22-11-2020 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 21-01-87


सल्तनत ए नफ्स हक़दार ही सल्तनत ए जहान हक़दार


आज खालिक ए क़िस्मत रब अपने तमाम अफ़ज़ल क़िस्मत नशीन बच्चों को देख रहे हैं। रब उल हक़ के आगे अब भी सिर्फ़ यह तनज़ीम नहीं है मगर चारों ओर के क़िस्मत नशीन बच्चे सामने हैं। चाहे वतन-विलायत के किसी भी कोने में हैं मगर बेहद का रब बेहद बच्चों को देख रहे हैं। यह जिस्मानी वतन के अन्दर मुकाम की हद आ जाती है, मगर बेहद रब के नज़र की खिल्क़त बेहद है। रब की नज़र में तमाम मोमिन रूहों की खिल्क़त समाई हुई है। तो नज़र की खिल्क़त में तमाम सामने है। तमाम क़िस्मत नशीन बच्चों को खालिक ए क़िस्मत अल्ल्लाह् ताला देख-देख ख़ुशगवार होते हैं। जैसे बच्चे रब को देख खुशगवार होते हैं, रब भी तमाम बच्चों को देख खुशगवार होते हैं। बेहद के रब को बच्चों को देख रूहानी नशा और फ़खुर है कि एक-एक बच्चा इस दुनिया के आगे ख़ास रूहों की लिस्ट में है! चाहे 16,000 की माला का लास्ट मणका भी है, फिर भी, रब के आगे आने से, रब का बनने से दुनिया के आगे ख़ास रूह है इसलिए चाहे और कुछ भी इल्म की तफ़्सील को जान नहीं सकते मगर एक अल्फ़ाज़ बाबा' दिल से माना और दिल से औरों को सुनाया तो ख़ास रूह बन गये, दुनिया के आगे अज़ीम रूह बन गये, दुनिया के आगे अज़ीम रूह के खुद के रूप में गायन-याफ्ता बन गये। इतनी अफ़ज़ल और आसान क़िस्मत है, समझते हो? क्योंकि बाबा अल्फ़ाज़ है चाबी'। किसकी? तमाम खज़ानों की, अफ़ज़ल क़िस्मत की। चाबी मिल गई तो क़िस्मत और खज़ाना ज़रूर हासिल होता ही है। तो तमाम मातायें और पनजतन चाबी हासिल करने के हक़दार बने हो? चाबी लगाने भी आती है या कभी लगती नहीं है? चाबी लगाने का तरीक़ा है - दिल से जानना और मानना। सिर्फ़ मुंह से कहा तो चाबी होते भी लगेगी नहीं। दिल से कहा तो ख़ज़ाने हमेशा हाज़िर हैं। बेशुमार ख़ज़ाने हैं ना। बेशुमार ख़ज़ाने होने के सबब जितने भी बच्चे हैं तमाम हक़दार हैं। खुले ख़ज़ाने हैं, भरपूर ख़ज़ाने हैं। ऐसे नहीं है कि जो पीछे आये हैं, तो ख़ज़ाने ख़त्म हो गये हों। जितने भी अब तक आये हो यानि कि रब के बने हो और मुस्तकबिल में भी जितने बनने वाले हैं, उन सबसे ख़ज़ाने बेहिसाब गुणा ज़्यादा हैं इसलिए रब उल हक़ हर बच्चे को गोल्डन चांस देते हैं कि जितना जिसको खज़ाना लेना है, वह खुली दिल से ले लो। दाता के पास कमी नहीं है, लेने वाले के हिम्मत और तजवीज़ पर बुनियाद है। ऐसा कोई बाप तमाम चक्कर में नहीं है जो इतने बच्चे हों और हर एक क़िस्मत नशीन हो! इसलिए सुनाया कि रूहानी रब उल हक़ को रूहानी नशा है।
तमाम की मधुबन में आने की, मिलने की आस पूरी हुई। अकीदत मन्दी की राह के सफ़र से फिर भी मधुबन में आराम से बैठने की, रहने की जगह तो मिली है ना। मन्दिरों में तो खड़े-खड़े सिर्फ़ दीदार करते हैं। यहाँ आराम से बैठे तो हो ना। वहाँ तो भागो-भागो,' चलो-चलो' कहते हैं और यहाँ आराम से बैठो, आराम से, याद की ख़ुशी से मौज मनाओ। मिलन के दौर में ख़ुशी मनाने के लिए आये हो। तो हर वक़्त चलते-फिरते, खाते-पीते ख़ुशी का खज़ाना जमा किया? कितना जमा किया है? इतना किया जो 21 विलादत आराम से खाते रहो? मधुबन ख़ास तमाम खज़ाने जमा करने का मुकाम है क्योंकि यहाँ एक रब दूसरा न कोई' - यह जिस्मानी रूप में भी एहसास करते हो। वहाँ अक्ल के ज़रिये एहसास करते हो मगर यहाँ ज़ाहिर जिस्मानी ज़िन्दगी में भी सिवाए रब और मोमिन फैमिली के और कोई नज़र आता है क्या? एक ही लगन, एक ही बातें, एक ही फैमिली के और एकरस सूरत ए हाल, और कोई रस है ही नहीं। पढ़ना और पढ़ाई के ज़रिए कुव्वत नशीन बनना, मधुबन में यही काम है ना। कितने क्लास करते हो? तो यहाँ ख़ास जमा करने का अस्बाब मिलता है इसलिए तमाम भाग-भागकर पहुँच गये हैं। रब उल हक़ तमाम बच्चों को ख़ास यही याद दिलाते हैं कि हमेशा नफ़्स ए सल्तनत के हक़दार सूरत ए हाल में आगे बढ़ते चलो। नफ्स ए सल्तनत - यही निशानी है जहान ए सल्तनत बनने की।
कई बच्चे रूहरिहान करते हुए रब से पूछते हैं कि हम मुस्तकबिल में क्या बनेंगे, बादशाह बनेंगे या अवाम बनेंगे?' रब उल हक़ बच्चों को रेसपान्ड करते हैं कि अपने आपको एक दिन भी चेक करो तो मालूम पड़ जायेगा कि मैं बादशाह बनूँगा और दौलत मन्द बनूँगा या अवाम बनूँगा। पहले वक़्त ए शफ़ा से अपने अहम तीन करोबार के हक़दार, अपने मददगार, साथियों को चेक करो। वह कौन? 1- ज़हन-बोल-आमाल यानि कि इरादे की कुव्वत। 2- अक्ल यानि कि फैसला करने की कुव्वत। 3- पिछली और मौजूदा अफ़ज़ल आदत। यह तीनों ख़ास कारोबारी हैं। जैसे आजकल के ज़माने में बादशाह के साथ वज़ीर ए आज़म और ख़ास वज़ीर होते हैं, उन्हीं की मदद से सल्तनत कारोबार चलती है। सुनहरे दौर में वज़ीर नहीं होंगे मगर नज़दीक के रिश्तेदार, साथी होंगे। किसी भी रूप में, साथी समझो या वज़ीर समझो। मगर यह चेक करो - यह तीनों खुद के हक़ से चलते हैं? इन तीनों पर खुद की सल्तनत है या इन्हों के हुकूक से आप चलते हो?ज़हन आपको चलाता है या आप ज़हन को चलाते हैं? जो चाहो, जब चाहो वैसा ही इरादा कर सकते हो? जहाँ अक्ल लगाने चाहो, वहाँ लगा सकते हो या अक्ल आप बादशाह को भटकाती है? आदत आपके बस हैं या आप आदतों के बस हो? सल्तनत यानि कि हुकूक। सल्तनत-हक़दार जिस कुव्वत को जिस वक़्त जो आर्डर करे, वह उसी तरिक़े मुताबिक काम करते या आप कहो एक बात, वह करें दूसरी बात? क्योंकि मुसलसल इबादत नशीन यानि कि खुद की सल्तनत के हक़दार बनने का ख़ास अस्बाब ही ज़हन और अक्ल है। आयत ही दिल से मुझे याद करो की है। इबादत को अक्ल का राब्ता कहते हैं। तो अगर यह ख़ास बुनियादी वुजूद अपने हक़ में नहीं हैं या कभी हैं, कभी नहीं है; अभी-अभी हैं, अभी-अभी नहीं है; तीनों में से एक भी कम हुकूक में है तो इससे ही चेक करो कि हम बादशाह बनेंगे या अवाम बनेंगे? निहायत अरसे के सल्तनत के हक़दार बनने की आदत निहायत अरसे के मुस्तकबिल सल्तनत के हक़दार बनायेंगी। अगर कभी हक़दार, कभी बस में हो जाते हो तो आधा चक्कर यानि कि पूरी सल्तनत-क़िस्मत का हक़ हासिल नहीं कर सकेंगे। आधा वक़्त के बाद अदना जन्नत के बादशाह बन सकते हो, तमाम वक़्त सल्तनत के हक़दार यानि कि सल्तनत करने वाले रॉयल फैमिली के नज़दीक रिश्ते में नहीं रह सकते। अगर बस में बार-बार होते हो तो आदत के हक़दार बनने के नहीं मगर सल्तनत हकदारों की सल्तनत में रहने वाले हैं। वह कौन हो गये? वह हुई अवाम। तो समझा, बादशाह कौन बनेगा, अवाम कौन बनेगा? अपने ही आइने में अपनी तक़दीर की सूरत को देखो। यह इल्म यानि कि नालेज आईना है। तो सबके पास आईना है ना। तो अपनी सूरत देख सकते हो ना। अभी निहायत वक़्त के हक़दार बनने की प्रेक्टिस करो। ऐसे नहीं कि आख़िर में तो बन ही जायेंगे। अगर आख़िर में बनेंगे तो आख़िर की एक विलादत थोड़ी-सी सल्तनत कर लेंगे। मगर यह भी याद रखना कि अगर निहायत वक़्त का अब से प्रेक्टिस नहीं होगी और शुरू से प्रेक्टिस नशीन नहीं बने हो, आग़ाज़ से अब तक यह ख़ास काम करने वाले आपको अपने हक़ में चलाते हैं और डगमग सूरत ए हाल करते रहते हैं यानि कि धोखा देते रहते हैं, दु:ख की लहर का एहसास कराते रहते हैं तो आख़िर में भी धोखा मिल जायेगा। धोखा यानि कि दु:ख की लहर ज़रूर आयेगी। तो आख़िर में भी पछतावे के दु:ख की लहर आयेगी इसलिए रब उल हक़ तमाम बच्चों को फिर से याद दिलाते हैं कि बादशाह बनो और अपने ख़ास मददगार मुलाज़िम और सल्तनत कारोबारी साथियों को अपने हक़ से चलाओ। समझा?
रब उल हक़ यही देखते हैं कि कौन-कौन कितने खुद की सल्तनत के हक़दार बने हैं? अच्छा। तो सब क्या बनने चाहते हो? बादशाह बनने चाहते हो? तो अभी खुद की सल्तनत के हक़दार बने हो या यही कहते हो बन रहे हैं, बन तो जायेंगे? गें-गें' नहीं करना। जायेंगे', तो रब भी कहेंगे - अच्छा, सल्तनत-क़िस्मत देने को भी देख लेंगे। सुनाया ना - निहायत वक़्त की आदत अभी से चाहिए। वैसे तो निहायत अरसा नहीं है, थोड़ा-अरसा है। मगर फिर भी इतने वक़्त की भी प्रेक्टिस नहीं होगी तो फिर लास्ट वक़्त यह उल्हना नहीं देना - हमने तो समझा था, लास्ट में ही हो जायेंगे इसलिए कहा गया है - कब नहीं, अब। कब हो जायेगा नहीं, अब होना ही है। बनना ही है। अपने ऊपर सल्तनत करो, अपने साथियों के ऊपर सल्तनत करना नहीं शुरू करना। जिसकी खुद पर सल्तनत है, उसके आगे अभी भी प्यार के सबब तमाम साथी भी चाहे जिस्मानी, चाहे रूहानी तमाम जी हजूर', हाँ-जी' कहते हुए साथी बनकर के रहते हैं, प्यारे और साथी बन हाँ-जी' का सबक़ प्रैक्टिकल में दिखाते हैं। जैसे अवाम बादशाह की मददगार होती है, प्यारी होती है, ऐसे आपकी यह तमाम आज़ाएं, ख़ास कुव्वतें हमेशा आपकी प्यारी, मददगार रहेंगी और इसका असर जिस्मानी में आपकी खिदमत के साथियों और जिस्मानी रिश्ते दारों, साथियों में पड़ेगा। हूरैन फैमिली में हक़दार बन आर्डर चलाना, यह नहीं चल सकता। खुद अपने आज़ाओं को आर्डर में रखो तो अपने आप आपके आर्डर करने के पहले ही तमाम साथी आपके काम में मददगार बनेंगे। खुद मददगार बनेंगे, आर्डर करने की ज़रूरत नहीं। खुद अपने मददगार की आॅफर करेंगे क्योंकि आप खुद की सल्तनत के हक़दार हैं। जैसे बादशाह यानि कि दाता, तो दाता को कहना नहीं पड़ता यानि कि मांगना नहीं पड़ता। तो ऐसे खुद की सल्तनत के हक़दार बनो। अच्छा। यह मेला भी ड्रामा में नूँध था। वाह ड्रामा' कह रहे हैं ना। दूसरे लोग कभी हाय ड्रामा' कहेंगे, कभी वाह ड्रामा' और आप हमेशा क्या कहते हो? वाह ड्रामा! वाह! जब दस्तयाबी होती हैं ना, तो दस्तयाबी के आगे कोई मुश्किल नहीं लगता है। तो ऐसे ही, जब इतने अफ़ज़ल फैमिली से मिलने की दस्तयाबी हो रही है तो कोई मुश्किल, मुश्किल नहीं लगेगा। मुश्किल लगता है? खाने पर ठहरना पड़ता है। खाओ तो भी अल्ल्लाह् की फ़ज़ीलत गाओ और क्यू में ठहरो तो भी अल्ल्लाह् की फ़ज़ीलत गाओ। यही काम करना है ना। यह भी रिहर्सल हो रही है। अभी तो कुछ भी नहीं है। अभी तो और इज़ाफ़ा होगा ना। ऐसे अपने को मोल्ड करने की आदत डालो, जैसा वक़्त वैसे अपने आपको चला सकें। तो पट (ज़मीन) में सोने की भी आदत पड़ गई ना। ऐसे तो नहीं-खटिया नहीं मिली तो नींद नहीं आई? टेन्ट में भी रहने की आदत पड़ गई ना। अच्छा लगा? ठण्डी तो नहीं लगती? अभी सारे आबू में टेन्ट लगायें? टेन्ट में सोना अच्छा लगा या कमरा चाहिए? याद है, पहले-पहले जब पाकिस्तान में थे तो अज़ीम हस्तियों को ही पट में सुलाते थे? जो नामीग्रामी अज़ीम हस्ती होते थे, उन्हों को हाल में पट में टिफुटी (तीन फुट) देकर सुलाते थे। और जब मोमिन फैमिली का इज़ाफा हुआ तो भी कहाँ से शुरूआत की? टेन्ट से ही शुरू की ना। पहले-पहले जो निकले, वह भी टेन्ट में ही रहे, टेन्ट में रहने वाले सेन्ट (अज़ीम रूह) हो गये। जिस्मानी पार्ट होते भी टेन्ट में ही रहे। तो आप लोग भी एहसास करेंगे ना। तो तमाम हर तरह से ख़ुश हैं? अच्छा, फिर और 10,000 मंगा के टेन्ट देंगे, बन्दोबस्त करेंगे। तमाम नहाने के बंदोबस्त का सोचते हो, वह भी हो जायेगा। याद है, जब यह हाल बना था तो सबने क्या कहा था? इतने नहाने के मुकाम क्या करेंगे? इसी मकसद से यह बनाया गया, अभी कम हो गया ना। जितना बनायेंगे उतना कम तो होना ही है क्योंकि आखिर तो बेहद में ही जाना है। अच्छा।
सब तरफ़ के बच्चे पहुँच गये हैं। तो यह भी बेहद के हाल का सिंगार हो गया है। नीचे भी बैठे हैं। (अलग-अलग) मुकामों पर नूरानी कलेमात सुन रहे हैं) यह इज़ाफ़ा होना भी तो खुशनसीबी की निशानी है। बढ़ोतरी तो हुई मगर तरीक़त से चलना। ऐसे नहीं, यहाँ मधुबन में तो आ गये, रब्बा को भी देखा, मधुबन भी देखा, अभी जैसे चाहें वैसे चलें। ऐसे नहीं करना क्योंकि कई बच्चे ऐसे करते हैं-जब तक मधुबन में आने को नहीं मिलता है, तब तक पक्के रहते हैं, फिर जब मधुबन देख लिया तो थोड़े अलबेले हो जाते हैं। तो अलबेले नहीं बनना। मोमिन यानि कि मोमिन ज़िन्दगी है, तो ज़िन्दगी तो हमेशा जब तक है, तब तक है। ज़िन्दगी बनाई है ना। ज़िन्दगी बनाई है या थोड़े वक़्त के लिए मोमिन बनें हैं? हमेशा अपनी मोमिन ज़िन्दगी की खासियत साथ रखना क्योंकि इसी खासियतों से मौजूदा भी अफ़ज़ल है और मुस्तकबिल भी अफ़ज़ल है। अच्छा। बाक़ी क्या रहा? टोली। (बरक़ात) बरक़ात तो बरक़ाती के बच्चे ही बन गये। जो हैं ही बरक़ाती के बच्चे, उन्हों को हर कदम में बरक़ात देने वाले से से बरक़ात अपने आप ही मिलती रहती है। बरक़ात ही आपकी परवरिश है। बरक़ातों की परवरिश से ही पल रहे हैं। नहीं तो सोचो, इतनी अफ़ज़ल दस्तयाबी और मेहनत क्या की। बिना मेहनत के जो दस्तयाबी होती है, उसको ही बरक़ात कहा जाता है। तो मेहनत क्या की और दस्तयाबी कितनी अफ़ज़ल! विलादत-विलादत दस्तयाबी के हक़दार बन गये। तो बरक़ात हर कदम में बरक़ात देने वाले की मिल रही है और हमेशा ही मिलती रहेगी। नज़र से, बोल से, रिश्ते से बरक़ात ही बरक़ात है। अच्छा।
अभी तो गोल्डन जुबली मनाने की तैयारी कर रहे हो। गोल्डन जुबली यानि कि हमेशा गोल्डन सूरत ए हाल में वाक़ेअ रहने की जुबली मना रहे हो। हमेशा रीयल गोल्ड, ज़रा भी अलाए (खाद) मिक्स नहीं। इसको कहते हैं गोल्डन जुबली। तो दुनिया के आगे सोने की सूरत ए हाल में वाकेअ होने वाले सच्चा सोना ज़ाहिर हों, इसके लिए यह तमाम खिदमत के अस्बाब बना रहे हैं क्योंकि आपकी गोल्डन सूरत ए हाल गोल्डन एज को लायेगी, गोल्डन दुनिया को लायेगी, जिसकी खुवाहिशात सबको है कि अभी कुछ दुनिया बदलनी चाहिए। तो खुद की तब्दीली से दुनिया की तब्दीली करने वाली ख़ास रूहें हो। आप सबको देख रूहों को यह यक़ीन हो, नेक आस हों कि सचमुच गोल्डन दुनिया आई कि आई! सैम्पल को देखकर के यक़ीन होता है ना-हाँ, अच्छी चीज़ है। तो सोने की दुनिया के सैम्पल आप हो। सोने की सुरत ए हाल वाले हो। तो आप सैम्पल को देख उन्हों को यक़ीन हो कि हाँ, जब सैम्पल तैयार है तो ज़रूर ऐसी ही दुनिया आयी कि आयी। ऐसी खिदमत गोल्डन जुबली में करेंगे ना। ना अम्मीद को उम्मींद देने वाले बनना। अच्छा।
तमाम नफ़्स ए सल्तनत हक़दार, तमाम निहायत अरसे के हक़दार दस्तयाब करने की तजवीज़ नशीन रूहों को, तमाम दुनिया की ख़ास रूहों को, तमाम बरक़ात देने वाले की बरक़ात से पलने वाली अफ़ज़ल रूहों को रब उल हक़ का यादप्यार और सलाम।

बरक़ात:-
भटकती हुई रूहों को हक़ीक़ी मंजिल दिखाने वाले ज़िन्दा लाइट-माइट हाउस बनों

किसी भी भटकती हुई रूह को हक़ीक़ी मंजिल दिखाने के लिए ज़िन्दा लाइट-माइट हाउस बनो। इसके लिए दो बातें तवज्जों पर रहें: 1- हर रूह की चाहना को परखना, जैसे काबिल डाॅक्टर उसे कहा जाता है जो नब्ज को जानता है, ऐसे परखने की कुव्वत को हमेशा यूज़ करना। 2-हमेशा अपने पास तमाम खज़ानों का एहसास क़ायम रखना। हमेशा यह मकसद रखना कि सुनाना नहीं है मगर तमाम रिश्तों का, तमाम कुव्वतों का एहसास कराना है।

स्लोगन:-
दूसरों की करेक्शन करने के बजाए एक रब से दुरूस्त कनेक्शन रखो।

आमीन