02-09-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
मीठे बच्चे - बाप आये हैं तुम्हें ऐसे श्रेष्ठ कर्म
सिखलाने, जिससे तुम 21 जन्म की बादशाही का वर्सा ले सको, अटल अखण्ड राज्य के मालिक
बन सको
प्रश्नः-
गृहस्थियों और
संन्यासियों के किस एक सिद्धान्त में बहुत बड़ा अन्तर है?
उत्तर:-
गृहस्थियों का
सिद्धान्त है कि भगवान जरूर किसी न किसी रूप में आयेगा और संन्यासियों का सिद्धान्त
है कि ब्रह्म को याद करते-करते ब्रह्म में लीन हो जायेंगे। अब बाप समझाते हैं
ब्रह्म में कोई लीन नहीं होता। आत्मा अमर है वह लीन कैसे होगी। भगवान यदि आयेगा तो
जरूर टीचर बनकर शिक्षा देगा। प्रेरणा से तो ज्ञान नहीं देगा ना।
गीत:-
तुम्हें पाके
हमने.....
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
अपने आपको राजाई का तिलक देने के लिए याद की मेहनत करनी है। सब विकारों को छोड़ देना
है।
2) ब्रह्मा बाप समान
साधारण और गुप्त रहना है। बाहर का ठाठ आदि नहीं करना है। अपने भविष्य राजाई के नशे
में रहना है।
वरदान:-
अपनी चंचल
वृत्ति को परिवर्तन कर सतोप्रधान वायुमण्डल बनाने के जवाबदार श्रेष्ठ आत्मा भव
जो बच्चे अपनी चंचल
वृत्तियों को परिवर्तन कर लेते हैं वही सतोप्रधान वायुमण्डल बना सकते हैं क्योंकि
वृत्ति से वायुमण्डल बनता है। वृत्ति चंचल तब होती है जब वृत्ति में इतने बड़े
कार्य की स्मृति नहीं रहती। अगर कोई अति चंचल बच्चा बिजी होते भी चंचलता नहीं छोड़ता
है तो उसे बांध देते हैं। ऐसे ही यदि ज्ञान-योग में बिजी होते भी वृत्ति चंचल हो तो
एक बाप के साथ सर्व सम्बन्धों के बंधन में वृत्ति को बांध दो तो चंचलता सहज समाप्त
हो जायेगी।
स्लोगन:-
अलबेलेपन की
लहर को समाप्त करने का साधन है बेहद का वैराग्य।
अव्यक्त इशारे - अब
अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो
दातापन के संस्कार
इमर्ज कर मन्सा द्वारा पुण्य का खाता जमा करो, वाणी द्वारा कमजोर आत्माओं को खुशी
में, परेशान को शान की स्मृति में और दिलशिकस्त आत्माओं को उमंग-उत्साह में लाओ,
सम्बन्ध-सम्पर्क से आत्मा को अपने श्रेष्ठ संग का रंग अनुभव कराओ तो पुण्य का खाता
जमा होता जायेगा।