23-11-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
तुम रूहानी हवासी बनो तो तमाम बीमारियां ख़त्म हो जायेंगी और तुम डबल सिरताज दुनिया के मालिक बन जायेंगे

सवाल:-
रब के सामने किन बच्चों को बैठना चाहिए?

जवाब:-
जिन्हें इल्म डांस करना आता है। इल्म डांस करने वाले बच्चे जब रब के सामने होते हैं तो रब्बा के नूरानी कलेमात भी ऐसे चलते है। अगर कोई सामने बैठ इधर-उधर देखते तो रब्बा समझते यह बच्चा कुछ भी समझता नहीं है। रब्बा मोमिना को भी कहेंगे तुमने यह किसको लाया है, जो रब्बा के सामने भी उबासी देते हैं। बच्चों को तो ऐसा रब मिला है, जो ख़ुशी में डांस करनी चाहिए।

नग़मा:-
दूरदेश का रहने वाला.......

आमीन।
मीठे-मीठे बच्चों ने नग़मा सुना। रूहानी बच्चे समझते हैं कि रूहानी रब्बा जिसको हम याद करते आये हैं, दु:ख दूर करने वाले, ख़ुशी देने वाले और तुम मात-पिता..... फिर से आकर हमको खुशियां बेशुमार दो, हम ग़मज़दा हैं, यह तमाम दुनिया ग़मज़दा है क्योंकि यह है इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर की पुरानी दुनिया। पुरानी दुनिया या पुराने घर में इतनी ख़ुशी नहीं हो सकती, जितनी नई दुनिया, नये घर में होती है। तुम बच्चे समझते हो हम दुनिया के मालिक अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन के थे, हमने ही 84 विलादत लिए हैं। रब फ़रमाते हैं बच्चों तुम अपनी विलादतों को नहीं जानते हो कि कितनी विलादत पार्ट बजाया है। इन्सान समझते हैं 84 लाख दोबारा विलादत हैं। एक-एक दोबारा विलादत कितने साल की होती है। 84 लाख के हिसाब से तो ख़िल्क़त का चक्कर निहायत बड़ा हो जाए। तुम बच्चे जानते हो हम रूहों का रब हमको पढ़ाने आये हैं। हम भी दूरदेश के रहने वाले हैं। हम कोई यहाँ के रहने वाले नहीं हैं। यहाँ हम पार्ट बजाने आये हैं। रब को भी हम आलम ए अरवाह में याद करते हैं। अभी इस पराये वतन में आये हैं। रहमतुल्आल्मीन को बाबा कहेंगे। शैतान को बाबा नहीं कहेंगे। अल्ल्लाह् ताला को बाबा कहेंगे। बाप की अज़मत अलग है, 5 ख़बासतों की कोई अज़मत करेंगे क्या! जिस्मानी हवास तो निहायत बड़ी बीमारी है। हम रूहानी हवासी बनेंगे तो कोई बीमारी नहीं रहेगी और हम दुनिया के मालिक बन जायेंगे। यह बातें तुम्हारी अक्ल में हैं। तुम जानते हो रहमतुल्आल्मीन हम रूहों को तालीम देते हैं। जो भी और इतने इज्तेमाअ वगैरह हैं, कहाँ भी ऐसे नहीं समझेंगे कि हमको रब्बा आकर हक़ीक़ी इबादत सिखलायेंगे। बादशाहत के लिए पढ़ायेंगे। बादशाह बनाने वाला तो बादशाह ही चाहिए ना। सर्जन पढ़ाकर अपने जैसा सर्जन बनायेंगे। अच्छा, डबल सिरताज बनाने वाला कहाँ से आयेगा, जो हमको डबल सिरताज बनाये इसलिए इन्सानों ने फिर डबल सिरताज आदम अलैहिस्सलाम को रख दिया है। मगर आदम अलैहिस्सलाम कैसे पढ़ायेंगे! ज़रूर रब मिलन पर आये होंगे, आकर बादशाहत क़ायम की होगी। रब कैसे आते हैं, यह तुम्हारे सिवाए और कोई की अक्ल में नहीं होगा। दूरदेश से रब आकर हमको तालीम देते हैं, हक़ीक़ी इबादत सिखलाते हैं। रब फ़रमाते हैं मुझे कोई लाइट और जवाहिरात से जड़ा ताज है नहीं। वह कभी बादशाहत पाते नहीं। डबल सिरताज बनते नहीं, औरों को बनाते हैं। रब फ़रमाते हैं हम अगर बादशाह बनता तो फिर रंक भी बनना पड़ता। हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन बादशाह थे, अब रंक हैं। तुम भी डबल सिरताज बनते हो तो तुमको बनाने वाला भी डबल सिरताज होना चाहिए, जो फिर तुम्हारा राब्ता भी क़ायम हो। जो जैसा होगा ऐसा अपने जैसा बनायेगा। राहिब कोशिश कर राहिब बनायेंगे। तुम घरेलू राब्ते वाले, वह राहिब तो फिर तुम फालोअर्स तो ठहरे नहीं। कहते हैं फलाना शिवानन्द का फालोअर है। मगर वह राहिब माथा मुड़ाने वाले हैं, तुम तो फालो करते नहीं! तो तुम फिर फालोअर क्यों कहते हो! फालोअर तो वह जो झट कपड़ा उतार कफनी पहन लें। तुम तो घरेलू राब्ते में ख़बासतों वगैरह में रहते हो फिर शिवानन्द का फालोअर्स कैसे कहलाते हो।हादी का तो काम है ख़ैर निजात करना। हादी ऐसे तो नहीं कहेंगे फलाने को याद करो। फिर तो खुद हादी नहीं हुआ। आलम ए निजात में जाने लिए भी तरीक़ा चाहिए।
तुम बच्चों को समझाया जाता है, तुम्हारा घर है दारूल निजात या ग़ैर मुजस्सम दुनिया। रूह को कहा जाता है ग़ैर मुजस्सम सोल। जिस्म है 5 अनासरों का बना हुआ। रूहें कहाँ से आती हैं? दारूल निजात ग़ैर मुजस्सम दुनिया से। वहाँ निहायत रूहें रहती हैं। उनको कहेंगे स्वीट साइलेन्स होम। वहाँ रूहें ग़म-ख़ुशी से न्यारी रहती हैं। यह अच्छी तरह पक्का करना है। हम हैं स्वीट साइलेन्स होम के रहने वाले। यहाँ यह नाटकशाला है, जहाँ हम पार्ट बजाने आते हैं। इस नाटकशाला में सूरज, चांद, स्टार्स वगैरह बत्तियाँ हैं। कोई गिनती कर न सके कि यह नाटकशाला कितने माइल्स की है। एरोप्लेन में ऊपर जाते हैं मगर उसमें पेट्रोल वगैरह इतना नहीं डाल सकते जो जाकर फिर लौट भी आयें। इतना दूर नहीं जा सकते। वह समझते हैं इतने माइल्स तक है, लौटेंगे नहीं तो गिर पड़ेंगे। समुन्दर का और आसमान अनासर का अाख़िर पा नहीं सकते। अभी रब तुमको अपना आख़िर देते हैं। रूह इस आसमान अनासर से पार चली जाती है। कितना बड़ा रॉकेट है। तुम रूहें जब पाकीज़ा बन जायेंगी तो फिर रॉकेट मिसल तुम उड़ने लग पड़ेंगे। कितना छोटा रॉकेट है। सूरज-चांद से भी उस पार बुनियादीवतन में चले जायेंगे। सूरज-चांद का आख़िर पाने की निहायत कोशिश करते हैं। दूर के स्टॉर्स वगैरह कितने छोटे देखने में आते हैं। हैं तो निहायत बड़े। जैसे तुम पतंग उड़ाते हो तो ऊपर में कितनी छोटी-छोटी दिखाई पड़ती है। रब फ़रमाते हैं तुम्हारी रूह तो सबसे तीखी है। सेकण्ड में एक जिस्म से निकल दूसरे हमल में जाए दाखिली करती है। किसका आमालों का हिसाब-किताब लण्डन में है तो सेकण्ड में लण्डन जाकर विलादत लेगी। सेकण्ड में ज़िन्दगी ए निजात भी गाई हुई है ना। बच्चा हमल से निकला और मालिक बना, वारिस हो ही गया। तुम बच्चों ने भी रब को जाना गोया दुनिया के मालिक बन गये। बेहद का रब ही आकर तुमको दुनिया का मालिक बनाते हैं। स्कूल में बैरिस्टरी पढ़ते तो बैरिस्टर बनेंगे। यहाँ तुम डबल सिरताज बनने के लिए पढ़ते हो। अगर पास होंगे तो डबल सिरताज ज़रूर बनेंगे। फिर भी जन्नत में तो ज़रूर आयेंगे। तुम जानते हो रब तो हमेशा वहाँ ही रहते हैं। ओ गॉड फादर कहेंगे तो भी नज़र ज़रूर ऊपर जायेगी। गॉड फादर है तो ज़रूर कुछ तो उनका पार्ट होगा ना। अभी पार्ट बजा रहे हैं। उनको बागवान भी कहते हैं। कॉटों से आकर फूल बनाते हैं। तो तुम बच्चों को ख़ुशी होनी चाहिए। रब्बा आया हुआ है इस देस पराये। दूर देस का रहने वाला आये देस पराये। दूर देस का रहने वाला तो रब ही है। और रूहें भी वहाँ रहती हैं। यहाँ फिर पार्ट बजाने आती हैं। देस पराये - यह मतलब कोई नहीं जानते हैं। इन्सान तो अकीदत मन्दी की राह में जो सुनते हैं वह हक़-हक़ कहते रहते हैं। तुम बच्चों को रब कितनी अच्छी तरह समझाते हैं। रूह इमप्योर होने से उड़ नहीं सकती है। प्योर बनने बिगर वापिस जा नहीं सकती। नापाक से पाक बनाने वाला एक ही रब को कहा जाता है। उनको आना भी है मिलन पर। तुमको कितनी ख़ुशी होनी चाहिए। रब्बा हमको डबल सिरताज बना रहे हैं, इससे आला दर्जा कोई का होता नहीं। रब फ़रमाते हैं मैं डबल सिरताज बनता नहीं हूँ। मैं आता ही हूँ एक बार। पराये देस, पराये जिस्म में। यह दादा भी कहते हैं मैं रहमतुल्आल्मीन थोड़े ही हूँ। मुझे तो लखीराज कहते थे फिर सरेन्डर हुआ तो रब्बा ने आदम अलैहिस्सलाम नाम रखा। इसमें दाखिली कर इनको कहा कि तुम अपने विलादतों को नहीं जानते हो। 84 विलादतों का भी हिसाब होना चाहिए ना। वो लोग तो 84 लाख कह देते हैं जो बिल्कुल ही इम्पासिबुल है। 84 लाख विलादतों का राज़ समझाने में ही सैकड़ों साल लग जायें। याद भी पड़ न सके। 84 लाख योनियों में तो चरिन्दे-परिन्दे वगैरह तमाम आ जाते हैं। इन्सान की ही विलादत नायाब गायी जाती है। जानवर थोड़े ही नॉलेज समझ सकेंगे। तुमको रब आकर नॉलेज पढ़ाते हैं। खुद फ़रमाते हैं मैं आता हूँ शैतानी सल्तनत में। इबलीस ने तुमको कितना पत्थर अक्ल बना दिया है। अब फिर रब तुमको पारस अक्ल बनाते हैं। उतरते फ़न में तुम पत्थर अक्ल बन गये। अब फिर रब चढ़ते फ़न में ले जाते हैं, नम्बरवार तो होते हैं ना। हर एक को अपनी तजवीज़ से समझना है। अहम बात है याद की। रात को जब सोते हो तो भी यह ख्याल करो। रब्बा हम आपकी याद में सो जाते हैं। गोया हम इस जिस्म को छोड़ देते हैं। आपके पास आ जाते हैं। ऐसे रब्बा को याद करते-करते सो जाओ तो फिर देखो कितना मज़ा आता है। हो सकता है दीदार ए जलवा भी हो जाए। मगर इस दीदार ए जलवा वगैरह में ख़ुश नहीं होना है। रब्बा हम तो आपको ही याद करते हैं। आपके पास आने चाहते हैं। रब को तुम याद करते-करते बड़े आराम से चले जायेंगे। हो सकता है मलक़ूतवतन में भी चले जाओ। बुनियादी वतन में तो जा नहीं सकेंगे। अभी वापिस जाने का वक्त कहाँ आया है। हाँ, दीदार ए जलवा हुआ बिन्दी का फिर छोटी-छोटी रूहों का दरख़्त दिखाई पड़ेगा। जैसे तुमको फ़िरदौस का दीदार ए जलवा होता है ना। ऐसे नहीं, दीदार ए जलवा हुआ तो तुम फ़िरदौस में चले जायेंगे। नहीं, उसके लिए तो फिर मेहनत करनी पड़े। तुमको समझाया जाता है तुम पहले-पहले जायेंगे स्वीट होम। तमाम रूहें पार्ट बजाने से आज़ाद हो जायेंगी। जब तक रूह पाकीज़ा नहीं बनी है तब तक जा न सके। बाक़ी दीदार ए जलवा से मिलता कुछ भी नहीं है। मीरा को दीदार ए जलवा हुआ, फ़िरदौस में चली थोड़े ही गई। फ़िरदौस तो सुनहरे दौर में ही होता है। अभी तुम तैयारी कर रहे हो फ़िरदौस का मालिक बनने के लिए। रब्बा मोजिज़ा वगैरह में इतना जाने नहीं देते हैं क्योंकि तुमको तो पढ़ना है ना। रब आकर तालीम देते हैं, तमाम की ख़ैर निजात करते हैं। तबाही भी सामने खड़ी है। बाक़ी शैतानों और हूरैनों की जंग तो है नहीं। वह आपस में लड़ते हैं तुम्हारे लिए क्योंकि तुम्हारे लिए नई दुनिया चाहिए। बाक़ी तुम्हारी लड़ाई है इबलीस के साथ। तुम निहायत नामीग्रामी वारियर्स हो। मगर कोई जानते नहीं कि हूरैन इतनी क्यों गाई जाती हैं। अभी तुम हिन्दुस्तान को कुव्वत ए इबादत से जन्नत बनाते हो। तुमको अब रब मिल गया है। तुमको समझाते रहते हैं-इल्म से नई दुनिया जिंदाबाद होती है। यह अफ़ज़ल ख्वातीन - अफ़ज़ल हज़रात नई दुनिया के मालिक थे ना। अब पुरानी दुनिया है। पुरानी दुनिया की तबाही आगे भी मूसलों के ज़रिए हुई थी। क़यामत की लड़ाई लगी थी। उस वक़्त रब हक़ीक़ी इबादत भी सिखा रहे थे। अब प्रैक्टिकल में रब हक़ीक़ी इबादत सिखा रहे हैं ना। रब ही तुमको सच बताते हैं। सच्चा रब्बा आते हैं तो तुम हमेशा ख़ुशी में डांस करते हो। यह है इल्म डांस। तो जो इल्म डांस के शौकीन हैं, उनको ही सामने बैठना चाहिए जो नहीं समझने वाले होंगे, उनको उबासी आयेगी। समझ जाते हैं, यह कुछ भी समझते नहीं हैं। इल्म को कुछ भी समझेंगे नहीं तो इधर-उधर देखते रहेंगे। रब्बा भी मोमिना को कहेंगे तुमने किसको लाया है। जो सीखते हैं और सिखलाते हैं उनको सामने बैठना चाहिए। उनको ख़ुशी होती रहेगी। हमको भी डांस करना है। यह है इल्म डांस। आदम अलैहिस्सलाम ने तो न इल्म सुनाया, न डांस किया। नूरानी कलेमात तो यह इल्म की है ना। तो रब ने समझाया है-रात को सोते वक़्त रब्बा को याद करते, चक्कर को अक्ल में याद करते रहो। रब्बा हम अब इस जिस्म को छोड़ आपके पास आते हैं। ऐसे याद करते-करते सो जाओ फिर देखो क्या होता है। आगे कब्रिस्तान बनाते थे फिर कोई सुकून में चले जाते थे, कोई रास करने लगते थे। जो रब को जानते ही नहीं, तो वह याद कैसे कर सकेंगे। इन्सान रब को जानते ही नहीं तो रब को याद कैसे करें, तब रब फ़रमाते हैं मैं जो हूँ, जैसा हूँ, मुझे कोई भी नहीं जानते।
अभी तुमको कितनी समझ आई है। तुम हो बातिन वारियर्स। वारियर्स नाम सुनकर हूरैन को फिर तलवार तीर वगैरह दे दिये हैं। तुम वारियर्स हो कुव्वत ए इबादत के। कुव्वत ए इबादत से दुनिया के मालिक बनते हो। बाज़ू की ताक़त से भल कोई कितनी भी कोशिश करे मगर फ़तह पा नहीं सकते। हिन्दुस्तान का योग मशहूर है। यह रब ही आकर सिखलाते हैं। यह भी किसको मालूम नहीं है। उठते-बैठते रब को ही याद करते रहो। कहते हैं राब्ता नहीं क़ायम होता है। राब्ता अल्फ़ाज़ उड़ा दो। बच्चे तो रब को याद करते हैं ना। रहमतुल्आल्मीन फ़रमाते हैं दिल से मुझे याद करो। मैं ही तमाम कुव्वत नशीन हूँ, मुझे याद करने से तुम सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बन जायेंगे। जब सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बन जायेंगे तब फिर रूहों की बरात निकलेगी जैसे मक्खियों की बरात होती है ना। यह है रहमतुल्आल्मीन की बारात। रहमतुल्आल्मीन-रब्बा के पिछाड़ी तमाम रूहें मच्छरों के जैसें भागेंगी। बाक़ी जिस्म तमाम ख़त्म हो जायेंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) रात को सोने से पहले रब्बा से मीठी-मीठी बातें करनी हैं। रब्बा हम इस जिस्म को छोड़ आपके पास आते हैं, ऐसे याद करके सोना है। याद ही अहम है, याद से ही पारस अक्ल बनेंगे।

2) 5 ख़बासतों की बीमारी से बचने के लिए रूहानी हवासी रहने की तजवीज़ करनी है। बेशुमार ख़ुशी में रहना है, इल्म डांस करना है। क्लास में सुस्ती नहीं फैलाना है।

बरक़ात:-
तीनों ज़माने को जानने वाली स्टेज के ज़रिए फ़ालतू का खाता ख़त्म करने वाले हमेशा कामयाबी नशीन बनो।

तीनों ज़माने को जानने वाली स्टेज पर वाक़ेअ होना यानि कि हर इरादा, बोल और आमाल करने के पहले चेक करना कि यह फ़ालतू है या क़ामिल है! फ़ालतू एक सेकण्ड में पदमों का नुकसान करता है, क़ामिल एक सेकेण्ड में पदमों की कमाई करता है। सेकण्ड का फ़ालतू भी कमाई में निहायत घाटा डाल देता है जिससे की हुई कमाई भी छिप जाती है इसलिए एक ज़माने के देखते हुए आमाल करने के बजाए तीनों ज़माने को जानने वाली सूरत ए हाल पर वाक़ेअ होकर करो तो फ़ालतू ख़त्म हो जायेगा और हमेशा कामयाबी नशीन बन जायेंगे।

स्लोगन:-
इज़्ज़त, शान और अस्बाबों की कुर्बानी ही अज़ीम कुर्बानी है।

आमीन