21-02-2021 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 06-11-87


खिदमत नशीन बनने का अस्बाब चार तरह की खिदमतें


आज जहान फ़लाह नशीन, जहान खिदमतगार रब अपने जहान खिदमतगार, मददगार तमाम बच्चों को देख रहे थे कि हर एक बच्चा मुसलसल आसान इबादत नशीन के साथ-साथ मुसलसल खिदमतगार कहाँ तक बने हैं? क्योंकि याद और खिदमत - दोनों का बैलेन्स हमेशा मोमिन ज़िन्दगी में रब उल हक़ और तमाम अफ़ज़ल मोमिन रूहों के ज़रिए ब्लैसिंग का अस्बाब बनाता है। इस मिलन के दौर पर ही मोमिन ज़िन्दगी में इलाही बरक़ात और मोमिन फैमिली की बरक़ातें दस्तयाब होती हैं इसलिए इस छोटी-सी ज़िन्दगी में तमाम दस्तयाबियां और हमेशा के अवक़ात की दस्तयाबियां आसानी से हासिल होती हैं। इस मिलन के दौर को ख़ास ब्लैसिंग-दौर कह सकते हैं, इसलिए ही इस दौर को अज़ीम दौर कहते हैं। खुद रब हर अफ़ज़ल आमाल, हर अफ़ज़ल इरादे की बुनियाद पर दरेक मोमिन बच्चे को दरेक वक़्त दिल से बरक़ात देते रहते हैं। यह मोमिन ज़िन्दगी इलाही-बरक़ात की परवरिश से इज़ाफें को दस्तयाब होने वाली ज़िन्दगी है। मालिक ए हलीम रब तमाम बरक़ात की झोलियाँ खुले दिल से बच्चों को दे रहे हैं। मगर यह तमाम बरक़ात लेने की बुनियाद याद और खिदमत का बैलेन्स है। अगर मुसलसल इबादत नशीन हैं तो साथ-साथ मुसलसल खिदमतगार भी हैं। खिदमत की अहमियत हमेशा अक्ल में रहती है?

कई बच्चे समझते हैं - खिदमत का जब चान्स मिलता है और कोई अस्बाब और वक़्त जब मिलता है तब ही खिदमत करते हैं। मगर रब उल हक़ जैसे याद मुसलसल, आसान एहसास कराते हैं, वैसे खिदमत भी मुसलसल और आसान हो सकती है। तो आज रब उल हक़ खिदमतगार बच्चों की खिदमत का चार्ट देख रहे थे। जब तक खिदमतगार नहीं बने तब तक हमेशा की बरक़ात के एहसाससाती नहीं बन सकते। जैसे वक़्त मुताबिक, खिदमत के चांस मुताबिक़, प्रोग्राम मुताबिक़ खिदमत करते हो, उस वक़्त ख़िदमत के सिला याफ़्ता रब की, फैमिली की बरक़ात और कामयाबी दस्तयाब करते हो मगर हमेशा अवक़ात के लिए नहीं इसलिए कभी बरक़ात के सबब आसान खुद और खिदमत में तरक्की एहसास करते हो और कभी मेहनत के बाद कामयाबी एहसास करते हो क्योंकि मुसलसल याद और खिदमत का बैलेन्स नहीं है। मुसलसल खिदमत नशीन कैसे बन सकते, आज उस खिदमत की अहमियत सुना रहे हैं।

तमाम दिन में अलग-अलग तरह से खिदमत कर सकते हो। इसमें एक है खुद की खिदमत यानि कि खुद के ऊपर लबरेज़ और मुकम्मल बनने का हमेशा अटेन्शन रखना। आपकी इस तालीम के जो अहम सबजेक्ट हैं, उन तमाम में अपने को पास विद्-आनर बनाना है। इसमें इल्म याफ़्ता, याद याफ़्ता, इख्तियार याफ़्ता - तमाम में लबरेज़ बनना है। यह खुद की खिदमत हमेशा अक्ल में रहे। यह खुद की खिदमत अपने आप ही आपके लबरेज़ याफ़्ता के ज़रिए खिदमत कराती रहती है मगर इसका तरीक़ा है - अटेन्शन और चेंकिग। खुद की चेकिंग करनी है, दूसरों की नहीं करनी। दूसरी है - जहान खिदमत जो अलग-अलग अस्बाबों के ज़रिए, अलग-अलग तरीके से, आवाज़ के ज़रिए और रिश्ते राब्ते के ज़रिए करते हो। यह तो तमाम अच्छी तरह से जानते हैं। तीसरी है - यज्ञ खिदमत जो जिस्म और दौलत के ज़रिए कर रहे हो।
चौथी है - ज़हनियत खिदमत। अपने नेक जज़्बात, अफ़ज़ल खुवाहिशात, अफ़ज़ल कैफियत, अफ़ज़ल वायब्रेशन के ज़रिए किसी भी मुकाम पर रहते हुए कई रूहों की खिदमत कर सकते हो। इसका तरीक़ा है - लाइट हाउस, माइट हाउस बनना। लाइट हाउस एक ही मुकाम पर वाक़ेअ होते दूर-दूर की खिदमत करते हैं। ऐसे आप तमाम एक मुकाम पर होते कईयों की खिदमत के वास्ते ज़रिए बन सकते हो। इतनी कुव्वतों का खज़ाना जमा है तो आसानी से कर सकते हो। इसमें मैकरू अस्बाब और चान्स और वक़्त की प्रॉबलम नहीं है। सिर्फ़ लाइट-माइट से लबरेज़ बनने की ज़रूरत है। हमेशा ज़हन, अक्ल फ़ालतू सोचने से आज़ाद होना चाहिए, दिल से मुझे याद करो' के मन्त्र का आसान खुद का रूप होना चाहिए। यह चारों तरह की खिदमत क्या मुसलसल खिदमतगार नहीं बना सकती? चारों ही खिदमतों में से हर वक़्त कोई न कोई खिदमत करते रहो तो आसानी से मुसलसल खिदमतगार बन जायेंगे और मुसलसल खिदमतों पर हाज़िर होने के सबब, हमेशा बिज़ी रहने के सबब आसानी से इबलीस फ़तहयाब बन जायेंगे। चारों ही खिदमतों में से जिस वक़्त जो खिदमत कर सकते हो वह करो मगर खिदमत से एक सेकेण्ड भी खाली नहीं रहो। 24 घण्टा खिदमतगार बनना है। 8 घण्टे के इबादत नशीन और खिदमतगार नहीं मगर मुसलसल खिदमतगार। आसान है ना? और नहीं तो खुद की खिदमत तो अच्छी है। जिस वक़्त जो चांस मिले, वह खिदमत कर सकते हो।

कई बच्चे जिस्म के सबब और वक़्त न मिलने सबब समझते हैं हम तो खिदमत कर नहीं सकते हैं। मगर अगर चार ही खिदमतों में से कोई भी खिदमत में तरीक़त मुताबिक बिज़ी रहते हो तो खिदमत की सबजेक्टस में मार्क्स जमा होती जाती हैं और यह मिले हुए नम्बर (अंक) फाइनल रिज़ल्ट में जमा हो जायेंगे। जैसे आवाज़ के ज़रिए खिदमत करने वालों के मार्क्स जमा होते हैं, वैसे यज्ञ-खिदमत और खुद की खिदमत और ज़हनियत खिदमत - इनकी भी इतनी ही अहमियत है, इसके भी इतने नम्बर जमा होंगे। हर तरह की खिदमत के नम्बर इतने ही हैं। मगर जो चारों ही तरह की खिदमत करते उसके उतने नम्बर जमा होते; जो एक और दो तरह की खिदमत करते, उसके नम्बर उस मुताबिक़ जमा होते। फिर भी, अगर चार तरह की नहीं कर सकते, दो तरह की कर सकते हैं तो भी मुसलसल खिदमतगार हैं। तो मुसलसल के सबब नम्बर बढ़ जाते हैं इसलिए मोमिन ज़िन्दगी यानि कि मुसलसल खिदमतगार आसान इबादत नशीन।

जैसे याद का अटेन्शन रखते हो कि मुसलसल रहे, हमेशा याद का लिंक जुटा रहे; वैसे खिदमत में भी हमेशा लिंक जुटा रहे। जैसे याद में भी अलग-अलग सूरत ए हाल का एहसास करते हो - कभी बीजरूप का, कभी फरिश्तारूप का, कभी ग़ौरतलब का, कभी रूहरिहान का मगर सूरत ए हाल अलग-अलग होते भी याद की सबजेक्ट में मुसलसल याद में गिनते हो। ऐसे यह अलग-अलग खिदमत का रूप हो। मगर खिदमत के बिना ज़िंदगी नहीं। श्वाँसो श्वाँस याद और श्वाँसों श्वाँस खिदमत हो - इसको कहते हैं बैलेन्स। तब ही हर वक़्त ब्लैसिंग दस्तयाब होने का एहसास हमेशा करते रहेंगे और दिल से हमेशा अपने आप ही यह आवाज़ निकलेगा कि बरक़ातों से पल रहे हैं, बरक़ात से, उड़ते फ़न के एहसास से उड़ रहे हैं। मेहनत से, जंग से छूट जायेंगे। क्या', क्यों', कैसे' - इन सवालों से आज़ाद हो हमेशा ख़ुश रहेंगे। कामयाबी हमेशा पैदाइशी हक़ के रूप में एहसास करते रहेंगे। मालूम नहीं क्या होगा। कामयाबी होगी या नहीं होगी, मालूम नहीं हम आगे चल सकेंगे या नहीं चल सकेंगे - यह मालूम नहीं का इरादा तब्दील हो तब मास्टर तीनों ज़माने की सूरत ए हाल का एहसास करेंगे। कामयाबी हुई पड़ी है' - यह यक़ीन और नशा हमेशा एहसास होगा। यही ब्लैसिंग की निशानियाँ हैं। समझा?

मोमिन ज़िन्दगी में, अज़ीम दौर में रब उल हक़ के हक़दार बन फिर भी मेहनत करनी पड़े, हमेशा जंग की सूरत ए हाल में ही ज़िन्दगी बितायें - यह बच्चों के मेहनत की ज़िन्दगी रब उल हक़ से देखी नहीं जाती इसलिए मुसलसल इबादत नशीन, मुसलसल खिदमतगार बनो। समझा? अच्छा।

पुराने बच्चों की आस पूरी हो गई ना। पानी की खिदमत करने वाले खिदमतगार बच्चों को आफरीन (शाबाश) है जो कई बच्चों की उम्मीदों को पूरा करने में रात-दिन मददगार हैं। नींद फ़तहयाब भी बन गये तो कुदरत फ़तहयाब भी बन गये। तो मधुबन के खिदमतगार को, चाहे प्लैन बनाने वाले, चाहे पानी लाने वाले, चाहे आराम से रिसीव करने वाले, रहाने वाले, खाना वक़्त पर तैयार करने वाले - जो भी अलग-अलग खिदमत के ज़रिया हैं, उन सबको थैंक्स देना। रब उल हक़ तो दे ही रहे हैं। दुनिया पानी-पानी करके चिल्ला रही है और रब के बच्चे कितना आसानी से काम चला रहे हैं! रब उल हक़ तमाम खिदमतगार बच्चों की खिदमत देखते रहते हैं। कितना आराम से आप लोगों को मधुबन रिहाईश नशीन ज़रिया बन चान्स दिला रहे हैं! आप भी मददगार बने हो ना? जैसे वह मददगार बने हैं तो आपको उसका सिला मिल रहा है, वैसे आप तमाम भी दरेक काम में जैसा वक़्त उसी मुताबिक चलते रहेंगे तो आपकी इमदाद का सिला और मोमिनों को भी मिलता रहेगा।

रब उल हक़ मुस्करा रहे थे - सुनहरे दौर में दूध की नदियाँ बहेंगी मगर मिलन पर पानी, घी तो बन गया ना। घी की नदी नलके में आ रही है। पानी घी बन गया तो बेशकीमती हो गया ना। इसी तरीके से कइयों को चांस देते रहेंगे। फिर भी देखो, दुनिया में और आप मोमिनों में फ़र्क है ना। कई मुकामों से फिर भी आप लोगों को निहायत आराम है और प्रेक्टिस भी हो रही है इसलिए राज़युक्त बन हर मुश्किलात में राज़ी रहने की प्रेक्टिस बढ़ाते चलो। अच्छा।

तमाम मुसलसल इबादत नशीन, मुसलसल खिदमतगार अफ़ज़ल रूहों को, हमेशा तीनों ज़माने को जानने वाले बन कामयाबी के हक़ को एहसास करने वाले, हमेशा खुशहाल, मुत्मइन, अफ़ज़ल रूहों को, हर सेकेण्ड ब्लैसिंग के एहसास करने वाले बच्चों को खालिक, बरकाती रब उल हक़ का यादप्यार और सलाम।
दादी जी से:- इरादा किया और तमाम को अफ़ज़ल इरादे का सिला मिल गया। कितनी बरक़ातों की मालायें पड़ती हैं! जो ज़रिया बनते हैं उन्हों के भी, रब के साथ-साथ फ़ज़ीलत तो गाते हैं ना इसलिए तो रब के साथ बच्चों की भी इबादत होती है, अकेले रब की नहीं होती। तमाम को कितनी ख़ुशी दस्तयाब हो रही है! यह बरक़ातों की मालायें अकीदत मन्दी में मालाओं के हक़दार बनाती हैं!

पार्टियों से ग़ैबी - रब उल हक़ की मुलाकात
1) आप तमाम अफ़ज़ल रूहें सबकी प्यास बुझाने वाले हो ना? वह है मैकरू पानी और आपके पास है - आब ए इल्म ए हयात'। पानी कलील अरसे की प्यास बुझाए मुत्मइन रूह बना देता है। तो तमाम रूहों को आब ए हयात के ज़रिए मुत्मइन करने के ज़रिया बने हुए हो ना। यह ख़ुशी हमेशा रहती है? क्योंकि प्यास बुझाना - यह अज़ीम सवाब है। प्यासे की प्यास बुझाने वाले को सवाबी रूह कहते हैं। आप भी अज़ीम सवाबी रूह बन तमाम की प्यास बुझाने वाले हो। जैसे प्यास से इन्सान तड़फते हैं, अगर पानी न मिले तो प्यास से तड़फेंगे ना! ऐसे, आब ए हयात ए इल्म न मिलने से रूहें ग़म बेचैनी में तड़फ रही हैं। तो उनको आब ए हयात ए इल्म देकर प्यास बुझाने वाली नफ़ीस रूहें हो। तो सवाब का खाता कई विलादतों के लिए जमा कर रहे हो ना? एक विलादत में ही कई विलादतों का खाता, कई विलादतों के लिए जमा कर रहे हो ना? एक विलादत में ही कई विलादतों का खाता जमा होता है। तो आपने इतना जमा कर लिया है ना? इतने मालामाल बन गये जो औरों को भी बांट सकते हो! अपने लिए भी जमा किया और दूसरों को भी देने वाले दाता बने। तो हमेशा यह चेक करो कि तमाम दिन में सवाबी रूह बने, सवाब का काम किया या सिर्फ़ अपने लिए ही खाया-पिया मौज किया? जमा करने वाले को समझदार कहा जाता है, जो कमाये और खाये उसको समझदार नहीं कहेंगे। जैसे खाना खाने के लिए फुर्सत निकालते हो क्योंकि ज़रूरी है, ऐसे यह सवाब का काम करना भी ज़रूरी है। तो हमेशा ही सवाबी रूह हो, कभी-कभी की नहीं। चांस मिले तो करें, नहीं। चांस लेना है। वक़्त मिलेगा नहीं, वक़्त निकालना है, तब जमा कर सकेंगे। इस वक़्त जितनी भी तक़दीर की लकीर खींचने चाहो, उतनी खींच सकते हो क्योंकि रब क़िस्मत देने वाला और बरक़ाती है। अफ़ज़ल नॉलेज की कलम रब ने अपने बच्चों को दे दी है। इस कलम से जितनी लम्बी लकीर खींचनी चाहो, खींच सकते हो। अच्छा।

2) तमाम राज ऋषि हो ना? राज यानि कि हक़दार और ऋषि यानि कि इबादत नशीन। इबादत की कुव्वत आसानी से तब्दील कराने की बुनियाद है। इलाही लगन से खुद को और दुनिया को हमेशा के लिए बे मुश्किल बना सकते हैं। बे मुश्किल बनना और बे मुश्किल बनाना - यही खिदमत करते हो ना। कई तरह की मुश्किलात से तमाम रूहों को आज़ाद करने वाले हो। तो ज़िन्दगी ए आज़ाद की बरक़ात रब से लेकर औरों को दिलाने वाले हो ना। ग़ैर बन्दिश यानि कि ज़िन्दगी ए आज़ाद।

3) हिम्मते बच्चे मदद ए रब। बच्चों की हिम्मत पर हमेशा रब की मदद पद्मगुणा दस्तयाब होती है। बोझ तो रब के ऊपर है। मगर ट्रस्टी बन हमेशा रब की याद से आगे बढ़ते रहो। रब की याद ही हिफ़ाज़त का साया है। पिछला हिसाब सूली है मगर रब की मदद से कांटा बन जाता है। मुश्किलात आनी ज़रूर हैं क्योंकि सब कुछ यहाँ ही चुक्तू करना है। मगर रब की मदद कांटा बना देती है, बड़ी बात को छोटा बना देती है क्योंकि बड़े बाप का साथ है। हमेशा यक़ीन से आगे बढ़ते रहो। हर कदम में ट्रस्टी, ट्रस्टी यानि कि सब कुछ तेरा, मेरा-पन ख़त्म। गृहस्थी यानि कि मेरा। तेरा होगा तो बड़ी बात छोटी हो जायेगी और मेरा होगा तो छोटी बात बड़ी हो जायेगी। तेरा-पन हल्का बनाती है और मेरा-पन भारी बनाती है। तो जब भी भारी एहसास करो तो चेक करो कि कहाँ मेरा-पन तो नहीं। मेरे को तेरे में बदली कर दो तो उसी घड़ी हल्के हो जायेंगे, तमाम बोझ एक सेकेण्ड में ख़त्म हो जायगा। अच्छा।

बरक़ात:-
मुत्मइन नशीनी की खासियत और अफ़ज़ल नशीनी के ज़रिए तमाम के पसंदीदा हूरैन बनने वाले बरक़ाती याफ़्ता बनो।

जो हमेशा खुद से और तमाम से मुत्मइन रहते हैं वही कई रूहों के पसंदीदा हूरैन आठ हूरैन बन सकते हैं। सबसे बड़े से बड़ी फ़ज़ीलत कहो, सदक़ा कहो या खासियत या अफ़ज़ल नशीनी कहो - वह इत्मीनान ही है। मुत्मइन रूह ही अल्लाह ताला को प्यारी, अवाम को प्यारी और खुद को प्यारी होती है। ऐसी मुत्मइन रूह ही बरक़ाती रूप में मशहूर होगी। अभी अाख़िर के वक्त में अज़ीम सदक़ा नशीन से भी ज़्यादा बरक़ाती रूप के ज़रिए खिदमत होगी।

स्लोगन:-
फ़तहयाब जवाहिरात वह है जिसकी पैशानी पर हमेशा फतह का तिलक चमकता हो।


पैगाम- आज महीने का तीसरा ऐतवार इन्टरनेशनल इबादत का दिन है। तमाम भाई-बहनें शाम 6.30 से 7.30 बजे तक ख़ास इबादत की प्रेक्टिस में अपने बुजुर्गान ए दीन को इमर्ज करें। और तमाम दरख्त को तमाम कुव्वतों को सकाश देने की खिदमत करें।

आमीन