04-04-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - अल्फ और बे
को याद करो तो रमणीक बन जायेंगे, बाप भी रमणीक है तो उनके बच्चे भी रमणीक होने
चाहिए''
प्रश्नः-
देवताओं के
चित्रों की कशिश सभी को क्यों होती है? उनमें कौन सा विशेष गुण है?
उत्तर:-
देवतायें बहुत
रमणीक और पवित्र हैं। रमणीकता के कारण उनके चित्रों की भी कशिश होती है। देवताओं
में पवित्रता का विशेष गुण है, जिस गुण के कारण ही अपवित्र मनुष्य झुकते रहते हैं।
रमणीक वही बनते जिनमें सर्व दैवी गुण हैं, जो सदा खुश रहते हैं।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अभी हम वनवाह में हैं - इसलिए बहुत-बहुत साधारण रहना है। कोई भी
अभिमान देह का वा कपड़ों आदि का नहीं रखना है। कोई भी कर्म करते बाप की याद का नशा
चढ़ा रहे।
2) हम बेहद के त्यागी और राजऋषि हैं - इसी नशे में रह पवित्र बनना है। ज्ञान धन
से भरपूर बन दान करना है। सच्चा-सच्चा सौदागर बन अपना पोतामेल रखना है।
वरदान:-
स्वयं को
सेवाधारी समझकर झुकने और सर्व को झुकाने वाले निमित्त और नम्रचित भव
निमित्त उसे कहा जाता - जो
अपने हर संकल्प वा हर कर्म को बाप के आगे अर्पण कर देता है। निमित्त बनना अर्थात्
अर्पण होना और नम्रचित वह है जो झुकता है, जितना संस्कारों में, संकल्पों में
झुकेंगे उतना विश्व आपके आगे झुकेगी। झुकना अर्थात् झुकाना। यह संकल्प भी न हो कि
दूसरे भी हमारे आगे कुछ तो झुकें। जो सच्चे सेवाधारी होते हैं - वह सदैव झुकते हैं।
कभी अपना रोब नहीं दिखाते।
स्लोगन:-
अब
समस्या स्वरूप नहीं, समाधान स्वरूप बनो।
ये अव्यक्त इशारे
- महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो
आप महान आत्माओं
का हर मंसा संकल्प हर आत्मा के प्रति मधुर हो, महान हो। जैसे बाप का स्वभाव सदा हर
आत्मा के प्रति कल्याण वा रहम की भावना का है, हर एक को ऊंचा उठाने का, मधुरता और
निर्माणता का है। ऐसे अपना स्वभाव बनाओ। अगर तेज़ बोलने का, आवेश में आने का स्वभाव
है तो यह भी ब्राह्मण जीवन में बहुत बड़ा विघ्न है। अब ऐसे स्वभाव का परिवर्तन करो।