22-02-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
अभी यह चढ़ते फ़न का वक्त है, हिन्दुस्तान ग़रीब से दौलत मन्द बनता है, तुम रब से सुनहरे दौर की बादशाही का वर्सा ले लो

सवाल:-
रब का कौन सा टाइटिल आदम अलैहिस्सलाम को नहीं दे सकते हैं?

जवाब:-
रब है गरीब-निवाज़। आदम अलैहिस्सलाम को ऐसे नहीं कहेंगे। वह तो निहायत दौलत मन्द है, उनकी सल्तनत में तमाम दौलतमंद हैं। रब जब आते हैं तो सबसे ग़रीब हिन्दुस्तान है। हिन्दुस्तान को ही दौलतमंद बनाते हैं। तुम कहते हो हमारा हिन्दुस्तान जन्नत था, अभी नहीं है, फिर से बनने वाला है। गरीब-निवाज़ रब्बा ही हिन्दुस्तान को जन्नत बनाते हैं।

नग़मा:-
आखिर वह दिन आया आज.....

आमीन।
मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने यह नग़मा सुना। जैसे रूह बातिन है और जिस्म ज़ाहिर है। रूह इन आंखों से देखने में नहीं आती है, इनकागनीटो है। है ज़रूर मगर इस जिस्म से ढकी हुई है इसलिए कहा जाता है रूह बातिन है। रूह खुद कहती हैं मैं ग़ैर मुजस्सम हूँ, यहाँ जिस्म में आकर बातिन बनी हूँ। रूहों की ग़ैर मुजस्सम दुनिया है। उसमें तो बातिन की बात नहीं। पाक परवरदिगार भी वहाँ रहते हैं। उनको कहा जाता है सुप्रीम। आला ते आला रूह, परे ते परे रहने वाला पाक परवरदिगार। रब फ़रमाते हैं जैसे तुम बातिन हो, मुझे भी बातिन में आना पड़े। मैं गर्भजेल में आता नहीं हूँ। मेरा नाम एक ही रहमतुल्आल्मीन चला आता है। मैं इस जिस्म में आता हूँ तो भी मेरा नाम नहीं बदलता। इनकी रूह का जो जिस्म है, इनका नाम बदलता है। मुझे तो रहमतुल्आल्मीन ही कहते हैं - तमाम रूहों का बाप। तो तुम रूहें इस जिस्म में बातिन हो, इस जिस्म के ज़रिए आमाल करती हो। मैं भी बातिन हूँ। तो बच्चों को यह इल्म अभी मिल रहा है कि रूह इस जिस्म से ढकी हुई है। रूह है इनकागनीटो। जिस्म है कागनीटो। मैं भी हूँ बे जिस्म। रब इनकागनीटो इस जिस्म के ज़रिए सुनाते हैं। तुम भी इनकागनीटो हो, जिस्म के ज़रिए सुनते हो। तुम जानते हो रब्बा आया हुआ है - हिन्दुस्तान को फिर से ग़रीब से दौलत मन्द बनाने। तुम कहेंगे हमारा हिन्दुस्तान। हर एक अपने स्टेट के लिए कहेंगे - हमारा गुजरात, हमारा राजस्थान। हमारा-हमारा कहने से उसमें लगाव रहता है। हमारा हिन्दुस्तान ग़रीब है। यह तमाम मानते हैं मगर उन्हें यह मालूम नहीं कि हमारा हिन्दुस्तान दौलत मन्द कब था, कैसे था। तुम बच्चों को निहायत नशा है। हमारा हिन्दुस्तान तो निहायत दौलत मन्द था, दु:ख की बात नहीं थी। सुनहरे दौर में दूसरा कोई मज़हब नहीं था। एक ही हूर-हूरैन मज़हब था, यह किसको मालूम नहीं है। यह जो वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी है यह कोई नहीं जानते। अभी तुम अच्छी तरह समझते हो, हमारा हिन्दुस्तान निहायत दौलत मन्द था। अभी निहायत ग़रीब है। अब फिर रब आये हैं दौलत मन्द बनाने। हिन्दुस्तान सुनहरे दौर में निहायत दौलत मन्द था जबकि हूर-हूरैन की सल्तनत थी फिर वह सल्तनत कहाँ चली गई। यह कोई नहीं जानते। राहिब-वली वगैरह भी कहते थे हम खालिक और मख़लूक़ को नहीं जानते हैं। रब फ़रमाते हैं सुनहरे दौर में भी हूर हूरैन को खालिक और मख़लूक़ के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का इल्म नहीं था। अगर उन्हों को भी इल्म हो कि हम सीढ़ी उतरते इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में चले जायेंगे तो बादशाही का ख़ुशी भी न रहे, फिकर लग जाए। अभी तुमको फिकर लगी हुई है हम सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ थे फिर हम ख़ैर रास्त कैसे बनें! हम रूहें जो ग़ैर मुजस्सम दुनिया में रहती थी, वहाँ से फिर कैसे दारूल मसर्रत में आये यह भी इल्म है। हम अभी चढ़ते फ़न में हैं। यह 84 विलादतों की सीढ़ी है। ड्रामा के मुताबिक हर एक एक्टर नम्बरवार अपने-अपने वक़्त पर आकर पार्ट बजायेंगे। अब तुम बच्चे जानते हो ग़रीब-निवाज़ किसको कहा जाता है, यह दुनिया नहीं जानती। नग़में में भी सुना - आखिर वह दिन आया आज, जिस दिन का रास्ता तकते थे....., तमाम अकीदत मन्द। अल्लाह ताला कब आकर हम अकीदत मन्दों को इस अकीदत मन्दी की राह से छुड़ाए खैर निजात में ले जायेंगे - यह अभी समझा है। रब्बा फिर से आ गया है इस जिस्म में।शब ए बारात भी मनाते हैं तो ज़रूर आते हैं। ऐसे भी नहीं कहेंगे मैं आदम अलैहिस्सलाम के जिस्म में आता हूँ। नहीं। रब फ़रमाते हैं आदम अलैहिस्सलाम की रूह ने 84 विलादत लिए हैं। उनके निहायत विलादतों के आख़िर का यह आखिरी विलादत है। जो पहले नम्बर में था वह अब आखिर में है तुम्ही थे तुम्हे ही बनना है। मैं तो आता हूँ सादे जिस्म में। तुमको आकर बतलाता हूँ - तुमने कैसे 84 विलादत लिए हैं। सरदार लोग भी समझते हैं एकोअंकार परमपिता परमात्मा बाप है। वह बरोबर इन्सान से हूरैन बनाने वाला है। तो क्यों नहीं हम भी हूरैन बनें। जो हूरैन बने होंगे वह एकदम चटक पड़ेंगे। हूर हूरैन मज़हब का तो एक भी अपने को समझते नहीं। और मज़हबों की हिस्ट्री निहायत छोटी है। कोई की 500 साल की, कोई की 1250 साल की। तुम्हारी हिस्ट्री है 5 हज़ार साल की। हूरैन मज़हब वाले ही जन्नत में आयेंगे। और मज़हब तो आते ही बाद में हैं। हूरैन मज़हब वाले भी अब और मज़हबों में कनवर्ट हो गये हैं ड्रामा के मुताबिक। फिर भी ऐसे कनवर्ट हो जायेंगे। फिर अपने-अपने मज़हब में लौटकर आयेंगे।

रब समझाते हैं - बच्चे, तुम तो दुनिया के मालिक थे। तुम भी समझते हो रब्बा जन्नत का क़याम करने वाला है तो हम क्यों नहीं जन्नत में होंगे, रब से हम वर्सा ज़रूर लेंगे - तो इससे साबित होता है यह हमारे मज़हब का है। जो नहीं होगा वह आयेगा ही नहीं। कहेंगे पराये मज़हब में क्यों जायें। तुम बच्चे जानते हो सुनहरे दौर नई दुनिया में हूरैनों को निहायत ख़ुशी थी, सोने के महल थे। सोमनाथ के मन्दिर में कितना सोना था। ऐसा कोई दूसरा मज़हब होता ही नहीं। सोमनाथ मन्दिर जैसा इतना भारी मन्दिर कोई होगा नहीं। निहायत हीरे-जवाहरात थे। बुद्ध वगैरह के कोई हीरे-जवाहरातों के महल थोड़े ही होंगे। तुम बच्चों को जिस रब ने इतना आला बनाया है उनकी तुमने कितनी इज़्ज़त रखी है! इज़्ज़त रखी जाती है ना। समझते हैं अच्छा आमाल करके गये हैं। अभी तुम जानते हो सबसे अच्छे आमाल नापाक से पाक बनाने वाले रब ही करके जाते हैं। तुम्हारी रूह कहती है सबसे आला से आला खिदमत बेहद के रब आकर करते हैं। हमको रंक से राव, बेगर से प्रिन्स बना देते हैं। जो हिन्दुस्तान को जन्नत बनाते हैं, उनकी अभी इज़्ज़त कोई नहीं रखते। तुम जानते हो आला ते आला मन्दिर गाया हुआ है जिसको लूट गये। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर को कभी कोई ने लूटा नहीं है। सोमनाथ के मन्दिर को लूटा है। अकीदत मन्दी की राह में भी निहायत दौलत मन्द होते हैं। राजाओं में भी नम्बरवार होते हैं ना। जो आला मर्तबे वाले होते हैं तो छोटे मर्तबे वाले उन्हों की इज़्ज़त रखते हैं। दरबार में भी नम्बरवार बैठते हैं। बाबा तो तजुर्बेकार है ना। यहाँ की दरबार है नापाक राजाओं की। पाक राजाओं की दरबार कैसी होगी। जबकि उन्हों के पास इतनी दौलत है तो उन्हों के घर भी इतने अच्छे होंगे। अभी तुम जानते हो रब हमको पढ़ा रहे हैं, जन्नत का क़याम करा रहे हैं। हम मलिक ए आज़म-मल्लिकाए आज़म जन्नत के बनते हैं फिर हम गिरते-गिरते अकीदत मन्द बनेंगे तो पहले-पहले रहमतुल्आल्मीन के पुजारी बनेंगे। जिसने जन्नत का मालिक बनाया उनकी ही बुतपरस्ती करेंगे। वह हमको निहायत दौलत मन्द बनाते हैं। अभी हिन्दुस्तान कितना ग़रीब है, जो ज़मीन 500 रूपये में ली थी उसकी वैल्यू आज 5 हज़ार से भी ज़्यादा हो गई है। यह सब हैं आर्टीफीशियल कीमत। वहाँ तो ज़मीन का क़ीमत होती नहीं, जिसको जितना चाहिए ले लेवे। ढेर की ढेर ज़मीन पड़ी होगी। मीठी नदियों पर तुम्हारे महल होंगे। इन्सान निहायत थोड़े होंगे। कुदरत गुलाम होगी। फल-फूल निहायत अच्छे मिलते रहते हैं। अभी तो कितनी मेहनत करनी पड़ती है तो भी अन्न नहीं मिलता। इन्सान निहायत भूख प्यास में मरते हैं। तो नग़मा सुनने से तुम्हारे रोमांच खड़े हो जाने चाहिए। रब को ग़रीब-निवाज़ कहते हैं। ग़रीब-निवाज़ का मतलब समझा ना! किसको दौलतमंद बनाते हैं? ज़रूर जहाँ आयेगा उनको दौलतमंद बनायेगा ना। तुम बच्चे जानते हो - हमको पावन से पतित बनने में 5 हज़ार वर्ष लगते हैं। अभी फिर फट से रब्बा नापाक से पाक बनाते हैं। आला ते आला बनाते हैं, एक सेकेण्ड में ज़िन्दगी ए निजात मिल जाती है। कहते हैं रब्बा हम आपके हैं। रब फ़रमाते बच्चे, तुम दुनिया के मालिक हो। बच्चा पैदा हुआ और वारिस बना। कितनी ख़ुशी होती है। बच्ची को देख चेहरा उतर जाता। यहाँ तो तमाम रूहें बच्चे हैं। अभी मालूम पड़ा है कि हम 5 हज़ार साल पहले जन्नत के मालिक थे। रब्बा ने ऐसा बनाया था। शब ए बारात भी मनाते हैं मगर यह नहीं जानते कि वह कब आया था। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की सल्तनत थी, यह भी कोई नहीं जानते। जयन्ती मनाते सिर्फ़ लिंग के बड़े-बड़े मन्दिर बनाते हैं। मखर वह कैसे आया, क्या आकर किया, कुछ भी नहीं जानते, इसको कहा जाता है ब्लाईन्ड फेथ, अन्धी अकीदत। उनको यह मालूम ही नहीं है कि हमारा मज़हब कौन सा है, कब क़ायम हुआ। और मज़हब वालों को मालूम है, बुद्ध कब आया, तिथि तारीख भी है। रहमतुल्आल्मीन की, आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम की कोई तिथि तारीख नहीं है। 5 हज़ार साल की बात को लाखों साल लिख दिया है। लाखों साल की बात किसको याद आ सकेगी? हिन्दुस्तान में हूर-हूरैन मज़हब कब था, यह समझते नहीं हैं। लाखों साल के हिसाब से तो हिन्दुस्तान की आबादी सबसे बड़ी होनी चाहिए। हिन्दुस्तान की ज़मीन भी सबसे बड़ी होनी चाहिए। लाखों साल में कितने इन्सान पैदा होते, बेशुमार इन्सान हो जायें। इतने तो हैं नहीं, और ही कमती हो गये हैं, यह तमाम बातें रब बैठ समझाते हैं। इन्सान सुनते हैं तो कहते हैं यह बातें तो कभी नहीं सुनी, न कोई सहीफों में पढ़ी। यह वन्डरफुल बातें हैं।

अभी तुम बच्चों की अक्ल में तमाम चक्कर की नॉलेज है। यह निहायत विलादतों के आख़िर के आख़िर में अब नापाक रूह है, जो सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ थी सो अब बुरी खस्लतों से आरास्ता है फिर सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनना है। तुम रूहो को अब तालीम मिल रही है।रूह कानों के ज़रिए सुनती है तो जिस्म झूलता है क्योंकि रूह सुनती है ना। बरोबर हम रूहें 84 विलादत लेती हैं। 84 विलादत में 84 माँ-बाप ज़रूर मिले होंगे। यह भी हिसाब है ना। अक्ल में आता है हम 84 विलादत लेते हैं फिर कम विलादत वाले भी होंगे। ऐसे थोड़े ही तमाम 84 विलादत लेंगे। रब बैठ समझाते हैं सहीफों में क्या-क्या लिख दिया है। तुम्हारे लिए तो फिर भी 84 विलादत कहते, मेरे लिए तो अनगिनत, बेशुमार विलादत कह देते हैं। कण-कण में पत्थर-भित्तर में ठोक दिया है। बस जिधर देखता हूँ तू ही तू। कृष्ण ही कृष्ण है। मथुरा, वृन्दावन में ऐसे कहते रहते हैं। कृष्ण ही सब तरफ मौजूद है। राधे पंथी वाले फिर कहेंगे राधे ही राधे। तुम भी राधे, हम भी राधे।

तो एक रब ही बरोबर ग़रीब-निवाज़ है। हिन्दुस्तान जो सबसे दौलतमंद था, अभी सबसे ग़रीब बना है इसलिए मुझे हिन्दुस्तान में ही आना पड़े। यह बना-बनाया ड्रामा है, इसमें ज़रा भी फ़र्क नहीं हो सकता। ड्रामा जो शूट हुआ वह हूबहू रिपीट होगा, इसमें पाई का भी फ़र्क नहीं हो सकता। ड्रामा का भी मालूम होना चाहिए। ड्रामा माना ड्रामा। वह होते हैं हद के ड्रामा, यह है बेहद का ड्रामा। इस बेहद के ड्रामा के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर को कोई नहीं जानते। तो ग़रीब-निवाज़ ग़ैर मुजस्सम अल्ल्लाह् ताला को ही मानेंगे, आदम अलैहिस्सलाम को नहीं मानेंगे। आदम अलैहिस्सलाम तो दौलत मन्द सुनहरे दौर का प्रिन्स बनते हैं। अल्लाह ताला को तो अपना जिस्म है नहीं। वह आकर तुम बच्चों को दौलत मन्द बनाते हैं, तुमको हक़ीक़ी इबादत की तालीम देते हैं। तालीम से बैरिस्टर वगैरह बनकर फिर कमाई करते हैं। रब भी तुमको अभी पढ़ाते हैं। तुम मुस्तकबिल में हज़रात से अफ़ज़ल हज़रात बनते हो। तुम्हारी विलादत तो होगी ना। ऐसे तो नहीं जन्नत कोई समुन्दर से निकल आयेगी। आदम अलैहिस्सलाम ने भी विलादत लिया ना। जहन्नुम वगैरह तो उस वक़्त थी नहीं। आदम अलैहिस्सलाम का कितना नाम गाया जाता है। उनके बाप का गायन ही नहीं। उनका बाप कहाँ है? ज़रूर आदम अलैहिस्सलाम किसी का बच्चा होगा ना। आदम अलैहिस्सलाम जब विलादत लेते हैं तब थोड़े निहायत नापाक भी रहते हैं। जब वह बिल्कुल ख़त्म हो जाते हैं तब वह गद्दी पर बैठते हैं। अपनी सल्तनत ले लेते हैं, तब से ही उनका संवत शुरू होता है। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम से ही संवत शुरू होता है। तुम पूरा हिसाब लिखते हो। इनकी सल्तनत इतना वक्त, फिर इनकी इतना वक्त, तो इन्सान समझेंगे - यह चक्कर की उम्र बड़ी हो नहीं सकती। 5 हज़ार साल का पूरा हिसाब है। तुम बच्चों की अक्ल में आती है ना। हम कल जन्नत के मालिक थे। रब ने बनायी थी तब तो उनकी हम शब ए बारात मना रहे हैं। तुम सबको जानते हो। क्राइस्ट, गुरूनानक वगैरह फिर कब आयेंगे, यह तुमको नॉलेज है। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी हूबहू रिपीट होती है। यह तालीम कितनी आसान है। तुम जन्नत को जानते हो, बरोबर हिन्दुस्तान जन्नत था। हिन्दुस्तान ला फ़ानी खण्ड है। हिन्दुस्तान जैसी अज़मत और कोई की हो नहीं सकती। सबको नापाक से पाक बनाने वाला एक ही रब है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) ड्रामा के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का इल्म अक्ल में रखते हुए तमाम फिकर छोड़ देनी हैं। एक सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनने की फ़िक्र रखनी है।

2) ग़रीब निवाज़ रब्बा हिन्दुस्तान को ग़रीब से दौलत मन्द बनाने आया है, उनका पूरा-पूरा मददगार बनना है। अपनी नई दुनिया को याद कर हमेशा ख़ुशी में रहना है।

बरक़ात:-
एक साथ तीन रूपों से खिदमत करने वाले मास्टर तीन मुजस्सम बनो।

जैसे रब हमेशा तीन स्वरूपों से खिदमत पर हाज़िर हैं बाप, उस्ताद और हक़ीक़ी हादी, ऐसे आप बच्चे भी हर सेकण्ड ज़हन, अल्फ़ाज़ और आमाल तीनों के ज़रिए साथ-साथ खिदमत करो तब कहेंगे मास्टर तीन मुजस्सम। मास्टर तीन मुजस्सम बन जो हर सेकण्ड तीनों रूपों से खिदमत पर हाज़िर रहते हैं वही जहान फ़लाह कर सकेंगे क्योंकि इतने बड़े जहान का फ़लाह करने के लिए जब एक ही वक़्त पर तीनों रूप से खिदमत हो तब यह खिदमत का काम ख़त्म हो।

स्लोगन:-
आला मोमिन वह है जो अपनी कुव्वत से बुरे को अच्छे में बदल दे।

आमीन