23-11-2025 प्रात:मुरली ओम् शान्ति 31.12.2007 "बापदादा" मधुबन
नये वर्ष में अखण्ड
महादानी, अखण्ड निर्विघ्न, अखण्ड योगी और सदा सफलतामूर्त बनना
आज बापदादा अपने सामने
डबल सभा को देख रहे हैं। एक तो साकार में सम्मुख बैठे हैं और दूसरे दूर बैठे भी दिल
के समीप दिखाई दे रहे हैं। दोनों सभाओं की श्रेष्ठ आत्माओं के मस्तक में आत्म दीप
चमक रहा है। कितना सुन्दर चमकता हुआ नज़ारा है। इतने सब एक संकल्प, एकरस स्थिति में
स्थित परमात्म प्यार में लवलीन एकाग्र बुद्धि से स्नेह में समाये हुए कितने प्यारे
लग रहे हैं। आप सभी भी आज विशेष नया वर्ष मनाने के लिए पहुंच गये हो। बापदादा भी सभी
बच्चों का उमंग-उत्साह देख, चमकते हुए आत्म दीप को देख हर्षित हो रहे हैं।
आज का दिन संगम का
दिन है। एक वर्ष की, पुराने की विदाई है और नये वर्ष की बधाई होने वाली है। नया
वर्ष अर्थात् नया उमंग और उत्साह, स्व परिवर्तन का उमंग है, सर्व प्राप्तियों को
स्वयं में प्राप्त देख दिल में उत्साह है। दुनिया वाले भी यह उत्सव मनाते हैं, उन्हों
के लिए एक दिन का उत्सव है और आप लकी लवली बच्चों के लिए संगमयुग का हर दिन उत्सव
है क्योंकि खुशी का उत्साह है। दुनिया वाले तो बुझे हुए दीपक को जलाके वर्ष मनाते
हैं और बापदादा और आप इतने सारे चारों ओर के जगे हुए दीपकों के साथ नया वर्ष का
उत्सव मनाने आये हैं। यह तो रीति रसम मनाने के लिए निमित्त मात्र करते हो लेकिन आप
सभी जगे हुए दीपक हो। अपना चमकता हुआ दीप दिखाई देता है ना! जो अविनाशी दीप है।
तो नये वर्ष में हर
एक ने दिल में स्व प्रति, विश्व की आत्माओं प्रति कोई नया प्लैन बनाया है? 12 बजे
के बाद नया वर्ष शुरू हो जायेगा तो इस वर्ष को विशेष किस रूप में मनायेंगे? जैसे
पुराना वर्ष विदाई लेगा तो आप सबने भी पुराने संकल्प, पुराने संस्कार उन्हों को
विदाई देने का संकल्प किया? वर्ष के साथ-साथ आप भी पुराने को विदाई दे नये
उमंग-उत्साह के संकल्पों को प्रैक्टिकल में लायेंगे ना! तो सोचो अपने में क्या
नवीनता लायेंगे? कौन से नये उमंग-उत्साह की लहर फैलायेंगे? कौन से विशेष संकल्प का
वायब्रेशन फैलायेंगे? सोचा है? क्योंकि आप सभी ब्राह्मण सारे विश्व की आत्माओं के
लिए परिवर्तन निमित्त आत्मायें हो। विश्व के फाउण्डेशन हो, पूर्वज हो, पूज्य हो। तो
इस वर्ष अपनी श्रेष्ठ वृत्ति द्वारा क्या वायब्रेशन फैलायेंगे? जैसे प्रकृति चारों
ओर कभी गर्मी का, कभी सर्दी का, कभी बहार का वायब्रेशन फैलाती है। तो आप प्रकृति के
मालिक प्रकृतिजीत कौन सा वायब्रेशन फैलायेंगे? जिससे आत्माओं को थोड़े समय के लिए
भी सुख-चैन का अनुभव हो। इसके लिए बापदादा यही इशारा दे रहे हैं कि जो भी खजाने
प्राप्त हुए हैं उन खजानों को सफल करो और सफलता स्वरूप बनो। विशेष समय का खजाना कभी
भी व्यर्थ न जाये। एक सेकण्ड भी व्यर्थ को कार्य में लगाओ। समय को सफल करो, हर
श्वांस को सफल करो, हर संकल्प को सफल करो, हर शक्ति को सफल करो, हर गुण को सफल करो।
सफलतामूर्त बनने का यह विशेष वर्ष मनाओ क्योंकि सफलता आपका जन्म सिद्ध अधिकार है।
उस अधिकार को अपने कार्य में लगाए सफलतामूर्त बनो क्योंकि अब की सफलता आपके अनेक
जन्म साथ रहने वाली है। आपके समय के सफलता का प्रालब्ध पूरा आधा-कल्प सफलता का फल
प्राप्त होगा। अब के समय की सफलता का प्रालब्ध पूरा समय ही प्राप्त होगा। श्वांस को
सफल करने से भविष्य में भी देखो आपके श्वांस की सफलता का परिणाम भविष्य में सभी
आत्मायें पूरा समय स्वस्थ रहती हैं। बीमारी का नाम नहीं। डाक्टर्स की डिपार्टमेंट
ही नहीं क्योंकि डाक्टर्स क्या बन जायेंगे? राजा बन जायेंगे ना! विश्व के मालिक बन
जायेंगे। लेकिन इस समय आप श्वांस सफल करते हो और सर्व आत्माओं को स्वस्थ रहने का
प्रालब्ध प्राप्त होता है। ऐसे ही ज्ञान का खजाना, उसके फल स्वरूप स्वर्ग में आपके
अपने राज्य में इतने समझदार, शक्तिवान बन जाते जो वहाँ कोई वजीर से राय लेने की
आवश्यकता नहीं, स्वयं ही समझदार शक्तिवान होते हैं। शक्तियों को सफल करते हो, उसकी
प्रालब्ध वहाँ सब शक्तियां विशेष धर्म सत्ता, राज्य सत्ता दोनों ही विशेष शक्तियां,
सत्तायें वहाँ प्राप्त होंगी। गुणों का खजाना सफल करते हो तो उसकी प्रालब्ध देवता
पद का अर्थ ही है दिव्यगुणधारी और साथ-साथ अभी लास्ट जन्म में आपकी जड़ मूर्ति का
पूजन करते हैं तो क्या महिमा करते हैं? सर्वगुण सम्पन्न। तो इस समय की सफलता की
प्रालब्ध स्वत: ही प्राप्त हो जाती इसलिए चेक करो खजाने मिले, खजानों से सम्पन्न
हुए हैं लेकिन स्व प्रति वा विश्व प्रति कितना सफल किया है? पुराने वर्ष को विदाई
देंगे तो पुराने वर्ष में क्या जमा किया हुआ खजाना सफल किया, कितना किया? यह चेक
करना और आने वाले वर्ष में भी इन खजानों को व्यर्थ के बजाए सफल करना ही है। एक
सेकण्ड भी और कोई खजाना भी व्यर्थ न जाये। पहले बताया है कि संगम समय का सेकण्ड,
सेकण्ड नहीं है वर्ष के बराबर है। ऐसे नहीं समझना एक सेकण्ड, एक मिनट ही तो गया,
व्यर्थ जाना इसको ही अलबेलापन कहा जाता है। आप सबका लक्ष्य है कि ब्रह्मा बाप समान
सम्पन्न और सम्पूर्ण बनना है। तो ब्रह्मा बाप ने सर्व खजाने आदि से अन्तिम दिन तक
सफल किया, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देखा - सम्पूर्ण फरिश्ता बन गया। अपनी प्यारी दादी
को भी देखा सफल किया और औरों को भी सफल करने का सदा उमंग-उत्साह बढ़ाया। तो
ड्रामानुसार विशेष विश्व सेवा के अलौकिक पार्ट के निमित्त बनी।
तो इस वर्ष, कल से हर
दिन अपना चार्ट रखना - सफल और व्यर्थ... क्या हुआ कितना हुआ? अमृतवेले ही दृढ़
संकल्प करना, स्मृति स्वरूप बनना कि सफलता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है। सफलता मेरे
गले का हार है। सफलता स्वरूप ही समान बनना है। ब्रह्मा बाप से प्यार है ना। तो
ब्रह्मा बाप का सबसे ज्यादा प्यार किससे था? जानते हो, किससे प्यार था? मुरली से।
लास्ट दिन भी मुरली का पाठ मिस नहीं किया। समान बनने में यह चेक करना - ब्रह्मा बाप
का जिससे प्यार रहा, ब्रह्मा बाप के प्यार का सबूत है - जिससे बाप का प्यार था उससे
मेरा प्यार स्वत: ही सहज होना चाहिए। ब्रह्मा बाप की और विशेषता क्या रही? सदा
अलर्ट, अलबेलापन नहीं। लास्ट दिन भी कितना अलर्ट रूप में अपने सेवा का पार्ट बजाया।
शरीर कमजोर होते भी कैसे अलर्ट होके, आधार लेके नहीं बैठे और अलर्ट करके गये। तीन
बातों का मन्त्र देके गये। याद है ना सबको। तो जितना अलर्ट रहेंगे, फालो करेंगे,
अलबेलापन खत्म होगा। अलबेलेपन के विशेष बोल बापदादा बहुत सुनते रहते हैं। जानते हो
ना! अगर इन तीन शब्दों को (निराकारी, निर्विकारी और निरंहकारी) सदा अपने मन में
रिवाइज़ और रियलाइज करते चलो तो आटोमेटिकली सहज और स्वत: समान बन ही जायेंगे। तो एक
बात सफल करो सफलतामूर्त बनो।
बापदादा ने बच्चों की
वर्ष की रिजल्ट देखी। क्या देखा? महादानी बने हो, लेकिन अखण्ड महादानी, अखण्ड
अण्डरलाइन, अखण्ड महादानी, अखण्ड योगी, अखण्ड निर्विघ्न अभी इसकी आवश्यकता है। क्या
अखण्ड हो सकता है? हो सकता है? पहली लाइन वाले बताओ कि अखण्ड हो सकता है? हाथ उठाओ
अगर हो सकता है तो। जो कर सकता है, कर सकते हो? मधुबन वाले भी उठा रहे हैं। बापदादा
मधुबन वालों को पहले देखता है। मधुबन से प्यार है। शान्तिवन या पाण्डव भवन या जो भी
दादी की भुजायें हैं, सबको ध्यान से देखते हैं। अगर अखण्ड हो गया, मन्सा से शक्ति
फैलाने की सेवा में बिजी रहो, वाचा से ज्ञान की सेवा और कर्म से गुणदान वा गुण का
सहयोग देने की सेवा करो।
आजकल चाहे अज्ञानी
आत्मायें हैं, चाहे ब्राह्मण आत्मायें हैं सभी को गुण का दान, गुणों का सहयोग देना
आवश्यक है। अगर स्वयं सहज सिम्पुल रूप में सैम्पुल बनके रहे तो आटोमेटिक दूसरे को
आपके गुणमूर्त का सहयोग स्वत: ही मिलेगा। आजकल ब्राह्मण आत्मायें भी सैम्पुल देखने
चाहती हैं, सुनने नहीं चाहती हैं। आपस में भी क्या कहते हो? कौन बना है? तो
प्रत्यक्ष रूप में गुणमूर्त देखने चाहते हैं। तो कर्म से विशेष गुणों का सहयोग, गुणों
का दान देने की आवश्यकता है। सुनने कोई नहीं चाहता, देखने चाहता है। तो अभी यह
विशेष ध्यान में रखना कि मुझे ज्ञान से, वाचा से तो सेवा करते ही रहते हो और करते
ही रहना है, छोड़ना नहीं है लेकिन अभी मन्सा और कर्म, मन्सा द्वारा वायब्रेशन फैलाओ।
सकाश फैलाओ। वायब्रेशन वा सकाश दूर बैठे भी पहुंचा सकते हो। शुभ भावना, शुभ कामना
द्वारा किसी भी आत्मा को मन्सा सेवा द्वारा वायब्रेशन वा सकाश दे सकते हो। तो अभी
इस वर्ष एक मन्सा शक्तियों का वायब्रेशन, शक्तियों द्वारा सकाश और कर्म द्वारा गुण
का सहयोग वा अज्ञानी आत्माओं को गुणदान दो।
नये वर्ष में गिफ्ट
भी देते हो ना। तो इस वर्ष स्वयं गुणमूर्त बन गुणों की गिफ्ट देना। गुणों की टोली
खिलाते हो ना। मिलते हो तो टोली खिलाते हो ना। टोली खिलाने में खुश हो जाते हैं ना।
कोई आत्मायें, भागन्ती भी टोली को याद करते हैं। और बातें भूल जाते हैं लेकिन टोली
याद आती है। तो इस वर्ष कौन सी टोली खिलायेंगे? गुणों की टोली खिलाना। गुणों की
पिकनिक करना क्योंकि बाप समान समय की समीपता प्रमाण और दादी के इशारे प्रमाण समय की
सम्पन्नता अचानक कभी भी होना सम्भव है इसलिए बाप समान बनना है वा दादी को प्यार का
रिटर्न देना है तो जो आवश्यकता है - मन्सा और कर्म द्वारा सहयोगी बनने की, कोई कैसा
भी है यह नहीं सोचो, यह बनें तो मैं बनूं। नम्बरवन बनना है तो कभी यह नहीं सोचना कि
यह बने तो बनूं। पहला नम्बर तो बनने वाला बन जायेगा, फिर आपका नम्बर तो दूसरा हो
जायेगा। क्या आप दूसरा नम्बर बनने चाहते हैं कि पहला नम्बर बनने चाहते हैं? वैसे
अगर किसको कहो आप दूसरा नम्बर ले लो तो लेंगे? सभी यही कहेंगे पहला नम्बर लेना है।
तो पहला निमित्त बनना है। दूसरे को निमित्त क्यों बनाते हो, अपने को निमित्त बनाओ
ना। ब्रह्मा बाप ने क्या कहा? हर बात में खुद निमित्त बनके निमित्त बनाया। हे
अर्जुन बन पार्ट बजाया। मुझे निमित्त बनना है। मुझे करना है। दूसरा करेगा, मुझे
देखके और करेंगे, और को देख मैं करूंगा, नहीं। मुझे देख और करेंगे। यह ब्रह्मा बाप
का पहला पाठ है। तो सुना क्या करना है? सफलता मूर्त, सफल सफलता मूर्त, अखण्ड दानी,
माया को आने की हिम्मत ही नहीं होगी। जब अखण्ड महादानी बन जायेंगे, निरन्तर सेवाधारी
रहेंगे, बिजी रहेंगे, मन बुद्धि सेवाधारी रहेगा तो माया कहाँ आयेगी। तो अभी इस वर्ष
क्या बनना है? सबका एक आवाज दिल से निकले, यह बापदादा चाहता है, वह क्या? नो
प्राब्लम, कम्पलीट। प्रॉब्लम नहीं लेकिन कम्पलीट बनना ही है। दृढ़ निश्चयबुद्धि,
विजयमाला के नजदीक मणका बनना ही है। ठीक है ना! बनना है ना! मधुबन वाले बनना है! नो
कम्पलेन? नो कम्पलेन। हिम्मत रखने वाले हाथ उठाओ। नो प्राब्लम। वाह! मुबारक हो,
मुबारक हो, मुबारक हो।
देखो, निश्चय का
प्रत्यक्ष प्रमाण है रूहानी नशा। अगर रूहानी नशा नहीं तो निश्चय भी नहीं है। फुल
निश्चय नहीं है, थोड़ा बहुत है। तो नशा रखो क्या बड़ी बात है! कितने कल्प आप ही बाप
समान बने हैं, याद है? अनगिनत बार बने हो। तो यह नशा रखो हम ही बने हैं, हम ही हैं
और हम ही बार-बार बनते रहेंगे। यह नशा सदा ही कर्म में दिखाई दे। संकल्प में नहीं,
बोल में नहीं, लेकिन कर्म में, कर्म का अर्थ है चलन में, चेहरे में दिखाई दे। तो
होमवर्क मिल गया। मिला ना? अब देखेंगे नम्बरवार में आते हो या नम्बरवन में आते हो।
अच्छा।
बापदादा के पास कार्ड,
पत्र, ईमेल, याद-प्यार कम्प्युटर द्वारा भी बहुत आये हैं और बापदादा दूर बैठे
दिलतख्तनशीन बच्चों को, हर एक को नाम सहित विशेषता सहित यादप्यार और दिल की दुआयें
सम्मुख इमर्ज कर दे रहे हैं। बापदादा जानते हैं कि प्यार तो सबको रहता ही है और
बापदादा सदा अमृतवेले विशेष ब्राह्मण आत्माओं को यादप्यार का रेसपान्ड विशेष करता
है। इसीलिए कार्ड भी अच्छे-अच्छे बनाये हैं, वह यहाँ (स्टेज पर) रखते हैं लेकिन
बापदादा के पास तो वतन में पहले पहुंचते हैं। अच्छा।
चारों ओर के चमकते
हुए आत्म-दीप बच्चों को, सदा सफल करने वाले सफलता स्वरूप बच्चों को, सदा अखण्ड
महादानी, अखण्ड निर्विघ्न, अखण्ड ज्ञान और योगयुक्त, सदा एक ही समय में तीन सेवा
करने वाले मन्सा वायब्रेशन द्वारा वायुमण्डल द्वारा, वाचा वाणी द्वारा, चलन और चेहरे
वा कर्म द्वारा, तीनों सेवा एक ही समय इकट्ठा हो तब आपका प्रभाव अच्छा कहने वाले नहीं,
लेकिन अच्छा बनने वालों के ऊपर पड़ेगा। तो ऐसे अनुभवी मूर्त द्वारा अनुभव कराने वाले
बच्चों को बापदादा का नये वर्ष के लिए पदम पदमगुणा यादप्यार, दुआयें और दिल का तख्त
सदा तख्तनशीन बनाने वाला है, इसलिए चारों ओर के बच्चों को जो सम्मुख हैं, वा दूर
बैठे दिलतख्त पर हैं, सभी को नाम और विशेषता सहित यादप्यार और नमस्ते।
अच्छा - जो पहली बार
आये हैं वह उठकर खड़े हो जाओ। हाथ हिलाओ। देखो आधा क्लास पहले बारी का आया है। पीछे
वाले हाथ हिलाओ। दिखाई दे रहा है टी.वी. में। बहुत हैं। अच्छा पहले वारी आने वालों
को बापदादा की बहुत-बहुत दिल से मुबारक भी है, और दिल का यादप्यार भी है। जैसे अभी
आये हो, तो अभी के आने वालों को बापदादा का वरदान है - “अमर भव''।
वरदान:-
ग्लानी करने
वाले को भी गुणमाला पहनाने वाले इष्ट देव, महान आत्मा भव
जैसे आजकल आप विशेष
आत्माओं का स्वागत करते समय कोई गले में स्थूल माला डालते हैं तो आप डालने वाले के
गले में रिटर्न कर देते हो, ऐसे ग्लानि करने वाले को भी आप गुणमाला पहनाओ तो वह
स्वत: ही आपको गुणमाला रिटर्न करेंगे क्योंकि ग्लानि करने वाले को गुणमाला पहनाना
अर्थात् जन्म-जन्म के लिए भक्त निश्चित कर देना है। यह देना ही अनेक बार का लेना हो
जाता है। यही विशेषता इष्ट देव, महान आत्मा बना देती है।
स्लोगन:-
अपनी मन्सा वृत्ति सदा अच्छी पॉवरफुल बनाओ तो खराब भी अच्छा हो जायेगा।
अव्यक्त इशारे -
अशरीरी व विदेही स्थिति का अभ्यास बढ़ाओ
कितना भी कार्य की
चारों ओर की खींचातान हो, बुद्धि सेवा के कार्य में अति बिज़ी हो - ऐसे टाइम पर
अशरीरी बनने का अभ्यास करके देखो। यथार्थ सेवा का कभी बन्धन नहीं होता है क्योंकि
योग युक्त, युक्तियुक्त सेवाधारी सदा सेवा करते भी उपराम रहते हैं। ऐसे नहीं कि सेवा
ज्यादा है इसलिए अशरीरी नहीं बन सकते। याद रखो मेरी सेवा नहीं बाप ने दी है तो
निर्बन्धन रहेंगे।