02-04-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - बाप की यह वण्डरफुल हट्टी (दुकान) है, जिस पर सब वैराइटी सामान मिलता है, उस हट्टी के तुम मालिक हो''

प्रश्नः-
इस वण्डरफुल दुकानदार की कॉपी कोई भी नहीं कर सकता है - क्यों?

उत्तर:-
क्योंकि यह स्वयं ही सर्व खजानों का भण्डार है। ज्ञान का, सुख का, शान्ति का, पवित्रता का, सर्व चीजों का सागर है, जिसको जो चाहिए वह मिल सकता है। निवृत्ति मार्ग वालों के पास यह सामान मिल नहीं सकता। कोई भी अपने को बाप समान सागर कह नहीं सकते।

गीत:-
तुम्हें पाके हमने....

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप द्वारा जो सुख-शान्ति-पवित्रता का वक्खर मिला है, वह सबको देना है। पहले विकारों का दान दे पवित्र बनना है फिर अविनाशी ज्ञान धन का दान करना है।

2) देवताओं जैसा मीठा बनना है। जो बापदादा से प्रतिज्ञा की है, उसे सदा याद रखना है और बाप की याद में रहकर विकर्म भी विनाश करने हैं।

वरदान:-
निमित्तपन की स्मृति द्वारा अपने हर संकल्प पर अटेन्शन रखने वाले निवारण स्वरूप भव

निमित्त बनी हुई आत्माओं पर सभी की नज़र होती है इसलिए निमित्त बनने वालों को विशेष अपने हर संकल्प पर अटेन्शन रखना पड़े। अगर निमित्त बने हुए बच्चे भी कोई कारण सुनाते हैं तो उनको फालो करने वाले भी अनेक कारण सुना देते हैं। अगर निमित्त बनने वालों में कोई कमी है तो वह छिप नहीं सकती इसलिए विशेष अपने संकल्प, वाणी और कर्म पर अटेन्शन दे निवारण स्वरूप बनो।

स्लोगन:-
ज्ञानी तू आत्मा वह है जिसमें अपने गुण वा विशेषताओं का भी अभिमान न हो।

ये अव्यक्त इशारे - महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो

मधुरता का गुण जीवन में तब आयेगा जब अपनी वा दूसरे की बीती को न देख अन्दर के संस्कारों को सरल व नम्रचित बनायेंगे। सरलचित आत्मा का गुण है ही मधुरता। उनके नयनों से मधुरता, मुख से मधुरता और चलन से मधुरता प्रत्यक्ष रूप में देखने में आती है। मधुरता और नम्रता, इन दो विशेष धारणाओं से सदा विश्व कल्याणकारी, महादानी, वरदानी बन जायेंगे और सहज ही स्नेह का सबूत दे सकेंगे।