैं। अभी तुम जानते हो उनमें कोई फ़ायदा नहीं। इन चीज़ों से ही तमाम तबाही होनी है। बाक़ी जो भी इतनी मेहनत करते हैं तमाम फ़ालतू। तुम जानते हो यह तमाम चीज़ें जो साइंस से बनती हैं वह मुस्तकबिल में तुम्हारे ही काम आयेंगी। यह ड्रामा बना हुआ है। बेहद का रब आकर पढ़ाते हैं तो कितना रिगार्ड रखना चाहिए। उस्ताद का वैसे भी निहायत रिगार्ड रखते हैं। उस्ताद फ़रमान करते हैं - अच्छी तरह पढ़कर पास हो जाओ। अगर फ़रमान को नहीं मानेंगे तो नापास हो जायेंगे। रब भी फ़रमाते हैं तुमको पढ़ाते हैं दुनिया का मालिक बनाने। यह अफ़ज़ल ख्वातीन अफ़ज़ल हज़रात मालिक हैं। भल अवाम भी मालिक है, मगर दर्जे तो निहायत हैं ना। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन भी तमाम कहते हैं ना - हम मालिक हैं। ग़रीब भी हिन्दुस्तान का मालिक अपने को समझेगा। मगर बादशाह और उनमें फ़र्क कितना है। नॉलेज से मर्तबे का फ़र्क हो जाता है। नॉलेज में भी होशियारी चाहिए। पाकीज़गी भी ज़रूरी है तो हेल्थ-वेल्थ भी चाहिए। जन्नत में तमाम हैं ना। रब एम ऑब्जेक्ट समझाते हैं। दुनिया में और कोई की अक्ल में यह एम आब्जेक्ट होगी नहीं। तुम फट से कहेंगे हम यह बनते हैं। तमाम दुनिया में हमारी बादशाहत होगी। यह तो अभी पंचायती राज है। पहले थे डबल ताजनशीन फिर एक ताज अभी नो ताज। रब्बा ने नूरानी कलेमात में फ़रमाया था - यह भी तस्वीर हो - डबल सिरताज बादशाहों के आगे सिंगल ताज वाले माथा झुकाते हैं। अभी रब फ़रमाते हैं मैं तुमको बादशाहों का बादशाह डबल सिरताज बनाता हूँ। वह है कलील अरसे के लिए, यह है 21 विलादतों की बात। पहली अहम बात है पाकीज़ा बनने की। बुलाते भी हैं कि आकर नापाक से पाक बनाओ। ऐसे नहीं कहते कि बादशाह बनाओ। अभी तुम बच्चों का है बेहद की बेनियाज़ी। इस दुनिया से ही चले जायेंगे अपने घर। फिर हेविन में आयेंगे। अन्दर में ख़ुशी रहनी चाहिए जबकि समझते हैं हम घर जायेंगे फिर बादशाहत में आयेंगे फिर मुरझाइश दु:ख वगैरह यह तमाम क्यों होना चाहिए। हम रूह घर जायेंगी फिर दोबारा विलादत नई दुनिया में लेंगी। बच्चों को मैकरू ख़ुशी क्यों नहीं रहती है? इबलीस की आपोज़ीशन निहायत है इसलिए ख़ुशी कम हो जाती है। नापाक से पाक बनाने वाले खुद फ़रमाते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे विलादत-दर-विलादत के गुनाह ख़ाक हो जायेंगे। तुम दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन बनते हो। जानते हो फिर हम अपने मुकाम ए बादशाहत में चले जायेंगे। यहाँ अलग-अलग तरह के बादशाहें हुए हैं, अब फिर रूहानी मुकाम ए बादशाहत बनना है। जन्नत के मालिक बन जायेंगे। क्रिश्चियन लोग हेविन का मतलब नहीं समझते हैं। वह दारूल निजात को हेविन कह देते हैं। ऐसे नहीं कि हेविनली गॉड फादर कोई हेविन में रहते हैं। वह तो रहते ही हैं दारूल सुकून में। अभी तुम तजवीज़ करते हो पैराडाइज में जाने के लिए। यह फ़र्क बताना है। गॉड फादर है दारूल निजात में रहने वाला। हेविन नई दुनिया को कहा जाता है। फादर ही आकर पैराडाइज क़ायम करते हैं। तुम जिसको दारूल सुकून कहते हो उनको वो लोग हेविन समझते हैं। यह तमाम समझने की बातें हैं।
रब फ़रमाते हैं नॉलेज तो निहायत आसान है। यह है पाकीज़ा बनने की नॉलेज, निजात-ज़िन्दगी ए निजात में जाने की नॉलेज, जो रब ही दे सकते हैं। जब किसको फाँसी दी जाती है तो अन्दर में यही रहता है हम अल्ल्लाह् ताला पास जाते हैं। फाँसी देने वाले भी कहते हैं गॉड को याद करो। गॉड को जानते दोनों नहीं हैं। उनको तो उस वक़्त दोस्त-रिश्तेदार वगैरह जाकर याद पड़ते हैं। गायन भी है आख़री वक़्त जो औरत को याद करे...... कोई न कोई याद ज़रूर रहता है। सुनहरे दौर में ही लगाव फ़तहयाब रहते हैं। वहाँ जानते हैं एक खाल छोड़ दूसरी ले लेंगे। वहाँ याद करने की दरकार नहीं इसलिए कहते हैं दु:ख में याद तमाम करें....... यहाँ दु:ख है इसलिए याद करते हैं अल्ल्लाह् ताला से कुछ मिले। वहाँ तो सब कुछ मिला ही हुआ है। तुम कह सकते हो हमारा मकसद है इन्सान को आस्तिक बनाना, मालिक का बनाना। अभी तमाम यतीम हैं। हम मालिक का बनते हैं। ख़ुशी, सुकून, दौलत का वर्सा देने वाला रब ही है। इन अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़ज़ल हज़रात की कितनी बड़ी उम्र थी। यह भी जानते हैं हिन्दुस्तान रिहाईश नशीनियों की पहले-पहले उम्र निहायत बड़ी रहती थी। अब छोटी है। क्यों छोटी हुई है-यह कोई भी नहीं जानते। तुम्हारे लिए तो निहायत आसान हो गया है समझना और समझाना। सो भी नम्बरवार हैं। समझानी हर एक की अपनी-अपनी है, जो जैसा इख्तियार करते हैं ऐसे समझाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) जैसे रब हमेशा रूहानी हवासी हैं, ऐसे रूहानी हवासी रहने की पूरी-पूरी तजवीज़ करनी है। एक रब को दिल से प्यार करते-करते रब के साथ घर चलना है।

2) बेहद के रब का पूरा-पूरा रिगार्ड रखना है यानि कि रब के फरमान पर चलना है। रब का पहला फरमान है - बच्चे अच्छी तरह पढ़कर पास हो जाओ। इस फरमान की ताबेदारी करनी है।

बरक़ात:-
सेन्स और इसेन्स के बैलेन्स के ज़रिए अपनेपन को फ़ना करने वाले जहान तब्दील नशीन बनो।

सेन्स यानि कि इल्म की पाइंटस, समझ और इसेन्स यानि कि तमाम कुव्वत याफ़्ता की याद और क़ाबिल याफ़्ता। इन दोनों का बैलेन्स हो तो अपनापन या पुरानापन फ़ना हो जायेगा। हर सेकण्ड, हर इरादा, हर बोल और हर आमाल दुनिया तब्दील नशीनी की खिदमत के वास्ते फ़ना होने से जहान तब्दील नशीन अपने आप बन जायेंगे। जो अपनी जिस्म की याद के साथ फ़ना हो जाते हैं उनके अफ़ज़ल वायब्रेशन के ज़रिए माहौल की तब्दीली आसानी से होती है।

स्लोगन:-
दस्तयाबियों को याद करो तो दुख और परेशानी की बातें भूल जायेंगी।

आमीन