21-11-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
यह मिलन का दौर आलातरीन बनने का नेक वक़्त है, क्योंकि इसी वक्त रब तुम्हें हज़रात से अफ़ज़ल हज़रात बनने की तालीम देते हैं

सवाल:-
तुम बच्चों के पास ऐसी कौन-सी नॉलेज है जिसके सबब तुम किसी भी हालत में रो नहीं सकते?

जवाब:-
तुम्हारे पास इस बने-बनाये ड्रामा की नॉलेज है, तुम जानते हो इसमें हर रूह का अपना पार्ट है, रब हमें ख़ुशी का वर्सा दे रहे हैं। फिर हम रो कैसे सकते। परवाह थी बालातर आलम ए अरवाह में रहने वाले की, वह मिल गया बाक़ी क्या चाहिए। बख्तावर बच्चे कभी रोते नहीं।

आमीन।
रूहानी रब बैठ बच्चों को एक बात समझाते हैं। तस्वीरों में भी ऐसे लिखना है कि तीन मुजस्सम पाक परवरदिगार बच्चों के वास्ते समझाते हैं। तुम भी किसको समझाते हो तो तुम रूह कहेंगे पाक परवरदिगार ऐसे फ़रमाते हैं। यह बाबा भी कहेंगे - रब्बा तुमको समझाते हैं। यहाँ इन्सान, इन्सान को नहीं समझाते हैं मगर पाक परवरदिगार रूहों को समझाते हैं या रूह, रूह को समझाती है। दरिया ए इल्म तो रहमतुल्आल्मीन ही है और वह है रूहानी रब। इस वक़्त रूहानी बच्चों को रूहानी रब से वर्सा मिलता है। जिस्मानी तकब्बुर यहाँ छोड़ना पड़ता है। इस वक़्त तुमको रूहानी हवासी बन रब को याद करना है। आमाल भी भल करो, धंधा धोरी वगैरह भल चलाते रहो, बाक़ी जितना वक़्त मिले अपने को रूह समझ रब को याद करेंगे तो गुनाहों का ख़ात्मा होंगा। तुम जानते हो रहमतुल्आल्मीन इसमें आया हुआ है। वह सच है, ज़िन्दा है। हक़ीक़ी ज़िन्दा निशात याफ़्ता कहते हैं। जिब्राइल अलैहिस्सलाम, मीकाईल अलैहिस्सलाम, इस्राफील अलैहिस्सलाम या कोई भी इन्सान की यह अज़मत नहीं है। आला ते आला अल्लाह ताला एक ही है, वह है सुप्रीम सोल। यह इल्म भी तुमको सिर्फ़ इस वक़्त है। फिर कभी मिलना नहीं है। हर 5 हज़ार साल बाद रब आते हैं, तुमको रूहानी हवासी बनाए रब को याद कराने, जिससे तुम स्याह रास्त से ख़ैर रास्त बनते हो, और कोई तरीक़ा नहीं। भल इन्सान पुकारते भी हैं- ए नापाक से पाक बनाने वाले आओ । मगर मतलब नहीं समझते। नापाक से पाक बनाने वाले इलाही कहें तो भी दुरूस्त है। तुम तमाम आबिद या नमाज़ी हो। वह है एक खुदा ताला, तुम अकीदत मन्दों को सिला चाहिए अल्ल्लाह् ताला के ज़रिए। निजात और ज़िन्दगी ए निजात - यह है सिला। निजात-ज़िन्दगी ए निजात का देने वाला वह एक ही रब है। ड्रामा में आला ते आला पार्ट वाले भी होते हैं तो अदना पार्ट वाले भी होते हैं। यह बेहद का ड्रामा है, इसको और कोई समझ न सके। तुम इस वक़्त स्याह रास्त अदना से ख़ैर रास्त रूह ए अफ़ज़ल बन रहे हो। सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ को ही आलातरीन कहा जाता है। इस वक़्त तुम आलातरीन नहीं हो। रब तुमको आलातरीन बनाते हैं। यह ड्रामा का चक्कर कैसे फिरता रहता है, इसको कोई भी नहीं जानते। इख्तिलाफ़ी फ़ितने का दौर, मिलन का दौर फिर होता है सुनहरे दौर। पुराने को नया कौन बनायेंगे? रब बिगर कोई बना न सके। रब ही मिलन पर आकर पढ़ाते हैं। रब न सुनहरे दौर में आते हैं, न इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में आते हैं। रब फ़रमाते हैं मेरा पार्ट ही मिलन पर है इसलिए मिलन का दौर फलाह नशीन दौर कहा जाता है। यह है आस्पीशियस, निहायत आला नेक वक़्त मिलन का दौर। जबकि रब आकर तुम बच्चों को हज़रात से अफ़ज़ल हज़रात बनाते हैं। इन्सान तो इन्सान ही हैं मगर हूरैन फ़ज़ीलत वाले बन जाते हैं, उनको कहा जाता है। अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन। रब फ़रमाते हैं मैं यह दीन क़ायम करता हूँ, इसके लिए पाकीज़ा ज़रूर बनना पड़ेगा। नापाक से पाक बनाने वाला एक ही रब है। बाक़ी तमाम हैं ब्राइड्स, इबादत नशीन। नापाक से पाक बनाने वाले दानिशमंद इलाही कहना भी दुरूस्त है। मगर पिछाड़ी में जो फिर रघुपति राघव राजा राम कह देते वह रांग हो जाता। इन्सान बिगर मतलब जो आता है सो बोलते रहते हैं, धुन लगाते रहते हैं। तुम जानते हो खानदान ए महताबी दीन भी अब क़ायम हो रहा है। रब आकर मोमिन खानदान क़ायम करते हैं, इनको डिनायस्टी नहीं कहेंगे। यह कुनबा है, यहाँ न तुम पनजतनों की, न यज़ीदों की बादशाहत है। गीता जिसने पढ़ी होगी, उनको यह बातें जल्दी समझ में आयेंगी। यह भी है गीता। कौन सुनाते हैं? अल्ल्लाह् ताला। तुम बच्चों को पहले-पहले तो यह समझानी देनी है कि गीता का भगवान कौन? वह कहते हैं कृष्ण भगवानुवाच। अब आदम अलैहिस्सलाम तो होगा सुनहरे दौर में। उनमें जो रूह है वह तो ला फ़ानी है। जिस्म का ही नाम बदलता है। रूह का कभी नाम नहीं बदलता। आदम अलैहिस्सलाम की रूह का जिस्म सुनहरे दौर में ही होता है। नम्बरवन में वही जाता है। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम नम्बरवन फिर हैं सेकण्ड, थर्ड। तो उनके मार्क्स भी इतने कम होंगे। यह माला बनती है ना। रब ने समझाया है हूरैन माला भी होती है और इलाही माला भी होती है। मीकाईल अलैहिस्सलाम के गले में हूरैन माला दिखाते हैं। तुम बच्चे जन्नत के मालिक बनते हो नम्बरवार। तो तुम जैसे मीकाईल अलैहिस्सलाम के गले का हार बनते हो। पहले-पहले रहमतुल्आल्मीन के गले का हार बनते हो, उनको इलाही माला कहा जाता है, जो जपते हैं। माला पूजी नहीं जाती, सिमरी जाती है। माला का दाना वही बनते हैं जो जन्नत की दारूल हुकूमत में नम्बरवार आते हैं। माला में सबसे पहले होता है फूल फिर जोड़ी दाना। कुन्बाई राह है ना। कुन्बाई राह शुरू होती है आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम और बच्चों से। यही फिर हूरैन बनते हैं। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम है फर्स्ट। ऊपर में है फूल रहमतुल्आल्मीन। माला फेर-फेर कर पिछाड़ी में फूल को माथा टेकते हैं। रहमतुल्आल्मीन फूल है जो दोबारा विलादत में नहीं आते हैं, इनमें दाखिली करते हैं। वही तुमको समझाते हैं। इनकी रूह तो अपनी है। वह अपना जिस्म रवादारी करती है, उनका काम है सिर्फ़ इल्म देना। जैसे कोई की औरत या बाप वगैरह मरता है तो उनकी रूह को ब्राह्मण के जिस्म में बुलाते हैं। आगे आती थी, अब वह कोई जिस्म छोड़कर तो नहीं आती है। यह ड्रामा में पहले से ही नूँध है। यह तमाम है अकीदत मन्दी की राह। वह रूह तो गई, जाकर दूसरा जिस्म लिया। तुम बच्चों को अभी यह तमाम इल्म मिल रहा है, इसलिए कोई मरता है तो भी तुमको कोई फ़िक्र नहीं। अम्मा मरे तो भी हलुआ खाना (शान्ता बहन का मिसाल)। बच्ची ने जाकर उन्हों को समझाया कि तुम रोते क्यों हो? उसने तो जाकर दूसरा जिस्म लिया। रोने से लौट थोड़े ही आयेगी। बख्तावर थोड़े ही रोते हैं। तो वहाँ सबका रोना बन्द कराए समझाने लगी। ऐसे निहायत बच्चियाँ जाकर समझाती हैं। अभी रोना बन्द करो। झूठे मोमिन भी नहीं खिलाओ। हम सच्चे मोमिनों को ले आते हैं। फिर इल्म सुनने लग जाते हैं। समझते हैं यह बात तो दुरुस्त बोलते हैं। इल्म सुनते-सुनते शान्त हो जाते हैं। 7 दिन के लिए कोई भागवत वगैरह रखते हैं तो भी इन्सान के दु:ख दूर नहीं होते। यह बच्चियाँ तो सबके दु:ख दूर कर देती हैं। तुम समझते हो रोने की तो दरकार नहीं। यह तो बना-बनाया ड्रामा है। हर एक को अपना पार्ट बजाना है। कोई भी हालत में रोना नहीं चाहिए। बेहद का बाप-उस्ताद-हादी मिला है, जिसके लिए तुम इतना धक्का खाते रहते हो।बालातर आलम ए अरवाह में रहने वाला पाक परवरदिगार मिल गया तो बाक़ी क्या चाहिए। रब देते ही हैं ख़ुशी का वर्सा। तुम रब को भूल जाते हो तब रोना पड़ता है। रब को याद करेंगे तब ख़ुशी होगी। ओहो! हम तो दुनिया के मालिक बनते हैं। फिर 21 पीढ़ी कभी रोयेंगे नहीं। 21 पीढ़ी यानि पूरा बुढ़ापे तक बेवक्त मौत नहीं होती है, तो अन्दर में कितनी बातिन ख़ुशी रहनी चाहिए।
तुम जानते हो हम इबलीस पर फ़तह पाकर ज़हान फ़तहयाब बनेंगे। हथियार वगैरह की कोई बात नहीं। तुम हो रहमतुल्आल्मीन कुव्वतैन। तुम्हारे पास है इल्म तलवार, इल्म तीर। उन्होंने फिर अकीदत मन्दी में हूरैन को मैकरू तीर भाले वगैरह दे दिए है। रब फ़रमाते हैं इल्म तलवार से ख़बासतों को जीतना है, बाक़ी हूरैन कोई तशदिद थोड़े ही हैं। यह तमाम है अकीदत मन्दी की राह। राहिब-वली वगैरह हैं बेनियाज़ी राह वाले, वह कुन्बाई राह को मानते ही नहीं। तुम तो बेनियाज़ी करते हो तमाम पुरानी दुनिया का, पुराने जिस्म का। अब रब को याद करेंगे तो रूह पाकीज़ा हो जायेगी। इल्म की आदत ले जायेंगे। उस के मुताबिक नई दुनिया में विलादत लेंगे। अगर यहाँ भी विलादत लेंगे तो भी कोई अच्छे घर में बादशाह के पास या रिलीजस घर में वह आदत ले जायेंगे। सबको प्यारे लगेंगे। कहेंगे यह तो हूरैन है। कृष्ण की कितनी अज़मत गाते हैं। छोटेपन में दिखाते हैं माखन चुराया, मटकी फोड़ी, यह किया.... कितनी तोहमत लगायी हैं। अच्छा, फिर कृष्ण को सांवरा क्यों बनाया है? वहाँ तो कृष्ण गोरा होगा ना। फिर जिस्म बदलता रहता है, नाम भी बदलता रहता है। श्रीकृष्ण यानि कि आदम अलैहिस्सलाम तो जन्नत का पहला प्रिन्स था, उनको क्यों स्याह बनाया है? कभी कोई बता नहीं सकेंगे। वहाँ सांप वगैरह होते नहीं जो काला बना दें। यहाँ ज़हर चढ़ जाता है तो काला हो जाता है। वहाँ तो ऐसी बात हो न सके। तुम अब हूरैन फिरक़ा बनने वाले हो। इस मोमिन फ़िरकें का किसको भी मालूम नहीं है। पहले-पहले रब आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए मोमिनों को एडाप्ट करते हैं। बाप ए अवाम है तो उनकी अवाम भी बेइंतहा की बेइंतहा है। ब्रह्मा की बेटी सरस्वती कहते हैं। स

औरत तो है नहीं। यह किसको भी मालूम नहीं है। बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम के तो हैं ही मुंह निस्ब नामा। औरत की बात ही नहीं। इनमें रब दाखिली कर फ़रमाते हैं तुम हमारे बच्चे हो। मैंने इनका नाम आदम अलैहिस्सलाम रखा है, जो भी बच्चे बनें सबके नाम बदली किये हैं। तुम बच्चे अभी इबलीस पर फ़तह पाते हो, इसको कहा ही जाता है - हार और फ़तह का खेल। रब कितना सस्ता सौदा कराते हैं। फिर भी इबलीस हरा देता है तो भाग जाते हैं। 5 ख़बासत रूपी इबलीस हराता है। जिनमें 5 ख़बासत हैं, उनको ही शैतानी फ़िरका कहा जाता है। मन्दिर में हूरैन के आगे भी जाकर अज़मत गाते हैं - आप तमाम फ़ज़ीलतों से लबरेज़..... रब तुम बच्चों को समझाते हैं - तुम ही क़ाबिल ए एहतराम हूरैन थे फिर 63 विलादत नाकाबिल बनें, अब फिर काबिल ए एहतराम बनते हो। रब क़ाबिल ए एहतराम बनाते हैं, शैतान नाकाबिल बनाते हैं। यह बातें कोई सहीफ़ों में नहीं हैं। रब कोई सहीफ़ा थोड़े ही पढ़ा हुआ है। वह तो है ही दरिया ए इल्म। वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी है। ऑलमाइटी यानी तमाम कुव्वत नशीन। रब फ़रमाते हैं तमाम वेदों-सहीफ़ों वगैरह को जानता हूँ। यह सब

तमाम है अकीदत मन्दी की राह की चीज़ें। मैं इन तमाम बातों को जानता हूँ। इख्तिलाफी दौर से ही तुम नाकाबिल बनते हो। आला जन्नत-अदना जन्नत में तो इबादत होती नहीं। वह है काबिल ए एहतराम घराना। फिर होता है नाकाबिल घराना। इस वक़्त तमाम नाकाबिल हैं। यह बातें कोई को मालूम नहीं हैं। रब ही आकर 84 विलादतों की कहानी बताते हैं। काबिल ए एहतराम नाकाबिल यह तुम्हारे ऊपर ही तमाम खेल रहता है। हिन्दू मज़हब कह देते हैं। असल में तो हिन्दुस्तान में अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन था, न कि हिन्दू। कितनी बातें समझानी पड़ती हैं। यह तालीम है भी सेकण्ड की। फिर भी कितना वक्त लग जाता है। कहते हैं समन्दर को स्याही बनाओ, तमाम जंगल कलम बनाओ तो भी पूरा हो न सके। आख़िर तक तुमको इल्म सुनाता रहूँगा। तुम इनका किताब कितना बनायेंगे। शुरू में भी बाबा सवेरे-सवेरे उठकर लिखते थे, फिर मम्मा सुनाती थी, तब से लेकर छपता ही आता है। कितने कागज़ खलास हुए होंगे। गीता तो एक ही इतनी छोटी है। गीता का लॉकेट भी बनाते हैं। गीता का निहायत असर है, मगर गीता इल्म देने वाले को भूल गये हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता रबदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. इल्म तलवार से ख़बासतों को जीतना है। इल्म की आदत भरनी हैं। पुरानी दुनिया और पुराने जिस्म की बेनियाज़ी करनी है।

2. क़िस्मत नशीन बनने की ख़ुशी में रहना है, किसी भी बात की फ़िक्र नहीं करनी है। कोई जिस्म छोड़ देता है तो भी दु:ख के आंसू नहीं बहाने हैं।

बरक़ात:-
ताज और तख्त को हमेशा क़ायम रखने वाले मुसलसल खुद मुख्तार इबादत नशीन बनो

मौजूदा वक़्त रब के ज़रिए तमाम बच्चों को ताज और तख्त मिलता है, अभी का यह ताज और तख्त कई विलादतों के लिए ताज, तख्त दस्तयाब कराता है। जहान फ़लाह की ज़िम्मेवारी का ताज और रब उल हक़ का दिलतख्त हमेशा क़ायम रहे तो मुसलसल खुद मुख्तार इबादत नशीन बन जायेंगे। उन्हें किसी भी तरह की मेहनत करने की बात नहीं क्योंकि एक तो रिश्ता नज़दीक का है दूसरा बेशुमार दस्तयाबी है। जहाँ दस्तयाबी होती है वहाँ अपने आप याद होती है।

स्लोगन:-
प्लेन अक्ल से प्लैन को प्रैक्टिकल में लाओ तो कामयाबी समाई हुई है।

आमीन