18-01-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“बापदादा के अनमोल
महावाक्य - पिताश्री जी के पुण्य स्मृति दिवस पर प्रात:क्लास में सुनाने के लिए''
“मीठे बच्चे, ज्ञान रत्नों से झोली भरकर दान भी करना है, जितना दूसरों को रास्ता
बतायेंगे उतना आशीर्वाद मिलेगी''
ओम् शान्ति। मीठे
बच्चों को यह पक्का याद रखना है कि शिवबाबा हमको पढ़ाते हैं। शिवबाबा पतित-पावन भी
है, सद्गति दाता भी है। सद्गति माना स्वर्ग की राजाई देते हैं। बाबा कितना मीठा है।
कितना प्यार से बच्चों को बैठ पढ़ाते हैं। बाप, दादा द्वारा हमको पढ़ाते हैं। बाबा
कितना मीठा है, कितना प्यार करते हैं। कोई तकलीफ नहीं देते। सिर्फ कहते हैं मुझे
याद करो और चक्र को याद करो। बाप की याद में दिल एकदम ठर जानी चाहिए। (शीतल हो जानी
चाहिए) एक बाप की ही याद सतानी चाहिए क्योंकि बाप से वर्सा कितना भारी मिलता है।
अपने को देखना चाहिए हमारा बाप के साथ कितना लव है? कहाँ तक हमारे में दैवी गुण हैं
क्योंकि तुम बच्चे अब कांटों से फूल बन रहे हो। जितना-जितना योग में रहेंगे उतना
कांटों से फूल, सतोप्रधान बनते जायेंगे। फूल बन गये फिर यहाँ रह नहीं सकेंगे। फूलों
का बगीचा है ही स्वर्ग। जो बहुत कांटों को फूल बनाते हैं उन्हें ही सच्चा खुशबूदार
फूल कहेंगे। वह कभी किसी को कांटा नहीं लगायेंगे। क्रोध भी बड़ा कांटा है। बहुतों
को दु:ख देते हैं। अभी तुम बच्चे कांटों की दुनिया से किनारे पर आ गये हो, तुम हो
संगम पर। जैसे माली फूलों को अलग पाट (बर्तन) में निकालकर रखते हैं वैसे ही तुम फूलों
को भी अब संगमयुगी पाट में अलग रखा हुआ है। फिर तुम फुल स्वर्ग में चले जायेंगे।
कलियुगी कांटें भस्म हो जायेंगे।
मीठे बच्चे जानते हैं
पारलौकिक बाप से हमको अविनाशी वर्सा मिलता है। जो सच्चे-सच्चे बच्चे हैं जिनका
बापदादा से पूरा लव है उनको बड़ी खुशी रहेगी। हम विश्व का मालिक बनते हैं। हाँ
पुरुषार्थ से ही विश्व का मालिक बना जाता है, सिर्फ कहने से नहीं। जो अनन्य बच्चे
हैं उन्हों को सदैव यह याद रहेगा कि हम अपने लिए फिर से वही सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी
राजधानी स्थापन कर रहे हैं। बाप कहते हैं मीठे बच्चे, जितना तुम बहुतों का कल्याण
करेंगे उतना तुमको ही उजूरा मिलेगा। बहुतों को रास्ता बतायेंगे तो बहुतों की
आशीर्वाद मिलेगी। ज्ञान रत्नों से झोली भरकर फिर दान करना है। ज्ञान सागर तुमको
रत्नों की थालियाँ भर-भर कर देते हैं। उन रत्नों का जो दान करते हैं वही सबको प्यारे
लगते हैं। बच्चों के अन्दर में कितनी खुशी होनी चाहिए। सेन्सीबुल बच्चे जो होंगे वह
तो कहेंगे हम बाबा से पूरा ही वर्सा लेंगे। एकदम चटक पड़ेंगे। बाप से बहुत लव रहेगा
क्योंकि जानते हैं प्राण देने वाला बाप मिला है। नॉलेज का वरदान ऐसा देते हैं जिससे
हम क्या से क्या बन जाते हैं। इनसालवेन्ट से सालवेन्ट बन जाते हैं। इतना भण्डारा
भरपूर कर देते हैं। जितना बाप को याद करेंगे उतना लव रहेगा, कशिश होगी। सुई साफ होती
है तो चकमक (चुम्बक) तरफ खैंच जाती है ना। बाप की याद से कट निकलती जायेगी। एक बाप
के सिवाए और कोई याद न आये।
बाप समझाते हैं मीठे
बच्चे अब गफलत मत करो। स्वदर्शन चक्रधारी बनो, लाइट हाउस बनो। स्वदर्शन चक्रधारी
बनने की प्रैक्टिस अच्छी हो जायेगी तो फिर तुम जैसे ज्ञान का सागर हो जायेंगे। जैसे
स्टूडेन्ट पढ़कर टीचर बन जाते हैं ना। तुम्हारा धन्धा ही यह है। सबको स्वदर्शन
चक्रधारी बनाओ तब ही चक्रवर्ती राजा-रानी बनेंगे इसलिए बाबा सदैव बच्चों से पूछते
हैं स्वदर्शन चक्रधारी हो बैठे हो? बाप भी स्वदर्शन चक्रधारी है ना। बाप आये हैं
तुम मीठे बच्चों को वापिस ले जाने। तुम बच्चों बिगर हमको भी जैसे बेआरामी होती है।
जब समय होता है तो बेआरामी हो जाती है। बस अभी हम जाऊं। बच्चे बहुत पुकारते हैं।
बहुत दु:खी हैं। तरस पड़ता है। अब तुम बच्चों को चलना है घर। फिर वहाँ से तुम आपेही
चले जायेंगे सुखधाम। वहाँ मैं तुम्हारा साथी नहीं बनूँगा। अपनी अवस्था अनुसार
तुम्हारी आत्मा चली जायेगी।
जितना तुम बच्चे बाप
की याद में रहेंगे उतना दूसरों को समझाने का असर होगा। तुम्हारा बोलना जास्ती नहीं
होना चाहिए। आत्म-अभिमानी हो थोड़ा भी समझायेंगे तो तीर लगेगा। बाप कहते हैं बच्चे
बीती सो बीती। अब पहले अपने को सुधारो। खुद याद करेंगे नहीं, दूसरों को कहते रहेंगे,
यह ठगी चल न सके। अन्दर दिल जरूर खाती होगी। बाप के साथ पूरा लव नहीं है तो श्रीमत
पर चलते नहीं हैं। बेहद के बाप जैसी शिक्षा तो और कोई दे न सके। बाप कहते हैं मीठे
बच्चे, इस पुरानी दुनिया को अब भूल जाओ। पिछाड़ी में तो यह सब भूल ही जाना है।
बुद्धि लग जाती है अपने शान्तिधाम और सुखधाम में। बाप को याद करते-करते बाप के पास
चले जाना है। पतित आत्मा तो जा न सके। वह है ही पावन आत्माओं का घर। यह शरीर 5 तत्वों
से बना हुआ है। तो 5 तत्व यहाँ रहने लिए खींचते हैं क्योंकि आत्मा ने यह जैसे
प्रापटी ली हुई है, इसलिए शरीर में ममत्व हो गया है। अब इनसे ममत्व निकाल जाना है
अपने घर। वहाँ तो यह 5 तत्व हैं नहीं। सतयुग में भी शरीर योगबल से बनता है।
सतोप्रधान प्रकृति होती है इसलिए खींचती नहीं। दु:ख नहीं होता। यह बड़ी महीन बातें
हैं समझने की। यहाँ 5 तत्वों का बल आत्मा को खींचता है इसलिए शरीर छोड़ने की दिल नहीं
होती है। नहीं तो इसमें और ही खुश होना चाहिए। पावन बन शरीर ऐसे छोड़ेंगे जैसे
मक्खन से बाल। तो शरीर से, सब चीज़ों से ममत्व एकदम मिटा देना है, इससे हमारा कोई
कनेक्शन नहीं। बस हम जाते हैं बाबा के पास। इस दुनिया से अपना बैग बैगेज तैयार कर
पहले से ही भेज दिया है। साथ में तो चल न सके। बाकी आत्माओं को जाना है। शरीर को भी
यहाँ छोड़ देना है। बाबा ने नये शरीर का साक्षात्कार करा दिया है। हीरे जवाहरों के
महल मिल जायेंगे। ऐसे सुखधाम में जाने लिए कितनी मेहनत करनी चाहिए। थकना नहीं चाहिए।
दिनरात बहुत कमाई करनी है इसलिए बाबा कहते हैं नींद को जीतने वाले बच्चे मामेकम्
याद करो और विचार सागर मन्थन करो। ड्रामा के राज़ को बुद्धि में रखने से बुद्धि
एकदम शीतल हो जाती है। जो महारथी बच्चे होंगे वह कब हिलेंगे नहीं। शिवबाबा को याद
करेंगे तो वह सम्भाल भी करेंगे।
बाप तुम बच्चों को
दु:ख से छुड़ाकर शान्ति का दान देते हैं। तुमको भी शान्ति का दान देना है। तुम्हारी
यह बेहद की शान्ति अर्थात् योगबल दूसरों को भी एकदम शान्त कर देंगे। तुम बाप की याद
में रहकर फिर देखो यह आत्मा हमारे कुल की है या नहीं! अगर होगी तो एकदम शान्त हो
जायेगी। जो इस कुल के होंगे उन्हों को ही इन बातों से रस बैठेगा। बच्चे याद करते
हैं तो बाप भी प्यार करते हैं। आत्मा को प्यार किया जाता है। यह भी जानते हैं
जिन्होंने बहुत भक्ति की है वह ही जास्ती पढ़ेंगे। उनके चेहरे से मालूम पड़ता जायेगा
कि बाप में कितना लव है। आत्मा बाप को देखती है। बाप हम आत्माओं को पढ़ा रहे हैं।
बाप भी समझते हैं हम इतनी छोटी बिन्दी आत्मा को पढ़ाता हूँ। आगे चल तुम्हारी यह
अवस्था हो जायेगी। समझेंगे हम भाई-भाई को पढ़ाते हैं। शक्ल बहन की होते भी दृष्टि
आत्मा तरफ जाए। शरीर पर दृष्टि बिल्कुल न जाये, इसमें बड़ी मेहनत है। यह बड़ी महीन
बातें हैं। बड़ी ऊंच पढ़ाई है। वज़न करो तो इस पढ़ाई का तरफ बहुत भारी हो जायेगा।
अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे
बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी
बच्चों को नमस्ते।
अव्यक्त महावाक्य -
महावीर बच्चों के
संगठन की विशषता - एकरस, एकटिक स्थिति - 9-12-75
महावीर अर्थात् विशेष
आत्मा। ऐसे महावीर, विशेष आत्माओं के संगठन की विशेषता वर्तमान समय यही होनी चाहिए
जो एक ही समय सबकी एकरस, एकटिक स्थिति हो अर्थात् जितना समय, जिस स्थिति में ठहरना
चाहें, उतना समय, उस स्थिति में संगठित रूप में स्थित हो जाएं, संगठित रूप में सबके
संकल्प रूपी अंगुली एक हो। जब तक संगठन की यह प्रैक्टिस नहीं है, तब तक सिद्धि नहीं
होगी। संगठन में अभी ऑर्डर हो कि पाँच मिनट के लिए व्यर्थ संकल्प बिल्कुल समाप्त कर
बीजरूप पॉवरफुल स्थिति में एकरस स्थित हो जाओ, तो ऐसा अभ्यास है? ऐसे नहीं कोई मनन
करने की स्थिति में हो, कोई रूहरिहान कर रहा हो और कोई अव्यक्त स्थिति में हो।
ऑर्डर है बीजरूप होने का और कर रहे हैं रूहरिहान तो ऑर्डर नहीं माना ना! यह अभ्यास
तब होगा जब पहले व्यर्थ संकल्पों की समाप्ति करेंगे। हलचल होती ही व्यर्थ संकल्पों
की है। इन व्यर्थ संकल्पों की समाप्ति के लिए, अपने संगठन को शक्तिशाली व एकमत बनाने
के लिए कौन-सी शक्ति चाहिए?
इसके लिए एक तो फेथ (विश्वास),
दूसरा-समाने की शक्ति चाहिए। संगठन को जोड़ने का धागा है - फेथ। किसी ने जो कुछ किया,
मानो राँग भी किया, लेकिन संगठन प्रमाण वा अपने संस्कारों प्रमाण व समय प्रमाण उसने
जो किया उसका भी जरूर कोई भाव-अर्थ होगा। संगठित रूप में जहाँ सर्विस है, वहाँ उसके
संस्कारों को भी रहमदिल की दृष्टि से देखते हुए, संस्कारों को सामने न रख इसमें भी
कोई कल्याण होगा, इसको साथ मिलाकर चलने में ही कल्याण है। ऐसा फेथ जब संगठन में एक
दूसरे के प्रति हो तब ही सफलता हो सकती है। पहले से ही व्यर्थ संकल्प नहीं चलाने
चाहिए। जैसे कोई अपनी गलती को महसूस भी करते हैं लेकिन उसको कभी फैलायेंगे नहीं
बल्कि उसे समायेंगे। दूसरा उसको फैलायेगा तो भी बुरा लगेगा। इसी प्रकार दूसरे की
गलती को भी अपनी गलती समझ फैलाना नहीं चाहिए। व्यर्थ संकल्प नहीं चलाने चाहिए बल्कि
उन्हें भी समा देना चाहिए। इतना एक-दो में फेथ हो! स्नेह की शक्ति से ठीक कर देना
चाहिए। जैसे लौकिक रीति भी घर की बात बाहर नहीं करते हैं, नहीं तो इससे घर को ही
नुकसान होता है। तो संगठन में साथी ने जो कुछ किया उसमें जरूर रहस्य होगा, यदि उसने
राँग भी किया हो, तो भी उसको परिवर्तन कर देना चाहिए। यह दोनों प्रकार के फेथ रखकर
एक-दूसरे के सम्पर्क में चलने से, संगठन की सफलता हो सकती है, इसमें समाने की शक्ति
ज्यादा चाहिए। व्यर्थ संकल्पों को समाना है। बीते हुए संस्कारों को कभी भी वर्तमान
समय से टैली (मिलान) नहीं करो अर्थात् पास्ट को प्रेजेन्ट नहीं करो। जब पास्ट को
प्रेजेन्ट में मिलाते हो तब ही संकल्पों की क्यू लम्बी हो जाती है और जब तक यह
व्यर्थ संकल्पों की क्यू है, तब तक संगठित रूप में एकरस स्थिति हो नहीं सकती।
दूसरे की गलती सो अपनी
गलती समझना - यह है संगठन को मजबूत करना। यह तब होगा जब एक-दूसरे में फेथ होगा।
परिवर्तन करने का फेथ या कल्याण करने का फेथ, इसमें समाने की शक्ति जरूर चाहिए। देखा
और सुना उसको बिल्कुल समाकर, वही आत्मिक दृष्टि और कल्याण की भावना रहे। जब
अज्ञानियों के लिए कहते हो - अपकारियों पर उपकार करना है तो संगठन में भी एक दूसरे
के प्रति रहम की भावना रहे। अभी रहम की भावना कम रहती है क्योंकि आत्मिक स्थिति का
अभ्यास कम है।
ऐसा पॉवरफुल संगठन
होने से ही सिद्धि होगी। अभी आप सिद्धि का आह्वान करते हो, लेकिन फिर आपके आगे
सिद्धि स्वयं झुकेगी। जैसे सतयुग में प्रकृति दासी बन जाती है, वैसे सिद्धि आपके
सामने स्वयं झुकेगी। सिद्धि आप लोगों का आह्वान करेगी। जब श्रेष्ठ नॉलेज है, स्टेज
भी पॉवरफुल है तो सिद्धि क्या बड़ी बात है? सदाकाल एकरस स्थिति में रहने वालों को
सिद्धि प्राप्त न हो, यह हो नहीं सकता लेकिन इसके लिए संगठन की शक्ति चाहिए। एक ने
कुछ बोला, दूसरे ने स्वीकार किया। सामना करने की शक्ति ब्राह्मण परिवार के आगे यूज़
नहीं करनी है। वो माया के आगे यूज़ करनी है। परिवार से सामना करने की शक्ति यूज़
करने से संगठन पॉवरफुल नहीं होता। कोई भी बात नहीं जंचती तो भी एक-दूसरे का सत्कार
करना चाहिए। उस समय किसी के संकल्प वा बोल को कट नहीं करना चाहिए इसलिये अब समाने
की शक्ति को धारण करो।
संगठित रूप में आप
ब्राह्मण बच्चों की आपस के सम्पर्क की भाषा भी अव्यक्त भाव की होनी चाहिए। जैसे
फरिश्ते अथवा आत्मायें आत्माओं से बोल रही हैं। किसी की सुनी हुई गलती को संकल्प
में भी स्वीकार न करना और न कराना ही चाहिए। ऐसी जब स्थिति हो तब ही बाप की जो शुभ
कामना है-संगठन की, वह प्रैक्टिकल में होगी। इसके लिए विशेष पुरुषार्थ अथवा विशेष
अनुभवों की आपस में लेन-देन करो। संगठित रूप में विशेष योग के प्रोग्राम चलते रहें
तो विनाश ज्वाला को भी पंखा लगेगा। योग-अग्नि से विनाश की अग्नि जलेगी। अच्छा। ओम्
शान्ति।
वरदान:-
व्यक्त में
रहते अव्यक्त फरिश्ते रूप का साक्षात्कार कराने वाले सफेद वस्त्रधारी और सफेद
लाइटधारी भव
जैसे अभी चारों ओर यह
आवाज फैल रहा है कि यह सफेद वस्त्रधारी कौन हैं और कहाँ से आये हैं! ऐसे अब चारों
ओर फरिश्ते रूप का साक्षात्कार कराओ - इसको कहा जाता है डबल सेवा का रूप। जैसे बादल
चारों ओर छा जाते हैं, ऐसे चारों ओर फरिश्ते रूप से प्रगट हो जाओ, जहाँ भी देखें तो
फरिश्ते ही नज़र आयें। लेकिन यह तब होगा जब शरीर से डिटैच होकर अन्त:वाहक शरीर से
चक्र लगाने के अभ्यासी होंगे। मन्सा पावरफुल होगी।
स्लोगन:-
सर्व गुणों वा सर्व शक्तियों के अधिकारी बनने के लिए आज्ञाकारी बनो।
अव्यक्त इशारे - इस
अव्यक्ति मास में बन्धनमुक्त रह जीवनमुक्त स्थिति का अनुभव करो
जैसे बाप सदा
स्वतंत्र है - ऐसे बाप समान बनो। बापदादा अब बच्चों को परतंत्र देख नहीं सकते। अगर
स्वयं को स्वतंत्र नहीं कर सकते हो, स्वयं ही अपनी कमजोरियों में गिरते रहते हो तो
विश्व परिवर्तक कैसे बनेंगे! अब इस स्मृति को बढ़ाओ कि मैं मास्टर सर्वशक्तिमान
हूँ, इससे सहज सर्व पिंजड़ों से मुक्त उड़ता पंछी बन जायेंगे।