20-11-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
तुम अभी बिल्कुल शडपंथ (किनारे) पर खड़े हो, तुम्हें अब इस पार से उस पार जाना है, घर जाने की तैयारी करनी है

सवाल:-
कौन-सी एक बात याद रखो तो हालत अचल-अडोल बन जायेगी?

जवाब:-
पास्ट इज़ पास्ट। बीती को ग़ौरतलब नहीं करना है, आगे बढ़ते जाना है। हमेशा एक की तरफ़ देखते रहो तो हालत अचल-अडोल हो जायेगी। तुमने अब इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर की हद छोड़ दी, फिर पिछाड़ी की ओर क्यों देखते हो? उसमें अक्ल ज़रा भी न जाए - यही है महीन तालीम।

आमीन।
दिन बदलते जाते हैं, टाइम पास होता जाता है। इरादा करो, सुनहरे दौर से लेकर टाइम पास होते-होते अभी आकर इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के भी किनारे पर खड़े हैं। यह सुनहरा दौर, रूपहला दौर, इख्तिलाफी दौर, इख्तिलाफी फितने का दौर का चक्कर भी जैसे कि मॉडल है। खिल्क़त तो बड़ी लम्बी-चौड़ी है। उसके मॉडल रूप को बच्चों ने जान लिया है। आगे यह मालूम नहीं था कि अब इख्तिलाफ़ी फ़ितने का दौर पूरा होता है। अब मालूम पड़ा है - तो बच्चों को भी अक्ल से सुनहरे दौर से लेकर चक्कर लगाए इख्तिलाफीं फितने के दौर के अाख़िर में किनारे पर आकर ठहरना चाहिए। समझना चाहिए टिक-टिक होती रहती है, ड्रामा फिरता रहता है। बाक़ी क्या हिसाब रहा होगा? ज़रा-सा रहा होगा। आगे मालूम नहीं था। अभी रब ने समझाया है - बाक़ी कोना आकर रहा है। इस दुनिया से उस दुनिया में जाने का अभी बाक़ी थोड़ा वक़्त है। यह इल्म भी अभी मिला है। हम सुनहरे दौर से लेकर चक्कर लगाते-लगाते अब इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के आख़िर में आकर पहुँचे हैं। अब फिर वापिस जाना है। आने का और निकलने का गेट होता है ना। यह भी ऐसे है। बच्चों को समझाना चाहिए - बाक़ी थोड़ा किनारा है। यह रूह ए अफ़ज़ल मिलन का दौर है ना। अभी हम किनारे पर हैं। निहायत थोड़ा वक़्त है। अब इस पुरानी दुनिया से ममत्व निकालना है। अब तो नई दुनिया में जाना है। समझानी तो बड़ी आसानी से मिलती है। यह अक्ल में रखना चाहिए। चक्कर अक्ल में फिरना चाहिए। अभी तुम इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में नहीं हो। तुमने इस हद को छोड़ दिया है फिर उस तरफ़ वालों को याद क्यों करना चाहिए? जबकि छोड़ दिया है, पुरानी दुनिया को। हम रूह ए अफ़ज़ल मिलन के दौर मिलन के दौर पर हैं फिर पिछाड़ी में देखें भी क्यों? अक्ल का राब्ता ख़बासती दुनिया से क्यों लगायें? यह बड़ी महीन बातें हैं। रब्बा जानते हैं कोई-कोई तो रूपये से एक आना भी समझते नहीं हैं। सुना और भूल जाते हैं। तुमको पिछाड़ी तरफ़ नहीं देखना है। अक्ल से काम लेना है ना। हम पार निकल गये - फिर पिछाड़ी में देखें ही क्यों? पास्ट इज़ पास्ट। रब फ़रमाते हैं कितनी महीन बातें समझाते हैं। फिर भी बच्चों का कांध पिछाड़ी में क्यों लटका रहता है।इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर तरफ़ लटका हुआ है। रब फ़रमाते हैं कांध इस तरफ़ कर दो। वह पुरानी दुनिया तुम्हारे काम की चीज़ नहीं है। रब्बा पुरानी दुनिया से बेनियाज़ी दिलाते हैं, नई दुनिया सामने खड़ी है, पुरानी दुनिया से बेनियाज़ी। इरादा करो - ऐसी हमारी हालत है? रब फ़रमाते हैं पास्ट इज़ पास्ट। बीती बात को चितवो नहीं। पुरानी दुनिया में कोई आस नहीं रखो। अब तो एक ही आला आस रखनी है - हम चलें दारूल निजात। अक्ल में दारूल मसर्रत ही याद रहना चाहिए। पिछाड़ी में क्यों फिरना चाहिए। मगर निहायत की पीठ मुड़ जाती है। तुम अभी हो रूह ए अफ़ज़ल मिलन के दौर पर। पुरानी दुनिया से किनारा कर लिया है। यह समझ की बात है ना। कहाँ ठहरना नहीं है। कहाँ देखना नहीं है। बीती को याद नहीं करना है। रब फ़रमाते हैं आगे बढ़ते जाओ, पिछाड़ी को नहीं देखो। एक तरफ़ ही देखते रहो तब ही अचल, मुस्तहकिम, अडोल हालत रह सकती है। उस तरफ़ देखते रहेंगे तो पुरानी दुनिया के दोस्त-रिश्तेदार वगैरह याद पड़ते रहेंगे। नम्बरवार तो हैं ना। आज देखो तो निहायत अच्छा चल रहा है, कल गिरा तो दिल एकदम हट जाती है। ऐसी ग्रहचारी बैठ जाती है जो नूरानी कलेमात सुनने पर भी दिल नहीं होती। इरादा करो - ऐसे होता है ना?
रब फ़रमाते हैं तुम अभी मिलन पर खड़े हो तो रुख आगे रखना चाहिए। आगे है नई दुनिया, तब ही ख़ुशी होगी। अब बाक़ी शडपंथ (निहायत नज़दीक, किनारे) पर हैं। कहते हैं ना - अभी तो अपने वतन के दरख्त देखने में आते हैं। आवाज़ करो तो झट वह सुनेंगे। शडपंथ यानि कि बिल्कुल सामने हैं। तुम याद करते हो और हूरैन आ जाते हैं। आगे थोड़े ही आते थे। मलक़ूतवतन में ससुरघर वाले आते थे क्या? अब तो पियरघर और ससुरघर वाले जाकर मिलते हैं। फिर भी बच्चे चलते-चलते भूल जाते हैं। अक्ल का राब्ता पिछाड़ी में हट जाता है। रब फ़रमाते हैं तुम सबकी यह आख़िरी विलादत है। तुम्हें पीछे नहीं हटना है। अब पार होना है। इस तरफ़ से उस तरफ़ जाना है। मौत भी नज़दीक होता जाता है। बाक़ी सिर्फ़ कदम भरना है, नांव किनारे आती है तो उस तरफ़ कदम उठाना पड़ता है ना। तुम बच्चों को खड़ा होना है किनारे पर। तुम्हारी अक्ल में है रूहें जाती हैं अपने स्वीट होम। यह याद रहने से भी ख़ुशी तुमको अचल-अडोल बना देगी। यही इरादा ए ग़ौरतलब करते रहना है। यह है अक्ल की बात। हम रूह जा रही हैं। अब बाक़ी नज़दीक शडपंथ पर हैं। बाक़ी थोड़ा वक़्त है। इसको ही याद का सफ़र कहा जाता है। यह भी भूल जाते हैं। चार्ट लिखना भी भूल जाते हैं। अपने दिल पर हाथ रखकर देखो - रब्बा जो कहते हैं कि अपने को ऐसे समझो - हम नज़दीक शडपंथ पर खड़े हैं, ऐसी हालत हमारी है? अक्ल में एक रब्बा ही याद हो। रब्बा याद के सफ़र अलग-अलग तरह से सिखलाते रहते हैं। इस याद के सफ़र में ही मस्त रहना है। बस अब हमको जाना है। यहाँ हैं तमाम झूठे रिश्ते। सच्चा सुनहरे दौर का रिश्ता है। अपने को देखो हम कहाँ खड़े हैं? सुनहरे दौर से लेकर अक्ल में यह चक्कर याद करो। तुम दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन हो ना। सुनहरा दौर से लेकर चक्कर लगाए आकर किनारे पर खड़े हुए हो। शडपंथ हुआ ना। कई तो अपना टाइम निहायत फ़ालतू गँवाते रहते हैं। 5-10 मिनट भी मुश्किल याद में रहते होंगे। दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन तो सारा दिन बनना चाहिए। ऐसे तो है नहीं। रब्बा अलग-अलग तरीक़े से समझाते हैं। रूह की ही बात है। तुम्हारी अक्ल में चक्कर फिरता रहता है। अक्ल में यह याद क्यों नहीं रहनी चाहिए। अभी हम किनारे पर खड़े हैं। यह किनारा अक्ल में क्यों नहीं याद रहता है, जबकि जानते हो हम रूह ए अफ़ज़ल बन रहे हैं तो जाकर किनारे पर खड़े रहो। जूँ मुआफिक़ चलते ही रहो। क्यों नहीं यह प्रैक्टिस करते हो? क्यों नहीं चक्कर अक्ल में आता है? यह दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन है ना। रब्बा शुरू से लेकर तमाम चक्कर समझाते रहते हैं। तुम्हारी अक्ल तमाम चक्कर लगाए, आकर किनारे पर खड़ी रहनी चाहिए, और कोई भी बाहर का माहौल झंझट न रहे। रोज़ ब रोज़ तुम बच्चों को साइलेन्स में ही जाना है। टाइम वेस्ट नहीं गँवाना है। पुरानी दुनिया को छोड़ नये रिश्ते से अपना अक्ल का राब्ता लगाओ। राब्ता नहीं लगायेंगे तो गुनाह कैसे कटेंगे? तुम जानते हो यह दुनिया ही ख़त्म होनी है, इनका मॉडल कितना छोटा है। 5 हज़ार साल की दुनिया है। अजमेर में जन्नत का मॉडल है मगर किसको जन्नत याद आयेगा क्या? वह क्या जाने जन्नत से। समझते हैं जन्नत तो 40 हज़ार साल के बाद आयेगा। रब तुम बच्चों को बैठ समझाते हैं इस दुनिया में कामकाज करते अक्ल में यह याद रखो कि यह दुनिया तो ख़त्म होने वाली है। अब जाना है, हम पिछाड़ी में खड़े हैं। कदम-कदम जूँ मिसल चलता है। मंजिल कितनी बड़ी है। रब तो मंजिल को जानते हैं ना। रब के साथ दादा भी इकट्ठा है। वह समझाते हैं तो क्या यह नहीं समझा सकते। यह भी सुनते तो हैं ना। क्या यह ऐसे-ऐसे इरादा ए ग़ौरतलब नहीं करता होगा? रब तुमको इरादा ए ग़ौरतलब करने की प्वाइंट्स सुनाते रहते हैं। ऐसे नहीं कि बाबा निहायत पिछाड़ी में है। अरे, यह तो दुम लटका हुआ है फिर पिछाड़ी में कैसे होगा। यह तमाम गहरी-गहरी बातें इख्तियार करनी है। ग़फलत छोड़ देनी है। रब्बा के पास 2-2 साल के बाद आते हैं। क्या यह याद रहता होगा कि हम नज़दीक किनारे पर खड़े हैं? अभी जाना है। ऐसी हालत हो जाए तो बाक़ी क्या चाहिए? रब्बा ने यह भी समझाया है - डबल सिरताज...... यह सिर्फ़ नाम है, बाक़ी लाइट का ताज कोई वहाँ रहता नहीं है। यह तो पाकिज़गी की निशानी है। जो भी मज़हब क़याम हैं, उनके तस्वीरों में लाइट ज़रूर दिखाते हैं क्योंकि वह वाइसलेस सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ हैं फिर रजो तमो में आते हैं। तुम बच्चों को नॉलेज मिलती है, उसमें मस्त रहना चाहिए। भल तुम हो इस दुनिया में मगर अक्ल का राब्ता वहाँ लगा रहे। इनसे भी तोड़ तो निभाना है, जो इस खानदान के होंगे वह निकल आयेंगे। सैपलिंग लगना है। अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन वाले जो होंगे वह ज़रूर आगे-पीछे आयेंगे। पिछाड़ी में आने वाले भी आगे वालों से तीखे जायेंगे। यह पिछाड़ी तक होता रहेगा। वह पुरानों से तीखे कदम बढ़ायेंगे। तमाम इम्तहान है याद के सफ़र का। भल देरी से आये हैं, याद के सफ़र में लग जाएं और तमाम धंधाधोरी छोड़ इस सफ़र में बैठ जायें, खाना तो खाना ही है। अच्छी तरह याद में रहें तो इस ख़ुशी जैसी खुराक नहीं। यही तात लगी रहेगी - अभी हम जाते हैं। 21 विलादतों की सल्तनत-क़िस्मत मिलती है। लॉटरी मिलने वाले को ख़ुशी का पारा चढ़ जाता है ना। तुमको निहायत मेहनत करनी है। इसको ही अाख़िरी बेशकीमती ज़िन्दगी कहा जाता है। याद के सफ़र में निहायत मज़ा है। हनूमान भी तजवीज़ करते-करते स्थेरियम बना ना। भंभोर को आग लगी, शैतान की सल्तनत जल गयी। यह एक कहानी बना दी है। रब हक़ीक़ी बात बैठ समझाते हैं। शैतानी सल्तनत खलास हो जायेगी। स्थेरियम अक्ल इसको कहा जाता है। बस अब शडपंथ है, हम जा रहे हैं। इस याद में रहने की तजवीज़ करो तब ख़ुशी का पारा चढ़ेगा, उम्र भी कुव्वत ए इबादत से बढ़ती है। तुम अभी हूरैन फ़ज़ीलत इख्तियार करते हो फिर वह आधा चक्कर चलती है। इस एक विलादत में तुम इतनी तजवीज़ करते हो, जो तुम जाकर यह अफ़ज़ल ख्वातीन-अफ़ज़ल हज़रात बनते हो। तो कितनी तजवीज़ करनी चाहिए। इसमें ग़फलत या टाइम वेस्ट नहीं करना चाहिए, जो करेगा सो पायेगा। रब तालीम देते रहते हैं। तुम समझते हो - चक्कर-चक्कर हम दुनिया के मालिक बनते हैं, इतने थोड़े टाइम में कमाल कर देते हैं। तमाम दुनिया को चेंज कर देते हैं। रब के लिए कोई बड़ी बात नहीं। चक्कर-चक्कर करते हैं। रब समझाते हैं - चलते-फिरते, खाते-पीते अपना अक्ल का राब्ता रब से लगाओ। यह बातिन बात रब ही बच्चों को बैठ समझाते हैं। अपनी हालत को अच्छी तरह जमाते रहो। नहीं तो आला मर्तबा नहीं पायेंगे। तुम बच्चे नम्बरवार तजवीज़ के मुताबिक मेहनत करते हो। समझते हो अभी तो हम किनारे पर खड़े हैं। फिर पिछाड़ी में हम क्यों देखें? आगे कदम बढ़ते रहते हैं। इसमें हवास ए बातिन निहायत चाहिए, इसलिए कछुए का भी मिसाल है। यह मिसाल वगैरह तमाम तुम्हारे लिए हैं। राहिब तो हैं ही ज़िद्दी इबादत नशीन, वह तो हक़ीक़ी इबादत सिखला न सकें। वो लोग सुनते हैं तो समझते हैं यह लोग हमारी इनसल्ट करते हैं इसलिए यह भी तरीक़े से लिखना है। रब बिगर हक़ीक़ी इबादत कोई सिखला न सके। इनडायरेक्ट बोला जाता है - तो ख्याल न हो। तरीक़े से चलना होता है ना, जो सांप भी मरे लाठी भी न टूटे। कुटुम्ब फैमिली वगैरह सबसे मोहब्बत रखो मगर अक्ल का राब्ता रब से लगाना है। तुम जानते हो हम अभी एक की सलाह पर हैं। यह है हूरैन बनने की सलाह, इसको ही अद्वेत सलाह कहा जाता है। बच्चों को हूरैन बनना है। कितनी बार तुम बने हो? कई बार। अभी तुम मिलन के दौर पर खड़े हो। यह आखिरी विलादत है। अब तो जाना है। पिछाड़ी में क्या देखना है। देखते हुए फिर भी अपनी अडोलता में तुम खड़े रहो। मंजिल को भूलना नहीं है। तुम ही महावीर हो जो माया पर जीत पाते हो। अभी तुम समझते हो - हार और फ़तह का यह चक्कर फिरता रहता है। कितना वन्डरफुल इल्म है रब्बा का। यह मालूम था क्या कि अपने को नुक्ता समझना है, इतनी छोटी सी बिन्दी में तमाम पार्ट नूंधा हुआ है जो चक्कर फिरता रहता है। निहायत वन्डरफुल है। वन्डर कह छोड़ना ही पड़ता है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) पीछे मुड़कर नहीं देखना है। किसी भी बात में ठहर नहीं जाना है। एक रब की तरफ़ देखते हुए अपनी हालत एकरस रखनी है।

2) अक्ल में याद रखना है कि अभी हम किनारे पर खड़े हैं। घर जाना है, ग़फलत छोड़ देनी है। अपनी हालत ज़माने की बातिन मेहनत करनी है।

बरक़ात:-
बिहंग राह की खिदमत के ज़रिए जहान तब्दीली के काम को लबरेज़ करने वाले सच्चे खिदमतगार बनो।

बिहंग राह की खिदमत करने के लिए तनज़ीम रूप में रूप और बसन्त'' इन दो बातों का बैलेन्स चाहिए। जैसे बसन्त रूप से एक वक़्त पर कई रूहों को पैग़ाम देने का काम करते हो ऐसे ही रूप यानि कि याद की कुव्वत के ज़रिए, अफ़ज़ल इरादें की कुव्वत के ज़रिए बिहंग राह की खिदमत करो। इसकी भी इन्वेन्शन निकालो। साथ-साथ तनज़ीम रूप में मज़बूत इरादे से पुराने इरादे अख़लाक और पुरानी चलन के तिल और जौं यज्ञ में फ़ना करो तब जहान तब्दीली नशीनी का काम मुकम्मल होगा और यज्ञ का ख़ात्मा होगा।

स्लोगन:-
बालक और मालिक पन के बैलेन्स से प्लैन को प्रैक्टिकल में लाओ।

आमीन